क्या नेपाल के पास है घरेलू हिंसा का समाधान?

  • 2 नवंबर 2018
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एक अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भारी भीड़ है. इसी भीड़ में डॉक्टर प्रभात रिजाल को एक मरीज़ दिखी जिसके बदन पर छिलने और खरोंच के निशान थे.

उस महिला के आने की उम्मीद डॉक्टर प्रभात को पहले से थी. हम जिस अस्पताल का ज़िक्र कर रहे हैं, वो नेपाल के पश्चिमी इलाक़े में स्थित घोराही क़स्बे का क्षेत्रीय अस्पताल है.

डॉक्टर प्रभात और उनके साथी डॉक्टरों का साबक़ा हर रात ऐसे मरीज़ों से पड़ता है.

आम तौर पर ऐसे चोटिल मरीज़ शाम ढलने के बाद आते हैं. होता ये है कि इस वक़्त कई शराबी मर्द काम से लौटते हैं और शराब पीना शुरू करते हैं.

फिर वो अपनी बीवियों से मार-पीट करते हैं.

पतियों की हिंसा की शिकार महिलाएं अक्सर अपना पेट दबाए हुए आती हैं. कई बार उन्हें कान में दर्द की भी शिकायत होती है.

लेकिन अस्पताल के डॉक्टर और नर्सें पहले इन महिलाओं के बदन पर चोट और खरोंच के निशान देखते हैं. इन्हीं से असल बात पता चलती है.

घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं

उस महिला को देखते ही डॉक्टर प्रभात रिजाल को लगा कि कुछ गड़बड़ है. उन्होंने महिला से पूछा कि क्या हुआ है? महिला अपने पति की पिटाई से बचने के लिए भागकर अस्पताल आई थी. वो अभी भी हांफ रही थी. उसके बाल पसीने से भीगे हुए थे.

रात के वक़्त अस्पताल का इमरजेंसी वार्ड काफ़ी व्यस्त रहता है, तो डॉक्टर रिजाल एक नर्स के साथ उस महिला को एक प्राइवेट कमरे में ले गए. उन्होंने कमरे का दरवाज़ा बंद कर दिया.

इसके बाद उन्होंने महिला से बात कर के पूरा मामला समझा. उसे समझाया कि पति का मार-पीट करना सामान्य बात नहीं है. उसे ये हरकतें बर्दाश्त करने की ज़रूरत नहीं है.

कुछ देर बाद नर्स उसे पास ही स्थित एकद्वार संकट व्यवस्थापन केंद्र ले गई. ये वो जगह है जहां पर ऐसी घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद का पूरा इंतज़ाम है.

इन केंद्रों पर एक महिला पुलिस अधिकारी होती है और कुछ सलाहकार होते हैं. जो महिला को मानसिक तनाव और आर्थिक चुनौतियों से उबरने में मदद करते हैं.

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पति, लिव-इन पार्टनर या ब्वॉयफ्रैंड के हाथों हिंसा की शिकार होने वाली महिलाओं को सेहत से जुड़ी कई मुश्किलें झेलनी पड़ी हैं. इसकी शुरुआत डॉक्टर के पास जाने से होती है.

कई बार यहां डॉक्टर वो परेशानियां न सिर्फ़ देख पाते हैं बल्कि उनसे निपटने में मदद भी करते हैं, जिनकी शिकार ये महिलाएं होती हैं.

बहुत से देशों में सरकारें अस्पतालों में ऐसी सुविधाएं देने से कतराते हैं. लेकिन, नेपाल ने घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद के लिए अस्पतालों में ही ऐसे केंद्र बनाए हैं, जो घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद करते हैं.

इन केंद्रों में ज़्यादातर महिलाओं को ही नियुक्त किया जाता है. जो इन महिलाओं की हर तरह से मदद करते हैं.

कितनी ख़तरनाक है घरेलू हिंसा

यूं तो कोई भी साथी के हाथों हिंसा का शिकार हो सकता है. पर, महिलाएं इसकी शिकार ज़्यादा होती हैं.

पूरी दुनिया में किसी भी रिश्ते में रही महिलाओं में से एक तिहाई यौन हिंसा या शारीरिक हिंसा की शिकार होती हैं.

किसी संघर्ष से गुज़र रहे देशों में ऐसी घटनाएं ज़्यादा देखी जाती हैं. जैसे कि कांगो और युगांडा जैसे हिंसक संघर्ष देख रहे देश. अभी भी एशिया, अफ्रीका और ओशियानिया के देशों में घरेलू हिंसा की घटनाएं बहुत होती हैं.

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ऐसा नहीं है कि साथी के हाथों हिंसा की घटनाएं केवल विकासशील देशों में होती हों.

