दिल्ली में पानी की 'किल्लत' का माफ़ियाई खेल क्या है

  • 15 अक्तूबर 2018
पानी का टैंकर इमेज कॉपीरइट Getty Images

हम जिस टुक-टुक यानी ऑटो पर सवार हैं, वो ऊबड़-खाबड़ रास्तों और कीचड़ भरी गलियों से आड़ा-तिरछा होकर गुज़र रहा है. इसके भीतर बैठकर हमारी जान अटकी हुई है.

मेरी गाइड जसविंदर कौर हंसते हुए कहती हैं, "मुझे इस ड्राइवर पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं पर भगवान में मेरा यक़ीन है."

हम दक्षिणी दिल्ली के जयहिंद कैंप जा रहे थे. इस कैंप में 1200 लोग रहते हैं. यहां के लोगों की ज़िंदगी पानी के इर्द-गिर्द घूमती है.

दिन में सात बार पानी के टैंकर यहां के लोगों तक पानी पहुंचाने के लिए आते हैं. जसविंदर कौर बताती हैं कि इन टैंकरों से 50 लीटर पानी हासिल करना बहुत बड़ी चुनौती थी.

जसविंदर एक स्वयंसेवी संस्था, 'फ़ोर्स' यानी फ़ोरम फ़ॉर ऑर्गेनाइज़्ड रिसोर्स कंज़रवेशन ऐंड एनहैंसमेंट' के लिए काम करती हैं. ये संस्था लोगों को साफ़ पानी मुहैया कराने में जुटी है.

पहले इस इलाक़े में अक्सर पानी का टैंकर आने पर झगड़े शुरू हो जाते थे. जो ताक़तवर होता था, वही पानी हासिल कर पाता था. झगड़े का नतीजा ये होता था कि कमज़ोर, बीमार और बुज़ुर्ग लोग पानी से महरूम रह जाते थे.

उन्हें न तो पीने का पानी मिल पाता था और न ही नहाने-धोने और कपड़े साफ़ करने के लिए.

इमेज कॉपीरइट Lou Del Bello
Image caption फ़ातिमा दिखाती हैं कि पानी के बड़े डिब्बों को कैसे कपड़े की मदद से उठाया जा सकता है

पर्ची के नुस्खे से झगड़े हुए कम

लेकिन अब जयहिंद कैंप में हालात धीरे-धीरे बेहतर हो रहे हैं. इस इलाक़े को स्लम का दर्जा हासिल है. मतलब ये कि सरकार मानती है कि ये सरकारी ज़मीन पर आबाद बस्ती है.

सरकार इस इलाक़े की सफ़ाई, पानी की सप्लाई, खान-पान और जनता की दूसरी बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज़िम्मेदार है.

यहां पर एक और एनजीओ 'वाटरएड' ने स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर सार्वजनिक शौचालयों का एक ब्लॉक बनवाया है. इससे लोगों को खुले में शौच करने से मुक्ति मिल गई है. महिलाओं को अब शौच जाने में डर नहीं लगता. पानी की बर्बादी भी कम हुई है.

इस इमारत के बीच में एक छोटा-सा अपार्टमेंट है. यहां हमारी मुलाक़ात फ़ातिमा से होती है. मज़बूत इरादों वाली फ़ातिमा हमारा स्वागत चाय के कप के साथ करती हैं. वो इस टॉयलेट ब्लॉक की मैनेजर हैं.

वो इस जगह के रख-रखाव के साथ लोगों को शौचालय इस्तेमाल करना भी सिखाती हैं. साथ ही वो चाय की एक दुकान भी चलाती हैं.

फ़ातिमा कहती हैं, "मेरे चार बच्चे हैं. छह जनों का परिवार चलाने के लिए बहुत सारा पैसा चाहिए. मेरे बच्चे बड़े हो रहे हैं. मैं उन्हें पढ़ाना चाहती हूं ताकि वो मुझसे बेहतर ज़िंदगी जी सकें."

सामुदायिक शौचालय के रख-रखाव से फ़ातिमा को घर चलाने में मदद मिल जाती है. लेकिन वो सिर्फ़ अपने परिवार की बेहतरी के लिए काम नहीं कर रही हैं. उनके ऊपर अपने आस-पास रह रहे लोगों की मुश्किलों से जूझने की भी ज़िम्मेदारी है.

