अलीबाबा की वो मशीन जो क्रिएटिव राइटरों लिए खतरा बन जाएगी

  • 27 सितंबर 2018
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आप किसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट पर जाते हैं, तो आप को हज़ारों प्रोडक्ट देखने को मिलते हैं. इससे जुड़ी जानकारियां मिलती हैं. फ़ोन, चार्जर, जूते, कपड़ों के बारे में अनगिनत जानकारियां होती हैं. किस साइज़ का है, किस काम आएगा, कौन सा चार्जर किस फ़ोन के लिए मुफ़ीद होगा. ये सारी बातें आप को उस शॉपिंग वेबसाइट या ऐप पर मिलेंगी.

रोज़ाना इन ऐप या वेबसाइट को खंगालते हुए आप को ये सब बहुत आम और आसान लगता होगा.

मगर, इतनी जानकारियां लिखना एक कला भी है और विज्ञान भी. इसमें बहुत मेहनत लगती है.

हाल ही में चीन की ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी अलीबाबा ने ऐलान किया है कि ये एक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी रोबोट को इस बात की ट्रेनिंग दे रहा है कि वो उसके तमाम उत्पादों के बारे में जानकारी लिखे.

रोबोट से काम लेना अब कोई नई बात नहीं रही. आज बनावटी या मशीनी अक़्ल से संगीत की धुनें तैयार करने, तस्वीरें बनाने और कविताएं लिखने के काम लिए जा रहे हैं.

आज की तारीख़ में कंप्यूटर विज्ञापन की कॉपी तक लिख रहे हैं. वो महज़ एक सेकेंड में बीस हज़ार वाक्य लिख मारते हैं.

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के जुन वैंग कहते हैं कि, 'जेनरेटिव बॉट्स आज के ज़माने का सबसे नया चलन है. इनके ज़रिए सिर्फ़ कॉपी लिखने का काम नहीं, बल्कि बहुत से और काम कराए जा रहे हैं.'

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इंसान और मशीन के बीच धुंधला होता फ़र्क़

अलीबाबा ने जो मशीनी कॉपी राइटर लॉन्च किया है, उसका नाम रखा है-अलीमामा. ये भाषा की समझ रखता है. विषय को समझता है. अलीबाबा की वेबसाइट पर मौजूद दसियों लाख प्रोडक्ट के बारे में इसके पास जानकारी है. इन चीज़ों के बारे में वो ख़ुद से विस्तार से लिख सकता है.

अलीबाबा के प्रवक्ता ने बताया था कि, 'ये मशीनी कॉपी राइटर अपने प्रतिद्वंदी के उत्पाद देख कर उनसे बेहतर लाइन सोचने में बर्बाद होने वाले वक़्त को बचाएगा. इस मशीनी लेखक को चलाने वाला इंसान कुछ बटन दबाएगा और बस एक शानदार कॉपी तैयार होगी, जो ख़ूबसूरत तरीक़े से उस उत्पाद की जानकारी को बयां करेगी.'

कला की दुनिया में तो अक़्लमंद मशीनें पहले ही इंसानी अक़्ल को चुनौती दे रही हैं. अब विज्ञापन के मैदान में इनके उतरने से मुक़ाबला और दिलचस्प होने वाला है. ये सॉफ्टवेयर लाखों शब्द और तस्वीरें ऑनलाइन दुनिया में दर्ज करेंगे. इन्हें लाखों-करोड़ों लोग देखेंगे और प्रभावित होंगे. अगर ये मशीनें अपना काम सही तरीक़े से कर पाईं, तो इनके लिखने और किसी इंसान के लिखने में फ़र्क़ हम शायद ही महसूस कर पाएं.

ऑनलाइन दुनिया में इंसान और मशीन के बीच का फ़र्क़ बहुत धुंधला हो गया है. आज सोशल मीडिया जैसे ट्विटर पर बॉट्स ग़लत जानकारी फैला देते हैं. हमें आटोमैटिक तरीक़े से लिखे गए स्पैम ई-मेल मिलते हैं, जिनमें उत्पाद जैसे वियाग्रा के बारे में काव्यात्मक तरीक़े से विज्ञापन लिखा होता है. आज ऑनलाइन दुनिया में स्वचालित तरीक़े से बहुत सी ख़बरों को फिर से छाप दिया जाता है. वो भी पलक झपकते ही. हम पता नहीं लगा सकते कि किसी ख़बर का असल सोर्स क्या था. उसे सबसे पहले किस ने कहां छापा था.

