ऐसे 'सुपर डैड' से आप मिलना चाहेंगे

  • 4 दिसंबर 2018
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इन दिनों अगर आप जापान के अख़बारों, फ़ैशन पत्रिकाओं या टीवी के विज्ञापनों पर नज़र दौड़ाएं, तो आप को एक नया 'सुपरहीरो' देखने को मिलेगा.

ये सुपरहीरो मुस्कुराते हुए हैंडसम लोग हैं, जो नाश्ते पर तलवारबाज़ी का खेल खेलते हैं. अपने बच्चों के साथ पार्क में साइकिल चलाते हैं. कई बार तो पापा अपने बच्चों जैसे लिबास में भी नज़र आते हैं. वो हमदर्द हैं. समझदार हैं. जापान के ये नए सुपरहीरो बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी खाना पकाते हैं और घर के दूसरे काम करते हैं.

इन्हें जापान में 'इकुमेन' कहा जाता है. इकुमेन दो शब्दों को जोड़ कर बनाया गया है. इकुजी यानी बच्चों की देख-भाल और इकेमेन यानी बलवान. ये इकुमेन पिता, पहले के दौर के कामकाजी जापानी मर्दों की छवि के ठीक उलट हैं.

पहले के पिता जहां काम के जुनून से भरे होते थे. वहीं आज इकुमेन पापा बनने की होड़ जापान के मर्दों में लगी है. ये शब्द सबसे पहले 2000 के दशक में एक विज्ञापन लिखने वाले ने गढ़ा था.

2010 में जापान के स्वास्थ्य, श्रम और कल्याण मंत्री ने राष्ट्रव्यापी इकुमेन प्रोजेक्ट शुरू किया. इसका मक़सद मर्दों में पारिवारिक जीवन के प्रति ज़्यादा लगाव पैदा करना था.

जल्द ही इकुमेन का विचार बहुत लोकप्रिय हो गया. आज जापान की लोक संस्कृति में ये बहुत चलन में आ गया है.

लेकिन, क्या इस शब्द की वजह से जापान के समाज में औरतों और मर्दों के बीच भेदभाव कम हुआ है?

या फिर, चटख, शोख़ और चमकीली तस्वीरों ने केवल ऊपरी तौर पर आए बदलाव को दिखाना शुरू किया है. जबकि हक़ीक़त में आज भी परिवार की ज़्यादा ज़िम्मेदारी महिलाएं ही उठा रही हैं?

पहले के ज़माने में जापान में मर्दों का काम केवल घर के लिए पैसे कमाना समझा जाता था. ये तनख़्वाह वाले लोग अपनी कंपनी के प्रति समर्पित होते थे. देर तक दफ़्तर में रुक कर काम करते थे, ताकि परिवार को आर्थिक सुरक्षा मिल सके और वो तरक़्क़ी की सीढ़ियां तेज़ी से चढ़ सकें.

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पुरानी सोच के गंभीर नतीजे

हाल ही में जापान के समाज पर किताब, 'कूल जैपेनीज़ मेन' लिखने वाली हैना वसालो कहती हैं, 'काम के प्रति निष्ठा दिखाने वालों को ही जापान के समाज में आदर्श मर्द माना जाता था.'

वैसे, ऐसी सोच केवल जापान के समाज में नहीं पायी जाती. लेकिन, 1980 के दशक में भी जापान के पुरुष अपने बच्चों के साथ रोज़ औसतन चालीस मिनट से भी कम बातें किया करते थे. और ये बात भी आम तौर पर रात के खाने की टेबल पर हुआ करती थी.

एक रिसर्च के मुताबिक़ कई जापानी पुरुष तो चाय तक नहीं बना पाते थे. यहां तक कि वो बिना पत्नी की मदद के अपने कपड़े तक नहीं तलाश पाते थे. जब, पिता अपने बच्चों से बात भी करते थे, तो वो लगाव वाली नहीं हुआ करती थी. अक्सर वो आदेश देने वाली बातें हुआ करती थीं, ताकि बच्चे पिता का सम्मान करें और डरें.

जापान की आम कहावत है-जिशिन, कमिनारी, काजी, ओयाजी. यानी भूकंप, बिजली कड़कना, आग और पिता, एक जैसे हैं.

