अंटार्कटिका का सबसे ख़तरनाक बचाव अभियान

  • 25 फरवरी 2019
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मैल्कम रॉबर्ट्स को जठरांत्र रक्तस्राव यानी गैस्ट्रोइन्टेस्टाइनल ब्लीडिंग की समस्या उत्पन्न हुई तो वे किसी भी अस्पताल से हज़ारों मील दूर थे. क्या डॉक्टरों की एक टीम उन्हें बचाने के लिए समय पर पहुंच पाएगी?

अप्रैल 2015 के अन्तिम दिनों में अंटार्कटिका में एक बचाव अभियान के लिए रक्त की थैलियों से भरे एक हवाई जहाज में टिम नटबीम को भेजा गया. नटबीम ब्रिटेन में आपात चिकित्सा के एक सलाहकार हैं.

सर्दियों के शुरूआती दिन थे और ऐसे में पूरा महाद्वीप अंधेरे और भयंकर सर्दी के साथ-साथ तेज हवाओं की चपेट में होता है. छह महीने तक चलने वाली इस ऋतु में आमतौर पर उड़ानें नहीं होतीं.

लेकिन, नटबीम एक पायलट और इंजीनियर को साथ लेकर इस यात्रा पर निकल पड़े. इनका मकसद अंटार्कटिक बेस में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही एक ज़िन्दगी को बचाना था.

ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के एक इंजीनियर मैलकम रॉबर्ट्स को कुछ दिनों पहले हैली रिसर्च स्टेशन पर भयंकर जठरांत्र रक्त स्राव की समस्या उत्पन्न हो गई थी. वे किसी भी निकटवर्ती अस्पताल से हज़ारों मील दूर थे.

रॉबर्ट्स का काफी खून बह गया था लेकिन पिछले 24 घंटों से उन्होंने हिम्मत बांधी हुई थी. यदि बचावकर्मी समय पर पहुंच जाएं तो उनके ज़िन्दा बचने की कुछ उम्मीद हो सकती है लेकिन बचावकर्मियों के रास्ते में बहुत सारी चुनौतियां हैं.

हैली तक की हवाई यात्रा में ईंधन भरने के लिए अंटार्कटिक प्रायद्वीप पर बने एक अन्य बेस रोथेरा में रूकना पड़ेगा और इसमें 24 घंटे लग जाएंगे. दुबारा भी यही यात्रा करनी है अर्थात कुल 48 घंटों की यात्रा. वापसी में बचाव दल को आपातस्थिति से भी निपटना है.

मरीज़ की जान बचाना अपने आप में चुनौतीपूर्ण है. लेकिन क्या नटबीम इस अभियान से मनौवैज्ञानिक रूप से निपट पाएंगे.

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नटबीम को शुरू में तो इस अभियान पर जाना भी नहीं था. जब आपातस्थिति उत्पन्न हुई तो उन्हें चिली के सबसे दक्षिण हिस्से पुन्टा ऐरेनास नामक जगह पर पहुंचाया गया था ताकि उन्हें जहाज के उतरने के बाद अतिरिक्त मदद के रूप में उपयोग किया जा सके. लेकिन उस स्थान के ठीक उत्तर में एक ज्वालामुखी फटने के बाद सब कुछ बदल गया.

इस अभियान पर जिस डॉक्टर को जाना था वह सेंटियागो में इंतज़ार कर रहा था. ज्वालामुखी विस्फोट के बाद सारी उड़ानें रद्द कर दी गईं. चिली और अंटार्कटिका के बीच मौसम ने ऐसी करवट बदली कि आगे दिखना काफी कम हो गया.

अचानक नटबीम को पता चला कि उन्हें अभियान पर जाना होगा. वो मानते हैं कि सब कुछ इतना तेजी से हुआ कि उन्हें उस समय इस अभियान पर मिलने वाले खतरों के बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिला. वे तो अंटार्कटिक की यात्रा के बारे में सोचकर रोमांचित हो रहे थे.

