संघर्ष रोकने में मददगार आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस

  • 16 मार्च 2019
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इमेज कॉपीरइट Getty Images

मानवता इस वक़्त बहुत बड़े संकट से जूझ रही है. इसकी बड़ी वजह हैं हिंसक संघर्ष. दुनिया के कई देशों में हिंसक संघर्ष छिड़ा हुआ है, जिससे करोड़ों लोग प्रभावित हैं. हिंसा की वजह से हर साल हज़ारों लोग मारे जाते हैं.

बहुत से वैज्ञानिकों का मानना है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इस संघर्ष को रोकने में मदद कर सकता है.

वाइसी गुओ ऐसे ही रिसर्चर हैं. वाइसी, ब्रिटेन की वारविक यूनिवर्सटी से जुड़े हुए हैं. वो ब्रिटेन में डेटा साइंस और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के राष्ट्रीय संगठन, एलन तुरिंग इंस्टीट्यूट में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस टीम के प्रमुख हैं.

वाइसी गुओ और उनकी टीम, मानवता के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने के परंपरागत तरीक़ों में मशीनी जानकारी जोड़कर उसे नए सिरे से समझती है.

वाइसी गुओ की टीम, दुनिया के किसी हिस्से में होने वाले हिंसक संघर्ष का पूर्वानुमान लगाने का काम कर रही है. इसके लिए आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी बनावटी अक़्ल की मदद ली जा रही है.

ऐसे पूर्वानुमान से शांति स्थापना के लिए काम करने वाले संगठनों की मदद होगी. ख़ास तौर से संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठनों की.

शांति के मिशन अक्सर पैसे की कमी से जूझते हैं. यही नहीं, उनके पास आंकड़ों की कमी भी होती है. कहां दखल देने की ज़्यादा ज़रूरत है, ये बात शांति रक्षक टुकड़ियों को नहीं होती.

ताकि संघर्ष और न भड़के

अब वाइसी गुओ की टीम ऐसी जगहों का अंदाज़ा मशीन की मदद से लगाने में जुटी है, जहां आने वाले वक़्त में हिंसा भड़क सकती है. इसका दायरा कितना बड़ा हो सकता है. ये कितनी जल्दी बड़े इलाक़े में फैल सकती है, या फिर संघर्ष सीमित ही रहेगा.

वाइसी गुओ और उनके साथी ये भी अंदाज़ा लगाते हैं कि किसी संघर्ष के अहम किरदार, जैसे अस्थायी सरकार, अलगाववादी और संयुक्त राष्ट्र का कितना बड़ा रोल हो सकता है.

इन पूर्वानुमानों की मदद से कूटनयिक प्रयास किए जा सकते हैं, ताकि संघर्ष और न भड़के.

किसी जगह हिंसा भड़कने के कई आयाम हो सकते हैं. वहां का भूगोल, राजनीति, अर्थशास्त्र, सामाजिक ताना-बाना समझना किसी भी संघर्ष को समझने में मददगार हो सकते हैं.

संघर्ष बड़ा या छोटा होगा, ये कई बार किसी एक किरदार का रोल बड़ा या छोटा होने की वजह से तय होता है.

भारत-पाकिस्तान तनाव

भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव को ही लीजिए. यहां इतिहास, भूगोल, सामाजिक शास्त्र तो अहम रोल निभाते ही हैं. साथ ही भारत-पाकिस्तान के आपसी रिश्ते और दूसरे देशों से ताल्लुक़ भी इस संघर्ष को सीमित रखने का और बढ़ाने में रोल निभाते हैं.

जैसे ही दोनों देशों में तनातनी बढ़ी, दुनिया के बड़े देशों ने कूटनीतिक प्रयास कर के संघर्ष का विस्तार होने से रोका. लेकिन, लड़ाई में दूसरे देशों से मिले हथियारों का भारत ने भी प्रयोग किया और पाकिस्तान ने भी.

दूसरे देशों से सप्लाई होने वाले हथियार भी किसी संघर्ष का आयाम बदल देते हैं. भारत ने मिग-21 विमान से ही पाकिस्तान के अमरीकी फाइटर एफ-16 को मार गिराया.

तो, किसी संघर्ष में ऐसे कई कारक ज़िम्मेदार होते हैं.

