क्या इस 'टीकाकरण' से होगा फ़ेक न्यूज़ का इलाज

  • 22 नवंबर 2018
फ़ेक न्यूज़

सदियों से हम बीमारियों का इलाज करने के लिए दवाएं लेते रहे हैं. पिछले कई दशकों से बीमारी होने से पहले ही उसकी रोक-थाम के लिए टीके लगाए जाते रहे हैं.

टीके कैसे काम करते हैं, ये बात सभी को मालूम नहीं. टीका असल में हमारे शरीर को किसी बीमारी के कमज़ोर विषाणु यानी वायरस से परिचित कराता है. इससे हमारा शरीर उस वायरस से लड़ने की तैयारी करता है. हमारे शरीर में एंटीबॉडी बनते हैं. टीकों की वजह से हम पिछली सदी की कई महामारियों, जैसे ख़सरा और पोलियो का पूरी तरह से ख़ात्मा कर चुके हैं.

इक्कीसवीं सदी में फ़र्ज़ी ख़बरें यानी फ़ेक न्यूज़ महामारी की तरह फैलती जा रही हैं. तो क्या, इस महामारी का मुक़ाबला टीकाकरण से हो सकता है.

बहुत से विशेषज्ञ मानते हैं कि टीकाकरण से हम फ़ेक न्यूज़ की महामारी से निपट सकते हैं.

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर सैंडर वान डर लिंडेन ऐसे ही विशेषज्ञों में से एक हैं, जो ये मानते हैं कि फ़ेक न्यूज़ की महामारी को हम टीका लगाकर ख़त्म कर सकते हैं.

ऐसा इसलिए मुमकिन है क्योंकि फ़ेक न्यूज़ भी वायरस की तरह ही फैलती है. ये बड़ी रफ़्तार से फैलती है. दूर-दूर तक बड़ा गहरा असर करती है. असली ख़बरें इसके सामने ठहर नहीं पाती हैं.

जैसे एक मरीज़ से दूसरे मरीज़ तक दूसरी बीमारियों का वायरस फैलता है, वैसे ही फ़ेक न्यूज़ भी ट्विटर हैशटैग, व्हाट्सऐप ग्रुप और फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल के ज़रिए बड़ी तेज़ी से फैलती है. और, फ़ेक न्यूज़ ऐसी बला है कि मारे नहीं मरती. एक बार शुरू हो गई तो दौड़ती-भागती चली जाती है. नए-नए इलाक़े फ़तह करती जाती है.

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वान डर लिंडेन कहते हैं कि फ़ेक न्यूज़ रोकने की जितनी ही कोशिश की जाती है, ये उतनी ही तेज़ी से बढ़ती जा रही है. अगर ये लोगों के ज़हन में पैबस्त हो गई, तो निकालना मुश्किल हो जाता है.

इसकी रोकथाम का एक ज़रिया ये हो सकता है कि फ़ेक न्यूज़ का फैलाव शुरू होने से पहले ही ख़त्म कर दिया जाए. यानी फ़ेक न्यूज़ का हमला होने से पहले ही उसे तबाह कर दिया जाए.

मनोवैज्ञानिकों ने दुष्प्रचार रोकने के लिए टीकाकरण का प्रस्ताव 1960 के दशक में दिया था. वो दौर शीत युद्ध का था. अमरीका और सोवियत संघ एक-दूसरे के ख़िलाफ़ झूठी ख़बरों को ख़ूब ज़ोर-शोर से फैलाते थे. पर, इक्कीसवीं सदी में सूचना या फ़र्ज़ी ख़बरों के प्रचार-प्रसार का तौर-तरीक़ा पूरी तरह से बदल गया है. ज़ाहिर है, इस महामारी को रोकने के लिए टीका भी नया चाहिए. आज सियासी गोलबंदी से लेकर सांस्कृतिक युद्ध तक के लिए फ़ेक न्यूज़ का इस्तेमाल हो रहा है, ताकि अपना मोर्चा मज़बूत किया जा सके.

