हाथी को कैसे बचा सकती है टेक्नॉलॉजी

  • 18 फरवरी 2019
हाथी इमेज कॉपीरइट Getty Images

असाधारण बीमारियों के नए उपचार, प्रयोगों के लिए प्रयोगशालों में जीव-जन्तुओं की उपयोगिता समाप्त करने, इंसान का पर्याय बनने और विलुप्त हो रही प्रजातियों को पुनर्जीवन देने में भी 'चिप' पर इकट्ठा की गई जानकारियां अत्यन्त सहायक हो रही हैं.

क्योटो विश्वविद्यालय के एक माइक्रोइंजीनियर केन इचिरो कामेई जब अपने दोस्तों के साथ वक्त बिताने बाहर जाते हैं तो आमतौर पर वह अपने साथ अपनी एक चिप भी लाते हैं जिस पर किसी जीव की पूरी ज़िन्दगी अंकित होती है.

इस दौरान जैसे ही कामकाज के बारे में बातचीत होती है, कामेई प्रयोगशाला की एक स्लाइड की तरह दिखने वाली अपनी उस चिप को बाहर निकालते हैं जिसमें स्पष्ट तौर पर सिलिकॉन की एक परत जैसी चीज़ पर सूक्ष्म गड्ढे और चैनल यानि प्रणालिकाएं नजर आती हैं.

इन्हें दिखाते हुए वे कहते हैं, "मैं इंसानों और जानवरों का सृजन करने के लिए इन चिपों की रचना कर रहा हूं."

दोस्तों से फौरन वाहवाही मिलती है और वाहवाही से प्रसन्न कामेई कहते हैं, "ऐसा लगता है कि मैं एक जादूगर हूं और मेरे दोस्त मुझसे जादू दिखाने की गुजारिश कर रहे हैं."

कामेई जैव तकनीक के एक ऐसे नए क्षेत्र की अगुवाई कर रहे हैं जिसका उद्देश्य अंगों, प्रणालियों और सम्पूर्ण शरीर की रचना की हू-ब-हू नकल उस चिप पर दोहराना है.

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हाथियों का अनाथालय

महत्वाकांक्षी परियोजना

प्रयोगशाला में होने वाले परम्परागत जैव रासायनिक प्रयोग जहां एक ओर अचल और एकाकी होते हैं वहीं कामेई द्वारा प्रयुक्त चिपों में चैनलों, वॉल्बों और पम्पों की आपस में जुड़ी हुई प्रणाली होती है जो काफी जटिल परस्पर क्रियाओं को सम्भव करती है, वो भी इस हद तक कि ये मिलकर एक जीती-जागती प्रणाली की नकल कर लेते हैं.

चिकित्सा शोध में क्रान्तिकारी बदलाव लाने की इन चिपों की संभावना को देखते हुए विश्व आर्थिक फोरम में वर्ष 2016 में 'ऑर्गन ऑन चिप्स' को उस वर्ष की 10 श्रेष्ठ उभरती हुई प्रोद्योगिकियों में शामिल किया था.

लेकिन जहां वो विशेष चिप किसी एक खास ऊतक या अंग की नकल कर सकते हैं, कामेई और उनके सहयोगी पूरे जीव की नकल बनाने के उद्देश्य से काम कर रहे हैं.

उनके अनुसार परियोजना काफी महत्वाकांक्षी है.

कामेई अपनी प्रयोगशाला में मुख्य रूप से एक लेज़र कटर और एक थ्री डी प्रिंटर की मदद से अपने सूक्ष्म चिप (माइक्रो फ्ल्यूडिक) चिप बनाते हैं.

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कैंसर सेल्स

इन चिपों को चलाने के लिए वह सूक्ष्म प्रणालियों से जुड़े छह प्रकोष्ठों में विभिन्न प्रकार के कोशिका ऊतकों को जोड़ते हैं और फिर प्रणालिका में संचार लाने के लिए चिप के न्यूमेटिक माइक्रो पम्प को एक कंट्रोलर से जोड़ देते हैं.

