जल्द ही बर्फ़ीले पानी में समा जाएगा ये गांव

  • 15 नवंबर 2018
गायब होता एक गांव इमेज कॉपीरइट Anna Filipova
Image caption जलवायु परिवर्तन की वजह से ग्रीनलैंड के इस गांव का अस्तित्व संकट में आ गया है

ग्रीनलैंड का क़ानाक़ क़स्बा दुनिया के सबसे उत्तरी छोर पर आबाद जगहों में से एक है. जलवायु परिवर्तन के ख़िलाफ़ जंग में ये क़स्बा शहीद होने को है.

क़ानाक़ की आबादी क़रीब 650 है. यहां के ज़्यादातर बाशिंदे बर्फ़ से भी सर्द माहौल में जीते हैं.

यहां दो साल या इससे भी ज़्यादा वक़्त तक तापमान ज़ीरो डिग्री सेल्सियस से नीचे बना रहता है.

आर्कटिक में पड़ने वाला ये इलाक़ा लगातार जमा रहता है. इसकी बुनियाद पर ही यहां इमारतें और दूसरे निर्माण कार्य किए गए हैं.

लेकिन, अब धरती का तापमान बढ़ रहा है. तो क़ानाक़ की ज़मीन पिघलने लगी है. अब ये मकानों का बोझ मुश्किल से उठा पा रही है.

आगे चल कर शायद ऐसा भी न हो पाए. यानी यहां नए मकान बनाना मुमकिन नहीं रह जाएगा.

आर्कटिक इलाक़े में आबाद दूसरे क़स्बों का भी यही हाल है. लेकिन दूसरे क़स्बे तो बर्फ़ के बजाय चट्टानों पर टिके हुए हैं.

1950 के दशक में बसाया गया क़ानाक़ क़स्बा, मिट्टी, बालू और दलदली ज़मीन पर बसा है.

पिघलने लगी है 'सफ़ेद ज़मी'

चूंकि यहां 'पर्माफ्रॉस्ट' यानी सब कुछ जम जाने वाले हालात रहते हैं, तो यहां पर बर्फ़ीली ज़मीन के ऊपर ही मकान बनाए गए.

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डेनमार्क की कोपेनहेगेन यूनिवर्सिटी के सेबेस्टियन ज़ैस्ट्रज़्नी कहते हैं कि, 'चट्टान के मुक़ाबले मिट्टी और दलदली इलाक़ों में पानी होता है. ये बड़ी चुनौती होती है. जब पर्माफ्रॉस्ट के हालात होते हैं, तो ज़मीन जम जाती है. फिर ये पिघल भी जाती है. यानी ये ऊपर-नीचे होती रहती है. इसकी वजह से मकान धंस जाते हैं, लुढ़क जाते हैं या फिर गिर भी जाते हैं.'

जलवायु परिवर्तन की वजह से यहां की ज़मीन पर जमी बर्फ़ पिघल रही है.

इसकी वजह से स्थानीय निवासी ओर्ला क्लीस्ट के मकान को नुक़सान पहुंचा है.

उनके मकान के लिविंग रूम और गुसलख़ाने की दीवारों में दरारें पड़ गई हैं.

बाथरूम का फ़र्श इतना ऊबड़-खाबड़ हो गया है कि मकान की टाइलें टूट रही हैं.

ओर्ला के रसोईघर की दीवारें तो इतनी फट गई हैं कि उनसे हवा घर के भीतर आती है.

बहुत से लोगों ने अपने मकानों की दीवारों पर टेप चिपका दिए हैं ताकि सर्द हवा घर में न घुसे.

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बर्फ़ पिघलने और जमने का जो चक्र लंबे फ़ासले पर चलता था वो बड़ी तेज़ी से घूमने लगा है.

2018 में ग्रीनलैंड में कई दिन ऐसे रहे, जब तापमान 23 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया.

ये 1958-2002 के बीच के औसत तापमान से ज़्यादा है. पूरे उत्तरी आर्कटिक इलाक़े में तापमान में ये उछाल देखा जा रहा है.

