इंसानों ने जानवरों का दूध पीना क्यों शुरू किया

  • 2 मार्च 2019
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जानवरों के दूध के मुक़ाबले बाज़ार में कई और तरह के दूध आ गए हैं. जैसे सोया या बादाम से बना दूध. ये तेज़ी से लोकप्रिय भी हो रहे हैं.

शाकाहार को तरज़ीह देने वाले लोगों के लिए ये मुफ़ीद हैं. ये शाकाहारी दूध उन लोगों को भी रास आते हैं, जिन्हें डेयरी के दूध से एलर्जी है.

जानवरों के दूध और इंसान के रिश्ते में आया एक और मोड़ भर है. आख़िर इंसानों का जानवरों के दूध से रिश्ता हज़ारों साल पुराना जो ठहरा. इतने पुराने ताल्लुक़ात में उतार-चढ़ाव आने लाज़मी हैं.

अजीब बात है न, कि इंसान दूसरे जानवरों का दूध पीता है. आख़िर ये दूध जानवर अपने बच्चों के लिए पैदा करते हैं. हम इसे जानवरों के थन से निचोड़ कर ख़ुद इस्तेमाल कर लेते हैं.

बहुत से देशों में जानवरों का दूध पीना अच्छा नहीं माना जाता. साल 2000 में चीन ने देशव्यापी मुहिम छेड़कर लोगों से डेयरी उत्पाद और दूध का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने की अपील की थी. ऐसा सेहत के लिहाज़ से बेहतर माना गया था.

चीन में दूध पीना क्यों मानते हैं बुरा?

असल में चीन की पुरानी सभ्यता में दूध पीने को अच्छा नहीं माना जाता था. आज भी बहुत से चीनी नागरिकों के लिए चीज़ का इस्तेमाल भी उबकाई ला देता है.

अगर हम इंसान के क़रीब 3 लाख साल के इतिहास के पन्ने पलटें, तो दूध पीने की आदत ज़्यादा पुरानी नहीं है.

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भले ही ये दावा किया जाता हो कि प्राचीन भारत में दूध की नदियां बहती थीं. पर, आज से 10 हज़ार साल पहले बमुश्किल ही कोई इंसान ऐसा मिलता होगा, जो जानवरों का दूध पीता था, वो भी कभी-कभार.

दूध पीने की आदत सबसे पहले पश्चिमी यूरोप के लोगों को पड़ी. ये वो इंसान थे, जिन्होंने सबसे पहले गाय और दूसरे जानवर पालने शुरू किए थे.

आज, भारत से लेकर यूरोप और अमरीका तक बहुत से लोग नियमित रूप से दूध का सेवन करते हैं.

ये बच्चों का खाना है

जानवरों का दूध पीना कई कारणों से अजीब है.

सबसे बड़ी वजह तो वैज्ञानिक है. दूध में लैक्टोज़ नाम की चीनी पायी जाती है. ये फलों और दूसरी मीठी चीज़ों से बिल्कुल अलग होती है.

जब हम बच्चे होते हैं, तो हमारे शरीर में दूध में मौजूद लैक्टोज़ को पचाने के लिए ख़ास एंजाइम बनता है. इसका नाम है लैक्टेस, ताकि हम मां के दूध में मौजूद लैक्टोज़ को पचा सकें.

लेकिन, बचपन के दिन बीतने के साथ ही हम लैक्टोज़ को ठीक से पचाने की ख़ूबी खो बैठते हैं. हमारे शरीर में लैक्टेस नाम का एंजाइम बनना बंद हो जाता है.

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इस एंजाइम की ग़ैरमौजूदगी में हमारे लिए दूध को पचा पाना मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि जो वयस्क लोग बहुत ज़्यादा तादाद में दूध पीते हैं, उन्हें गैस की, पेट में खिंचाव की और कई मामलों में दस्त की शिकायत हो जाती है.

मज़े की बात ये है कि किसी और जानवर, फिर चाहे वो गाय हो, बिल्ली हो या फिर कुत्ता, किसी में दूध पचाने वाला एंजाइम लैक्टेस नहीं होता.

तो, जब यूरोप में लोगों को दूध पीने की आदत पड़ी होगी, तो वो ख़ूब गैस छोड़ते रहे होंगे.

यूरोप में दूध का इतिहास

लेकिन, इंसान के खान-पान में आए इस बदलाव को देखते हुए क़ुदरत ने इंसान के शरीर में बदलाव करने शुरू किए.

बहुत से लोगों के शरीर में बचपन बीतने के बाद भी दूध के लैक्टोज़ को पचाने के लिए लैक्टेस एंजाइम बनता रहा. इससे लोगों के लिए जानवरों का दूध पचाना आसान हो गया.

