भविष्य में इस घने जंगल से लॉन्च होंगे रॉकेट

  • 27 दिसंबर 2018
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पांच दिसंबर को भारत ने अपना सबसे भारी सैटेलाइट अंतरिक्ष मे भेजा था. जीसैट-11 इसरो का बनाया सबसे भारी उपग्रह है, जिसे सफलता से अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया गया. इसे यूरोपीय स्पेस एजेंसी के रॉकेट आरियान-5 से अंतरिक्ष में भेजा गया.

क्या आप जानते हैं कि आरियान-5 को भारत ने अपने सबसे भारी सैटेलाइट को लॉन्च करने के लिए क्यों चुना?

इसकी वजह है आरियान का सक्सेस रेट. ये दुनिया का सबसे कम जोखिम वाला रॉकेट है.

यूरोपीय स्पेस एजेंसी का ये रॉकेट फ्रेंच गुयाना के कोउरू स्पेसपोर्ट से लॉन्च किया गया था.

आरियान ऐसा रॉकेट है जिसके सबसे कम स्पेस मिशन नाकाम रहे हैं.

यही वजह है कि भारत ने इसे अपने सबसे भारी सैटेलाइट को लॉन्च करने के लिए चुना.

यूरोपीय स्पेस एजेंसी का रॉकेट अगर कामयाबी की कमोबेश गारंटी देता है, तो इसकी क़ीमत भी वसूलता है.

ये दुनिया का सबसे महंगा रॉकेट है. ये 1996 से सैकड़ों सैटेलाइट को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर चुका है.

जबकि इसका पहला मिशन बुरी तरह नाकाम रहा था.

हाल ही में आरियान-5 से बेपीकोलम्बो अंतरिक्ष यान को सुदूर अंतरिक्ष के मिशन पर भेजा गया. इसकी मंज़िल बुध ग्रह है.

क्या एलन मस्क लाएंगे बदलाव

आरियान के महंगे मिशन अंतरिक्ष के बाज़ार में इसे मुक़ाबला करने में कमज़ोर साबित कर रहे हैं.

इसके मुक़ाबले एलन मस्क का स्पेसएक्स रॉकेट लाखों डॉलर कम क़ीमत में सैटेलाइट लॉन्च करने का वादा कर रहा है.

स्पेस मार्केट में बढ़ती प्रतिद्वंदिता का सामना करने के लिए यूरोपीय स्पेस एजेंसी आरियान-6 रॉकेट बना रही है. 62 मीटर लंबा ये रॉकेट मध्यम और बड़े सैटेलाइट लॉन्च करने में काम आएगा.

इसे दक्षिणी अमरीका के फ्रेंच गयाना से लॉन्च किया जाएगा. फ्रांस का ये उपनिवेश, पिछले क़रीब पचास साल से यूरोपीय स्पेस मिशन का केंद्र रहा है.

पहले यहां फ्रांस ने अपना स्पेस सेंटर विकसित किया था. अब इसे फ्रांस और दूसरे यूरोपीय देश मिलकर चलाते हैं.

आरियान-6 रॉकेट को लॉन्च करने के लिए फ्रेंच गयाना के जंगलों में रॉकेटर लॉन्चर तैयार किया जा रहा है.

इसे वैज्ञानिक चलता-फिरता एफिल टॉवर बताते हैं.

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यूरोपीय स्पेस एजेंसी की कोउरू शाखा की प्रमुख शार्लोट बेस्को कहती हैं कि, 'हम ऐसी चीज़ बना रहे हैं, जो सस्ती भी होगी और सफलता की गारंटी भी देगी. यूरोपीय देश चाहते हैं कि वो अंतरिक्ष के क्षेत्र में रूस और अमरीका से अलग स्वतंत्र पहचान बनाएं. इसलिए हम कोउरू में नया लॉन्चपैड बना रहे हैं.'

इस लॉन्चपैड के लिए फ्रेंच गयाना के जंगलों में बड़े पैमाने पर काम चल रहा है.

इस निर्माण कार्य को देखने के लिए आप को एक पहाड़ी पर मुश्किल चढ़ाई चढ़नी होगी.

मकड़ियों का घर

चढ़ाई ख़त्म होते ही पेड़ से लगा हुआ वाच टॉवर मिलेगा. यहां लिखा हुआ है, मकड़ियों का घर.

वजह ये है कि यहां ख़ूब बड़ी-बड़ी मकड़ियां मिलती हैं.

तो, जंगल में बन रहे इस चलायमान एफिल टॉवर के निर्माण को देखने के लिए पहले आप को मकड़ियों के इस चक्रव्यूह से पार पाना होगा.

