इस तस्वीरों की ग़लतियां बताना मुश्किल है, नामुमकिन नहीं

  • 5 दिसंबर 2018
शेर की तस्वीरें

तकनीक की तरक़्क़ी की वजह से अब ऐसी अक़्लमंद मशीनें बन रही हैं जो हमारे आस-पास की चीज़ों को न सिर्फ़ पहचान लेती हैं, बल्कि उनकी तस्वीरें भी बनाने में सक्षम हैं.

जिस तरह कोई आम इंसान चित्र बनाता है उसी तरह ये बुद्धिमान मशीनें भी उन चीज़ों की तस्वीरों में उतार लेती हैं जिन्हें उन्होंने देखा होता है.

हालांकि एक फ़र्क़ ज़रूर होता है.

कलाकार जहां ब्रश से अपनी कृतियां गढ़ते हैं, वहीं ये अक़्लमंद मशीनें यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनें पिक्सेल दर पिक्सेल कोई तस्वीर गढ़ते हैं.

ऊपरी तौर पर मशीनों की बनाई ये तस्वीरें तो ठीक दिखती हैं. पर, क़रीब से देखें तो इनमें गड़बड़ियां साफ़ नज़र आती हैं.

कैसे चीज़ें पहचानती हैं मशीनें?

हमें ये कैसे पता होता है कि मकड़ी के आठ पैर होते हैं या फिर आगे बढ़ने के लिए कार के सभी टायर एक ही दिशा में होने चाहिए?

इसका जवाब ये है कि हम इन सवालों के जवाब अपने आस-पास की चीज़ों को देखकर जानते हैं. हमारे दिमाग़ के न्यूरॉन दुनिया की बनावट से हमारा परिचय करवाते हैं और ये जानकारियां आंखों के ज़रिए हमारे दिमाग़ तक पहुंचती हैं.

इसी तरह बुद्धिमान मशीनों को भी ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें ढेर सारी तस्वीरें और चीज़ें दिखाई जाती हैं, ताकि वो उन्हें पहचानना सीख सकें.

मशीनों और हमारे बीच फ़र्क़ ये है कि हम कुछ तस्वीरों से ही चीज़ों को जान-पहचान जाते हैं. लेकिन, मशीनों को छोटी-छोटी चीज़ें पहचानने के लिए लाखों तस्वीरें दिखानी पड़ती हैं.

अजीबोग़रीब तस्वीरें

गूगल की कंपनी अल्फाबेट ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली ऐसी ही एक मशीन बनाई है जिसका नाम है बिगगैन.

इसकी ख़ासियत ये है कि इसके भीतर दो दिमाग़ हैं. एक मशीनी दिमाग़ जो तस्वीरें गढ़ता है और दूसरा जो इन तस्वीरों और असली तस्वीरों में फ़र्क़ का पता लगाता है. इस पड़ताल के ज़रिए ये बुद्धिमान मशीन खुद को बेहतर बनाती है.

अमरीका की हेरिओट-वॉट यूनिवर्सिटी के कंप्यूटर वैज्ञानिक एंड्रू ब्रॉक कहते हैं, "वक़्त के साथ-साथ ये मशीनें अपने आस-पास की चीज़ों की बनावट पहचानने लगती हैं और इनकी बनाई तस्वीरें भी बेहतर होती जाती हैं."

लगातार ट्रेनिंग के बाद पिक्सेल से तस्वीरें बनाने वाली मशीनें फर या किसी खुरदरी सतह को भी परख लेती हैं. इमारतों और पंछियों की बेहतर तस्वीरें भी बनाना शुरू कर देती हैं.

लेकिन, इन अक़्लमंद मशीनों का ऊट-पटांग तस्वीरें बनाने का सिलसिला फ़िलहाल नहीं थम रहा है.

कभी पैर ग़ायब तो कभी आंखें?

एंड्रू ब्रॉक कहते हैं कि, "मशीनों की बनाई इन तस्वीरों को देखें तो लगता है कि ये फर, घास और आसमान की तस्वीरें अच्छे से बना लेते हैं. दिक़्क़त ये होती है कि ये गिनती ठीक से नहीं कर पाते. नतीजतन कारों के आठ टायर हो जाते हैं, तो परिंदों के कई पर. ये हवाई जहाज़ का पंख ही ग़ायब कर देती हैं."

यही वजह है कि ऊपरी तौर पर तो मशीनों की बनाई तस्वीरें ठीक दिखती हैं लेकिन पास से देखने पर इनकी कमियां साफ़ दिखती हैं. कभी परिंदों की तस्वीरों से पैर ग़ायब होते हैं, तो कभी आंखें.

इन मशीनों की सबसे बड़ी कमी ये है कि ये अलग-अलग एंगल से दिखने वाली तस्वीर को अच्छे से नहीं समझ पाते हैं. वहीं, इंसान का दिमाग़ इस मामले में उस्ताद होता है.

हमें अख़बार के पीछे की तस्वीर का भी अंदाज़ा हो जाता है. किसी घर को एक तरफ़ से देखकर हम दूसरी तरफ़ की तस्वीर का अनुमान लगा लेते हैं.

