इस तरीक़े से धरती को गर्म होने से रोका जा सकेगा?

  • 17 मार्च 2019
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इंसान ने अपनी ख़्वाहिशों और ज़रूरतों को पूरा करने के लिए क़ुदरत को ख़ात्मे के कगार पर ला खड़ा किया है. माहौल इतना ख़राब हो चुका है कि अब तो इस बात का अंदेशा जताया जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह धरती शायद इंसान के रहने लायक ही न रहे.

निराशा के इस माहौल में भी कुछ लोग ऐसे हैं, जो उम्मीद बचाए हुए हैं. शायद क़ुदरत भी ख़ुद इंसान की इस कोशिश को समझ रही है और ख़ुद को बचाने के तरीक़ों का इशारा कर रही है.

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ऐसा ही एक इशारा प्रकृति ने साल 1991 फ़िलीपींस में दिया था.

यहां के मशहूर ज्वालामुखी माउंट पिनाटूबो के नीचे इतना ज़्यादा दबाव बढ़ गया था कि यहां ख़ामोश बैठा ज्वालामुखी अचानक फट पड़ा. इससे करोड़ों टन राख निकल कर आसमान में क़रीब दस किलोमीटर तक उछल कर मोटी परत बन गई. राख के ग़ुबार की वजह से सूरज की किरणें ज़मीन तक नहीं पहुंचीं. दुनिया का तापमान क़रीब 0.6 डिग्री सेल्सियस कम हो गया.

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माउंट पिनाटूबो में हुआ विस्फ़ोट बीसवीं सदी का दूसरा सबसे बड़ा विस्फ़ोट कहा जाता है. इसी से शोधकर्ताओं को एक तरीक़ा समझ आया कि क्यों ना बनावटी बादल बनाकर ज़मीन तक आने वाली सूरज की नुक़सानदेह किरणों को रोका जाए. इससे धरती का तापमान बढ़ने से रोका जा सकेगा.

हालांकि जलवायु परिवर्तन रोकने के बहुत से उपाय किए जा रहे हैं लेकिन वो सभी नाकाफ़ी हैं.

इंटरनेशनल पैनल फ़ॉर क्लाइमेट चेंज की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2050 तक दुनिया को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को ज़ीरो तक लाना होगा. लेकिन हालिया रिपोर्ट बताती है कि कार्बन डाई ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन कम होने के बजाय बढ़ रहा है.

नवंबर महीने में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है दुनिया के सभी देशों को जल्द से जल्द हानिकारक गैसों का उत्सर्जन रोकने के लिए क़दम उठाना होगा.अभी तक धरती के ध्रुवों पर मौजूद बर्फ़ की वजह से सूरज की क़रीब 30 फ़ीसद किरणें मुड़ जाती हैं.

इसी तरह समुद्री बर्फ़ सूरज की हानिकारक किरणों को लगभग 90 फ़ीसद तक लौटा देती है. वहीं खुले पानी वाले समुद्र सूरज की 94 फ़ीसद किरणों को सोख लेते हैं. आर्कटिक समुद्र की बर्फ़ तेज़ी से पिघने की वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ रही है.

वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर हम वैज्ञानिक तरीक़े से ऐसी सतह बना लें, जो सूरज की किरणों को वापस आसमान की तरफ़ मोड़ सके, तो इससे धरती के गर्म होने की रफ़्तार धीमी हो सकती है.

इसीलिए आर्टिफ़िशियल रिफ़्लेक्टिव सर्फ़ेस बनाने पर विचार किया जा रहा है.

कुछ प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो भी चुका है. इनमें मरीन क्लाउड ब्राइटनिंग और सोलर जियो इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट पर अमरीकी नेशनल एकेडमीज़ ऑफ़ साइंसेस और कई अन्य कमेटियों की रज़ामंदी है.

स्कॉटलैंड की एडिनबरा यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर स्टीफ़न सॉल्टर इस मुहिम में अहम रोल निभा रहे हैं. प्रोफ़ेसर स्टीफ़न 1970 के दशक में जहाज़ों की वजह से समुद्र में होने वाले प्रदूषण पर रिसर्च कर रहे थे. तब उन्होंने पाया कि जिस तरह पानी में जहाज़ अपने पीछे प्रदूषण फैलाते चलते हैं, ठीक उसी तरह आसमान में हवाई जहाज़ भी समुद्र के ऊपर ट्रेल बनाते हैं.

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इन्हीं ट्रेल्स की वजह से बादल चमकते हैं और बादलों की चमक से सूरज की किरणें रुक जाती हैं.