जयहिंद कैंप में कई धर्मों और जातियों के लोग रहते हैं. फ़ातिमा ने एक तरीक़ा ऐसा निकाला है जिससे सब को बराबर पानी मिलता है. हर घर को एक पर्ची दी जाती है. पानी का टैंकर आने पर उन्हें ये पर्ची लेकर जाना होता है. उन्हें दोबारा पानी हासिल करने के लिए अपनी अगली बारी आने का इंतज़ार करना होता है.

फ़ातिमा बड़े फ़ख़्र से बताती हैं कि उनके इस नुस्खे से पानी को लेकर झगड़े बहुत कम हो गए हैं.

फ़ातिमा जब मुझे इस इलाक़े की तंग गलियों में लेकर जाती हैं, तो कहीं छोटा सा चर्च दिखता है और कहीं पर मंदिर. तंग गलियों में छोटी-छोटी दुकानें आबाद हैं. झुग्गियों में रह रहे लोगों की ज़िंदगी में पानी की अहमियत साफ़ नज़र आती है. उन्हें और पानी चाहिए.

इमेज कॉपीरइट Lou Del Bello
Image caption फ़ातिमा पर्ची के ज़रिए पानी लेने वालों का रिकॉर्ड रखती हैं

20 शहरों का भूजल होगा ख़त्म

लेकिन, पानी इन लोगों के लिए दुश्मन सरीखा भी साबित हो सकता है. मॉनसून आने पर यानी जुलाई से लेकर सितंबर तक, बारिश का पानी इस बस्ती में जमा हो जाता है.

इस पानी की निकासी का कोई सिस्टम नहीं है. नतीजा ये कि हर गली में छोटा-सा तालाब नज़र आता है. इनमें मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया की बीमारियों के कीटाणु आबाद रहते हैं.

हम इस बस्ती से निकलते हैं तो जसविंदर मेरा ध्यान पास ही मौजूद चमकती इमारतों की तरफ़ खींचती हैं. दिल्ली में गंदी बस्तियों के साथ ऐसी चमकती इमारतें अक्सर दिख जाती हैं.

इन ग़रीब बस्तियों को ऐसे अपार्टमेंट में घरेलू काम मिल जाता है. मध्यम वर्ग के लोगों को घरेलू कामकाज में मदद मिल जाती है.

21वीं सदी के चमकते इंडिया की बदनुमा तस्वीर है, जयहिंद कैंप. ये हिंदुस्तान की जनता के पानी के साथ मुश्किल भरे रिश्ते की बानगी है.

नीति आयोग ने आशंका जताई है कि देश के 20 शहर जिनमें दिल्ली, चेन्नई, बेंगलुरू और हैदराबाद शामिल हैं, वो 2020 तक ज़मीन के भीतर के पानी से महरूम हो जाएंगे. इसका असर 10 करोड़ से ज़्यादा लोगों पर पड़ेगा.

हालांकि, इसका ये मतलब नहीं कि दिल्ली में पानी ही नहीं बचेगा क्योंकि दिल्ली को पड़ोसी राज्यों से पानी मिलता है.

नीति आयोग के अमिताभ कांत कहते हैं कि दिल्ली, भूगर्भ जल का बेतहाशा दोहन कर रही है. इसकी भरपाई ठीक से नहीं हो पा रही है.

हम भारत में पानी के संसाधनों के रख-रखाव की बात करें, तो तस्वीर डरावनी नज़र आती है. पानी का इस्तेमाल, पीने, नहाने-धोने से लेकर सिंचाई और उद्योगों तक में होता है. हर सरकारी विभाग इस संसाधन की फ़िक्र में दुबला नज़र आता है.

इमेज कॉपीरइट Alamy
Image caption दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में पानी निकासी की व्यवस्था नहीं है

पानी का बेहतर इस्तेमाल भी हो रहा

मज़े की बात ये है कि जिन राज्यों में पानी की कमी है जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश या आंध्र प्रदेश, वो अपने यहां लोगों को पीने का साफ़ पानी पहुंचाने का काम बेहतर ढंग से कर रहे हैं. फिर चाहे बात शहरों की हो या ग्रामीण इलाक़ों की.

ये राज्य बारिश के पानी का भी संरक्षण करने में आगे हैं. सिंचाई में पानी न बर्बाद हो, इसके लिए भी इन राज्यों में नई तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है.