डेनमार्क में कुल आबादी की एक तिहाई महिलाएं जीवनसाथी के हाथों हिंसा झेल चुकी हैं.

ब्रिटेन में 30 फ़ीसद के क़रीब महिलाएं कम से कम एक बार अपने पार्टनर के हाथों हिंसा की शिकार हुईं. अमरीका में ये तादाद 32 प्रतिशत है. इनमें से 16 फ़ीसद ने तो यौन हिंसा को भी झेला है.

पार्टनर या जीवनसाथी के हाथों हिंसा की शिकार महिलाओं की सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ता है.

अमरीका में क़रीबी साथी के हाथों हिंसा से बीस लाख से ज़्यादा चोट की घटनाएं होती हैं. यानी ये मोटापे और धूम्रपान से ज़्यादा गंभीर समस्या है.

पीड़ित महिलाओं को भयंकर दर्द, अस्थमा, नींद न आने, पेट ख़राब होने, डायबिटीज़ और यौन संक्रमण की शिकायतें होती देखी गई हैं.

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हिंसा की शिकार महिलाओं के ख़ुदकुशी करने की आशंका बढ़ जाती है. वो अक्सर डिप्रेशन, फिक्र करने, दौरे पड़ने और तनाव की शिकार हो जाती हैं.

ऐसी महिलाओं को जो पहली मदद मिलती है, वो ठिकाना अस्पताल होते हैं. अमरीका में दूसरे लोगों के मुक़ाबले साथी के हाथों हिंसा की शिकार महिलाएं ढाई गुना ज़्यादा अस्पताल जाती हैं.

अमरीका में क़त्ल होने वाली 40 प्रतिशत महिलाओं की हत्या उनके क़रीबी साथी ही करते हैं. यानी हिंसा की शुरुआत होने के बाद अगर उन्हें मदद मिल जाए, तो जान बचाई जा सकती है.

हाल ही में हिंसा की शिकार 1554 महिलाओं पर हुई रिसर्च से पता चला कि इनमें से 88 प्रतिशत का गला दबाने की कोशिश हुई थी.

अक्सर होता ये है कि अस्पताल के कर्मचारी ऐसी महिलाओं की मदद के लिए प्रशिक्षित नहीं होते.

घरेलु हिंसा का इलाज़

ब्रिटेन में अस्पताल के कर्मचारियों को जो ट्रेनिंग दी जाती है, उसमें घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की मदद के तरीक़े नहीं बताए जाते.

हालांकि अमरीका में अफोर्डेबल केयर एक्ट नाम का क़ानून है. इसमें हिंसा की शिकार महिलाओं के बीमा में उनको सलाह देने का ख़र्च भी शामिल होता है.

अस्पताल के कर्मचारियों को घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की पहचान करने और उनकी मदद करने की ट्रेनिंग इस बात पर निर्भर होती है कि लोगों की सेहत का ख़र्च उठाता कौन है.

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ऑस्ट्रेलिया की एक्सपर्ट केल्सी हेगार्टी कहती हैं कि सरकार निजी अस्पतालों से ऐसी मदद देने की उम्मीद नहीं कर सकतीं. कई बार स्वयंसेवी संस्थाएं ये काम करती हैं.

हेगार्टी कहती हैं कि जो चुनौती अस्थमा और डायबिटीज़ से भी ज़्यादा व्यापक है, उसके प्रति ऐसी अनदेखी परेशान करने वाली है.

ऐसी महिलाओं की मदद न करने के नतीजे ख़तरनाक हो सकते हैं.

लेबनान में हुई रिसर्च में पता चला कि हिंसा की शिकार महिलाओं के बारे में अस्पताल के कर्मचारी ये मानते हैं कि आक्रामक महिलाओं से ऐसी हिंसा वाजिब है.

इसीलिए अक्सर मरीज़ घरेलू हिंसा की घटनाओं को छुपाती हैं. नेपाल की आधी महिलाएं घरेलू हिसा की शिकार हो चुकी हैं. उन्हें लगता है कि अस्पताल में किसी को इस बारे में बताएंगी तो वो उन पर हंसेंगे. उन पर अच्छी बीवी न होने का आरोप लगाएंगे.

घरेलु हिंसा पर पुलिस का नज़रिया

नेपाल की रहने वाली नेहा ऐसी ही घरेलू हिंसा की पीड़ित महिला हैं. नेहा बताती हैं कि जब वो पुलिस के पास गईं, तो किसी ने पति के हाथों उनके पिटने की शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया. इसके बाद वो नेपाल के मदद करने वाले एकद्वार केंद्र में गईं.

बहस इस बात पर छिड़ी है कि अस्पताल के कर्मचारी किस तरह से नेहा जैसी घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की पहचान करें?