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कहने की बात नहीं कि ऐसी सोच के गंभीर नतीजे देखने को मिले. महिलाओं के लिए बच्चे को जन्म देने के बाद करियर में आगे बढ़ने का इरादा छोड़ना पड़ता था. नतीजा ये हुआ कि बहुत सी महिलाओं ने शादी का ख़याल ही छोड़ दिया.

बहुत सी लड़कियों ने देर से शादी की या शादी की ही नहीं. इसका नतीजा ये हुआ कि जापान में बच्चों की पैदाइश की दर बहुत गिर गई. 1980 के दशक में जापान में बच्चों की ख़ुदकुशी के मामले भी बहुत बढ़ गए थे. कई लोगों ने इसका संबंध मां-बाप की देखभाल में कमी से जोड़ कर बताया था.

फिर भी, जापान के समाज की सोच में बदलाव की रफ़्तार बहुत ही धीमी रही. 2002 में, केवल 0.33 फ़ीसद पुरुषों ने बच्चे होने पर 'पैटरनिटी लीव' ली. 2008 के एक सर्वे के मुताबिक़, मौक़ा मिलने पर कम से कम एक तिहाई जापानी मर्द अपने बच्चों के साथ ज़्यादा वक़्त बिताना चाहते थे. लेकिन, उन्हें चिंता थी कि उन के बॉस काम से छुट्टी लेना पसंद नहीं करेंगे.

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सरकार ने की बदलाव की कोशिश

जापान की सरकार का इकुमेन प्रोजेक्ट इन हालात को बदलने के लिए था. समाज की सोच में बदलाव लाने के लिए इसे एक आंदोलन के तौर पर चलाया गया. ताकि, जापानी मर्द भी बराबरी से अपने बच्चों की देखभाल कर सकें.

इकुमेन प्रोजेक्ट के तहत कार्यशालाएं आयोजित की गईं. पिता बने मर्दों को वर्क लाइफ़ बैलेंस की हैंडबुक भी दी गई. ताकि वो दफ़्तर और परिवार की ज़िम्मेदारियों के बीच अच्छे से तालमेल बिठा सकें.

पिता को परिवार से जोड़ने की दूसरी मुहिमों के मुक़ाबले इकुमेन प्रोजेक्ट में मर्दों को सुपरहीरो के तौर पर पेश किया गया. उसे ताक़तवर पुरुष के तौर पर दिखाया गया. एक पोस्टर में एक आदमी अपनी टी-शर्ट फाड़ता दिखा, जिसके नीचे पहने कपड़े में इकुमेन प्रोजेक्ट का लोगो बना था. इसमें लिखा था, समाज को इकुमेन की ताक़त.

इस मिशन में दिखाया गया कि कैसे जापान के पुरुष न केवल अपने परिवार की हिफ़ाज़त करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को पाल-पोस कर वो देशहित का भी काम कर रहे हैं.

इकुमेन को काफ़ी लोकप्रियता मिली. हैना वसालो कहती हैं कि, 'जापान में आज हर इंसान इकुमेन शब्द से परिचित है. ये पहले के ऐसे ही मुहिम से जुड़े शब्दों से बेहतर है, जिसमें ख़याल रखने वाले पिता की छवि गढ़ने की कोशिश की गई.'

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इकुमेन की लोकप्रियता और आलोचना

अब जापान में 'फादर्स क्वार्टरली' यानी (FQ) जैसी पत्रिकाओं में पिता और बच्चों के एक जैसे कपड़ों का विज्ञापन निकलता है. परिवार के साथ फ़ोटोशूट के विज्ञापन होते हैं.

हाल ही में इस पत्रिका ने मिस्टर इकुमेन प्रतियोगिता भी आयोजित की थी. जज़्बाती तौर पर संवेदनशील इकुमेन को टीवी शो में अहम रोल मिलने लगे हैं. इकुमेन के नाम से एक टीवी सिरीज़ भी बनाई गई. इस सिरीज़ में 21 बरस के मिडोरिकावा हिरोया की कहानी थी. हिरोया ने घर में रह कर बेटी को पालने का फ़ैसला किया, जबकि उसकी पत्नी कामकाजी थी.

पहले के ज़माने के मर्दों के मुक़ाबले में हिरोया को घर का काम कर के भी तसल्ली मिलती है. वो बेटी के साथ वक़्त बिताने को ही अपनी असली कमाई मानता है. बेरोज़गारी से होने वाली बदनामी उसे छू भी नहीं पाती. कई एपिसोड में हिरोया की क़रीबी महिलाएं उसके जैसा पति होने की कामना करती दिखाई गईं.

