कुछ चीज़ें हम क्यों भूल जाते हैं, जबकि कुछ हमेशा याद रहती हैं

  • 31 दिसंबर 2018
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हमारी याददाश्त अक्सर हमें धोखा दे जाती है. मनोवैज्ञानिकों को तो ये बात अर्से से पता है. लेकिन, आम लोग अक्सर याददाश्त के फ़रेब की आशंका को कम कर के आंकते हैं.

हम आप को वो छह वजहें बताते हैं जिससे हम अक्सर अपनी याददाश्त के अजीब बर्ताव का सही आकलन नहीं कर पाते.

1. ज़िंदगी के शुरुआती दिनों की यादें सहेजना नामुमकिन है...मगर कुछ लोग हैं कि मानते नहीं.

महाभारत के किरदार अभिमन्यु ने मां के गर्भ में रहते हुए ही जाना था कि चक्रव्यूह को भेद कर उसके अंदर कैसे जाते हैं. जब अभिमन्यु की मां गर्भवती थीं, तो धनुर्धर अर्जुन ने ये क़िस्सा उन्हें सुनाया था.

महाभारत के अनुसार, अभिमन्यु ने ये तो जान लिया था कि चक्रव्यूह के भीतर कैसे जाते हैं. पर, वो अपने पिता से ये नहीं सीख पाये थे कि चक्रव्यूह से बाहर कैसे आते हैं. क्योंकि अभिमन्यु की मां उस वक़्त सो गई थीं, जब अर्जुन उन्हें ये नुस्ख़ा बता रहे थे.

महाभारत के इस क़िस्से से ऐसा लगता है कि मां के गर्भ में पल रहे बच्चे की भी याददाश्त होती है.

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स्पेनिश कलाकार साल्वाडोर डैली ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ''मैं ये मान कर चलता हूं कि मेरे लेखकों को अपने बचपन की बातें या तो बिल्कुल ही याद नहीं, या फिर उस दौर की उनकी यादें बहुत धुंधली हैं. मगर, ज़िंदगी के उस बेहद अहम दौर और जन्म से भी पहले मां के गर्भ के तजुर्बे की एक-एक बात मुझे याद है. मुझे लगता है जैसे ये अभी कल की ही बात हो.'' डैली को उम्मीद थी कि उनके अपने तजुर्बे से प्रेरित होकर लोग अपने बचपन के अनुभवों की यादें ताज़ा कर सकेंगे.

लेकिन, हक़ीक़त ये है कि जन्म के बाद के कुछ साल की यादें सहेजना नामुमकिन है. और जन्म से पहले की बातें याद रख पाना तो बिल्कुल ही संभव नहीं. वजह ये है कि हमारे ज़हन के जिस हिस्से में यादें सहेजी जाती हैं, वो मां के गर्भ के भीतर विकसित नहीं होता. बच्चे के जन्म के बाद भी दिमाग़ के इस हिस्से के विकास में वक़्त लगता है. इसीलिए हम सब को बचपन के पहले कुछ वर्षों की बाते याद नहीं रहतीं हैं.

जो लोग बचपन के क़िस्से विस्तार से बताते हैं, वो असल में ख़याली पुलाव पकाकर परोस रहे होते हैं. वो ये ख़याली पुलाव असल में लोगों की सुनी हुई बातों और ज़िंदगी के दूसरे तजुर्बों की के आधार पर पका कर परोसते हैं.

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2. आप की याददाश्त मौसम यानी तापमान पर निर्भर करती है.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इंसान की याददाश्त किसी संदर्भ से जुड़ी बातों को ज़्यादा आसानी से याद रखती है.

इसे समझने के लिए एक तजुर्बा कीजिए. कुछ लोगों को बेहद ठंडे पानी में हाथ डालने को कहिए. फिर उन्हें कुछ शब्द बताकर उन्हें याद करने को कहिए.

ऐसा तजुर्बा करने वाले रिसर्चरों ने पाया है कि इस प्रयोग में भाग लेने वालों की याददाश्त उस वक़्त ताज़ा हो गई, जब उन्होंने बाद में फिर से ठंडे पानी से भरी बाल्टी में हाथ डाला.