वहीं, पानी से लबरेज उत्तर और पूर्वी भारत के राज्यों में पानी की बर्बादी ज़्यादा देखने को मिलती है. हरियाणा और यूपी के बीच बसी दिल्ली का हाल भी जल संरक्षण के मामले में बुरा ही है.

अमिताभ कांत, पानी से जुड़ी नीति आयोग की रिपोर्ट को राज्यों को शर्मसार करने की कोशिश बताते हैं. वो कहते हैं कि राज्यों के बर्ताव की जानकारी जनता के सामने रखकर हम स्थानीय प्रशासन को अपनी अक़्ल ठिकाने लगाने पर मजबूर करेंगे.

उत्तरी भारत के राज्यों में ही देश की आधी आबादी बसती है. अनाज के उत्पादन में भी ये राज्य काफ़ी आगे हैं. अगर इन राज्यों में हालात बेहतर नहीं होते तो बाक़ी देश को खान-पान की फ़िक्र करनी पड़ सकती है. इसका सीधा असर दिल्ली पर पड़ेगा.

दिल्ली इस वक़्त आबादी के लिहाज़ से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शहर है. यहां पर क़रीब तीन करोड़ लोग रहते हैं. 2028 तक दिल्ली, आबादी के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा शहर बन जाएगी.

जैसे-जैसे दिल्ली का विस्तार हो रहा है, इसके पानी के संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है. इनके ख़ात्मे का संकट क़रीब आता जा रहा है. दिल्ली अपनी पानी की ज़रूरत के लिए यूपी और हरियाणा पर निर्भर है.

कई बार इसे लेकर सियासी तनाव बढ़ जाता है. ख़ास तौर से गर्मियों के दिनों में. इस दौरान दिल्ली में पानी की किल्लत बहुत बढ़ जाती है.

अमरीका की हवाई यूनिवर्सिटी में पानी के प्रबंधन के एक्सपर्ट प्रियम दास कहते हैं, "आगे चलकर दिल्ली हो या कोई और बड़ा शहर, ज़मीन से बेतहाशा पानी निकालने से उसके संसाधनों पर ख़तरा बढ़ना ही है. धरती की आबो-हवा बदलने से मौसम में बहुत उतार-चढ़ाव आ रहा है. ऐसे में हमें भूगर्भ जल के संसाधनों की हिफ़ाज़त पर ध्यान देना होगा."

प्रियम दास चेतावनी देते हैं, "अगर हालात पर क़ाबू न पाया गया, तो पानी की भारी किल्लत हो सकती है. इसे लेकर लड़ाई-झगड़े और बढ़ने का डर है."

इमेज कॉपीरइट Lou Del Bello
Image caption पानी भरकर अपने घर तक लाना भी बहुत मेहनत का काम है

दिल्ली का पानी माफ़िया

पानी का संकट सिर पर है, फिर भी दिल्ली में ये देखने की कोई व्यवस्था नहीं है कि कौन है जो दिल्ली के सीने से इतना ज़बरदस्त तरीक़े से पानी निकाल रहा है.

आईआईटी भुवनेश्वर के असित बिस्वास कहते हैं, "कोई भी इस बात की निगरानी नहीं कर रहा है कि दिल्ली में भूगर्भ जल का दोहन कहां हो रहा है. अगर दिक़्क़त होती है तो लोग अधिकारियों को कुछ हज़ार रुपयों की रिश्वत देकर अपनी चोरी छुपा लेते हैं."

असित बिस्वास का इशारा देश के पानी के कारोबार की तरफ़ है. वो पानी माफ़िया की बात कर रहे हैं. दिल्ली में पानी माफ़िया का कितना जो़र है, ये बात किसी से छुपी नहीं है.

दिल्ली के सियासी लीडर माफ़िया को क़ाबू करने में दिलचस्पी नहीं रखते. असित बिस्वास कहते हैं कि इससे नेताओं को फ़ायदा होता है.

बिस्वास के मुताबिक़, "पानी की जितनी किल्लत होती है, उतनी मांग बढ़ती है. लोग पानी सप्लाई करने वाले माफ़िया के पास जाने को मजबूर होते हैं. दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारी और नेता मिलकर सरकारी टैंकरों से पानी की निजी तौर पर सप्लाई कराते हैं."