इस तरह उन्हें और उनकी टीम के अन्य लोगों को नई दवाओं के प्रभाव और उनके दुष्प्रभाव की जांच करने की क्षमता के साथ-साथ किसी भी व्यक्ति की कोशिकाओं के आधार पर विशेष तौर पर उस व्यक्ति के लिए दवा तैयार करने तथा रोग के कारणों को अच्छे ढंग से समझने की क्षमता प्राप्त होती है.

जैसे कि एक प्रयोग में कामेई और उनके सहयोगियों ने चिप पर हृदय की स्वस्थ कोशिकाओं के साथ-साथ यकृत की कैंसर युक्त कोशिकाओं को डाल दिया.

उसके बाद हृदय पर जहरीला असर डालने वाली कैंसर रोधी दवा डॉक्सोरियूबिसिन भी मिला दी गई. लेकिन इस दवा के स्पष्ट हानिकारक प्रभावों के बारे में जानकारी नहीं थी.

शोधकर्ताओं ने पाया कि इस दवा से सीधे तौर हृदय को नुकसान नहीं पहुंचता; बल्कि यकृत द्वारा चयापचय की क्रिया के दौरान उत्पन्न पदार्थ से नुकसान पहुंचता है.

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आनुवांशिक बीमारियां

इस तरह के प्रयोगों के लिए विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं की पर्याप्त आपूर्ति की आवश्यकता होती है.

इसे संभव किया 2012 में शरीर विज्ञान या चिकित्सा के क्षेत्र में इंड्यूस्ड-प्ल्यूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाओं (आईपीएस) के सृजन में अग्रणी योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले क्योटो विश्वविद्यालय के स्टेम सेल शोधकर्ता शिन्या यामानाका ने.

इस बारे में कामेई बताते हैं, "आईपीएस कोशिकाएं शरीर के बाहर भी कई गुना बढ़ सकती हैं जबकि अन्य तरह की स्टेम कोशिकाएं ऐसा नहीं कर सकतीं."

"पहले प्रयोग में लाई जाने वाली कोशिकाएं एक ही व्यक्ति से ली जाती थीं जो कि आनुवांशिक बीमारियों या एक व्यक्ति विशेष से संबंधित अध्ययन के लिए बहुत कारगर नहीं होती थी."

जैसा कि इनके नाम से ही पता लगता है कि एक जैसी आईपीएस कोशिकाएं शरीर के किसी भी अन्य प्रकार की कोशिकाओं से ली जा सकती हैं.

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अपार संभावनाएं

इन कोशिकाओं को 'यामानांका फैक्टर' यानी कोशिकाओं को भ्रूण वाली स्थिति में ले जाने वाले प्रोटीन कोडिंग जीन्स यानी आनुवांशिक तत्वों में बदल दिया जाता है.

इन एक जैसी कोशिकाओं को फिर किसी भी अन्य तरह की कोशिका में परिवर्तित करने के लिए बाध्य किया जा सकता है चाहे वो शुक्राणु और अंडे हों या फिर चिकित्सकीय प्रयोगों में मदद देने वाली शरीर की कोई अन्य कोशिका हो.

स्टेम कोशिकाएं विलुप्ति की कगार वाली प्रजातियों के ऐसे उत्पाद बनाने में प्रयुक्त हो सकती हैं जिनसे वन्य जीवन को समाप्त किए बिना बाजार की मांग को पूरा किया जा सके.

अधिकतर जैव चिकित्सकीय प्रौद्योगिकियों की तरह ही कामेई द्वारा प्रयोग की जाने वाली आईपीएस कोशिकाओं और चिपों को इंसानों को ध्यान में रखकर बनाया गया था न कि जानवरों को.

लेकिन दोनों ही प्रौद्योगिकियों में प्रजातियों के संरक्षण के साथ-साथ जीव-जन्तुओं के कल्याण की मदद की अपार संभावनाएं हैं.