यानी लंबे वक़्त तक दूध पीने की वजह से इंसान का डीएनए बदल गया.

पेरिस के म्यूज़ियम ऑफ़ ह्यूमनकाइंड की प्रोफ़ेसर लॉर सेगुरेल कहती हैं कि, 'लैक्टोज़ को पचाने की आदत यूरोपीय लोगों में पांच हज़ार साल पहले विकसित हुई. मध्य यूरोप के लोगों तक ये जीन आज से 3 हज़ार साल पहले पहुंचे.'

आज बहुत सी सभ्यताओं में इंसानों में ये जीन मिलता है, जो हमें लैक्टोज़ को वयस्क होने पर भी पचाने में मदद करता है.

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आज उत्तरी यूरोप की 90 फ़ीसद आबादी में ये लैक्टेस एंजाइम वयस्क होने के बाद भी बनता रहता है. कई मध्य-पूर्वी और अफ्रीकी देशों के लोगों में भी ये गुण आ गया है.

लेकिन, अभी भी दुनिया के कई देश ऐसे हैं, जिनकी आबादी के पास ये क़ुदरती ख़ूबी नहीं मौजूद है. एशिया और दक्षिणी अमरीका में रहने वाले बहुत से लोगों के पास बचपन के बाद भी लैक्टेस बनाते रहने वाला जीन नहीं पाया जाता. कई एशियाई और अफ्रीकी देशों का भी ये हाल है.

सेगुरेल कहती हैं कि, 'ये समझना मुश्किल है कि कुछ इंसानों में तो वयस्क होने पर भी लैक्टेस एंजाइम बनता रहता है. पर, कुछ सभ्यताओं में इस जीन का विकास नहीं हुआ. बड़ा सवाल ये है कि आख़िर दूध पीना इतना फ़ायदेमंद कैसे है, कि, क़ुदरत ने इंसान के शरीर में ये बदलाव करना ज़रूरी समझा?'

इस सवाल का जवाब लोग ये देते हैं कि दूध से हमें कई पोषक तत्व मिलते हैं. इससे भुखमरी के शिकार होने से बचा जा सकता है.

पर, बारीक़ी से जांच करें, तो ये तर्क मज़बूत नहीं लगता.

कुछ लोगों को क्यों नहीं पचती दूध से बनी चीजें?

सेगुरेल कहती हैं कि, 'इंसान के खान-पान की चीज़ों का दायरा बहुत व्यापक है. ऐसे में किसी एक खाने की चीज़ को लेकर जीन में बदलाव की बात समझ में नहीं आती.'

जिन लोगों में लैक्टेस एंजाइम नहीं बनता. जिन्हें दूध में मौजूद लैक्टोज़ पचाने में दिक़्क़त होती है. वो, भी थोड़ी मात्रा में दूध ले सकते हैं.

इसके अलावा दूध से मक्खन, दही और क्रीम बनाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है. तब हमें लैक्टोज़ से होने वाली परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा. शेड्डार और पार्मेसान चीज़ में तो लैक्टोज़ न के बराबर होता है.

शायद यही वजह है कि इंसान ने चीज़ का आविष्कार किया था.

पूर्वी यूरोपीय देश क्रोएशिया में कुछ ऐसे बर्तन मिले हैं, जिनसे ये इशारा मिलता है कि इंसान ने आज से 7000 साल पहले ही चीज़ बनाना शुरू कर दिया था. हालांकि इस दावे पर सवाल भी उठे हैं. मगर, यूरोप में कई और जगह ऐसे सबूत मिले हैं, जिनसे लगता है कि इंसान ने 6000 साल पहले ही चीज़ बनाना सीख लिया था. ये तो वो दौर है, जब इंसान में लैक्टेस एंजाइम को बड़े होने के बाद भी बनाते रहने वाला जीन भी विकसित नहीं हुआ था.

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जिन सभ्यताओं में जानवर पालने की परंपरा रही थी, उनमें दूध पीने की आदत भी पहले पड़ी. इन्हीं लोगों में लैक्टेस एंजाइम को बड़े होने के बाद भी बनाने वाला जीन पहले विकसित हुआ. जिन सभ्यताओं में जानवर पालने का चलन नहीं था, वहां ये ख़ूबी विकसित नहीं हुई.

लेकिन, इस जवाब में भी पेंच हैं. कई ऐसे देश भी हैं, जहां जानवर पालने की परंपरा तो रही है, मगर, उनमें वयस्क होने पर भी लैक्टेस एंजाइम बनाने वाला जीन विकसित नहीं हुआ.

