आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस बुझा रही जंगलों की आग

  • 7 मार्च 2019
जंगल के आग पर काबू कैसे पाया जा सकता है? इमेज कॉपीरइट Getty Images

पिछले साल कैलिफ़ोर्निया के जंगलों में भयंकर आग लगी थी. इससे भारी नुक़सान हुआ था. हवा में नमी न होने की वजह से आग बड़ी तेज़ी से और दूर-दूर तक इलाके तक फैल गई थी.

कैलिफ़ोर्निया में 2018 में आग लगने की 8527 घटनाएं हुई थीं. इसकी सीधा असर 18 लाख, 93 हज़ार 913 एकड़ ज़मीन पर असर पड़ा था. आग की वजह से कैलिफ़ोर्निया के पैराडाइज़ क़स्बे में 86 लोगों की मौत हो गई.

जंगल में भयंकर आग लगने का शिकार सिर्फ़ अमरीका का कैलिफ़ोर्निया सूबा हुआ हो, ऐसा नहीं है. 2018 में यूनान के समुद्र तट से लेकर ऑस्ट्रेलिया के जंगलों और ब्रिटेन तक जंगल की आग भड़की थी. यहां तक कि आर्कटिक जैसे सर्द इलाक़े में भी आग भड़क उठी थी.

आग लगने की इन घटनाओं को जलवायु परिवर्तन का नतीजा बताया जा रहा है. अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि आगे चलकर इंसानी सभ्यता ऐसी और भी घटनाओं के शिकार होंगे. ऐसे हालात से निपटने में हमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस मदद कर सकता है.

तेज़ी से भड़की आग को क़ाबू करना सबसे बड़ी चुनौती होती है. इस काम में सिर्फ़ जानकारों की मदद से आसानी नहीं होगी. इसीलिए आग का दायरा बढ़ने से रोकने के लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद ली जा रही है.

अमरीका के सैन फ्रांसिस्को की कंपनी सिल्वियाटेरा इसी काम में लगी है. सिल्वियाटेरा मशीनी अक़्ल की मदद से जंगलों की मैपिंग करती है और संसाधनों को मुहैया कराती है, ताकि जंगल की आग से नुक़सान को कम से कम किया जा सके.

कंपनी की अधिकारी नैन पॉन्ड बताती हैं कि, "हम रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट से ज़मीनी आंकड़े जुटाते हैं. फिर इनकी मदद से आग भड़कने के पूर्वानुमान लगाते हैं."

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जंगलों के विस्तार का आकलन

नैन पॉन्ड की टीम सैटेलाइट के अलावा ड्रोन और हेलीकॉप्टर से ली गई तस्वीरों के आधार पर भी जंगलों के विस्तार का आकलन करती है. इलाक़े में पाए जाने वाले पेड़-पौधों के आधार पर ये अंदाज़ा लगाया जाता है कि आग कितनी तेज़ी से और कितने बड़े इलाक़े में फैले सकती है.

सिल्वियाटेरा इस वक़्त अमरीका के 30 करोड़ हेक्टेयर इलाक़े में फैले जंगलों से जुड़े आंकड़े जुटा रही है. जब ये नक़्शा तैयार हो जाएगा, तो मशीन की मदद से आग के ज़्यादा जोखिम वाले इलाक़े की पहचान की जाएगी.

जोखिम का अंदाज़ा किसी ख़ास हिस्से में पाये जाने वाले पेड़-पौधों और झाड़ियों की क़िस्म, उनके घनत्व और जलने की क्षमता का आकलन कर के लगाया जाता है.

चीड़ जैसे कुछ पेड़ होते हैं, जो ज़्यादा जल्दी आग पकड़ लेते हैं. जंगल के पेड़-पौधों के आग पकड़ने की आशंका का अनुमान लगाने में उनकी मोटी छाल से लेकर दरख़्तों में मौजूद तेल का अनुपात तक असर डालता है. पत्तियां कितनी घनी हैं, ये बात भी आग के फैलने में काफ़ी मायने रखती है.