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ज्वलंत मुद्दे

अब जलवायु परिवर्तन को ही लीजिए. दुनिया के 97 फ़ीसद वैज्ञानिक तमाम रिसर्च के बाद इस नतीजे पर पहुचे हैं कि धरती के बढ़ते तापमान के लिए इंसानी गतिविधियां ज़िम्मेदार हैं. लेकिन, हमारे समाज का बड़ा तबक़ा है, जो ये मानने को राज़ी ही नहीं.

केवल 49 प्रतिशत अमरीकी ये मानते हैं कि कुल नहीं बल्कि आधे वैज्ञानिक ही जलवायु परिवर्तन के लिए इंसानों को ज़िम्मेदार बताते हैं. केवल 15 फ़ीसद अमरीकियों ने इस बात का सही जवाब दिया कि 91 प्रतिशत वैज्ञानिकों के हिसाब से क्लाइमेट चेंज की ज़िम्मेदार मानव जाति है.

ज़ाहिर है कि लोगों के दिमाग़ में शक के बीज बड़े शातिराना तरीक़े से बोए जा रहे हैं. दिक़्क़त ये है कि एक बार दिमाग़ में शक पैदा हो गया, तो उसे दूर करना बहुत मुश्किल हो जाता है.

इसकी बढ़िया मिसाल 2007 में अमरीका में चला 'ओरेगन याचिका' अभियान था. इसे चलाने वालों ने दावा किया कि 31 हज़ार से ज़्यादा अमरीकी वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन में इंसान का हाथ होने के दावे को मानने से इनकार किया है.

अभियान पर रिसर्च करने वालों ने तीन दस्तावेज़ तैयार किए थे. इसमें से पहला था 'ट्रुथ ब्रीफ.' इस में बताया गया था कि 97 फ़ीसद वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन के लिए इंसानों को ज़िम्मेदार मानते हैं.

वहीं, इसके जवाब में तैयार किए गए दस्तावेज़ में बताया गया था कि ओरेगन पेटिशन में जिन 31 हज़ार वैज्ञानिकों के दस्तख़त होने का दावा किया गया था, उसमें चार्ल्स डार्विन और स्पाइस गर्ल्स के भी नाम थे. वहीं, उस याचिका पर दस्तख़त करने वालों में केवल एक प्रतिशत जलवायु वैज्ञानिक थे.

फिर, इस टीम ने 2000 लोगों के बीच सर्वे किया. उनसे ये पूछा गया कि जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिकों की राय में कितना बदलाव आया है. फिर कुछ लोगों को केवल ट्रुथ ब्रीफ के बारे में बताया गया. और कुछ लोगों को काउंटर ब्रीफ के बारे में.

जिन लोगों को ट्रुथ ब्रीफ़ के बारे में पता था, उनमें से 90 प्रतिशत को वैज्ञानिकों के इस दावे पर यक़ीन था कि जलवायु परिवर्तन के लिए इंसान ज़िम्मेदार हैं. वहीं, ओरेगन याचिका के बारे में जिन लोगों ने पढ़ा था, उनमें से 63 फ़ीसद को ही वैज्ञानिकों की बातों पर भरोसा था.

लोगों के जिस समूह ने दोनों पक्षों की बातें सुनी थीं, उनमें से 72 प्रतिशत को वैज्ञानिकों की बात पर भरोसा था.

वान डर लिंडेन कहते हैं कि ग़लत जानकारी के इन ख़तरों का उन्हें अंदाज़ा तक नहीं था. फ़र्जी जानकारी से असल ख़बर को पूरी तरह से दबा दिया गया था.

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फ़ेक न्यूज़ से निपटने के लिए टीकाकरण

जब ओरेगन पेटिशन के बारे में पढ़ने वालों को ये बताया गया कि कुछ लोग उन्हें जलवायु परिवर्तन के बारे में बरगला रहे हैं. यानि इन लोगों को जब वैक्सीन दी गई, तो ऐसे 80 फ़ीसद लोगों ने वैज्ञानिकों की बातों पर यक़ीन किया.

यानी 'टीकाकरण' से फ़ेक न्यूज़ की बीमारी की रोकथाम की जा सकती है.

मनोविज्ञान के रिसर्चर जेम्स कुक की अगुवाई वाली टीम ने एक और रिसर्च की. उन्होंने यही सवाल एक और समूह से पूछा, तो साफ़ हो गया कि फ़ेक न्यूज़ पर टीकाकरण का असर होता है.

