मोटापा क्या पेट के कीटाणुओं की वजह से होता है

  • जेसिका ब्राउन
  • बीबीसी फ्यूचर
वजन कम करने के उपाय

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हमारे शरीर के भीतर कीटाणुओं और दूसरी तरह के छोटे जीवों की भरी-पूरी दुनिया आबाद है. अरबों-ख़रबों की तादाद में ये सूक्ष्म जीव हमारे पेट के भीतर आशियाना बनाए हुए हैं. वैज्ञानिक इन्हें शरीर का एक अलग अंग मानने लगे हैं.

इनका हमारी सेहत से गहरा वास्ता है.

पर, क्या हमारे पेट में रहने वाले इन सूक्ष्म जीवों का मोटापे से भी कोई रिश्ता है? वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारी डाइटिंग की कामयाबी या फिर नाकामी में इन नन्हे जीवों का भी योगदान होता है. इन्हें वो माइक्रोबायोम कहते हैं.

माना जाता है कि इंसान के मोटापे में उसके जीन का बड़ा रोल होता है. इसी तरह हमें जो बीमारियां होती हैं, उनमें भी ये जीन काफ़ी अहम रोल निभाते हैं. जैसे दिल की बीमारियां या फिर टाइप-2 डायबिटीज़ जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां.

जुड़वां लोगों के जीन भी कई बार अलग होते हैं. फिर भी, मोटापे या पेट की सेहत में बाहरी कारण अहम रोल निभाते हैं. इनमें हमारी आंतों में आबाद कीटाणुओं की दुनिया भी बड़ा किरदार निभाती है.

आपने देखा होगा कि डाइटिंग कर रहे लोगों में से कुछ तो आसानी से अपना लक्ष्य हासिल कर लेते हैं. वहीं, कुछ को इसके लिए बहुत मशक़्क़त करनी होती है.

इसकी वजह अक्सर हमारे शरीर के भीतर के कीटाणु होते हैं. जो कीटाणु हमारा खाना पचाने में सहायक होते हैं, वो असल में हमें फ़ायदे के साथ-साथ नुक़सान भी पहुंचाते हैं.

हमारे खाने में कई ऐसे तत्व होते हैं, जिन्हें पचाने में ये कीटाणु रोल निभाते हैं. क्योंकि इनके पास उन्हें तोड़ने वाले एंजाइम होते हैं. इसका नतीजा ये होता है कि जिस खान-पान में क़ैद ऊर्जा हमारी आंतें नहीं सोख पाती हैं. जब ये बैक्टीरिया इस खाने को तोड़ कर ऊर्जा निकालते हैं, तो वो कैलोरी हमें भी मिल जाती है.

इसका नतीजा ये होता है कि अगर कोई डाइटिंग पर है, तो वो कम खाने के बावजूद, ज़्यादा कैलोरी पाता है. उसका डाइटिंग प्लान नाकाम हो जाता है.

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बैक्टीरिया की वजह से ज़्यादा कैलोरी मिलती है शरीर को

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ब्रिटेन की मेयो क्लिनिक की एसोसिएट प्रोफ़ेसर पूर्णा कश्यप कहती हैं, "हम जो खाना खाते हैं, वो हमारे साथ-साथ हमारे भीतर पलने वाले बैक्टीरिया के भी काम आता है. वो खाने के उस हिस्से को भी पचा लेते हैं, जिन्हें पचाने के लिए हमारे पास एंजाइम नहीं होते हैं."

पूर्णा कश्यप इसके नुक़सान को समझाते हैं, "बैक्टीरिया जब हमारे शरीर में न पचने वाले इस खाने को खाते हैं, तो हमें और भी ज़्यादा कैलोरी मिल जाती है. ये कीटाणुओं के साथ-साथ हमारे लिए भी फ़ायदेमंद होता है."

लेकिन, इसका नुक़सान यूं होता है कि हमारे शरीर को ज़्यादा कैलोरी मिल जाती है.

पूर्णा कश्यप ने एक प्रयोग ये पता लगाने के लिए किया कि अगर हम कम कैलोरी वाला खाना खाते हैं, तो क्या उसका वज़न घटाने की कोशिश पर बुरा असर पड़ता है? कहीं बैक्टीरिया उस कम कैलोरी वाले खाने से भी तो ज़्यादा कैलोरी निकालकर हमें नहीं दे देते?

इस प्रयोग के नतीजे चौंकाने वाले थे. इसमें शामिल लोगों के एक समूह को अपना वज़न घटाने में नाकामी हाथ लगी. इसकी वजह वो बैक्टीरिया थे, जो उनके शरीर में जाने वाले खाने को तोड़ कर उसमें से ज़्यादा कैलोरी निकाल पा रहे थे.

हालांकि पूर्णा कश्यप मानते हैं कि इस प्रयोग को बड़े पैमाने पर करने की ज़रूरत है. तभी, किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकेगा.

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मोटापा बढ़ाने वाले बैक्टीरिया

ब्रिटिश रिसर्चर लुईस ब्रंकवाल ने मोटे लोगों के पेट के कीटाणुओं को खंगाला तो नई बात सामने आई. इन लोगों के पेट में चार तरह के ऐसे बैक्टीरिया मिले, जो मोटापा बढ़ाने वाले एंजाइम से लैस थे.