इससे पहले होता ये था कि जंगल में कुछ पेड़ों के नमूने लेकर अंदाज़न ये तय किया जाता था कि किस इलाक़े में आग तेज़ी से फैलेगी और किस जगह इसका असर कम पड़ेगा.

मगर, अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से इसका सटीक अनुमान लगाया जा सकता है. सिल्वियाटेरा जैसी कंपनियां जंगलों को लेकर सच्चाई के बेहद क़रीब पहुंच पाने वाले आंकड़े जुटा रही हैं.

ऐसे आंकड़ों की मदद से ही कैलिफ़ोर्निया के पैराडाइज़ इलाक़े में किस तरह आग तेज़ फैलेगी और किधर धीमी गति से बढ़ेगी, ये पता लगाया जा सका है. ज़्यादा जोखिम वाले इलाक़ों को नक़्शे में लाल रंग से चिह्नित किया जाता है. वहां पर आग रोकने के ज़्यादा पुख़्ता इंतज़ाम किए जाते हैं. हालांकि ये काम बहुत पेचीदा है.

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थ्री डी मॉडल की मदद

नैन पॉन्ड कहती हैं, "हमें ये भी देखना पड़ता है कि जंगल से हमें कितने संसाधन मिलते हैं. जंगलों में बहुत से जानवर रहते हैं. यहां के नदी नालों से हमें साफ़ पानी मिलता है. लोग मनोरंजन के लिए भी जंगलों में जाते हैं. जंगल के पेड़ मिट्टी का क्षरण रोकते हैं और ये हवा में मौजूद कार्बन डाई ऑक्साइड सोखने में भी मदद करते हैं."

वैसे, सिर्फ़ आग लगने का पूर्वानुमान लगाने में ही आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद नहीं ली जा रही है. एक और क़ुदरती आपदा यानी बाढ़ रोकने के लिए भी ये काफ़ी मददगार साबित हो रहे हैं.

बाढ़ आने की कई वजहें होती हैं. भारी बारिश होना, ज़मीन का बेतहाशा इस्तेमाल, पानी निकासी का सही इंतज़ाम न होने से लेकर पानी के संसाधनों का सही इस्तेमाल न होने जैसे बहुत से कारण हैं जो बाढ़ आने की वजह बनते हैं.

दुनिया में तमाम वैज्ञानिक बाढ़ की चेतावनी जारी करने के मॉडल पर लगातार काम कर रहे हैं.

अमरीका के यूटा सूबे की ब्रिघम यंग यूनिवर्सिटी के माइकल सूफ्रोंट ऐसे ही एक वैज्ञानिक हैं. वो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर के दुनिया के तमाम देशों में आने वाली बाढ़ का सटीक पूर्वानुमान लगाना चाहते हैं, ताकि नुक़सान कम से कम हो.

इसके लिए वो बाढ़ का अंदाज़ लगाने वाले मौजूदा मॉडल में छोटी और सहायक नदियों के आंकड़े जोड़ रहे हैं. माइकल मानते हैं कि अक्सर इन्हीं नदियों से बाढ़ आने की शुरुआत होती है. छोटी से छोटी धारा और नदी का आकलन करके नए मॉडल तैयार किए जा रहे हैं. इससे शहरों और गांवों की बेहतर हिफ़ाज़त हो सकेगी.

दिसंबर 2015 में ब्रिटेन के लीड्स शहर में भयंकर बाढ़ आई थी. ये वहां के इतिहास में दर्ज रिकॉर्ड बाढ़ थी. इसके बाद बैम नटाल नाम की कंपनी को बाढ़ से हिफ़ाज़त के लिए बांध बनाने का काम दिया गया.