कुछ लोगों का कहना है कि ऐसी महिलाओं की जांच हो जिनके बारे में शक हो कि वो पति या साथी के हाथों हिंसा की पीड़ित हैं.

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ऐसी महिलाओं से पहले ये पूछना पड़ेगा कि क्या वो घर में मार-पीट से परेशान हैं. लेकिन, इस सवाल से मदद हो पाएगी, कहना मुश्किल है.

बहुत से जानकारों को लगता है कि नेपाल ने जैसी व्यवस्था की है, वो महिलाओं को घरेलू और यौन हिंसा से उबरने में मदद कर सकती है.

नेपाल कैसे इन महिलाओं की मदद?

नेपाल के घोराही में स्थित एकद्वार संकट निवारण केंद्र में माया एक हरे रंग के बेड पर लेटी हुई थीं. वो एक दिन पहले अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में आई थीं.

अब वो इस केंद्र में राधा पौडेल से मिलने आई थीं. राधा उनके पास ही बैठी हुई थीं.

उन्होंने माया के बदन पर लगे चोट के निशान देखे. पास ही काग़ज़ पर उनकी चोट और तकलीफ़ों को तफ़्सील से दर्ज किया गया था.

माया को सिरदर्द, हाथ में चोट, सिर में सूजन, सीने में दर्द और पीठ मे खिंचाव की शिकायतें थीं.

राधा ने माया से फुसफुसाते हुए पूछा कि, 'तुम तो पहले भी अपने पति के साथ यहां आई थीं, न.'

माया ने कहा कि उनके पति ने आज आने से मना कर दिया था. वो घर पर बच्चों की रखवाली कर रहा था.

माया ने कुछ महीनों पहले अपने पति के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई थी. उसे कुछ दिनों तक गिरफ़्तार कर के रखा गया था.

बाद में माया ने उससे तलाक़ की अर्ज़ी डाल दी. केंद्र की पुलिस अधिकारी सबिता थापा ने उनकी मदद की. थापा, इस केंद्र में ही तैनात हैं.

राधा ने माया को पास ही स्थित महिलाओं की एक संस्था तक पहुंचाया, जो माया को कमाई करने में मदद कर रही है.

अब ये व्यवस्था पूरी तरह से ठीक हो या न हो, मगर, ये नेपाल की महिलाओं की मददगार साबित हो रही है. माया मदद मिलने के बाद भी हिंसा की शिकार होती रही थी. पर, आख़िर में उसे एकद्वार केंद्र से क़ानूनी, मेडिकल और आर्थिक मदद मिली.

स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका

नेपाल ने पहला एकद्वार संकट निवारण केंद्र 2011 में खोला था. इसकी शुरुआत मध्य नेपाल से हुई थी. अब देश के कई अस्पतालों से जुड़े मदद के ऐसे केंद्र काम कर रहे हैं.

2015 में नेपाल की सरकार ने ऐसे केंद्रों को लेकर नियम-क़ायदे तय कर दिए. तय हुआ कि अस्पतालों के कर्मचारी ऐसी महिलाओं को देखें, तो उन्हें इन मददगार केंद्रों तक पहुंचाएं. इसमें स्वयंसेवी संगठन जपीगो और संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी नेपाल की मदद की.

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नेपाल में अब तक सैकड़ों स्वास्थ्य कर्मचारियों को महिलाओं की मदद की ट्रेनिंग दी जा चुकी है. इनमें महिलाओं की डॉक्टरों से लेकर पारिवारिक डॉक्टर और अस्पतालों के छोटे कर्मचारी शामिल हैं.

घोराही में स्थित अस्पताल के कर्मचारी मानते हैं कि हिंसा पीड़ित महिलाओं के लिए ये केंद्र बहुत काम के साबित हुए हैं. 2013 में केवल 73 महिलाएं इन केंद्रों में आईं. अगले चार सालों में ये संख्या बढ़कर 493 पहुंच गई.

इस योजना का प्रोटोकॉल तय करने वाली महिलाओं में से एक सरोजा पांडे कहती हैं कि स्वास्थ्य कर्मचारी ऐसे मामलों में मदद का हाथ बढ़ाने से कतराते थे.

वो महिलाओं को इन केंद्रों तक भेजते और फिर छुट्टी पा जाते थे. कई महिलाएं दोबारा आती नहीं थीं. वो डर के मारे घर बैठ जाती थीं. कइयों ने तो ख़ुदकुशी कर ली

लेकिन, अब नेपाल के स्वास्थ्य कर्मचारियों को हिंसा पीड़ित महिलाओं की मदद की व्यापक ट्रेनिंग दी जा रही है. उन्हें महिलाओं से बातचीत का तरीक़ा बताया जाता है.