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विज्ञापन की दुनिया में मशीनों का इस्तेमाल

अलीबाबा के मशीनी कॉपीराइटर अलीमामा से जुड़ी ख़बर को ही लीजिए. कंपनी ने जो प्रेस रिलीज़ अंग्रेज़ी में जारी की थी, उसे ब्रिटेन, अमरीका और भारत की कई वेबसाइट ने छापा था.

पर, आप ये जान कर हैरान रह जाएंगे कि अलीमामा के बारे में जो पहली जानकारी इंटरनेट पर आई थी, वो यू-ट्यूब के अनजान से चैनल 'ब्रेकिंग न्यूज़' पर दर्ज हुई थी. एक मशीनी आवाज़ इस वीडियो में ख़बर पढ़ती हुई सुनाई देती है. जो आवाज़ आप सुनते हैं, वही शब्द सब-टाइटिल के तौर पर स्क्रीन पर नज़र आते हैं. साथ ही इस वीडियो में अलीबाबा से जुड़ी हुई पुरानी तस्वीरें दिखाई देती हैं.

इसी वीडियो में एक लिंक है, जो इस ख़बर के सोर्स के बारे में बताता है. और इस वीडियो न्यूज़ का सोर्स भारत में स्थित एक वेबसाइट-इंटरनेशनल बिज़नेस टाइम्स है.

वीडियो देखकर साफ़ ज़ाहिर होता है कि ख़बर को असलियत का जामा बड़े वाहियात तरीक़े से पहनाया गया है. ये वीडियो न्यूज़ एक सॉफ्टवेयर की तैयार की हुई है. मज़े की बात ये है कि इस 'ब्रेकिंग न्यूज़' चैनल पर इससे पहले आपने कोई और ख़बर नहीं देखी होगी, सिवा फुटबॉल के मैचों के और वो भी किसी और स्रोत से उठाई गई ख़बरें होती हैं.

हो सकता है कि इस वीडियो चैनल को चलाने वाले लोग ही ख़बरों को तय करते हैं. लेकिन, ख़बरें तैयार करने या इस चैनल से जुड़े ट्विटर एकाउंट को देखकर साफ़ हो जाता है कि इसे सॉफ्टवेयर की मदद से चलाया जा रहा है. तो, एक आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी ख़बर को दूसरे एआई ने तैयार कर के आप के सामने पेश किया है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के वैंग मानते हैं कि विज्ञापन की दुनिया में मशीनों का इस्तेमाल करने में कोई हर्ज नहीं. वैंग कहते हैं कि, 'ये विज्ञान फंतासी नहीं है. आप अपने उत्पाद को ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं, ताकि वो देखें और ख़रीदें. हम यहां किसी कला को तैयार करने की बात तो कर नहीं रहे.'

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अलीबाबा के एआई बॉट का इस्तेमाल आसान है. आप जिस उत्पाद की विज्ञापन कॉपी लिखवाना चाहते हैं, उसका लिंक इस अलीमामा में दर्ज करना होगा. कुछ ही सेकेंडों में ये आप को विज्ञापन की कई कॉपी दे देगा. आप को जो बेहतर लगे, वो इस्तेमाल कर लें. ज़रूरत के मुताबिक़ काट-छांट कर लें.

अलीबाबा के मुताबिक़ ये बॉट एक सेकेंड में 20 हज़ार लाइनें लिख सकता है. कंपनी एक दिन में इसे दसियों लाख दफ़ा इस्तेमाल कर रही है. अलीबाबा के एआई बॉट अलीमामा को अमरीकी कपड़ा कंपनी डिकीज़ भी इस्तेमाल कर रही है. डिकीज़ इस एआई यानी अलीमामा की मदद से अपने विज्ञापन की तमाम कॉपी तैयार कराती है, जो अलग-अलग लोगों तक पहुंचेंगे.

अलीबाबा ही नहीं, इसकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी, जेडी डॉटकॉम (JD.com) भी एक सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करती है, जो कंपनी के उत्पादों के बारे में जानकारी लिखते हैं. इसका नाम है जेडडीनेट (ZDNet). एक दिन में ये एक हज़ार विज्ञापन कॉपी लिख सकता है. ये सॉफ्टवेयर ख़ूब रच-रचकर कॉपी लिख सकता है. मुहावरेदार भाषा का इस्तेमाल कर सकता है. जैसे ये शादी की अंगूठी को इस तरह बयां करता है-आसमान से टपकी शादी की पवित्र बूंदें.

जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के मार्क रीडल को लगता है कि ये सॉफ्टवेयर भले ही विज्ञापन के लिए अच्छे वाक्य गढ़ लें, मगर ये सॉफ्टवेयर अच्छे पीआर की जगह नहीं ले सकते. रीडल पूछते हैं कि क्या ये आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस लेखक इस बात का यक़ीन दिला सकते हैं कि वो लोगों को उत्पाद देखने के बाद ख़रीदने के लिए मजबूर कर सकें.

मार्क रीडल के मुताबिक़, कैमरे की मदद से किसी प्रोडक्ट की तस्वीर देखकर कुछ की-वर्ड की मदद से उसके बारे में विज्ञापन की कॉपी तो मशीनी अक़्ल लिख सकती है. इसे देखकर ऐसा ही लगेगा कि किसी इंसान ने ये बातें लिखी हैं. मगर इससे किसी प्रोडक्ट की बिक्री होगी या बढ़ेगी ये कहना ज़रा मुश्किल है. ऑनलाइन दुनिया में तो मुक़ाबला बेहद कठिन है. किसी भी प्रोडक्ट को पसंद करने वाले ग्राहकों की ख़ास जमात को प्रभावित करने के लिए ऑनलाइन दुनिया में होड़ लगी रहती है.

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मार्क रीडल कहते हैं कि आप सिर्फ़ ये तो नहीं लिख सकते कि ये फलां कैमरा है. इसकी ये ख़ूबियां है. आप को ये बताना होगा कि फलां कैमरा आपकी ज़रूरतें पूरी करेगा, आपकी परेशानियां हल करेगा. दूसरे कैमरे के मुक़ाबले ये वाला लेना ज़्यादा ठीक होगा.

ये साबित करने के लिए आप को संभावित ग्राहक को कई जानकारियां देनी होंगी. उसके कई सवालों के जवाब तैयार रखने होंगे.

मार्क रीडल कहते हैं कि, 'मशीन से हम किसी भी विषय की सामान्य बातें, बुनियादी जानकारियां तो बड़े आराम से लिखवा सकते हैं. लेकिन, किसी उत्पाद की दूसरों से अलग करने वाली ख़ूबियां या ग्राहकों के सवालों के रेडीमेड जवाब तैयार करना. अभी हम उससे दूर हैं.'

भले ही हम उस दिन से दूर हों, मगर उस दिशा में बढ़ ज़रूर रहे हैं, जब मशीनें हमारे मुश्किल सवालों के जवाब देंगी. दूसरे उत्पादों की तुलना में अपने प्रोडक्ट को लेने के फ़ायदे गिनाएंगी.

वैंग कहते हैं कि विज्ञापन की दुनिया में बहुत की मशीनी चीज़ें पहले ही हो रही हैं. आप अपने कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन पर जो विज्ञापन देखते हैं, वो ख़ास आप के लिए होते हैं. दूसरे को वो विज्ञापन नहीं दिखते. वजह साफ़ है. मशीनी अक़्ल आप की दिलचस्पियों को उन कंपनियों तक पहुंचाती है, जो आप तक पहुंचना चाहती हैं. अपने उत्पाद बेचना चाहती हैं. मसलन, आप जूतों के शौक़ीन हैं, तो आप को जूतों के विज्ञापन दिखेंगे.

इस बात को ऐसे समझें. जैसे ही आप को वेब पेज खोलते हैं, ऑनलाइन दुनिया में एक जंग छिड़ जाती है. आप को अपने प्रति रिझाने के लिए एक ही सेकेंड में सौ से ज़्यादा कंपनियां आप पर हमला बोलती हैं. जो इस जंग में जीतता है, उसके विज्ञापन आप को अपनी स्क्रीन पर दिखते हैं. ये फ़ैसला एक सेकेंड के सौवें हिस्से में हो जाता है. यानी आप के पलक झपकाने से भी कम वक़्त में.

वैंग की कंपनी ऐड ब्रोकरेज का काम करती है. यानी आपकी पसंद उन कंपनियों तक पहुंचाती है, जो अपने विज्ञापन आप को दिखाना चाहते हैं. उनकी कंपनी का नाम है मीडियागामा. ये कंपनी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी मशीनी अक़्ल से चलती है. वैंग कहते हैं कि, 'हम भले ही आप को न जानते हों, मगर ऑनलाइन दुनिया में आप की हर हरकत पर हमारी नज़र है.'