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बेहतर सुरक्षा

जैसे कि आईपीएस कोशिकाओं का प्रयोग पशुओं के साथ अमानवीय व्यवहार तथा कृषि से पर्यावरण को होने वाले दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए प्रयोगशालाओं में बनाए गए मांस के सृजन में या विलुप्ति के कगार वाली प्रजातियों के ऐसे उत्पाद बनाने में हो सकता है जिनसे वन्य जीवन को समाप्त किए बिना बाज़ार की मांग को पूरा किया जा सके.

इंसानों की तरह ही चिपों के प्रयोग से वन्य जीवन के अध्ययन और उनकी बेहतर समझ का एक रास्ता खुलता है और इस तरह उन्हें बेहतर सुरक्षा भी मिलती है.

कामेई के 'बॉडी ऑन अ चिप' प्रोजेक्ट में एक हिस्सेदार तथा सैन डियागो जू इंस्टीट्यूट फॉर कंजर्वेशन रिसर्च में आनुवांशिकी संरक्षण के निदेशक ओलिवर राइडर कहते हैं, "बहुत सारे वैज्ञानिक इस तरह की प्रौद्योगिकियों से इंसानों के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी चिकित्सकीय उपयोगिता और संभावनाओं को लेकर काफी रोमांचित हैं."

"एक-दूसरे के हितों को ध्यान में रखकर यह काफी भाग्य की बात है कि जीव-जन्तुओं के संरक्षण में यह शोध कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है."

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जानवरों की मदद

मूल रूप से कामेई को मानवीय चिकित्सा से आगे शोध के लिए जीव-जन्तु संरक्षण ने नहीं बल्कि उनके कल्याण ने प्रेरित किया था.

लॉस एंजिल्स के कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में प्रयोगशाला में चूहों का अध्ययन करते हुए उन्हें इन चौपायों से हमदर्दी हो गई.

उसे याद करते हुए वो कहते हैं, "मुझे लगा कि इंसानों का अध्ययन करने के लिए मुझे चूहे की क्या जरूरत है. मैं इस तरह के जानवरों की मदद के लिए आतुर था."

इस तरह के सवाल उठाने वाले वो अकेले नहीं हैं. दुनियाभर के उद्योगों और विश्वविद्यालयों में जानवरों पर प्रयोग अब फैशन से बाहर हो रहे हैं.

साल 2009 में यूरोपीय संघ ने प्रसाधन उद्योग में इनके प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया और 2013 में कानून निर्माताओं ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए पूरे यूरोपीय बाज़ार में इस तरह की प्रसाधन सामग्रियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया चाहे वो कहीं भी बनी हों.

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वन्य जीवों की विविधता

यदि इस बात को देखा जाए कि चूहे, खरगोश और बंदर पर किसी भी दवा या उत्पाद का असर उसी तरह नहीं होता जिस तरह इंसानों पर होता है तो चिपों पर एकत्र किए गए मानवीय ऊतकों के दोहरे उपयोग समझ आते हैं.

मनुष्य के शरीर की नकल करने वाले इन चिपों को जानवरों पर प्रयोग के मुख्य पर्याय के रूप में देखा जाता है, ऐसा कामेई मानते हैं.

लेकिन रोगों से केवल मनुष्य ही ग्रस्त नहीं होते और आईपीएस कोशिकाओं तथा चिप प्रौद्योगिकी की मदद से जानवरों के लिए भी नए चिकित्सकीय उपचार के विकास में तेजी आ सकती है.

महत्वपूर्ण बात ये है कि इंसानी रोगों की तुलना में जानवरों के रोगों पर बहुत कम लोग अध्ययन करते हैं और इन अध्ययनों को मदद देने के संसाधन तो और भी कम हैं.