यानी हम किसी ख़ास अनुभव के दौरान याद किए गए सबक़ ज़्यादा दिन तक सहेज कर रख पाते हैं.

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यही वजह है कि शराब पीकर टल्ली हुए लोगों को कई बार उस रात की बातें याद रह जाती हैं. हालांकि, अक्सर ऐसे लोग उन बातों को ठीक-ठीक दोहरा नहीं पाते.

पढ़ाई के दौरान जो लोग कॉफ़ी पीते हैं या च्यूंइंग गम चबाते रहते हैं, उन्हें सबक़ ज़्यादा बेहतर ढंग से याद रह जाते हैं. इसी तरह कोई ख़ुशबू भी याददाश्त से जुड़कर उन्हें ताज़ा रखती है. इम्तिहान के दौरान कोई ख़ास परफ्यूम या आफ़्टरशेव इस्तेमाल करना काम का नुस्ख़ा हो सकता है.

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3. आप का दिमाग़ी वक़्त तुड़ा-मुड़ा होता है.

थोड़ा ठहर कर इन घटनाओं का साल और महीना याद करने की कोशिश कीजिए-

A. माइकल जैक्सन की मौत कब हुई थी

B. बियोंसे का एल्बम लेमोनेड कब रिलीज़ हुआ

C. ऑस्कर समारोह में ला ला लैंड को कब ग़लती से बेस्ट फ़िल्म का पुरस्कार दे दिया गया था

D. जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल ने कब एलान किया कि वो 2021 में चांसलर पद छोड़ देंगी.

अगर आप नियमित रूप से ख़बरों से वाबस्ता नहीं हैं, तो आप को इन सवालों के सटीक जवाब याद नहीं होंगे.

रिसर्च से पता चला है कि जैसे-जैसे वक़्त बीतता जाता है, वैसे-वैसे हमें लगता है कि कुछ घटनाएं अभी ही तो हुई हैं. वहीं कुछ घटनाएं ताज़ा होने के बाद भी कई बार लगता है कि ये बात हुए तो अर्सा गुज़र गया.

जैसे कि माइकल जैक्सन की मौत या फिर एंगेला मर्केल के रिटायर होने का एलान

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Image caption क्रेंप कैरेनबावर को एंगेला मर्केल की पसंदीदा उत्तराधिकारी माना जाता रहा है

इसे मनोवैज्ञानिक टेलिस्कोपिंग कहते हैं. असल में आपकी ज़हनी टाइमलाइन अक्सर मुड़ी-तुड़ी होती है. इसी वजह से पुरानी घटनाओं को हम हालिया समझ लेते हैं, जबकि हाल में हुई घटनाओं के बारे में ये सोचते हैं कि ये तो पुरानी बात है.

अब उन चार सवालों के जवाब जान लीजिए, जो ऊपर पूछे गए.

A. माइकल जैक्सन की मौत जून 2009 में हुई थी

B. बियोंसे का लेमोनेड एल्बम अप्रैल 2016 में जारी हुआ था

C. ला ला लैंड को ग़लती से बेस्ट फ़िल्म का ऑस्कर फ़रवरी 2017 में दे दिया गया था

D. एंगेला मर्केल ने 2021 में रिटायर होने का एलान इसी साल अक्तूबर में किया था.

4. धुंधली यादों के भी फ़ायदे होते हैं...

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आप अपने किसी क़रीबी दोस्त की तस्वीर बनाने की कोशिश करें. या फिर बिना उसकी कोई तस्वीर देखे उसके चेहरे को बयान करने की कोशिश करें.

इस बात की पूरी उम्मीद है कि आप अपने दोस्त का हुलिया कमोबेश सही-सही बयां कर पाएंगे. भले ही आप बहुत बारीक बातें न बता सकें, पर मोटा-मोटा हुलिया तो आप सटीक तरीक़े से बता देंगे.

