शॉपिंग के वक़्त मोटे लोगों के साथ होते हैं ऐसे भेदभाव

  • 23 नवंबर 2018
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मोटे और वज़नदार लोग ज़माने में कई तरह के पूर्वाग्रहों के शिकार होते हैं. उन्हें नौकरी मुश्किल से मिलती है. वो आलसी और कमजोर इरादों वाले माने जाते हैं.

कुछ मामलों में दुकानदार या सेवाएं मुहैया कराने वाले लोग मोटे लोगों से कतराते हैं. कई लोग तो उन्हें देखकर मुस्कुराते तक नहीं.

हाल ही में हमने ख़ुफ़िया तौर पर ख़रीदारी के तजुर्बे किए. इनसे मोटे लोगों के प्रति सेल्समैन के पूर्वाग्रह खुलकर सामने आए. हमने यहां तक पाया कि मोटे लोगों को दिखाया जाने वाले सामान भी आम लोगों को दिखाए जाने वाले सामान से अलग था.

इस ख़ुफ़िया रिसर्च का नतीजा से ये सामने आया कि मोटे लोगों को गोलाकार सामान ख़रीदने को ज़्यादा प्रोत्साहित किया जाता है.

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कैसे की गई थी रिसर्च?

रिसर्च के तहत एक सामान्य कद-काठी के अभिनेत्री घड़ियां और इत्र ख़रीदने के लिए दुकानों पर गई.

उनके साथ दो लोग गुपचुप तौर पर गए. इनका काम ये देखना था कि सेल्समैन उस सामान्य दिखने वाले ग्राहक से कैसा बर्ताव करते हैं, किस तरह के उत्पाद दिखाते हैं.

बाद में वही अभिनेत्री, मोटी महिला का भेष धर कर उसी लिबास में फिर से दुकानों में ख़रीदारी के लिए गई.

इस बार भी उसने उसी रंग के कपड़े पहने थे. बस, वो मोटापे के लिहाज़ से ज़्यादा ढीले-ढाले थे. इस बार भी अभिनेत्री के साथ दो रिसर्चर चुप-चाप चल रहे थे.

मोटी महिला के तौर पर वो अभिनेत्री 37 दुकानदारों से मिली. उसने 3 घड़ियां और इत्र या परफ्यूम उन दुकानदारों की सलाह पर ख़रीदे.

इस रिसर्च के नतीजों का विश्लेषण करने पर पता चला कि जब अभिनेत्री मोटी महिला बनकर दुकानों में गई थी, तो उसे गोलाकार घड़ियां या गोलाकार इत्र की बोतलें ज़्यादा दिखाई गईं और उन्हें बेचने की कोशिश की गई.

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'मोटे लोगों के लिए गोलाकार चीज़ें'

ये रिसर्च अमरीका की विलानोवा यूनिवर्सिटी की बेथ वैलेन ने की थी.

बेथ कहती हैं, "रिसर्च से हमारी ये सोच सही साबित होती है कि मोटे लोगों के लिए गोलाकार चीज़ें ही ठीक रहेंगी. ये एक पूर्वाग्रह है."

इस रिसर्च को ऑनलाइन भी किया गया. सेल्समेन से बात करके उनसे पूछा गया कि मोटे दिखने वाले लोगों के लिए किस तरह के सामान ठीक रहेंगे.

ऑनलाइन सवाल-जवाब में भी मोटे लोगों को गोल चीज़ें देने की ही बात की गई. इस बार ऑनलाइन सर्वे में दुकानदारों को मोटे ग्राहकों की तस्वीर दिखाई गई थी. फिर उन्हें बेचे जाने वाले सामान की तस्वीरें दिखाने को कहा गया था.

बेथ वैलेन कहती हैं, "हम ये दिखाना चाहते थे कि सिर्फ़ ख़रीदारी में ही नहीं, सामान्य जीवन में भी मोटे लोगों के साथ भेदभाव किया जाता है."

ऑनलाइन शॉपिंग के दौरान भी मोटे दिखने वाले लोगों को गोल आईने, लैम्प, मोमबत्तियां और घड़ियां ही ज़्यादा दिखाई गईं. कोणाकार चीज़ें उन्हें कम ही बेचने की कोशिश की गई, भले ही ग्राहक पुरुष हो या महिला.

भेदभाव वाली ये सोच केवल किसी ख़ास तरह के शरीर को ख़ास उत्पाद से जोड़कर देखने की नहीं है. ये सोच रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं. उत्पादों के आकार को इंसान के आकार से जोड़कर देखने की सोच समाज की ज़हन में गहराई तक बैठी हुई है.

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कैसा होता है मोटे लोगों का स्वभाव?

एक सोच ये भी है कि मोटे लोगों का स्वभाव ज़्यादा दोस्ताना होता है. गोलाकार चीज़ें भी दोस्ताना मानी जाती हैं.

रिसर्च करने वालों ने ये भी देखने की कोशिश की कि क्या मोटे लोगों को गोलाकार चीज़ें तब ज़्यादा दी गईं, जब उनका व्यवहार ज्यादा दोस्ताना था?

इस सवाल का जवाब उन्हें हां में मिला. मोटी महिला का भेष ले कर गई अभिनेत्री जब मुस्कुराते हुए बात कर रही थी, तब उसे ज़्यादा गोलाकार चीज़ें ऑफ़र की गईं. उसके चेहरे पर सख़्ती देखकर दुकानदार का रुख़ भी अलग लगा.

ये पूर्वाग्रह शायद सामान्य लोगों के प्रति भी होता है. बेथ वैलेन कहती हैं, "हमें इस बात के कोई सबूत नहीं मिले कि मोटे लोग गोलाकार सामान ज़्यादा पसंद करते हैं. या फिर सामान्य इंसान इकहरे दिखने वाले उत्पादों को तरज़ीह देते हैं."

रिसर्च का नतीजा ये है कि पूर्वाग्रह के चलते मोटे लोगों को शॉपिंग के वक़्त गोलाकार उत्पाद ज़्यादा बेचे जाएंगे. भले ही वो उन्हें पसंद करते हों या नहीं.

बेथ वैलेन का मानना है कि ऐसे ही पूर्वाग्रह ज़्यादा वज़न वाले लोगों के अलावा दूसरे लोगों के प्रति भी हो सकते हैं.

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इसका निदान क्या है?

बेथ के मुताबिक़, "आप नस्लवादी भेदभाव, बच्चों जैसी शक्ल वाले लोगों और लिंगभेद से जुड़े पूर्वाग्रहों को भी इस ख़रीद-फरोख़्त वाले पूर्वाग्रह से जोड़ कर देख सकते हैं."

बेथ कहती हैं कि सेल्स से जुड़े लोगों को ज़्यादा अच्छी ट्रेनिंग देनी होगी, उन्हें ख़रीदारों की पसंद ना-पसंद का ज़्यादा ख़याल रखने की सीख दी जानी चाहिए. कोई सामान दिखाने से पहले सामने वाले से पूछा जाना चाहिए कि आख़िर उसे कैसी चीज़ें पसंद हैं.

मोटापे और वज़न को लेकर, इस पूर्वाग्रह से कोई बड़ा नुक़सान तो नहीं है. वो कहती हैं, "लैम्प गोलाकार हो या कोणीय, कोई भी लैम्प आपके घर में होने से बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है."

लेकिन, ये रिसर्च इस बात की मिसाल है, कि कैसे रोज़मर्रा के तजुर्बे हमारी सोच पर असर डालते हैं.

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