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Image caption शहरों और कस्बों के पास से या उनसे हो कर गुज़रने वाले नदी नालों की डिजीटल तस्वीरों से बाढ़ का सटीक पूर्वानुमान लगाने में मदद मिल सकती है

बैम नटाल कंपनी ने सेनसेट नाम की स्टार्टअप कंपनी की मदद से बाढ़ के इलाक़ों का मॉडल तैयार किया. ये आयर नदी के साथ लगा क़रीब 12 किलोमीटर लंबा गलियारा था. इस हिस्से में ड्रोन की मदद से तस्वीरें ली गईं. ये तस्वीरें हर 2.5 सेंटीमीटर इलाक़े की पैमाइश कर के ली गई थीं.

इन तस्वीरों से 60 करोड़ ऐसे बिंदु इकट्ठे किए गए, जिनकी मदद से बाढ़ की आशंका वाले इलाक़ों का पूरा नक़्शा तैयार हुआ. इस नक़्शे को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से समझने की कोशिश हुई, ताकि, ये पता लग सके कि किन हिस्सों में बांध बनाकर बाढ़ से नुक़सान कम किया जा सकता है.

सेनसैट कंपनी के जेम्स डीन ने बताया कि उन्होंने बाढ़ वाले इलाक़े का थ्री डी मॉडल तैयार किया. इसके आधार पर बैम नटाल कंपनी ने निर्माण कार्य शुरू किए, जो इसी साल पूरा हो जाएगा.

वैसे, कई ऐसी प्राकृतिक आपदाएं हैं, जिन्हें रोका ही नहीं जा सकता. जैसे कि ज़लज़ला या ज्वालामुखी विस्फोट या फिर सुनामी. इनका पूर्वानुमान लगाना भी कमोबेश नामुमकिन है.

इनकी वजह से भारी संख्या में लोग मारे जाते हैं. ऐसी आपदाएं आने के बाद के दिनों में राहत और बचाव टीमों को लोगों की जान बचाने में काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ती है.

लेकिन, जापान के सेन्डाई स्थित टोहोकू यूनिवर्सिटी एक ऐसे मिशन पर काम कर रही है, जो क़ुदरती आफ़त की सूरत में फंसे लोगों को बचाने के काम आएगी.

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उम्मीद पर दुनिया कायम है

मार्च 2011 में जापान में बहुत भयंकर भूकंप आया था. भूकंप के इतिहास में ये सबसे भयानक ज़लज़ले के तौर पर याद किया जाता है. जब से इंसान ने भूकंप के रिकॉर्ड रखने शुरू किए, तब से आया ये चौथा सबसे भयंकर भूकंप था.

आप इसका अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि इससे जापान का होंशू द्वीप 2.4 मीटर खिसक गया. इससे पूरी धरती अपनी धुरि से 17 सेंटीमीटर खिसक गई. इस भूकंप का केंद्र जापान के समुद्र तट से 130 किलोमीटर दूर था.

इस ज़लज़ले की वजह से समंदर में आई सुनामी की वजह से जापान के पूर्वी समुद्री तट पर भारी तबाही मची थी. इसी की वजह से जापान के फ़ुकुशिमा एटमी प्लांट में इमरजेंसी जैसे हालात पैदा हो गए थे. टोहोकू इलाक़े में 20 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे. दो हज़ार लोग तो अब तक लापता हैं.

जापान के मार्च 2011 के भूकंप से 7 साल पहले हिंद महासागर के गर्भ में आए ज़बरदस्त ज़लज़ले से सुनामी की भयंकर लहरें उठी थीं. इसने 14 एशियाई और अफ्रीकी देशों में भारी तबाही मचाई थी. सुनामी से 2 लाख 30 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे. ज़्यादातर लोग इसलिए मारे गए कि उन्हें समय से आगाह नहीं किया गया.

