आपके फोन की ढेर सारी तस्वीरें, ई-मेल बन सकती हैं मुसीबत

  • 14 जनवरी 2019
डिजिटल जमाख़ोरी, डिजिटल कचरा इमेज कॉपीरइट Getty Images

जमाख़ोरी जुर्म है. इसे करने पर लोगों को क़ानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है.

लेकिन, क्या आप को पता है कि डिजिटल हो रही दुनिया में डिजिटल जमाख़ोरी भी हो रही है. ऐसा करने वालों को इसकी भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ रही है.

फ़िलहाल, डिजिटल जमाख़ोरी को रोकने के लिए क़ानून तो नहीं हैं. लेकिन, ऐसा करने वाले अपने लिए मुसीबतों का ढेर लगा रहे हैं.

हो सकता है कि आप भी डिजिटल जमाख़ोरी कर रहे हों. चलिए इसका पता लगाते हैं.

क्या आप के मोबाइल में तस्वीरों का अंबार लगा है? क्या आप के पर्सनल और ऑफ़िशियल ई-मेल अकाउंट में हज़ारों मेल जमा हैं? क्या आप के पेन ड्राइव में ढेर सारे ग़ैरज़रूरी डॉक्यूमेंट सेव हैं?

अगर इन सभी सवालों का जवाब हां है, तो आप भी डिजिटल जमाख़ोरी कर रहे हैं.

आज हमारे मोबाइल, लैपटॉप और कंप्यूटर की स्टोरेज लगातार बढ़ती जा रही है. इसके अलावा तमाम कंपनियां अपनी क्लाउड स्टोरेज सुविधाएं मुफ़्त में या बेहद मामूली दर पर दे रही हैं.

नतीजा ये कि हम ज़रूरी डेटा के साथ-साथ हज़ारों ग़ैरज़रूरी 'बाइट्स' अपने मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर में जमा करते जा रहे हैं. ई-मेल, फ़ोटो, डॉक्यूमेंट और दूसरे तरह की डिजिटल डेटा के पहाड़ हमें चारों तरफ़ से घेर चुके हैं.

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डेटा के ढेर बन रहे मुसीबत

आज दुनिया में ये डिजिटल जमाख़ोरी इस कदर बढ़ गई है कि अब ये बाक़ायदा रिसर्च का विषय बन गयी है.

हम अपने काम के दौरान या फिर निजी इस्तेमाल के दौरान तमाम ऐसे डेटा को जमा करते जा रहे हैं, जिनकी शायद हमें कभी ज़रूरत ही न पड़े.

पर, इस डिजिटल जमाख़ोरी के नतीजे ख़तरनाक हो सकते हैं. ये डिजिटल जमाख़ोरी हमें तनाव देती है. इससे घिरे हुए कई बार हम धुनते हैं.

हो सकता है कि दफ़्तर के ई-मेल में हज़ारों मेल देखकर आपका दिल अपने बाल नोचने का करता हो. हर रोज़ आप इस ढेर को साफ़ करने की सोच कर काम शुरू करते हैं, फिर मेल का ज़ख़ीरा देख कर आप इसे अगली बार पर टाल देते हों. ये ई-मेल और दूसरे डिजिटल डेटा का ढेर आपके लिए मुसीबत बनता जा रहा है.

आपकी दिमाग़ी सेहत पर असर डाल रहा है. बहुत से लोगों की आदत होती है कि काम होने के बाद भी मेल डिलीट नहीं करते.

डॉक्यूमेंट बचाकर रखते हैं. तस्वीरें सहेजते रहते हैं. इस उम्मीद में कि आगे चल शायद इनकी कभी ज़रूरत पड़े. नतीजा ये कि जब ज़रूरत पड़ती है, तो हम डिजिटल कचरे के ढेर के नीचे ख़ुद को दबाते जा रहे हैं.

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डिजिटल जमाख़ोरी पर रिसर्च पेपर

डिजिटल जमाख़ोरी जुमले का इस्तेमाल सबसे पहले साल 2015 में एक रिसर्च पेपर में हुआ था. नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने वहां के एक आदमी के बारे में लिखा था कि वो हर रोज़ हज़ारों तस्वीरें खींचता था फिर घंटों उन तस्वीरों की प्रोसेसिंग का काम करता था.

अख़बार ने लिखा था कि, 'वो आदमी अपनी खींची तस्वीरों को दोबारा देखता भी नहीं था. लेकिन उसे ये लगता था कि भविष्य में ये तस्वीरें किसी न किसी काम ज़रूर आएंगी.'

डिजिटल जमाख़ोरी को कुछ इस तरह से परिभाषित किया गया है, 'डिजिटल फाइलों का ढेर इस कदर लगाते जाना कि उन्हें सहेजने का मक़सद ही कहीं गुम हो जाए.'

ये जमाख़ोरी का एक नया रूप है, जिसे मनोवैज्ञानिक बीमारी कहते हैं. नीदरलैंड में तस्वीरों की जमाख़ोरी करने वाला आदमी पहले तमाम ग़ैरज़रूरी सामानों का ढेर लगाकर रखे हुए थे.

ब्रिटेन की नॉरथम्ब्रिया यूनिवर्सिटी में डिजिटल जमाख़ोरी पर रिसर्च करने वाले निक नीव कहते हैं कि जैसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम बेवजह की चीज़ों को हटाते नहीं, सहेज कर रखते रहते हैं, ठीक वैसा ही अब डिजिटल दुनिया में भी हो रहा है.

निक कहते हैं कि, 'जब आप असली जमाख़ोरों की बात करते हैं, तो लोगों को यही तो कहते हैं कि क्या बेवजह की चीज़ों का ढेर लगा रखा है. हटाओ सब. तो फ़ौरन वो जवाब देगा कि शायद आगे चल कर इस में से कुछ काम आ जाए. यही हाल ई-मेल का ढेर लगाने वालों का होता है.'

