जब बीमारियों को दूर भगाने के लिए होता था जादू-टोना

  • 29 जनवरी 2019
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टीबी, चेचक जैसी बीमारियों के लिए जब तक मेडिकल साइंस ने दवाएं नहीं बनाई थीं तब तक इन बीमारियों को भूत-प्रेत का प्रकोप माना जाता था.

आपने अपनी दादी नानी से ज़रूर सुना होगा कि इन बीमारियों के शिकार लोगों को घर से बाहर कर दिया जाता था. गांव-देहात में तो हालात और भी ख़राब थे.

कोढ़ के मरीज़ को तो गांव के बाहर ही निकाल दिया जाता था. लेकिन ये सोच और हालात सिर्फ़ भारत या एशिया में ही नहीं थे. ख़ुद को विकसित कहने वाले देश भी यही सोच रखते थे.

मध्य काल में यूरोप से लेकर अमरीका तक लोगों में भूत-प्रेत, चुड़ैल वग़ैरह को लेकर काफ़ी यक़ीन देखने को मिलता था. अक्सर, इस भरम की शिकार महिलाएं होती थीं. उन्हें चुड़ैल, डायन या प्रेत कहकर मार दिया जाता था.

चलिए, आपको अमरीका के मेसाचुसेट्स राज्य के एक तारीख़ी क़स्बे सलेम का एक दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हैं. यहां बहुत सी महिलाओं को चुड़ैल घोषित कर के मार डाला गया था.

चर्च ने फ़ांसी की सज़ा सुनाई

ये क़िस्सा 1692 का है. बेट्टी की उम्र उस वक़्त महज़ 9 साल थी और एबिगेल की 11 साल. इन दोनों को अजीब तरह के दौरे पड़ते थे. हाथ पूरी तरह अकड़ जाते थे. गर्दन दोहरी होकर कमर से लग जाती थी. दोनों बच्चियों को लोग चुडैल बताने लगे.

कहने लगे कि इन पर किसी भूत-प्रेत का साया है. इनके बाद गांव में और भी कई लोगों को यही दिक़्कत होने लगीं. धीरे-धीरे इस बीमारी के मरीज़ों की संख्या बढ़ने लगी.

मामला चर्च तक पहुंचा जहां पादरी ने फ़ैसला किया कि ये लोग जादू-टोना कर बुरी आत्माओं से संपर्क करते हैं और दूसरे लोगों को परेशान करते हैं लिहाज़ा इन्हें समाज में रहने का अधिकार नहीं. और इसी तर्क के आधार पर इन मरीज़ों को जेल में डाल दिया गया. कुछ को फांसी दे दी गई.

सलेम में महिलाओं की चुड़ैल बताकर हत्या का क़िस्सा अमरीका के इतिहास का काला पन्ना माना जाता है. वैज्ञानिकों को समझ में नहीं आया कि आख़िर उन महिलाओं को हुआ क्या था. लेकिन, हालिया रिसर्च से सलेम की उन महिलाओं की बीमारी का संकेत मिलता है.

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Image caption एक मेडिकल थ्योरी के मुताबिक सालेम में महिलाओं की समस्याओं के पीछे बैक्टीरिया या वायरस इन्फ़ेक्शन को बताया गया

फफूंद की थ्योरी

1976 में प्रोफ़ेसर लिंडा केपोरेल ने सबसे पहले इस संबंध में थ्योरी दी. प्रोफ़ेसर लिंडा के मुताबिक़ इन महिलाओं को एक दिमाग़ी बीमारी हो गई थी.

इसकी जड़ में एक फफूंद थी. ये फफूंद अनाज की बालियों पर आ जाती है और शरीर में जाने के बाद ऐंठन की शिकायत शुरुआत कर देती है.

लेकिन, उस दौर की मान्यता के मुताबिक़, लोगों ने इसे शैतान का बिछाया जाल बताया था. बाद के दिनों में कई वैज्ञानिकों ने सलेम की महिलाओं की बीमारी की वजह बैक्टीरिया या वायरस इन्फ़ेक्शन या ऑटोइम्यून डिसऑर्डर बताया.

लेकिन बाद की रिसर्च में इन सभी तर्कों को ख़ारिज कर दिया गया. रे फंगस की बात इसलिए नहीं मानी गई क्योंकि बेट्टी और एबिगेल में इस फंगस का इन्फेक्शन नहीं पाया गया था.

न तो उन्हें पेट की कोई तकलीफ़ थी और ना ही उनकी त्वचा ज़र्द पड़ी थी. जबकि इस फंगस के इंफ़ेक्शन से त्वचा पर जगह-जगह नीले-पीले चकत्ते पड़ जाते हैं.

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Image caption सालेम में जिन लोगों को दिमागी बुख़ार हुआ उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई थी.

दिमागी बुखार

2007 में लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के न्यूरोलॉजिस्ट और प्रोफ़ेसर माइकल ज़ैंडी और उनके छात्र जॉनी टेम ने एक नई थ्योरी दी.

उन्होंने दावा किया कि सलेम की महिलाओं को जो बीमारी थी, वो असल में एंटी-एनएमडीआर इंसेफेलाइटिस थी. इन दोनों जानकारों के मुताबिक़ एनएमडीआर रिसेप्टर्स दिमाग की तंत्रिकाओं को कंट्रोल करते हैं. और इसका संबंध याददाश्त, नई चीज़ें सीखने और इंसान के बर्ताव से होता है.