अक्सर हम कुछ बातों का लब्बो-लुबाब याद रखते हैं. जबकि बारीकियां भुला देते हैं. हेयरस्टाइल बता देंगे, मगर शायद बालों का रंग बताने में दिक़्क़त हो. चेहरे का आकार याद होगा, पर शायद किसी मस्से के बारे में बताना भूल जाएं.

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5. अपनी याददाश्त पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा जेब पर भारी पड़ सकता है.

बहुत से तजुर्बों से पता चला है कि अक्सर लोग अपनी याददाश्त को लेकर गुमान में होते हैं. लोगों को लगता है कि उनकी याददाश्त बहुत तेज़ है. ख़ुद पर ये ऐतबार हमें कई बार बहुत भारी पड़ता है. हम ऐसा सोचते हुए भूल जाते हैं कि कई बार याददाश्त ने हमें दग़ा दिया है. पुलिस वालों के साथ अक्सर ये दिक़्क़त होती है. वो जुर्म को लेकर कई बार गुमान में आ जाते हैं और ये बात मुक़दमे के दौरान मुल्ज़िम का जुर्म साबित करने पर भारी पड़ती है.

इसी तरह बहुत से छात्र इस गुमान में रहते हैं कि उन्होंने पूरा सबक़ याद कर लिया है. पर, इम्तिहान में उससे जुड़ा सवाल आने पर जवाब नहीं लिख पाते हैं.

हम अपनी भावी याददाश्त को लेकर भी ओवरकॉन्फिडेंट हो जाते हैं. जैसे कि जो काम भविष्य में करने होते हैं, उन्हें लेकर ख़ुद पर कुछ ज़्यादा ही ऐतबार कर बैठते हैं.

सब्सक्रिप्शन सेवाएं देने वाले अक्सर हमारे इस ओवरकॉन्फिडेंस का फ़ायदा उठाते हैं. वो पहले मुफ़्त में सेवाएं देने के लिए पहले महीने की सर्विस फ्री रखते हैं. फिर, लोगों को ये याद नहीं रहता कि फ्री वाला दौर ख़त्म होने के बाद उन्हें सब्सक्रिप्शन कैंसिल करना है. और फिर फीस कट जाती है.

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6. आप को डिजिटल भूलने की बीमारी हो सकती है.

आज हर इंसान के हाथ में स्मार्टफ़ोन दिखता है. ये हमारी याददाश्त के लिए वरदान की तरह है. फ़ेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर दर्ज बातें हमें किसी भी ख़ास तारीख़, दिन या तजुर्बे को याद करने में मदद करती हैं.

लेकिन, सोशल मीडिया की वजह से हमें पुरानी बातें याद करने में मुश्किल भी हो सकती है. जब हम याददाश्त पर बहुत ज़ोर डालते हैं, तो ये बहुत नाज़ुक हो जाती हैं. इसके नतीजे में कई बार इससे जुड़ी यादों का ख़ज़ाना भी बिगड़ जाता है.

जैसे कि फ़ेसबुक पर कोई फ़ोटो हो सकता है कि किसी समारोह की याद दिला दे. पर इसका दूसरा पहलू ये भी है कि हम उस दिन से जुड़े बाक़ी तजुर्बे भूल जाते हैं.

ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक जूली शॉ कहती हैं कि, ''आज सोशल मीडिया हमारे तजुर्बों की राह तय कर रहा है. सोशल मीडिया की बातें हमारी ज़िंदगी के सबसे अहम तजुर्बे बनती जा रही हैं. नतीजा ये होता है कि हमारा ज़हन उन यादों को काट-छांट कर फेंक देता है, जिनके बारे में उसे लगता है कि वो बातें सोशल मीडिया पर शेयर करने लायक़ नहीं हैं. ऐसी यादों को हमारा दिमाग़ ज़्यादा सहेजने लगता है जो दूसरों से शेयर करने लायक़ हैं बनिस्बत उन बातों के जो ज़हन के हिसाब से सोशल मीडिया पर दूसरों से साझा किया जा सकता है.''

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