वन्य जीवों की विविधता के कारण किसी भी प्रजाति से संबंधित रोगों के उपचार बहुत कठिन हैं और विलुप्ति के खतरे में पड़ी प्रजातियां तो मिलती भी नहीं हैं.

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जीवाणु संक्रमण के कारण

क्योटो विश्वविद्यालय के वन्य जीव शोध केन्द्र के निदेशक मिहो मुरायामा बताते हैं, "यदि हम संकट में पड़े जानवरों के अंग बना पाए, तो हमें ये जानकारी मिल सकेगी कि ये अंग किस तरह काम करते हैं और इन्हें संक्रमण से कैसे बचाया जाए. यह बहुत उपयोगी होगा क्योंकि हम चूहों की तरह इन जानवरों पर प्रयोग नहीं कर सकते."

कजाकिस्तान में वैज्ञानिक अब भी यह समझने के लिए जूझ रहे हैं कि 2015 में एक जीवाणु संक्रमण के कारण अचानक दो लाख सैगा हिरणों की अचानक मौत कैसे हो गई, जो इस प्रजाति की दुनिया की कुल आबादी का 60 प्रतिशत है.

उधर, तस्मानिया के शोधकर्ता तस्मानियन डेविल नामक जीव के अस्तित्व को खतरे में डालने वाले संक्रामक चेहरे के कैंसर से इन जीवों को बचाने के लिए वर्षों से शोध में लगे हैं.

एक अन्य उदाहरण गुरिल्ला हैं जिन्हें हृदयाघात यानी हार्ट अटैक का जबरदस्त खतरा रहता है लेकिन किसी को यह नहीं मालूम कि ऐसा क्यों होता है और न ही कोई इसे रोकने का उपाय सुझा पाया है.

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प्रजातियों के संरक्षण में...

कामेई का मानना है, "यदि हम किसी चिप प्रणाली में गुरिल्ला को होने वाले हार्ट अटैक की नकल कर पाएं तो हम उसके लिए आवश्यक दवा और उपचार की पहचान कर सकते हैं. इस तरह की जांच न केवल संकट में पड़े जानवरों के लिए फायदेमंद होगी बल्कि पालतू जानवरों और पशुओं के लिए भी उपयोगी होगी."

इस संबंध में राइडर बताते हैं कि चिपों के अलावा प्रजातियों के संरक्षण में आईपीएस कोशिकाएं एक अंतहीन संभावना को जन्म देती हैं.

उनका मानना है, "यदि कोशिकाओं को जानवरों में परिवर्तित कर या फिर कोशिका आधारित प्रौद्योगिकी का प्रयोग कर आनुवांशिक विविधता को संरक्षित और जमा किया जाए तो विलुप्ति का खतरा कम हो जाएगा। इस तरह की प्रौद्योगिकी की संभावनाओं की जांच करना वाकई अद्भुत है."

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एकमात्र उम्मीद है...

इस तरह के सबसे जानी-मानी परियोजनाओं में राइडर मुख्य भूमिका निभाने वालों में से एक हैं : श्वेत गैंडे की एक उप प्रजाति यानी उत्तरी श्वेत गैंडा, जिसके केवल दो सदस्य शेष रह गए हैं, को बचाने के अन्तर्राष्ट्रीय प्रयास के तहत पूर्व सदस्यों के जमाए गए ऊतक नमूनों का प्रयोग करते हुए आईपीएस कोशिकाओं को बनाना.

उसके बाद आईपीएस कोशिकाओं को अंडों और शुक्राणुओं में परिवर्तित कर आनुवांशिक रूप से विविध भ्रूणों को दक्षिणी मादा श्वेत गैंडे में रोपित कर दिया जाता है.

हालांकि ये महत्वाकांक्षी शुरुआत है लेकिन राइडर कहते हैं कि इस उप प्रजाति को विलुप्ति से बचाने की यह एकमात्र उम्मीद है.

परियोजना सफल हो या न हो, भविष्य में इससे प्रजातियों को बचाने के इसी तरह के प्रयासों को मदद मिलेगी.