पानी माफ़िया और नेताओं के इस गठजोड़ का खामियाज़ा समाज के कमज़ोर तबके के लोगों को उठाना पड़ता है. जो अवैध बस्तियां होती हैं, उन्हें पानी पहुंचाने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती नहीं. यहां रहने वाले लोग पानी माफ़िया के रहमो-करम पर जीते हैं. उन्हें रोज़ाना की पानी की ज़रूरत के लिए मोटी रक़म चुकानी पड़ती है.

2016-17 में सामने आए टैंकर घोटाले में अधिकारियों-नेताओं की पानी माफ़िया से मिलीभगत उजागर हुई थी.

इसके बावजूद दिल्ली पर पानी माफ़िया की पकड़ ढीली नहीं पड़ी है.

दिल्ली के जल संकट की बड़ी वजह इसकी तेज़ी से बढ़ती आबादी है. बड़ी तादाद में दूसरे राज्यों के लोग रोज़गार की तलाश में यहां आकर बस गए हैं. राजधानी में बड़े पैमाने पर अवैध बस्तियां और जयहिंद कैंप जैसे स्लम आबाद हैं.

2012 की जनगणना के मुताबिक़, दिल्ली में 10 लाख से ज़्यादा लोग स्लम में रहते हैं. पिछले छह सालों में इसमें ज़बरदस्त तेज़ी आई है.

इमेज कॉपीरइट Lou Del Bello
Image caption पश्चिमी दिल्ली के कीर्ति नगर में पानी की टोंटी पर दो वॉल्व लगे हैं ताकि पानी की लीकेज न हो

पानी के रखवाले

इस डरावनी तस्वीर के बीच उम्मीद की किरणें भी दिखती हैं. पश्चिमी दिल्ली का कीर्ति नगर इलाक़ा इसकी बानगी है. यहां पर बाहर से आकर बसे कुछ लोग हमें रास्ता दिखाते हैं कि पानी के संकट से निपटा जा सकता है.

यहां के स्लम में भी सब को बराबर पानी मिलता है. यहां पर घर बेहतर ढंग से सजे-संवरे दिखते हैं. पुरानी इमारतें पीले, नीले और गुलाबी रंग से रंगी दिखती हैं.

चटख ड्रेस पहने हुए कुछ महिलाएं हमें बस्ती में ले जाती हैं. वो हमें बताती हैं कि कैसे इस इलाक़े में रोज़ सुबह-शाम लोगों के दरवाज़ों तक पानी पहुंचाया जाता है.

इस बस्ती में पानी की सप्लाई करने वाले पाइप का जाल बिछाया गया है. हर घर तक इस पाइप से पानी पहुंचता है. ये दिल्ली के उन गिने-चुने स्लम में से है, जहां सरकार पानी की पाइप से सप्लाई में सहयोग करती है.

कीर्ति नगर के स्लम में रहने वाली कृष्णावती बताती हैं कि इस सिस्टम से पानी मिलने से पहले उन्हें दिन में कई घंटे पानी के जुगाड़ पर ख़र्च करने पड़ते थे.

अब बस उन्हें नल खोलना पड़ता है और ज़रूरत का पानी मिल जाता है. पानी की क्वालिटी भी बेहतर है. पहले संक्रमित पानी मिलता था. अब साफ़ पानी मिलने लगा है.

कृष्णावती और उनकी सहेलियां ही पानी सप्लाई के इस सिस्टम की निगरानी करती हैं. वो पाइप का रख-रखाव करती हैं. कहीं ख़राबी आने पर अधिकारियों को इत्तिला करती हैं, ताकि तुरंत मरम्मत हो सके.

पानी की ठीक ढंग से सप्लाई में इलाक़े कि इन महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान है.

वैसे इस व्यवस्था में भी कमियां हैं. जानकार मानते हैं कि नियमित सप्लाई न होने से पाइप जल्दी ख़राब होंगे. उससे आगे चलकर ज़्यादा पानी बर्बाद होने का डर है. पर फ़िलहाल तो ये तजुर्बा कारगर साबित हो रहा है. पानी की बर्बादी तो रुक ही गई है. लोग एक-दूसरे से मिलकर पानी का संरक्षण भी कर रहे हैं.

कीर्ति नगर में पानी की सप्लाई के इस सिस्टम की सबसे ख़ास बात ये है कि इसके रख-रखाव की ज़िम्मेदारी किसी एक इंसान की नहीं है. इससे भ्रष्टाचार की आशंका बहुत कम हो गई है.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ़्यूचर पर उपलब्ध है.)

ये भी पढ़ें:

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए