हमें भूतों पर क्यों यकीन करना चाहिए

  • 10 नवंबर 2018
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पश्चिमी देशों में हैलोवीन का त्यौहार ऐसा मौक़ा होता है, जब भूत-प्रेत और अजीबो-ग़रीब तरह की चीज़ों की नुमाइश होती है. ये वो मौक़ा होता है, जो गुज़र चुके लोगों के धरती पर उतर आने जैसा माहौल देता है.

पर, क्या हम भूतों से ज़िंदगी के कुछ अहम सबक़ भी सीख सकते हैं?

चलिए, इस सवाल का जवाब तलाशते हैं.

आज के हैलोवीन त्यौहार की बुनियाद में सेल्टिक परंपरा का पर्व समहैन था. ईसा से बहुत पहले के भूमध्य सागर और यूरोप में रहने वाले लोग सेल्टिक ज़बानें बोलते थे. उनका यक़ीन बुतों और देवताओं में हुआ करता था. ये लोग समहैन त्यौहार इसलिए मनाते थे क्योंकि उनका मानना था कि साल के इस हिस्से में इस दुनिया और उस दुनिया का फ़र्क़ मिट जाता है. इंसान और प्रेत एक साथ धरती पर आबाद रहते हैं.

सातवीं ईस्वी में जब पोप ग्रेगरी, लोगों को ईसाई बनाने की मुहिम में जुटे थे, तो उन्होंने अपने प्रचारकों से अपील की कि वो पगन यानी बुतपरस्ती की परंपरा वाले लोगों की परंपराओं का विरोध न करें बल्कि उनके त्यौहारों का ईसाईकरण कर दें.

तभी से समहैन त्यौहार ऑल सेंट्स डे बन गया. इस त्यौहार में मर चुके लोगों की आत्माओं से संवाद अच्छा माना जाने लगा. ऑल सेंट्स डे को ऑल हैलौज़ डे भी कहते थे. इससे पहले की रात को हैलोज़ इवनिंग यानी हैलोवीन कहा जाने लगा.

चर्च की शुरुआती परंपराओं में बुतपरस्तों यानी पगन परंपरा की अहम बुनियाद आत्माओं से संवाद भी शामिल हो गया.

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फ़ायदे का भरोसा

भूतों पर ये यक़ीन, प्राचीन कालीन यूरोप में चर्च के लिए बहुत फ़ायदे का सौदा साबित हुआ. पोप ग्रेगरी लोगों से कहा करते थे कि जो लोग भूत देखें, वो उनके लिए दुआएं पढ़ें. क्योंकि जो लोग मर चुके हैं, उन्हें दूसरी दुनिया यानी जन्नत के सफ़र के लिए ऐसी दुआओं की ज़रूरत होती है.

मध्यकाल में भूत-प्रेत और आत्माओं का ये यक़ीन चर्च के लिए कारोबार बन गया. चर्च के पादरी लोगों से पाप की माफ़ी के बदले में मोटी रक़म वसूलने लगे. भूतों पर भरोसा चर्च के लिए कमाई का ज़रिया बन गया, तो आम जनता इस 'भूत टैक्स' से बेहाल होने लगी.

जर्मनी के धर्म प्रचारक मार्टिन लूथर की अगुवाई में चर्च के ख़िलाफ़ उठी आवाज़ बग़ावत में तब्दील हो गई. लूथर ने धर्म को लेकर अपने जो 95 उपदेश दिए, वो आज भी जर्मनी के विटेनबर्ग स्थित ऑल सेंट्स कैथेड्रल की दीवारों पर 31 अक्टूबर 1517 को दर्ज किये गए. इस सुधारवाद से ही ईसाई धर्म दो-फाड़ हो गया और प्रोटेस्टेंट व कैथोलिक फ़िरक़ों में बंट गया.

इस सुधारवादी आंदोलन की वजह से ही प्रोटेस्टेंट शाखा को मानने वाले भूत-प्रेत पर यक़ीन को कैथोलिक फ़िरक़े का अंधविश्वास कहने लगे.

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बहस ख़त्म नहीं हुई

मगर, भूत होते हैं या नहीं, ये बहस ख़त्म नहीं हुई. इस सवाल का जवाब लोगों ने विज्ञान में तलाशने की कोशिश की. उन्नीसवीं सदी के आते-आते अध्यात्मवाद ने ज़ोर पकड़ा. इसे मानने वाले ये कहते थे कि इस दुनिया से जा चुके लोग, ज़िंदा लोगों से संवाद कर सकते हैं. इसके लिए मंडलियां बैठने लगीं. आत्माओं की तस्वीरें लेने का चलन इसी दौर में बढ़ा.