अनोखे व्यक्तित्व

अंटार्कटिक में सर्दियों में बहुत कम चिकित्सकीय बचाव अभियान चलाए गए हैं. वर्ष 2016 में सर्दियों के मध्य में जब दक्षिणी ध्रुव पर चौबीसों घंटे अंधेरा रहता है तब एक बीमार कर्मी को दक्षिणी ध्रुव से हवाई जहाज के रास्ते बचाया गया था. वर्ष 2010 में अमरीका के मुख्य शोध केन्द्र से भी एक मरीज़ को बचाया गया था.

ब्रिटेन के मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के मनोवैज्ञानिक शोधकर्ता नैथन स्मिथ का मानना है कि लोग ऐसे अभियानों में भाग इसलिए लेते हैं कि वे ऐसा कुछ करना चाहते हैं जो अन्य लोग न करना चाहते हों.

ऐसे लोग इसे अपने प्रशिक्षण की जांच करने के मौके के तौर पर देखते हैं.

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शोध में पाया गया है कि जो लोग समझदार होते हैं वे अच्छा प्रदर्शन करते हैं. स्मिथ बताते हैं कि जिन कामों में अधिक खतरा होता है उनमें ऐसे लोग ज़्यादा अच्छा प्रदर्शन करते हैं.

कर्तव्यनिष्ठा की भी अपनी भूमिका होती है. उदाहरण के लिए व्यक्तित्वों के प्रकार से संबंधित एक अध्ययन में पाया गया कि जो लोग अधिक खतरा उठाने के इच्छुक रहते हैं, वे अपनी कर्तव्यनिष्ठा के बल पर भीषण परिस्थितियों से निपट सकते हैं.

दरअसल यह बात उस आम धारणा के विपरीत है जिसमें यह माना जाता है कि एक्स्ट्रीम एक्टिविटीज़ यानी चरम गतिविधियों में भाग लेने वाले लोग दरअसल भावावेश में यह काम करते हैं.

स्मिथ मानते हैं कि ऐसे लोग काफी समय उस भावावेश से निपटने की तैयारी में लगाते हैं.

लम्बी यात्रा में आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए नटबीम और उनके दल को भी काफी सावधानी बरतनी होगी.

जैसे कि पूरी यात्रा में नटबीम को रक्त की थैलियों के तापमान पर निगरानी रखनी है. हवाई जहाज में आगे का हिस्सा तो गर्म था लेकिन पीछे तापमान 10 डिग्री सेल्सियस था. नटबीम को रक्त की थैलियां रखने के लिए उचित स्थान ढूंढना पड़ा और हर घंटे उसकी निगरानी करनी पड़ी.

हैली में सुबह हो रही थी और यह दल वहां उतरा. अब दल के पास रॉबर्ट्स को हवाई जहाज में लादने और वापस जाने के लिए केवल डेढ़ घंटे थे. इसके बाद उड़ान के लिहाज से बहुत अंधेरा हो जाता.

हवा की ठंडक के बिना ही तापमान 30 डिग्री सेल्सियस था. नटबीम ने हवाई जहाज से स्टेशन तक का फासला स्नोमोबाइल यानी बर्फ पर चलने वाले स्कूटर से तय किया और एक तरह से अंटार्कटिका में पहली बार होने वाले रक्त-आधान यानी ट्रांसफ्यूजन को अंज़ाम दिया.

इसके बाद रॉबर्ट्स को हवाई जहाज में ले आया गया. इधर, हवाई जहाज के इंजन लगातार चल रहे थे.

नटबीम का मानना है कि अनुमान न लगाए जा सकने वाली परिस्थितियों के कारण बहुत ज़्यादा योजना नहीं बनाई गई थी.

पहले भी अभियानों पर गए लोगों से बातचीत में स्मिथ और उनके सहयोगियों को पता चला कि योजना बनाने से ज़्यादा महत्वपूर्ण अपनी कुशलता पर विश्वास होना है.

वे मानते हैं कि आपको अपनी योजनाओं में लचीलापन रखना पड़ता है जिससे स्थिति के अनुरूप काम किया जा सके.