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विज्ञान और विकास

मूरायामा आगे कहती हैं कि प्रौद्योगिकी मूल जीव विज्ञान और विकास की हमारी समझ को और तेज कर सकती है.

जैसे कि वो और उनकी सहयोगी इस बात में दिलचस्पी रखते हैं कि हॉर्मोन और सीरोटोनेम जैसे न्यूरो ट्रांसमीटर जानवरों के व्यवहार को कैसे प्रभावित करते हैं और उस व्यवहार के मूल में आनुवांशिक तत्व किस तरह कार्य करते हैं.

यह जानने के लिए वो अक्सर किसी जानवर के आनुवांशिक विश्लेषण पर निर्भर करती हैं. लेकिन तत्काल हो रहे कार्यकलाप और शरीर विज्ञान की समझ के लिए जीवित कोशिकाओं के तुलनात्मक अध्ययन से बेहतर कुछ नहीं होता.

उन्होंने पिछले कई वर्षों में छह सौ से ज्यादा प्रजातियों की आनुवांशिक जानकारी चिपों और आईपीएस कोशिकाओं पर एकत्र की है. इससे उन्हें विभिन्न प्रजातियों के व्यवहारों की जड़ तक पहुंचने और उनकी तुलना करने में मदद मिलेगी.

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आवश्यक माहौल

मूरायामा कहती हैं, "बहुत सारे वन्य जीवों के बारे में अब भी हमें मूलभूत जानकारी नहीं है. इन प्रजातियों की बेहतर समझ के लिए हमारा उद्देश्य प्रयोगशाला के बाहर के और प्रयोगशाला के आंकड़ों को जोड़ना है."

लेकिन इस तरह के उद्देश्यों की प्राप्ति में अभी बहुत चुनौतियां हैं. एक तो ये कि विभिन्न प्रजातियों की आईपीएस कोशिकाओं के सृजन का सूत्र अलग-अलग है.

जो बात गैंडे के लिए कारगर होती है, जरूरी नहीं कि वह चिंपांजी या चील के लिए भी लागू हो.

आईपीएस कोशिकाओं को बनाने के बाद भी विभिन्न प्रजातियों के लिए विभिन्न कोशिका बनाने की प्रक्रिया भी भिन्न होती है. साथ ही इन कोशिकाओं के बढ़ने और पनपने के लिए आवश्यक माहौल भी भिन्न होते हैं.

टोक्यो के हीरू गाकुएन हाईस्कूल के विद्यार्थी हीतोमी ताबाता और तोमोका हीरायामा जब हाथियों की आईपीएस कोशिकाएं बनाने की कोशिश कर रहे थे तब उन्हें इस बात का अनुभव हुआ.

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हाथी दांत का निर्माण

छछूंदरों की तरह ही हाथी भी इस बात में विशिष्ट हैं कि उन्हें शायद ही कभी कैंसर होता हो.

हाथियों की इसी कैंसररोधी क्षमता के कारण शोध में दिलचस्पी रखने और डॉक्टर बनने की इच्छा रखने वाले ताबाता और हीरायामा ने हाथियों पर अध्ययन का विषय चुना.

शोध के दौरान ही उन्हें अफ्रीका में होने वाले हाथियों की हत्या में उत्पन्न संकट के बारे में पता चला जिसके कारण पिछले दशक में समूचे महाद्वीप में दसियों हजार हाथी मारे गए.

तब इन विद्यार्थियों को लगा कि स्वास्थ्य से संबंधित उनकी यह परियोजना संरक्षण का भी एक हल ढूंढ सकती है : हाथियों के आईपीएस सेल से प्रयोगशाला में ही हाथी दांत का निर्माण करके.

इस बारे में तबाता कहते हैं, "हम सोच रहे थे कि यदि कोशिकाओं को अलग करके हाथी दांत सफलतापूर्वक बनाया जाए तो हाथियों की आबादी को बढ़ाने में मदद मिल सकती है. हम हाथी दांत के खण्ड यानी ब्लॉक रच सकते हैं जिससे हैंकोस बनाना आसान होगा."