सेगुरेल इसके लिए मंगोलिया की मिसाल देती हैं. यहां के लोगों में बमुश्किल ही लैक्टेस बनाने वाला जीन मिलता है. जबकि यूरोपीय और पश्चिमी एशियाई देशों में ये जीन ख़ूब देखा जाता है.

सेगुरेल मानती हैं कि ये बड़ी पहेली है.

दूध पीने के फ़ायदे

सेगुरेल कहती हैं कि दूध पीने की आदत का विकास उन लोगों में हुआ जो जानवर पालने का पेशा करते थे. जानवरों के क़रीब रहने से उन्हें जानवरों वाली बीमारियां भी हो जाती थीं. लेकिन, दूध पीने से उन्हें इन बीमारियों से लड़ने की ताक़त मिलती थी. बच्चों को इसीलिए तो दूध पीने की आदत डाली जाती है.

फिर, मंगोलिया जैसे देशों में दूध का दूसरी तरह से इस्तेमाल होने लगा. कोई दही के तौर पर, तो किसी ने इसे पनीर, घी या मक्खन के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया.

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में जेनेटिक्स की प्रोफ़ेस डलास स्वैलो कहती हैं कि इंसानों में लैक्टेस एंजाइम बनते रहने का गुण कई वजहों से विकसित हुआ होगा. इसकी बड़ी वजह दूध में मौजूद पोषक तत्व हो सकते हैं. जैसे कि इस में अच्छी तादाद में फैट, प्रोटीन और चीनी तो होती ही है. इसके अलावा दूध में कैल्शियम और विटामिन डी जैसे अहम पोषक तत्व भी मिलते हैं.

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दूध, साफ़ पानी का भी ज़रिया होता है. यही वजह है कि इंसान के भीतर दूध को पचा पाने की क्षमता विकसित हुई.

वैज्ञानिकों ने देखा है कि जिन सभ्यताओं के लोगों में अब तक लैक्टेस को बनाते रहने वाला जीन विकसित नहीं हुआ था, वो भी उन इंसानों से यौन संबंध बनाकर नई पीढ़ी को ये जीन दे रहे हैं, जिनके अंदर ये जीन मौजूद है. डलास स्वैलो इसके लिए चिली के कोचिम्बो जनजाति के लोगों की मिसाल देती हैं, जिनको दूध पचाने में मददगार जीन महज़ पांच सौ साल पहले यूरोपीय उपनिवेशकों से मिला.

क्या लोग दूध पीना छोड़ रहे हैं?

कम से कम ख़बरें तो यही इशारा करती हैं. 2018 में ब्रिटेन के द गार्जियन अख़बार ने हेडलाइन लगाई-आख़िर दूध से हमारी मुहब्बत क्यों ख़त्म हो गई?

आज बहुत सी कंपनियां जई, बादाम और सोया मिल्क बेच रही हैं. इनका कारोबार ख़ूब बढ़ रहा है.

ऐसे में लगता तो ये है कि दुनिया अब दूध से किनारा कर रही है. पर आंकड़े दूसरी ही कहानी कहते हैं.

2018 की एक रिपोर्ट बताती है कि 1998 से दुनिया में दूध का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. 2017 में दुनिया भर में 86.4 करोड़ टन दूध का उत्पादन हुआ था. दूध के उत्पादन और खपत पर नज़र रखने वाली संस्था आईएफसीएन डेयरी रिसर्च नेटवर्क का कहना है कि 2030 तक दुनिया में दूध की मांग क़रीब 117 करोड़ टन तक पहुंच जाएगी.

पर, अमरीका जैसे कुछ देशों में दूध की खपत कम हो रही है. यहां सोया और बादाम मिल्क की मांग वयस्कों में बढ़ रही है.

जानकार कहते हैं कि ये शाकाहारी दूध, डेयरी उत्पाद का विकल्प नहीं हो सकते. इनमें कई पोषक तत्व नहीं होते.

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दूध की सबसे ज़्यादा मांग एशियाई देशों में बढ़ रही है. यानी लोग इसे पचाने की मुसीबतों को दरकिनार कर के दूध का इस्तेमाल कर रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र का विश्व खाद्य संगठन कई देशों में दूध के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की मुहिम चलाता है. वो गाय-भैंसों के अलावा दूसरे जानवर जैसे इलामा पालने की भी हौसला-अफ़ज़ाई करता है.

दुनिया की सेहत पर आई एक रिपोर्ट कहती है कि हमें लाल मांस खाना कम करना चाहिए और अपने खान-पान में एक गिलास दूध को शामिल करना चाहिए.

तो, साहिबान, भले ही बादाम मिल्क और सोया मिल्क आप को लुभा रहे हों, गाय के दूध ने अभी हार नहीं मानी है.

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