लेकिन एंटी-एनएमडीआर इंसेफ़ेलाइटिस होने पर दिमाग की तंत्रिकाएं अनियंत्रित हो जाती है. और इसके लिए ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर ज़िम्मेदार है, जो कि एक ख़ास तरह के बैक्टीरिया से होता है.

हालांकि इस बैक्टीरिया की क़िस्म और शरीर में दाख़िल होने के तरीक़े पर सभी रिसर्चर एक मत नहीं हैं.

एंटी-एनएमडीआर इंसेफेलाइटिस की पीड़ित कई महिलाओं में देखा गया है कि उन्हें बच्चेदानी में टेराटोमा नाम का अजीब सा ट्यूमर हो जाता है.

इस ट्यूमर में हड्डी, बाल और दांत होते हैं. साथ ही नसों का जाल होता है जो एनएमडीआर रिसेप्टर को ज़ाहिर करता है. शायद यही रिसेप्टर्स एंटी-बॉडी रिसेप्टर्स को बढ़ावा देते हैं और दिमाग़ को प्रभावित करते हैं.

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Image caption एनएमडीएआर बीमारी के लक्षणों में अनिद्रा और मिर्गी के दौरे आते थे, यही लक्षण भूत या चुड़ैल के प्रकोप के लिए भी माने जाते थे

अगर मर्ज़ पकड़ में आ जाए तो इसका सही इलाज करने पर 75 फ़ीसद मरीज़ एनएमडीआर इंसेफेलाइटिस से मुक्त हो सकते हैं. इसी तरह पेट में टेरोमेटा ट्यूमर होने पर अगर इसे निकाल दिया जाए तो किसी भी महिला को डायन कहलाने से बचाया जा सकता है.

दिलचस्प बात तो ये है कि अभी तक ये ट्यूमर सिर्फ़ महिलाओं में होता था लेकिन अब मर्दों में भी इसकी शिकायत मिलने लगी है.

हालांकि महिलाएं कम उम्र में ही इसकी शिकार हो जाती हैं. और उनकी संख्या भी मर्दों के मुक़ाबले ज़्यादा है लेकिन मर्दों की तादाद भी कुछ कम नहीं है.

ऑटो इम्यून डिसऑर्डर

सलेम गांव की बेट्टी और एबिगेल की बीमारी 21वीं सदी में पकड़ में आई बीमारी से मेल खाती है. हालांकि अभी भी बहुत से रिसर्चरों के लिए उनकी बीमारी रहस्य हैं.

उनका सवाल है अगर किसी तरह का इंफ़ेक्शन इन दोनों बच्चियों को नहीं हुआ था तो फिर दोनों की हालत एक जैसी क्यों थी. दोनों को एक जैसे दौरे क्यों पड़ते थे.

इसके लिए भी प्रोफ़ेसर ज़ैंडी ऑटो इम्यून डिसऑर्डर को ही ज़िम्मेदार मानते हैं. उनके मुताबिक़ हो सकता है कि पहले एक ही लड़की को ये बीमारी हुई हो बाद में दूसरी को भी हो गई.

हालांकि बाक़ी के मरीज़ों के लिए उनका कहना है कि ज़रूरी नहीं कि सभी में एंटी-एनडीएमआर इंसेफेलाइटिस वाले लक्षण हों. इनमें से कुछ को मिर्गी का मर्ज़ भी हो सकता है या कोई और बीमारी. लेकिन अज्ञानता के चलते उन्हें भी भूत-प्रेत का साया मान लिया गया होगा.

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मनोवैज्ञानिक निकोलस स्पेनोस भी इसके पीछे सामाजिक और राजनीतिक कारक देखते हैं. इनके मुताबिक़ सत्रहवीं सदी के प्यूरिटन्स ने सारी दुनिया को शैतान का ख़ौफ़ बताने के लिए इस तरह के दौरे पड़ने वालों को भूत होने का सर्टिफिकेट जारी कर दिया.

उस दौर के दस्तावेज़ों से पता चलता है कि जब कोर्ट में मरीज़ को पेश किया जाता था तो उसकी हरेक हरकत का अलग ही मतलब निकाला जाता था.

मिसाल के लिए अगर मरीज़ कोर्ट रूम में अपना होंठ काटे तो कहा जाता था कि डायन उसके होंठ काट रही है. अगर वो अपने हाथ घुमाए तो कहा जाता था कि डायन उसे चुटकी काट रही है जबकि कोर्ट रूम के बाहर दौरे का असर ख़त्म होने पर वही मरीज़ बिल्कुल ठीक हो जाती थी और लगता था कि उसे कुछ हुआ ही नहीं था.

1971 में आई फ़िल्म 'द एक्ज़ोरसिस्ट' की कहानी को जिससे प्रेरणा मिली थी, वो ख़ुद 14 साल की उम्र में इसी बीमारी से पीड़ित रह चुकी थी. 1949 में उसे अस्पताल में दाखिल कराया गया था.

जहां तक बेट्टी और एबिगेल का सवाल है तो कहा जाता है कि बेट्टी ने ठीक होने के बाद शादी की और अपना परिवार बनाया. जबकि अबिगेल के बारे में किसी कुछ पता नहीं चल सका.

1692 में क़रीब 150 मरीज़ों को जेल से रिहा किया गया था. ख़ैर अब एंटी एनएमडीएआर का इलाज संभव है, लिहाज़ा उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बीमारी के शिकार मरीज़ को डायन, प्रेत या चुड़ैल नहीं कहा जाएगा.

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