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लोग क्यों जमा करते हैं डिजिटल डेटा?

निक नीव और उनकी टीम ने डिजिटल जमाख़ोरी पर रिसर्च के दौरान 45 लोगों से बात की. उनसे पूछा कि आख़िर वो डिजिटल डेटा का ढेर लगाकर क्यों रखे हुए हैं?

इन लोगों ने कई कारण गिनाए. जैसे आलस, भविष्य में कोई चीज़ काम न आ जाए, किसी चीज़ को हमेशा के लिए डिलीट करने से अनजाना भय या फिर डेटा को किसी के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करने के लिए सहेजना.

डिजिटल जमाख़ोरी में अव्वल है ई-मेल. ज़्यादातर लोगों के निजी और दफ़्तर के ई-मेल अकाउंट में हज़ारों मेल पड़े होते हैं.

ऑफ़िस की मेल न डिलीट करने के पीछे लोगों की यही सोच होती है कि कहीं भविष्य में उसकी ज़रूरत न पड़ जाए. जबकि हक़ीक़त ये होती है कि ऐसी सहेजकर रखी गई ई-मेल हम शायद ही कभी दोबारा देखते या पढ़ते हैं.

निक नीव कहते हैं कि, 'लोगों को पता होता है कि मेल का ये ढेर एक समस्या है. लेकिन, तमाम संस्थानों के काम करने के तरीक़े की वजह से वो इन्हें डिलीट करने से हिचकते हैं. इस तरह ई-मेल का ढेर लगता जाता है.'

हालांकि निक कहते हैं कि डिजिटल जमाख़ोरी पर रिसर्च अभी नई-नई है, तो तुरत-फ़ुरत किसी नतीजे पर पहुंचना ठीक नहीं.

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डिजिटल डेटा से काम की चीज़ की तलाश मुश्किल

अक्सर हम सब ई-मेल के ढेर में से ज़रूरी मेल निकालने में मुश्किलें उठाते हैं. फ़ोटो के ढेर में से ज़रूरत की तस्वीर खोजे नहीं मिलती.

ऑस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिवर्सिटी के दर्शन सेदारा पिछले कुछ साल से डिजिटल जमाख़ोरी पर रिसर्च कर रहे हैं. उन्होंने इस बारे में जितने लोगों से बात की, कमोबेश हर इंसान को डिजिटल डेटा से काम की चीज़ तलाशने में मुश्किल आई थी.

दिसंबर 2018 में दर्शन सेदारा ने अपनी सहयोगी सचित्रा लोकुगे के साथ एक रिसर्च पेपर प्रकाशित किया था. इस में उन्होंने 846 लोगों से बात करने के बाद ये नतीजा निकाला था कि डिजिटल डेटा के ढेर में से ज़रूरी चीज़ तलाशने से उन्हें तनाव हुआ.

बेवजह सामान जमा करने वाले लोगों में डिजिटल जमाख़ोरी की भी आदत पड़ जाती है. ऐसे लोग अक्सर तनाव का शिकार होते हैं.

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डेटा से नियंत्रण हट जाता है

अमरीका की विस्कॉन्सिन-व्हाइटवाटर यूनिवर्सिटी में आईटी की प्रोफ़ेसर जो एन ओरावेक कहती हैं कि डिजिटल जमाख़ोरी का सिर्फ़ यही मतलब नहीं कि आपने ढेर सारा डेटा जमा कर रखा है. बल्कि असल में बात ये है कि हमारे पास जो डिजिटल डेटा जमा है, उसकी उपयोगिता का हमें अंदाज़ा है भी या नहीं?

अगर हमें इन आंकड़ों की उपयोगिता का अंदाज़ा है, तो हम इसे डिजिटल जमाख़ोरी नहीं कह सकते.

लेकिन प्रोफ़ेसर एन कहती हैं कि जब हम बेवजह के डेटा जमा करने लगते हैं, तो ये जमाख़ोरी ही कहलाता है. इससे हमारे ज़हनी संतुलन पर असर पड़ता है.

बहुत से लोगों को आंकड़ों के इस अंबार से मुश्किल होती है. वो परेशान हो जाते हैं. फाइलों में से ज़रूरी फ़ाइल तलाशने में दिक़्क़त होती है. यानी हम डेटा पर से नियंत्रण खो बैठते हैं.

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इस मुसीबत की जड़ स्टोरेज की बढ़ती उपलब्धता है. तमाम कंपनियां क्लाउड स्टोरेज की सुविधा बहुत कम क़ीमत पर देती हैं. इसके अलावा हमारे फ़ोन और लैपटॉप में आंकड़े सहेजने की जगह बढ़ती जा रही है. इसीलिए डिजिटल जमाख़ोरी भी बढ़ रही है.

प्रोफ़ेसर एन ओरावेक सलाह देती हैं कि आईटी कंपनियों को चाहिए कि वो डेटा स्टोरेज को लेकर जो सुविधाएं दे रही हैं, उन पर फिर से विचार करें. लोगों को भी चाहिए कि वो नियमित रूप से अपने सहेजे हुए डेटा को देखें और ग़ैरज़रूरी फ़ाइलें समय-समय पर डिलीट करते रहें.

सेल्फ़ी का ढेर, अनदेखी ई-मेल और दूसरी बेवजह की फ़ाइलों का ढेर लगाने का कोई फ़ायदा नहीं. इनसे तनाव ही बढ़ता है. इन्हें हटाकर हम अपने डिजिटल ख़ज़ाने पर सही तरीक़े से कंट्रोल कर सकते हैं.

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