पहली आलमी जंग के बाद अध्यात्मवाद का कमोबेश ख़ात्मा हो गया. लेकिन, इसका असर अब भी देखा जा सकता है. आज भी 'घोस्ट हंटर्स' वैज्ञानिक तरीक़ों से भूतों के अस्तित्व को साबित करने की कोशिश करते देखे जाते हैं.

भूत-प्रेत और जिन्नों का सवाल सिर्फ़ ईसाई धर्म का नहीं. दूसरे मज़हबों में भी इन्हें लेकर तर्क-वितर्क होते रहे हैं. हिंदू धर्म में तो बाक़ायदा गुज़री हुई आत्माओं का आह्वान किया जाता है. तंत्र-मंत्र में यक़ीन करने वाले अक्सर ये काम करते हैं. अघोरी संप्रदाय के लोग इसके लिए मशहूर हैं. पित्र पक्ष में हिंदू धर्म के लोग अपने गुज़र चुके पितरों को तर्पण देते हैं. माना जाता है कि आत्माएं वापस इस दुनिया में आती हैं. उनका स्वागत-सत्कार होता है.

ताइवान में 90 फ़ीसदी लोग भूत देखने का दावा करते हैं. ताइवान के अलावा जापान, कोरिया, चीन और वियतनाम भूतों का महीना मनाते हैं. इनमें एक ख़ास दिन प्रेत दिवस के तौर पर मनाया जाता है. इस दिन के बारे में ये मान्यता है कि 'घोस्ट डे' पर आत्माएं धरती पर मुक्त रूप से विचरण करती हैं.

इन मान्यताओं का संबंध बौद्ध धर्म की कहानी उराबोन सूत्र से बताया जाता है. इस कहानी में विवरण है कि बुद्ध एक युवा भिक्षु को अपनी गुज़र चुकी मां की मदद का तरीक़ा बताते हैं. वो युवा भिक्षु अपनी मां को 'भूखे प्रेत' के तौर पर बार-बार देखता है.

दूसरे धर्मों की ही तरह ताइवान में भी भूतों को अच्छे और बुरे के दर्जे में बांट कर देखा जाता है. दोस्ताना भूत वो होते हैं, जो पुश्तैनी या पारिवारिक रूप से जुड़े होते हैं. भूतोत्सव के दौरान इनका घर में स्वागत किया जाता है. वहीं, जो प्रेत दोस्ताना नहीं माने जाते, वो क्रोधित होते हैं या फिर भूखे. ऐसे भूत, इंसानों को डराते हैं.

नैतिकता के पथ-प्रदर्शक प्रेत

भूत-प्रेतों के बारे में जो समझ रखते हैं, उनके मुताबिक़ भूत यूं ही नहीं डराते. इसकी ख़ास वजह होती है. जैसे कि क़त्ल की अनसुलझी गुत्थी, मजबूर कर के ख़ुदकुशी कराना, ऐसे हादसे जो रोके जा सकते थे और नैतिक पतन के सबक़.

ऐसे मामलों मे देखा जाता है कि भूत क़ब्र से इंसाफ़ की गुहार लगाते हैं. वो किसी इंसान से इंसाफ़ मांग सकते हैं या फिर पूरे समाज से.

जैसे कि अमरीका में लोगों ने अफ़्रीकी मूल के मारे गए लोगों के प्रेत देखे या फिर अमरीका के मूल निवासियों के भूत देखे. न्यूयॉर्क की बिंगैमटन स्टेट यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली एलिज़ाबेथ टकर ने ऐसे तमाम क़िस्सों को इकट्ठा किया है. वो कहती हैं कि प्रेतों की ऐसी भयावाह कहानियों का ताल्लुक़ आम-तौर पर किसी बुरी घटना से पाया गया है.

इस नज़रिए से देखें, तो, प्रेत हमें नैतिकता के दाग़दार पहलू की याद दिलाते हैं. वो ये बताते हैं कि किन मामलों में इंसानों ने या समाज ने नैतिक पैमानों का पालन नहीं किया. ये करतूतें आत्मा पर बोझ की तरह महसूस होती हैं.

पर प्रेतों की कहानियां सिर्फ़ बुरे सबक़ नहीं देतीं. वो उम्मीदें भी जगाती हैं. वो ये एहसास दिलाती हैं कि मौत के बाद आप दूसरी दुनिया में जाकर भी इस दुनिया से ताल्लुक़ बनाए रख सकते हैं. अगर आपने कुछ बुरा काम किया है, तो आप के पास मौक़ा होगा कि आप पछतावा कर लें. पुराने पापों का प्रायश्चित कर लें.

तो, अगली बार किसी हैलोवीन पार्टी में जाएं, तो अपने दोस्तों के साथ हमारी ज़िंदगी में भूतों की अहमियत पर ग़ौर फ़रमाएं. ये भी सोचें कि किस तरह वो हमें बुरे रास्ते से सही रास्ते पर लाने का काम करते हैं.

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(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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