ऑस्ट्रेलिया की नेशनल यूनिवर्सिटी की एरिन न्यूमन कहती हैं कि ऐसे रिसर्च के नतीजे हौसला बढ़ाने वाले हैं.

साफ़ है कि अगर लोगों को ग़लत जानकारी के साथ सही ख़बर भी बताई जाएगी, तो वो ग़लत ख़बर को दूसरों के शेयर करने से पहले कई बार सोचेंगे.

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आख़िर फ़ेक न्यूज़ पर टीकाकरण क्यों असरदार है?

इंसान अक्सर सोचने के लिए शॉर्टकट का इस्तेमाल करते हैं. दुनिया में जानकारियों की भरमार है. हमारे ज़हन के पास इतना वक़्त नहीं है कि वो हर बात की गहराई से पड़ताल करे.

अगर आप किसी के चेहरे पर झुर्रियां और बालों को पका हुआ देखेंगे, तो दिमाग़ तुरंत बताएगा कि फ़लां शख़्स बुज़ुर्ग है. आपको बचपन से बुज़ुर्गों की यही पहचान बताई गई है. तो, दिमाग़ ने उन्हें देखा और फ़ौरन पुरानी जानकारी से इस नई तस्वीर को जोड़कर नतीजे पर पहुंचा दिया. और फिर दिमाग़ दूसरे काम में लग गया.

दुष्प्रचार करने वालों को पता है कि लोगों का दिमाग़ शॉर्ट कट पर चलता है. जैसे कि ओरेगन पेटिशन अभियान से जुड़े लोगों ने ये ग़लत दावा किया था कि उन्हें 31 हज़ार वैज्ञानिकों का समर्थन हासिल है. असल में आम लोग अक्सर किसी बात को लेकर नतीजे पर पहुंचने के लिए जानकारों की राय को अहमियत देते हैं. इसी का फ़ायदा ओरेगन पेटिशन से जुड़े लोगों ने उठाया.

कोई भी जानकारी जो आसानी से मानी जा सकती है, उस पर लोग सोचने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगाते.

किसी भी नई जानकारी पर भरोसा करने से पहले लोग इसे पांच तरीक़ों से आज़माते हैं. पहली बात तो ये कि क्या दूसरे लोग उस बात को मानते हैं? क्या उस ख़बर को सही बताने के लिए सबूत हैं? क्या नई जानकारी हमारी पुरानी जानकारी से मेल खाती है? क्या ये बात ठीक लगती है? इस ख़बर का स्रोत कितना क़ाबिले-यक़ीन है?

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बहुत बार ऐसा भी होता है कि दिमाग़ कुछ ज़्यादा ही शॉर्ट कट अपना लेता है. हम ख़ुद से पूछते ही नहीं कि जलवायु परिवर्तन के बारे में ओरेगन याचिका की शुरुआत करने वाले वैज्ञानिक कौन हैं? जिस संख्या के बारे में दावा किया जा रहा है, वो कितनी सही है.

असल में तो हर इंसान ये सोचता है कि जलवायु परिवर्तन के लिए वो ज़िम्मेदार नहीं. ऐसे में जब ओरेगन पेटिशन जैसे अभियान चलते हैं, तो लोग उन पर सहज यक़ीन कर लेते हैं.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि हमारा दिमाग़ दो तरह से काम करता है. पहला तो ये कि रोज़मर्रा की जो बातें काम की हैं, उन पर सहज भरोसा. फिर वो जानकारी किसी फ़र्ज़ी फ़ेसबुक अकाउंट से ही क्यों न मिली हो. लोग ख़बर की हेडलाइन देखते ही उस पर यक़ीन कर लेते हैं.

ऐसे ही माहौल में फ़ेक न्यूज़ फैलती है. लेकिन, फ़ेक न्यूज़ का टीका तैयार कर रहे लोगों की कोशिश होती है कि हमारा दिमाग़ किसी भी जानकारी की गहराई से पड़ताल करे.

वान डर लिंडेन कहते हैं कि टीकाकरण से हम ठंडे दिमाग़ से किसी बात की पड़ताल करते हैं. वान डर लिंडेन के मुताबिक़ हमें फ़ेक न्यूज़ के ख़िलाफ़ असल जानकारी मुहैया करानी होगी.