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कैंसररोधी जीन

हैंकोस उस सील का नाम है जो जापान में हाथी दांत के 80 प्रतिशत उत्पाद बनाता है.

तबाता और हीरायामा चूहों से प्ल्यूरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएं रचने में सफल रहे लेकिन जब यही काम हाथियों के लिए करना पड़ा तो समस्या खड़ी हो गई.

हाथियों में पी53 नाम का एक जीन पाया जाता है जो कैंसररोधी भूमिका निभाता है लेकिन यही जीन उसके री-प्रोग्रामिंग में भी अड़चन डालता है.

इस बारे में हीरायामा कहती हैं, "ये जीन कोशिकीय चक्र का विरोध करता है या उसे कम करता है, इसका अर्थ ये हुआ कि इससे आईपीएस कोशिकाएं बनाना और कठिन है."

फिर भी वो और तबाता मिलकर पी53 को बदलने की कोशिश करते रहेंगे.

मार्च में उनके स्नातक होने तक यामानाका फैक्टर को लाने में किस तरह का बदलाव करना होगा, इस पर उनकी शोध जारी रहेगी. उसके बाद उन्हें उम्मीद है कि इस परियोजना पर आगे का काम कनिष्ठ विद्यार्थी करेंगे.

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'बॉडी ऑन ए चिप'

कामेई भी इस बात से सहमत हैं कि पी53 एक बड़ी अड़चन है, लेकिन विज्ञान की अन्य चुनौतियों की तरह इस अड़चन को भी पार करने के लिए जूझना जरूरी है.

वो कहते हैं कि यदि ये संभव है तो हमें इसे करना ही चाहिए. कम से कम इस परियोजना से यह तो पता चलता है कि किस तरह 'बॉडीज ऑन ए चिप' से युवा वैज्ञानिकों को आनुवांशिक शोध का एक अच्छा उपकरण मिल जाएगा.

फिलहाल तो कामेई ने चूहों से संबंधित 'बॉडी ऑन ए चिप' का मॉडल तैयार किया है. वह ग्रेवीज ज़ेब्रा से संबंधित दूसरी परियोजना भी लगभग पूरी करने वाले हैं.

इस परियोजना की कोशिकाएं उनकी प्रयोगशाला में क्योटो सिटी जू के सौजन्य से प्राप्त हुईं. उनकी सूची में अगले जानवर डॉल्फिन और घोड़े हैं.

उनका मानना है कि हर प्रजाति में कुछ कठिनाई होती है लेकिन अध्ययन के लिए वे सब की सब दिलचस्प विषय देती हैं और अगर इससे चिड़ियाघरों में काम करने वाले लोगों या जानवरों को लाभ होता है तो ये बहुत अच्छी बात है.

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'टिशू चिप्स इन स्पेस'

साथ में वो ये भी कहते हैं कि उनका उद्देश्य तो अंतरिक्ष तक फैला हुआ है.

अमरीका के नेशनल सेंटर फॉर ट्रांसलेशनल साइंस और इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन यूएस नेशनल लेबोरेटरी ने 'टिशू चिप्स इन स्पेस' परियोजना शुरू की है जिसके अन्तर्गत मानवीय कोशिकाओं और अंगों पर अंतरिक्ष के प्रभाव की जांच होनी है.

कामेई मानते हैं कि पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर यदि इंसान ने बस्ती बसाई तो वहां जानवर भी रह सकें, इसके लिए यह प्रौद्योगिकी बहुत काम की होगी.

वो कहते हैं कि वह तो मंगल ग्रह पर नहीं जाएंगे लेकिन उनका सपना उन सब की मदद करना है जो अंतरिक्ष में जाएंगे - चाहे वो पालतू जानवर हों या पशु.

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