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आरियान-6 रॉकेट नए इंजन और नए बूस्टर से लैस होगा. इसे लॉन्च करने के लिए स्थायी पैड बनाने के बजाय, एक जोड़ा जा सकने वाला स्पेसपोर्ट बनाया जा रहा है. रॉकेट को भी असेंबल कर के यहां लाया जाएगा. फिर स्पेसपोर्ट में फिट कर के लॉन्च के लिए उसे तैयार किया जाएगा. तैयारी पूरी होने के बाद रॉकेट के इर्द-गिर्द से हटाया जा सकने वाला 'एफिल टॉवर' टुकड़ों में हटाया जाएगा.

यूरोपीय स्पेस एजेंसी का ये स्पेस स्टेशन 1960 के दशक में फ्रांस ने विकसित किया था. बाद में यूरोप के और देशों ने मिलकर यूरोपीय स्पेस एजेंसी बनाई, तो यहां उसका लॉन्चपैड बनाया गया.

शार्लोट बेस्को कहती हैं कि पहले यहां से आरियान-4, वेगा और सोयुज़ रॉकेट भी लॉन्च किए जाते थे.

तब भी स्पेस पोर्ट को असेंबल ही किया जाता था. तब लॉन्च की तैयारी करने में 35 दिन लगते थे.

मगर अब ऐसा पोर्ट तैयार किया जा रहा है, जो कम वक़्त में बन जाएगा. इससे लॉन्च की लागत कम होगी.

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फ्रेंच गयाना का ये स्पेस सेंटर भूमध्य रेखा के क़रीब है, तो रॉकेट को उड़ान के लिए ज़रूरी ताक़त धरती की चाल से भी मिल जाती है.

मौसम के लिहाज़ से भी ये जगह स्पेस लॉन्च के मुफ़ीद है.

मगर, यहां की गर्मी बहुत बड़ी चुनौती है. इससे इमारतों पर अक्सर काई और धूल-गर्द जमती रहती है. साथ ही मकड़ियां भी धावा बोलती रहती हैं.

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इमारतों के भीतर एयरकंडीशनर लगाए गए हैं. साथ ही कन्डक्टर की मदद से बाहरी जीवों के हमले को रोका जाता है.

शार्लोट बेस्को कहती हैं कि जब ये लॉन्च पैड और आरियान-6 रॉकेट तैयार हो जाएंगे, तो एक लॉन्च की तैयारी में आज के 35 दिन के मुक़ाबले केवल 12 दिन लगा करेंगे. सामान की ढुलाई का ख़र्च भी कम आएगा.

कम खर्चीला होगा ये रॉकेट

लॉन्च पैड बनाने के लिए जितना काम ज़मीन के ऊपर किया जा रहा है, उतना ही ज़मीन के भीतर भी चल रहा है. ज़मीन से क़रीब 30 मीटर की गहराई में 20 मीर चौड़ी सुरंगें बनाई जा रही हैं.

इनके ज़रिए रॉकेट से निकलने वाली लपट को ठंडा किया जाएगा. यहां पानी की बौछारें लपटों पर मार कर उन्हें शांत किया जाएगा. इन सुरंगों की वजह से लॉन्च के वक़्त लगने वाले झटके का असर भी कम होगा.

इस वक़्त इस लॉन्च पैड को तैयार करने में 600 से ज़्यादा लोग दो पालियों में काम करते हैं.

पहला आरियान-6 रॉकेट अगले साल यानी 2019 में तैयार होने की उम्मीद है. इसकी मदद से पहला स्पेस लॉन्च 2020 में करने की तैयारी है. इस प्रोजेक्ट के चीफ़ इंजीनियर फ्रेडरिक मुनो को यक़ीन है कि वो तय समय पर काम पूरा कर लेंगे.

फ्रेडिरक कहते हैं कि सटीक डिज़ाइन और बिना किसी हादसे के वो काम यक़ीनन पूरा करेंगे. और उम्मीद है कि पहला लॉन्च देखने के लिए यहां लोग भी जुटेंगे.

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इसी साल जब एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने अपना फॉल्कन रॉकेट लॉन्च किया था, तो उसे देखने के लिए काफ़ी लोग जुटे थे. इसे फ्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से लॉन्च किया गया था. इस लॉन्च को देखने के लिए हज़ारों लोग केनेडी स्पेस सेंटर पहुंचे थे.

आरियान-6 के लॉन्च के वक़्त इतनी भीड़ जुटने की उम्मीद तो नहीं है. वजह ये है कि ये यूरोप से काफ़ी दूर है. समुद्र के किनारे है और जंगली इलाक़ा है. कोउरू तक पहुंचना आसान काम नहीं है.

शार्लोट बेस्की कहती हैं कि, 'ये जगह स्पेस लॉन्च के लिए तो बहुत सही है, ये आबादी से दूर है. लॉन्च के बाद रॉकेट के हिस्से समुद्र में गिरते हैं और हादसे की सूरत में किसी आबादी को ख़तरा होने का डर नहीं. लेकिन, ये यूरोपीय देशों से बहुत दूर है.'

और, जो कोई यहां आना चाहे, तो याद रहे कि उसे मकड़ियों के जाल से पार पाना होगा.

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