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नींद की कमी

पूरे अभियान में सबसे बड़ी चुनौती 48 घंटे की उड़ान के दौरान होने वाली नींद की कमी थी. नटबीम इस दौरान केवल चार घंटे सो पाए.

माइक्रोस्लीप्स यानी श्वाननिद्रा, इसका मतलब है कि एक सेकेंड से 30 सेकेंड तक पलकें बंद करके झपकी लेने से शरीर को संयत करने में मदद मिलती है. अमरीका की वॉशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के स्लीप एंड परफॉर्मेंस रिसर्च सेंटर के निदेशक हैंस वॉन डॉन्जेन कहते हैं कि यदि शरीर को नींद न मिले तो मस्तिष्क अपना तरीका निकालकर इसकी भरपाई कर लेता है.

लेकिन, माइक्रोस्लीप्स से ध्यान में भटकाव आता है और काम पर असर पड़ता है.

चिली तक की वापसी की लम्बी उड़ान के दौरान नटबीम इतना थक चुके थे कि उन्हें इलाज से जुड़े काम करने में कठिनाई हो रही थी. रॉबर्ट्स की दशा की लगातार निगरानी आवश्यक थी और उपचार संबंधी बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने थे. ऐसे में नटबीम अलग ही खतरा पैदा कर रहे थे.

एक स्थान पर विमान को पहाड़ों के ऊपर से उड़ना था लेकिन रॉबर्ट्स का रक्तचाप कम था तो इस बारे में नटबीम को भी सोचना था.

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नटबीम कहते हैं कि वे आमतौर पर आसानी से निर्णय ले लेते हैं और उन्हें कभी दिक्कत नहीं होती.

नींद आपकी भावनाओं पर भी काफी असर डालती है. मस्तिष्क के भावना केन्द्र उस व्यक्ति में आपस में कम जुड़े होते हैं जिसने पर्याप्त आराम न किया हो. इसलिए उसे अपनी भावनाओं पर काबू पाने में कठिनाई आती है. वॉन डॉन्जेन के अनुसार ऐसे लोग काफी चिड़चिड़े और अस्थिर से दिखते हैं.

उड़ान के दौरान ही नटबीम के लिए तब एक और मुसीबत पैदा हो गई जब रॉबर्ट्स को अचानक आघात हो गया. उन्हें और अधिक रक्त तथा तरल के साथ-साथ अन्य उपचार भी देना पड़ा. नटबीम कहते हैं कि उस समय मैं भावनात्मक रूप से बहुत उत्तेजित था.

स्मिथ का मानना है कि नींद की कमी से होने वाले प्रभावों को समझकर उनसे निपटा जा सकता है. नटबीम बताते हैं कि इस बारे में उन्हें पता है कि थकान लगने पर उनकी सहनशीलता कुछ कम हो जाती है. इसलिए शायद इससे मदद मिली हो.

टीमवर्क से सफलता

किस्मत से नटबीम के साथी नींद की कमी झेल रहे नटबीम की मदद कर रहे थे. इसके अतिरिक्त उनकी पूरी यात्रा पर एक दूसरी टीम भी दूर से नज़र रखे हुए थी.

जहां भी हवाई जहाज रूकता था और दोनों दलों की बात हो पाती थी, तो मौसम के बारे में मिलने वाली जानकारी से फैसले लेने में आसानी हो जाती थी.

नटबीम ब्रिटेन में अपने बॉस से भी नियमित तौर पर सम्पर्क रख रहे थे जिससे विभिन्न परिस्थितियों में उपचार पर चर्चा की जा सके.

जैसे कि रोथेरा में हवाई जहाज उतरने के बाद रॉबर्ट्स जठरांत्र रक्तस्राव से फिर पीड़ित हो गए. वहां मौजूद डॉक्टर के बावजूद पूरी तरह थके हुए नटबीम रॉबर्ट्स को छोड़ना नहीं चाहते थे.

ऐसे समय में ब्रिटेन से आए उनके बॉस के निर्देशों से सब कुछ ठीक हो गया. उन्हें थोड़ा आराम करने की सलाह दी गई जिससे हवाई यात्रा के बचे हुए समय में वे रॉबर्ट्स की देखभाल कर सकें.