किसी एक देश मे हिंसा भड़कने का असर दूसरे देश पर भी पड़ता है. तो, वाइसी गुओ की टीम ने संभावित संघर्ष वाले इलाक़ों के देशों के बीच सीमाओं का भी डेटाबेस बनाया है. जैसे कि भारत और बांग्लादेश की सीमा. यहां पर सरहद के आर-पार संघर्ष की स्थिति नहीं है. यानी स्थायित्व का माहौल है.

वहीं, भारत-पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर की सीमा अस्थिर है और कभी भी हिंसक संघर्ष को दावत दे सकती है.

मानवीय पूर्वानुमान कई बार ग़लत

इसी तरह, बांग्लादेश का पड़ोसी देश म्यांमार रोहिंग्या शरणार्थियों की वजह से उबल रहा है. इसका असर बांग्लादेश पर भी पड़ रहा है.

वाइसी गुओ की टीम ऐसी तमाम सीमाओं का डेटाबेस तैयार कर रही है, जहां आने वाले वक़्त में संघर्ष हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र, रेड क्रॉस और विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन भी ऐसे हालात से निपटने में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद ले रहे हैं.

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मेडिकल क्षेत्र में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल

आज दुनिया में आंकड़ों की भरमार है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इन आंकड़ों की मदद से सटीक के बेहद क़रीब पूर्वानुमान लगा सकता है. इसके बरक्स हम इंसानों की बात करें, तो वो कई पूर्वाग्रहों के शिकार होते हैं. इसलिए मानवीय पूर्वानुमान कई बार ग़लत साबित होते हैं.

अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को तमाम पहलुओं से जुड़े आंकड़े देने पर वो काफ़ी सही पूर्वानुमान लगा सकता है. इससे शांति बहाली के लिए काम करने वाले संगठनों की राह आसान हो रही है.

आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से हम ये भी जान सकते हैं कि किसी क़ुदरती आपदा के बाद किस इलाक़े को सबसे ज़्यादा मदद की दरकार होगी.

चुनौतियां

मशीनें किसी जगह पड़ने वाले अकाल के बारे में भी हमें आगाह कर सकती हैं.

कई नई तरह की चुनौतियां भी हैं, जो दुनिया पर असर डाल रही हैं. जैसे कि जलवायु परिवर्तन. इसका असर संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ता है. नतीजा ये होता है कि बड़ी तादाद में लोगों का पलायन एक जगह से दूसरी जगह को होता है. इससे कई देशों में शरणार्थियों का संकट खड़ा हो जाता है.

संसाधनों को लेकर चल रही लड़ाई से मची भगदड़ सिर्फ़ विकासशील देशों को ही नहीं, विकसित देशों पर भी असर डालती है.

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इंसानो से बातें करना चाहती है रोबोट सोफ़िया

अरब देशों में तेल को लेकर छिड़ा संघर्ष अमरीका और यूरोपीय देशों पर असर डालता है. शरणार्थियों की खेप की खेप यूरोप पहुंचने से सांस्कृतिक संघर्ष छिड़ने का अंदेशा बढ़ता जा रहा है.

वाइसी गुओ कहते हैं कि साइबर अटैक जैसी नई चुनौतियां भी मानवता पर असर डाल रही हैं. किसी देश के चुनाव में साइबर हमले से असर डाला जा सकता है.

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप पर आरोप लग रहे हैं कि रूसी हैकर्स ने उनकी मदद चुनाव जीतने में की थी. इसी तरह फ़ेसबुक पर कई देशों के चुनाव में दख़लंदाज़ी के आरोप लगे हैं.

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कैसे काम करता है गूगल 'क्लिप'?

भारत में व्हाट्सऐप और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया की वजह से कई बार हिंसा को बढ़ावा देने की घटनाएं सामने आई हैं.

अक्सर साइबर औज़ारों की मदद से किसी देश के माहौल को बिगाड़ने का काम हो सकता है. ऐसी चुनौतियों से निपटने में भी नई तकनीक, मशीन या फिर आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस मदद कर सकता है.

इसकी संभावनाएं तलाशने में वाइसी गुओ जैसे कई एक्सपर्ट जुटे हुए हैं.

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