इससे हमारा दिमाग़ दूसरे तरीक़े से सोचेगा. नई जानकारी के आधार पर दावों को कसौटी पर कसेगा.

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फ़ेक न्यूज़ के खिलाफ टीकाकरण की चुनौतियां

सबसे बड़ी चुनौती तो यही है कि हर ख़बर के साथ आपको नए सिरे से 'टीका लगाना' होगा. ये काम बहुत मुश्किल है.

दुनिया भर में रोज़ाना हज़ारों की तादाद में ख़बरें बनती हैं. अब आप किसी विषय की पहचान कैसे पहले कर सकते हैं?

और दूसरी दिक़्क़त ये भी है कि लोगों को ये बताया जाना पसंद नहीं है कि क्या सही है और क्या ग़लत.

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अब, इसका निदान क्या है

वान डर लिंडेन कहते हैं कि जनता को ये बताया जाए कि आख़िर फ़ेक न्यूज़ फैलाने वाले करते क्या हैं? इससे लोगों को उनके तौर-तरीक़े पहले से पता होंगे. वो फ़ेक न्यूज़ के प्रति ज़्यादा सावधान होंगे.

ये तजुर्बा नीदरलैंड के छात्रों के बीच किया गया. जिसमें उन्हें ऑफ़लाइन गेम के ज़रिए बताया गया कि किस तरह से फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाई जाती हैं.

फिर ऑनलाइन दुनिया में उन्हें फ़र्ज़ी वेबसाइट बनाकर झूठी ख़बरें चलाने का मौक़ा दिया गया. वो ट्विटर पर बॉट्स ख़रीद सकते थे और अपने फॉलोवर्स की तादाद ख़ूब तेज़ी से बढ़ा सकते थे.

पूरे खेल के दौरान लोगों को फ़र्जी पहचान बनाने से लेकर दूसरों की जगह लेने, ध्रुवीकरण, साज़िशें रचने और किसी को बदनाम करने के अलावा ट्विटर-फ़ेसबुक पर ट्रोलिंग का मौक़ा मिला. यानी अगली बार जब इन छात्रों का सामना फ़ेक न्यूज़ के असली सौदागरों से होगा, तो उन्हें पता होगा कि वो कौन से नुस्खे फ़ेक न्यूज़ के प्रचार के लिए आज़माने वाले हैं.

तब वो अपने ज़हन को ज़्यादा एक्टिव बनाकर फ़ेक न्यूज़ की गहरी पड़ताल से उसे पहचानेंगे और उसे फैलने से रोकेंगे.

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यूं तो ये अजीब लग सकता है कि लोगों को फ़ेक न्यूज़ का प्रचार-प्रसार करने का तरीक़ा बताकर उन्हें इससे लड़ने के लिए तैयार किया जाए. मगर ये प्रयोग करने वालों को इस पर भरोसा है. जब टीका लगता है, तो लोग कुछ वक़्त के लिए परेशानी महसूस करते हैं. उल्टी आती है. चक्कर आते हैं. मगर बाद में वो बीमारी से लड़ पाते हैं. फ़ेक न्यूज़ से जुड़ा ये खेल उसी तरह काम करता है.

फिलहाल, फ़ेक न्यूज़ से लड़ने वाला ये गेम लंदन डिज़ाइन म्यूज़ियम मे दिखाया जा रहा है. वहीं इसे तैयार करने वाली कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की टीम फ़ेक न्यूज़ से लड़ना सिखाने वाले इस 'टीके' यानी ऑनलाइन गेम का 12 भाषाओं में अनुवाद करने जा रही है. जल्द ही एक साथ बड़ी तादाद में लोगों को तैयार किया जा सकेगा. यानी बहुत से लोगों को ये गेम खिलाकर बड़े पैमाने पर फ़ेक न्यूज़ के ख़िलाफ़ 'टीकाकरण अभियान' चलाया जा सकेगा.

फ़ेक न्यूज़ के ख़िलाफ़ ये 'टीका' कितना कारगर होगा, ये तो वक़्त ही बताएगा.

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(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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