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दुनिया का औसत तापमान क़रीब एक डिग्री सेल्सियस बढ़ा है. मगर उत्तरी ध्रुव पर औसत तापमान 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है.

तेजी से ग़ायब हो रही है बर्फ़

क़ानाक़ में ज़रूरी सामान की आपूर्ति साल में केवल दो बार होती है.

क़ानाक़ दुनिया के उन बचे-खुचे ठिकानों में से है, जहां समुद्र में जमी बर्फ़ के ऊपर शिकार कर के लोग ज़िंदगी बसर करते हैं.

अब ये बर्फ़ तेज़ी से पिघल रही है.

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1979 से इस इलाक़े में जमी बर्फ़ का डेटा सैटेलाइट के ज़रिए रखा जा रहा है. उसके बाद से बर्फ़ पिघलने के जो 12 साल सब से ख़राब रहे हैं, वो सभी 2007 के बाद के हैं.

सितंबर 2018 में इस इलाक़े में 1981-2010 के औसत से 26.6 प्रतिशत कम बर्फ़ थी.

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2014 में ये गिरावट 24.8 प्रतिशत थी. 2016 में औसत से 29.4 फ़ीसद कम बर्फ़ देखी गई तो 2015 में बर्फ़ का क्षेत्रफ़ल 28 प्रतिशत कम था.

यहां जमी बर्फ़ की मोटाई भी कम हो रही है. 1980 से 2008 के बीच आर्टकिट सागर की बर्फ़ की मोटाई 3.64 मीटर से घटकर 1.89 मीटर रह गई है.

खानपान पर असर डालता जलवायु परिवर्तन

स्थानीय शिकारी योर्गेन उमाक़ कहते हैं कि, 'हर साल समुद्री बर्फ़ की तादाद अलग-अलग रहती है क्योंकि गर्म मौसम की वजह से बर्फ़ की मोटाई कम रहती है. इसकी वजह से शिकारियों को अपने पुराने रास्ते बदलने पड़ते हैं. बर्फ़ मोटी न रह जाने से पुराने रास्तों से गुज़रना ख़तरनाक हो जाता है. हर साल यहां शिकार का सीज़न भी सिमटता जा रहा है.'

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समुद्र के ऊपर जमी बर्फ़ में बहुत से लोगों ने जान गंवाई है. फिर भी, ख़तरों के बावजूद कई शिकारी, सीज़न में समुद्री बर्फ़ के ऊपर डेरा जमाते हैं.

शिकार के अलावा क़ानाक़ के लोगों को पीने के पानी के लिए भी जोखिम उठाना पड़ता है.

उन्हें पीने का पानी पास की एक नदी से मिलता है. सर्दियों में इतनी ठंड होती है कि नदी जम जाती है. इसके बाद लोग बर्फ़ की सिल्लियों को ले आते हैं. जहां पर इन्हें पिघलाकर ज़रूरत का पानी तैयार किया जाता है.

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यानी पीने के पानी को लाने जैसा साधारण काम भी क़ानाक़ में जोखिम भरा हो जाता है.

क़ानाक़ के रहने वाले इनुकिटसोरसौक़ और जेनोविरा सदोराना कहते हैं कि यहां ये कोई नई बात नहीं और इससे ज़्यादा बात बिगड़ भी क्या सकती है.

ये स्थानीय जोड़ा शिकार पर ज़िंदगी बसर करता है.

मगर जलवायु परिवर्तन को लेकर जो अनुमान हैं, वो इस यक़ीन को तोड़ने वाली चेतावनी देते हैं. धरती गर्म हो रही है.

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बर्फ़ पिघल रही है. इससे क़ानाक़ के लोगों के मकान और रोज़ी के ज़रियों पर ही ख़तरा नहीं मंडरा रहा है, बल्कि उनकी सभ्यता, संस्कृति और रिवाजों के साथ-साथ उनकी हस्ती तक मिट जाने का डर क़रीब आता जा रहा है.

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