नटबीम का मानना है कि शायद उन्हें दुनिया की सबसे अच्छी सलाह दी गई थी. यदि मैं रुक जाता तो और भी थक जाता और यात्रा के अन्तिम चरण के लिए मैं मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार न हो पाता.

यदि माहौल तनावपूर्ण हो तो आसपास के लोग उससे निपटने में काम आते हैं.

सब कुछ समूह के आंतरिक रिश्तों पर निर्भर करता है. यदि समूह एक साथ काम नहीं कर पाता तो इसका नकारात्मक असर पड़ता है.

व्यक्तित्व के लक्षणों विशेषकर एक-दूसरे की बात से सहमति का गुण यह बता सकता है कि दल में कौन अच्छा खिलाड़ी होगा.

स्मिथ बताते हैं, "जिन लोगों को खतरनाक स्थितियों में छोटे समूहों में काम करना पड़ता है वे आमतौर पर अच्छे सदस्य की तरह काम करते हैं. उन्हें अपनी बात रखने और दल का कामकाज़ चलाए रखने में कुशलता हासिल होती है."

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आख़िर में क्या हुआ

रोथेरा से अंतिम उड़ान के बाद हवाई जहाज चिली के पुन्टा ऐरेनास पर उतरा. रॉबर्ट्स को एक अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उनका कामयाब इलाज़ हुआ. लेकिन, नटबीम को ऐसा लग रहा था कि अभियान अभी पूरा नहीं हुआ है. वे मैलकम के साथ अस्पताल में जाना चाह रहे थे.

अक्सर अभियान से लौटे दलों की ऐसी ही प्रतिक्रिया होती है. स्मिथ कहते हैं कि इस तरह के भावुक अनुभवों में साथ वक्त बिताने के बाद आपस में इस तरह की संवेदना सामान्य है.

बाद में नटबीम नियमित तौर पर रॉबर्ट्स का हालचाल लेने अस्पताल जाते रहे.

स्मिथ के अनुसार आमतौर पर लोग किसी भी घटना के लगभग तीन हफ्ते बाद तक उस पर विचार करते रहते हैं. किसी भी अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर वापस लौटने पर लोगों को ऐसा लगता है कि अब उनका कोई उद्देश्य नहीं है.

स्मिथ के अनुसार ऐसे में कोई रिपोर्ट लिख देना या अनुभवों को कहानी का रूप देने से काफी मनोवैज्ञानिक मदद मिलती है.

प्रशिक्षण से भी इसमें मदद मिल सकती है. इसीलिए अंतरिक्ष यात्री या सेना में काम करने वाले लोग अक्सर गहन तैयारियां करते हैं. स्मिथ बताते हैं कोई भी प्रशिक्षण किसी भी अभियान के मनोवैज्ञानिक पहलू पर केन्द्रित नहीं होता.

एक तरह से देखा जाए तो यह अभियान किसी भी अस्पताल के आपातकाल कक्ष में डॉक्टरों के सामने से गुजरने वाले रोज़मर्रा के मामलों का एक और अधिक चरम रूप है.

नटबीम का कहना है कि ऐसे अभियानों का मानसिक अभ्यास तब कर लेना चाहिए जब आप आरामदेह स्थिति में हों. इससे नींद की कमी से निपटने के लिए मस्तिष्क को तैयार करने में मदद मिलती है.

नटबीम को लगता है कि वो शायद ही किसी ऐसे अभियान में दोबारा जाएं. उन्होंने तो एक बैक-अप डॉक्टर की भूमिका की तैयारी की थी. उन्हें अब लगता है कि अभियान में नुकसान पहुंचने के काफी संयोग थे.

वे कहते हैं, "एक सफल बचाव अभियान पर दोबारा नज़र डालना अच्छा लगता है लेकिन अभियान से जुड़े सभी पहलुओं पर विचार करने तथा खतरों का भी ध्यान रखने की आवश्यकता होती है. मैं अब भी इससे उबर नहीं पाया हूं."

(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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