ऑनलाइन दुनिया में तीन सबसे बडे ऐड नेटवर्क हैं. ऐडसेंस, ऐडमॉब और डबलक्लिक. इन तीनों को गूगल चलाता है. दुनिया में ऐसी बहुत ही कम जगहें बची हैं, जहां गूगल आप का पीछा न करता हो. दसियों लाख लोकप्रिय वेबसाइट में से 75 फ़ीसद पर आप के जाते ही गूगल का ट्रैकर आप के पीछे लग जाता है.

अगर आप किसी ख़ास स्टोर से अपनी पसंद के जूते ख़रीदते हैं, तो गूगल को इसकी ख़बर हो जाती है. फिर मीडियागामा जैसी कंपनियों की अक़्लमंद मशीनें इस जानकारी को उन कंपनियों तक पहुंचाती हैं, जो अपने प्रोडक्ट आप को बेचना चाहती हैं. तो, अगर आप ने जूते ख़रीदे हैं, तो आप की स्क्रीन पर आपके पसंदीदा ब्रैंड्स दिखने लगते हैं.

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इंसानी जज़्बात पैदा करने की चुनौती

वैंग कहते हैं कि बिना आपका नाम जाने, आप की शक़्ल देखे, ऑनलाइन दुनिया में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस आप पर निगाह रखता है.

और अभी तो शुरुआत है. जल्द ही आप को मैसेज और तस्वीरें भेजकर लुभाया जाने वाला है. हाल ही में वैंग की कंपनी मीडियागामा ने ब्रिटिश सरकार का 'इनोवेशन एजेंसी' नाम का ठेका हासिल किया है. ये एक ऐसा कंप्यूटर या रोबोट विकसित करेगा, जो आप की पसंद की तस्वीरें और आप को लुभाने वाले टेक्स्ट मैसेज भेजने का काम करेगा. वक़्त ऐसा आने वाला है, जब आप की स्क्रीन पर आपके मन-माफ़िक विज्ञापन ही दिखेंगे.

कुल मिलाकर मशीनें तेज़ी से अक़्लमंदी बढ़ा रही हैं. मगर अभी भी इंसानी जज़्बात पैदा करना उनके लिए चुनौती है.

हालांकि ऐसे रोबोट तैयार हो गए हैं, जो आप के तजुर्बे को सामान्य शब्दों में बयां कर सकें. जैसे कि आप सिनेमा देखने गए और इस अनुभव को शब्द देना चाहते हैं. तो, इसे एक छोटी कहानी के तौर पर कोई मशीन लिख देगी.

एलेक्सा और सिरी जैसे पर्सनल असिस्टेंट भी आगे चल कर आप को कहानियां सुनाया करेंगे.

पश्चिमी देशों में तो सियासी प्रचार के लिए भी मशीनी अक़्ल का इस्तेमाल हो रहा है. हमारे देश में भी सोशल मीडिया पर तमाम अभियान अक़्लमंद मशीनों की मदद से चलाए जा रहे हैं. ख़ास तौर से सोशल मीडिया पर प्रचार-दुष्प्रचार और राजनीतिक माहौल बनाने-बिगाड़ने के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद ली जा रही है.

हाल ही में चीन की शिन्हुआ न्यूज़ एजेंसी ने एलान किया है कि वो सॉफ्टवेयर की मदद से ख़बरें लिखवाने का काम शुरू कर रही है. अब शिन्हुआ जैसी सरकारी प्रचार एजेंसी का ऐसा करना फिक्र की बात है. क्योंकि अगर वो कोई ख़ास न्यूज़ रिपोर्ट तैयार कर के सैकड़ों बॉट्स के ज़रिए ऑनलाइन दुनिया में प्रचारित करेगी, तो इससे लोगों की राय प्रभावित की जा सकेगी. ऐसे दुष्प्रचार का मुक़ाबला करना बहुत मुश्किल होगा.

चिंताएं भले ही हों, मगर हम बढ़ उसी तरफ़ रहे हैं. आज ज़्यादा से ज़्यादा कारोबार और राजनैतिक अभियान इन्हीं बॉट्स के ज़रिए चलाए जा रहे हैं. हम जहां भी उन्हें पकड़ सकें, हमें उनकी शिनाख़्त करनी चाहिए.

शायद हमें ख़बर भी है. क्योंकि कोई भी वेबपेज खोलते ही हम पर हमला सा हो जाता है. मगर, अभी इस बात से दुनिया ज़्यादा फ़िक्रमंद नहीं दिखती.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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