इन बैक्टीरिया की वजह से टाइप-2 डायबिटीज़ पैदा करने वाले केमिकल भी निकलते थे. ऐसे बैक्टीरिया अक्सर मांस खाने वाले लोगों के पेट में ही देखे गए.

ब्रंकवाल कहते हैं कि ज़्यादा प्रोटीन वाला खाना यानी मांस-मछली खाने वालों को कई तरह की बीमारियां होने का ख़तरा बढ़ जाता है.

वो ये भी कहते हैं कि अब इस बात पर रिसर्च की ज़रूरत है कि इंसान की आंतों के बैक्टीरिया में कैसे बदलाव लाया जा सकता है. ताकि, मोटापे और दूसरी बीमारियों के ख़तरे को कम किया जा सके.

मोटे और दुबले लोगों के पेट के बैक्टीरिया में क्या फ़र्क़ होता है, अभी ये साफ़ नहीं है.

लेकिन, डेनमार्क के मेटाबोलिज़्म एक्सपर्ट ओलुफ पेडरसन कहते हैं कि आंतों में जितनी तरह के कीटाणु होंगे, उतना ही इंसान के लिए फ़ायदेमंद होगा. असल में पेडरसन ने क़रीब तीन सौ मोटे और दुबले लोगों पर रिसर्च की.

उन्होंने पाया कि मोटे लोगों के पेटों के भीतर जो कीटाणु आबाद थे, उनमें विविधता की कमी थी. इन लोगों में डायबिटीज़, दिल की बीमारी और आंतों में जलन की शिकायत ज़्यादा देखी गई.

अब कुछ लोगों में कीटाणुओं की ज़्यादा क़िस्में होने और कुछ लोगों में कम नस्लें होने की वजह तो नहीं मालूम. पर, ज़्यादा एंटीबायोटिक लेने से हमारे पेट में पलने वाले कई कीटाणु खल्लास हो जाते हैं. इनका हमारे खान-पान पर भी गहरा असर होता है.

एक रिसर्च ये कहती है कि अगर हम ज़्यादा रेशेदार खाना, यानी फल और सब्ज़ियां खाएं, तो हमारे भीतर कीटाणुओं की ज़्यादा तरह की नस्लें आबाद होंगी. इनकी मदद से हम आंतों में होने वाली जलन जैसी शिकायतें रोक सकते हैं, या कम कर सकते हैं.

नॉटिंघम यूनिवर्सिटी की एना वाल्डेस कहती हैं कि, 'अगर टाइप-2 डायबिटीज़ के मरीज़ रेशेदार खाना ज़्यादा खाएं तो डायबिटीज़ में कमी आती है.'

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कीटाणुओं को बदला जा सकता है?

शरीर के वज़न और इसके पेट के भीतर मौजूद कीटाणुओं पर सबसे ताज़ा रिसर्च का नतीजा है- क्राइस्टेनसेनेलेसी. ये एक कीटाणु का नाम है. जो दुनिया के 97 फ़ीसद इंसानों के पेट में पाया जाता है. पर, इसकी तादाद दुबले लोगों में ज़्यादा देखी गई है.

ये अक्सर लोगों को अपनी मां से मिलता है. जब चूहों में क्राइस्टेनसेनेलेसी नाम का ये कीटाणु प्रत्यारोपित किया गया, तो इसने चूहों को मोटा होने से रोकने में मदद की. इस रिसर्च में शामिल जिलियन वाटर्स कहती हैं कि अब इस कीटाणु की उत्पत्ति और इसके फ़ायदे-नुक़सान पर और रिसर्च हो रही है.

वहीं, इज़राइल के वाइज़मैन इंस्टीट्यूट ने लोगों के पर्सनलाइज़्ड इलाज का तरीक़ा ढूंढ निकाला है. एक हज़ार से ज़्यादा लोगों पर हुई रिसर्च से दिलचस्प बातें सामने आई हैं.

देखा गया है कि टमाटर खाने से लोगों के ख़ून में शुगर की मात्रा बहुत बढ़ गई. इसी तरह दूसरी खाने की चीज़ों के साथ भी देखा गया.

वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे कि लोगों के पेट में मौजूद कीटाणुओं के आधार पर उन्हें डायबिटीज़ होने की आशंका की भविष्यवाणी कर सकते हैं.

इस रिसर्च की मदद से इज़राइल और अमरीका में लोगों की सेहत से जुड़ी सेवाएं डे टू के नाम से शुरू की गई हैं. जल्द ही डे टू की सेवा ब्रिटेन में भी शुरू होगी.

अगले पांच सालों में ऐसी और सुविधाएं बढ़ने की उम्मीद है.

पूर्णा कश्यप कहते हैं कि हमारी आंतों में रहने वाले कीटाणु बहुत से पेचीदा केमिकल रिएक्शन कर सकते हैं. अब ये समझने की ज़रूरत है कि ये कीटाणु ऐसा कर कैसे पाते हैं.

शरीर के भीतर के कीटाणुओं को बदला भी जा सकता है. यानी भविष्य में पेट और दूसरी बीमारियों के इलाज के विकल्पों में से एक, शरीर में मौजूद कीटाणुओं की नस्ल बदलना भी होगा.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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