इकुमेन प्रोजेक्ट की मार्केटिंग काफ़ी कामयाब रही है. जापान के समाज में मर्दों के रोल को लेकर नए सिरे से चर्चा शुरू हुई है. लोगों में जागरूकता बढ़ी है. लेकिन हैना वसालो बताती हैं कि इस प्रोजेक्ट की निंदा भी हुई है. कई महिलाओं ने ये सवाल उठाया है कि आख़िर बच्चों की परवरिश में उनके रोल की अनदेखी क्यों की गई?

हैना कहती हैं कि इकुमेन के शुरुआती प्रचार के झांसे में बहुत से लोग आ गए. पर बाद में बहुत से लोगों को इसकी कमियां दिखीं. ख़ास तौर से महिलाओं को. घर का छोटा-मोटा काम करने वाले मर्द भी ख़ुद के इकुमेन होने का दावा करने लगे. यानी, तमाम प्रयासों के बावजूद इकुमेन प्रोजेक्ट में भी बच्चों और परिवार की बड़ी ज़िम्मेदारी मां को संभालते ही दिखाया गया.

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कितना बदलाव आया

बहुत से मर्दों ने भी खुद को 'इकुमेन बीमारी' का शिकार बताया. उनकी शिकायत थी कि घर और दफ़्तर की उम्मीदें उन पर बोझ बनती जा रही थीं. भले ही वो निजी तौर पर तरक़्क़ीपसंद सोच रखते हैं. लेकिन, जो पिता नौकरी से छुट्टी लेकर बच्चों के साथ वक़्त बिताते हैं, उन्हें उनके बॉस दंड देते हैं.

फिर जापान के समाज में औरतों और मर्दों के बीच भेदभाव की सोच भी इकुमेन प्रोजेक्ट से कुछ ख़ास कम नहीं हुई. जापान के क़ानून में अभी भी तलाक़ की सूरत में औरत और मर्द को बराबरी का दर्जा नहीं हासिल है.

हैना वसालो कहती हैं कि बहुत से पिता गुज़ारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं होते. फिर उन्हें बच्चों से मिलने का हक़ भी नहीं मिलता, भले ही बच्चों से उनके अच्छे ताल्लुक़ रहे हों. विकसित देश होने के बावजूद जापान में औरतों और मर्दों के बीच भेदभाव का स्तर ज़्यादा है.

हालांकि इकुमेन प्रोजेक्ट की वजह से इस में बदलाव आ रहा है. 2012 में जहां केवल 1.9 प्रतिशत कामकाजी पुरुषों ने पैटरनिटी लीव ली थी. वहीं, 2017 में ये तादाद सात प्रतिशत हो गई.

अब 45 फ़ीसद से भी कम जापानी मर्द इस सोच के समर्थक हैं कि, 'पुरुषों को बाहर काम करना चाहिए और महिलाओं को घर संभालना चाहिए.' 1992 में ये सोच रखने वालों की तादाद 60 फ़ीसद थी.

अब बच्चों की देखभाल करने वाले पिता, अक्सर दिखने भी लगे हैं. ख़ास तौर से साप्ताहिक छुट्टियों पर, वो शहरी इलाक़ों में कभी बाज़ार तो कभी पार्कों में दिख जाते हैं.

हैना वसालो मानती हैं कि लोगों के बर्ताव और सोच में बदलाव बहुत धीरे-धीरे आता है. लेकिन, उन्होंने बहुत से ऐसे जापानी पुरुषों से बात की, जो अलग रास्ते पर चलने लगे हैं. वो आदर्श इकुमेन सुपरहीरो भले न हों. लेकिन, उन्हें बच्चों की परवरिश में लुत्फ़ आने लगा है. वो दूसरे पुरुषों को भी बच्चे पालने के नुस्ख़े बताते हैं. ऐसे लोग फ़ेसबुक के ज़रिए भी जुड़ रहे हैं. स्कूल में पीटीए मीटिंगों में भी ये इकुमेन मर्द जाने लगे हैं.

हैना कहती हैं कि, 'मुझे ये देख कर तसल्ली हुई कि कि वो अपनी सोच में बदलाव कर के रिश्तों को बेहतर तरीक़े से जी रहे हैं. परिवार और दफ़्तर की ज़िम्मेदारी अच्छे से संभाल रहे हैं. इससे जापान को लेकर एक उम्मीद जगती है.'

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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