ये कमी ख़ास तौर से मशीनों में होती है. वो उसी आंकड़े से अनुमान लगाती हैं, जो उनमें फीड किए गए होते हैं. अब इस कमी से पार पाने के लिए मशीनों में और भी डेटा डालने की ज़रूरत होगी. लेकिन, गूगल के डीपमाइंड प्रोजेक्ट में शोधकर्ता ऐसी मशीनें बनाने में जुटे हैं, जो इस कमी को ख़ुद से दूर करने की कोशिश करेंगी.

अगर आप चार बरस के बच्चे से कुत्ते की तस्वीर बनाने को कहेंगे, तो ज़ाहिर है उससे परफेक्ट तस्वीर नहीं बनेगी. लेकिन, वो बच्चा भी किसी कुत्ते के चार पैर, दो कान और एक नाक को सही-सही बनाएगा.

बच्चों के मुक़ाबले अक़्लमंद मशीनों की बात करें तो वो बिल्कुल असली दिखने वाले कुत्तों की तस्वीरें तो बना लेंगी. लेकिन, कभी आंख में हेर-फेर होगी, तो कभी नाक या जीभ में. फर को बनाने की उस्ताद मशीनें तो सारा ध्यान कुत्तों के फर बनाने में ही लगा देती हैं.

इंसानों की तस्वीरें बनाने में तो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीनों को और भी दिक़्क़त होती है. वो ऊपरी तौर पर तो सही तस्वीरें बना देते हैं मगर चेहरे इतने बिगड़े हुए होते हैं कि पहचानना मुश्किल हो जाता है. कई बार तो वो इंसानों की बहुत भयानक तस्वीरें बना देते हैं.

एंड्रू ब्रॉक के साथ काम करने वाले जेफ़ डोना ह्यू और कैरेन सिमोन्यान कहते हैं कि इसकी बड़ी वजह व्यक्ति-व्यक्ति में फ़र्क़ होना है.

इसीलिए अक्सर अक़्लमंद मशीनें कंफ्यूज़ हो जाती हैं कि वो इंसानों को कैसे गढ़ें. उन्हें इंसानों की सही फोटो बनाने के लिए और डेटा की ज़रूरत है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
इंसानो से बातें करना चाहती है रोबोट सोफ़िया

पर एक मामले में मशीनें तस्वीरें बनाने की उस्ताद हैं. जैसे बुलबुले की तस्वीर. फिर चाहे वो किसी तालाब से उठता बुलबुला हो, या कॉफ़ी के कप से.

मगर दिक़्क़त तब होती है, जब मशीनें किसी स्थिर चीज़ में उथल-पुथल को नहीं पकड़ पातीं. वजह ये होती है कि मशीनों को हमेशा स्टिल फोटो दिखाए जाते हैं. वो किसी उतार-चढ़ाव या बदलाव को नहीं पढ़ पाती हैं.

चीज़ों को देखना, जांचना और पड़ताल करना. इन्हीं तरीक़ों से हम दुनिया को देख-समझ और पहचान पाते हैं. लेकिन, जो बातें हमारे लिए मामूली हैं, वहीं चीज़ें मशीनों को समझाने के लिए ढेर सारे डेटा की ज़रूरत होती है. उनके लिए इस दुनिया की छोटी-छोटी बातें सीखनी भी बड़ी हो जाती हैं.

सवाल ये है कि मशीनों से तस्वीरें बनवाकर क्या हासिल होगा?

एंड्रू ब्रॉक कहते हैं, "आगे चलकर हम और पेचीदा बातें समझने वाली मशीनें बनाना चाहते हैं और पेचीदा दुनिया को समझने वाले ही आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को गढ़ना चाहते हैं."

आज आंकड़ों से भरी दुनिया को समझने के लिए हमें ऐसी ही मशीनों की ज़रूरत है. तस्वीरें बनाने जैसा काम कर के मशीनें इस उलझी हुई दुनिया के बारे में अपनी समझ बढ़ाती हैं.

इंसान के दिमाग़ के लिए तो ये काम चुटकी बजाने जैसा है. पर, अगर हम मशीनों की बनाई बिल्ली की तस्वीरें देखें तो हर एक की शक़्ल बिगड़ी दिखेगी. आख़िर इसकी क्या वजह है?

इंटरनेट पर तो ये सबसे ज़्यादा शेयर की जाने वाली तस्वीरें हैं. मशीनें आख़िर बिल्लियों की सही फोटो क्यों नहीं बना पातीं?

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के साइमन स्ट्रिंगर कहते हैं, "आज भले ही इतनी अक़्लमंद मशीनें बन रही हैं कि वो इंसानों जैसे बर्ताव करें मगर इंसानी दिमाग़ जैसा सिस्टम बनाना फिलहाल तो नामुमकिन दिखता है."

"इंसान का दिमाग़ तस्वीरों को हर एंगल से देख-समझ सकता है. किनारों की पहचान कर सकता है. मशीनों के लिए ये मुमकिन नहीं. इसीलिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की बनाई तस्वीरों में गड़बड़ियां दिखाई देती हैं.''

साइमन कहते हैं कि, "ये हमारे दिमाग़ की पेचीदा दुनिया को समझने की कुव्वत को दर्शाता है."

आगे चलकर शायद हम ऐसी मशीनें बना पाएं, जिन्हें इस दुनिया की बेहतर समझ होगी.

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