सुनामी की लहरों सबसे पहले इंडोनेशिया पर हमला बोला, उसके बाद ये लहरें थाईलैंड, म्यामांर और श्रीलंका पहुंचीं. कुछ ही घंटों के भीतर सुनामी की लहरें अफ्रीका के पूर्वी तट तक पहुंच चुकी थीं. इसके रास्ते में पड़ने वाले किसी भी इंसान के पास कोई विकल्प ही नहीं था. सुनामी आने के बाद के दिनों में राहत और बचाव की टीमें बहुत दिनों तक लोगों को तलाशती रही थीं. संचार के सभी माध्यम तबाह हो गए थे.

टोहोकू यूनिवर्सिटी के बाई यानबिंग को उम्मीद है कि उनके काम से भविष्य में इतने बड़े पैमाने पर होने वाली तबाही को रोका जा सकेगा.

यानबिंग एक ऐसा औज़ार तैयार कर रहे हैं, जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से क़ुदरती आपदाओं का पूर्वानुमान लगाएगा. इसके अलावा ये औज़ार तबाही वाले इलाक़ों में बची और मरम्मत की जा सकने वाली इमारतों का आकलन कर के सरकारों को राहत-बचाव अभियान चलाने में मदद करेगा.

सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों की मदद से ऐसे आंकड़े तैयार हो रहे हैं, जो इमारतों को अलग अलग दर्जे में बांटेगा. जिनकी मरम्मत हो सकती है, उन्हें अलग से बताएगा. जिन्हें गिराना ही पड़ेगा, उनकी ये मशीन अलग जानकारी रखेगी.

यानबिंग कहते हैं, "ये जानकारी उन लोगों को दी जाएगी, जो मौक़े पर सबसे पहले पहुंचते हैं. वो इस जानकारी के आधार पर बचाव की संभावना वाले हिस्सों में पहले अभियान चलाएंगे."

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इसके अलावा राहत और बचाव अभियान में काम करने के लिए रोबोट को भी ट्रेनिंग दी जा रही है. इससे बचाव अभियान में जोखिम भरे काम करने के लिए इंसान की बजाय रोबोट को भेजा जा सकेगा.

अमरीका की कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी की केटी सिकारा ऐसे ही रोबोट तैयार कर रही हैं जो आपदा प्रभावित इलाक़ों में जाकर लोगों की मदद कर सकेगा. और ज़रूरत पड़ने पर मलबे में दबे लोगों को तलाश कर निकाल सकेगा.

सिकारा कहती हैं, "रोबोट ऐसे ऊंचे-नीचे ऊबड़-खाबड़ इलाक़े में जा सके, इसके लिए उसे तैयार करना सबसे बड़ी चुनौती है."

यूं तो भूकंप की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. मगर बाद में आने वाले झटकों के बारे में बताया जा सकेगा. इसके लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से पूर्वानुमान के मॉडल तैयार किए जा रहे हैं.

कई बार असल भूकंप से ज़्यादा आफ्टरशॉक तबाही मचाते हैं. जैसा कि न्यूज़ीलैंड में हुआ. यहां 2010 में भयंकर भूकंप आया. इससे इमारतों को तो नुक़सान हुआ, पर किसी की जान नहीं गई. लेकिन, इस भूकंप के कुछ दिन बाद आए आफ्टरशॉक ने 185 लोगों की बलि ले ली.

अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में ऐसा मॉडल तैयार किया गया है, जो भूकंप और आफ्टरशॉक के आंकड़ों के आधार पर भविष्य के भूकंपों के पूर्वानुमान तैयार करता है.

आंकड़ों की भारी कमी के चलते क़ुदरती आपदा का सटीक पूर्वानुमान सही से नहीं लगाया जा सकता. ऐसी आफ़तें बहुत ही कम आती हैं. ऐसे में मशीन की मदद से इनका पूर्वानुमान सही ढंग से लगाना नामुमकिन है.

लेकिन, आपदा के बाद के अनुमान से भी बहुत लोगों की जान बचाई जा सकती है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इसमें बड़ा रोल निभा रहा है.

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