यहां तक कि कई कर्मचारियों को पीड़ित का रोल देकर भी समझाया जाता है कि कैसे मदद करें. अदालत की प्रक्रिया की जानकारी भी दी जाती है.

सेवाभाव से की जाती है महिलाओं की मदद

कर्मचारियों को बताया जाता है कि वो ऐसी महिलाओं से हमदर्दी रखें. ट्रेनिंग देने वाले ईश्वर प्रसाद उपाध्याय कहते हैं कि कर्मचारियों को समझाया जाता है कि ये सिर्फ़ एक काम नहीं है.

उन्हें समझाया जाता है कि अगर उनका दिल गवाही नहीं देता, तो महिलाओं की मदद से ख़ुद को दूर ही रखें. उन्हें महिलाओं के प्रति सेवा का भाव रखने की सीख दी जाती है.

नेपाल के अलावा रवांडा, ग्वाटेमाला, भारत, इंग्लैंड, मलेशिया दक्षिण अफ्रीका और कोलंबिया में भी इससे मिलती-जुलती व्यवस्था है.

जॉर्डन और डोमिनिकन रिपब्लिक जैसे देशों में तो मरीज़ों की पड़ताल की जाती है कि कहीं वो घरेलू हिंसा की शिकार तो नहीं.

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जानकार कहते हैं कि सिर्फ़ स्वास्थ्य सेवा के कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने से काम नहीं बनेगा. ऐसी महिलाओं के रहने की व्यवस्था करनी होगी. उन्हें कमाई के ज़रिए देने होंगे. तभी वो हिंसा के दुष्चक्र से निकल पाएंगी.

घोराही में कई बार मदद मिलने में देर होने से महिलाएं दोबारा ऐसे केंद्र में नहीं आती हैं. वो मार-पीट करने वाले पतियों के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत करने के बजाय परिवार या रिश्तेदारों की मदद से मामले का निपटारा करने की कोशिश करती हैं.

नेपाल में कई बार पुलिसवाले भी महिलाओं को बातचीत से मसला सुलझाने की सलाह देते हैं. हालांकि इससे महिलाओं के और हिंसा के शिकार होने का डर बढ़ जाता है.

अमरीका में हुई रिसर्च से ये बात साबित भी हो चुकी है.

जानकार कहते हैं कि स्वास्थ्य सेवा से जुड़े कर्मचारियों को हिंसा पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं है. वो ऐसे भी मदद कर सकते हैं. उन्हें महिलाओं की मदद करने वालों से मिलवा सकते हैं. हिंसा पीड़ित महिलाओं से बहुत सावधानी से सवाल पूछे जाने चाहिए.

अगर कोई महिला सवाल का जवाब देने में हिचकिचाए, तो उनसे अपने साथी से रिश्ते के बारे में पूछा जाना चाहिए.

फिर उसे सलाह देने वालों के पास भेजा जाना चाहिए. अगर महिलाओं के साथ आए परिजन या रिश्तेदार उन्हें अकेला नहीं छोड़ते तो शक की वजह बनती है.

लेबनान के जिनान उत्सा कहते हैं कि जो महिलाएं मार-पीट के बावजूद अपने पार्टनर के साथ रहना चाहती हैं, उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए. घर में कोई हथियार या नुकीली-धारदार चीज़ नहीं होनी चाहिए.

वो महिलाएं जिन्हें मिली मदद

महिलाओं के पास मदद करने वालों के नंबर होने चाहिए. हिंसा करने वाले के घर पर रहने के दौरान दरवाज़े इस तरह से नहीं बंद होने चाहिए कि निकलना मुश्किल हो.

जिनान उत्सा कहते हैं कि पीड़ित महिलाओं से बात करना, उनकी बातें सुनना अपने आप में एक तजुर्बा है. इससे महिलाओं को ये एहसास होता है कि वो अकेले नहीं हैं.

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पति के हाथों हिंसा की शिकार सबिता इस बात से सहमत हैं. एक बार वो ज़ोरदार बारिश के बीच घोराही के मदद केंद्र पहुची थीं. वो एक कोने में बैठकर बस कर्मचारियों को काम करते हुए देख रही थीं.

तीन साल पहले ही वो इस केंद्र में अपनी शिकायत लेकर आई थीं. अब सबिता अक्सर यहां सलाह-मशविरे के लिए आती रहती हैं. बाद में पति से समझौता हो गया था और वो उनके साथ रहने लगी थीं. इस केंद्र की मदद से ही वो डिप्रेशन से उबर सकीं.

अब सबिता हिंसा पीड़ित दूसरी महिलाओं को भी यहां भेजा करती हैं.

सबिता कहती हैं कि मदद केंद्र के लोगों ने उनकी जिस तरह से देखभाल की, उतना तो मां-बाप भी नहीं करते.

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