1990 में ब्रिटेन के वैज्ञानिक जॉन लेथेम ने भी सफ़ेद सर्फ़ेस बनाने की थ्योरी पेश की थी. इसके लिए उन्होंने समुद्री नमक स्प्रे करने की तरकीब सोची थी. हालांकि शुरुआत में जिस तरह की स्प्रे मशीन तैयार की गईं, उनसे स्प्रे करना बहुत मुश्किल होता था. लेकिन नए डिज़ाइन की मशीनों से ये परेशानी दूर हो जाएगी.

ये मानवरहित हाइड्रो फ़ॉइल शिप होगी जिसे कंप्यूटर और विंड पावर की मदद से नियंत्रित किया जाएगा. ये मशीन बादलों की तरफ़ समुद्री नमक के बारीक कणों की मोटी परत तैयार करेगी. प्रोफ़ेसर सॉल्टर कहते हैं कि इस प्रोजेक्ट का ख़र्चा संयुक्त राष्ट्र की सालाना क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस के ख़र्च से भी कम होगा. इसके लिए हर साल 10 से 20 करोड़ डॉलर सालाना ख़र्च करने होंगे.

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सॉल्टर के मुताबिक़ 300 जहाज़ों का बेड़ा दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस कम कर देगा.

2012 में ब्रिटेन की लीड्स यूनिवर्सिटी में हुई एक रिसर्च में कहा गया है कि चमकीले बादलों की मदद से ट्रॉपिकल साइक्लोन सीज़न में समुद्री सतह का तापमान कम करके समुद्री तूफ़ानों और समुद्री धारा गर्म होने के असर यानी अल नीनो को भी रोका जा सकता है. क्योंकि ये तूफ़ान समुद्र में तापमान बढ़ने की वजह से आते हैं.

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क़ुदरत को बचाने के लिए ये प्रोजेक्ट बेहतर विकल्प तो माने जा रहे हैं लेकिन जानकार इनसे होने वाले नुक़सान से भी आगाह कर रहे हैं. बहुत सी थ्योरी इशारा करती हैं कि इनसे सूखा पड़ने, सैलाब, और फ़सलों के सूखने का ख़तरा बढ़ सकता है.

कुछ रिसर्चर तो इस तकनीक का इस्तेमाल हथियार के तौर पर किए जाने का ख़तरा भी बताते हैं. वहीं कुछ का कहना है कि जियो इंजीनियरिंग तकनीक की वजह से कार्बन डाई ऑक्साइड का स्तर बढ़ता ही रहेगा. इससे गंभीर समस्याएं पैदा हो जाएंगी.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोलर रेडिएशन मैनेजमेंट का एक और विकल्प सुझाया जा रहा है. स्ट्रेटोस्फ़ेरिक एरोसोल स्कैटरिंग यानी (SAS). इस तकनीक के तहत वायुमंडल में एरोसोल निचले स्तर पर स्प्रे करने के बजाए 10 किलोमीटर ऊंचाई पर कृत्रिम बादल बनाने की योजना है.

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इतनी ऊंचाई पर एरोसोल की ये परत लंबे समय के लिए स्थाई होगी और मुनासिब अनुपात में सूरज की रौशनी को अंतरिक्ष में लौटा देगी.

2017 में पेश अमरीकी नेशनल सेंटर फ़ॉर एटमोस्फ़ेरिक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक़ वायुमंडल में हरेक टेराग्राम पार्टिकल्स से विश्व का तापमान 0.2C कम किया जा सकता है. हालांकि अभी तक ये किसी को नहीं पता कि इस तकनीक का मौसम और माहौल पर कैसा असर पड़ेगा. SAS पर हार्वर्ड का सोलर इंजीनियरिंग रिसर्च प्रोग्राम काम कर रहा है.

एक प्रोजेक्ट के तहत हवा में कैल्शियम कार्बोनेट को वेदर बलून के ज़रिए वायुमंडल में भेजकर केमिकल रिएक्शन जानने की कोशिश की गई. लेकिन इसका विरोध किया जाने लगा. विरोध करने वालों में वो लोग भी शामिल थे जो ख़ुद को फ़्रेंड्स ऑफ़ अर्थ कहते हैं.

SAS प्रोजेक्ट के डायरेक्टर एलिज़ाबेथ बर्न भी इस तकनीक के ख़िलाफ़ हैं. इनका कहना है कि अगर ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन इसी तरह बढ़ता रहा तो हर साल ज़्यादा से ज़्यादा सोलर जियोइंजीनियरिंग प्रोजेक्ट लगाने होंगे. जिससे धरती पर दबाव और ज़्यादा बढ़ेगा. बर्न इस इल्ज़ाम का भी विरोध करते हैं कि जियो इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट के पीछे पैसे वाली कंपनियों का हाथ है.

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ज़्यादातर रिसर्चरों का कहना है कि पर्यावरण को बचाने के और भी बहुत से तरीक़े हैं. ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाकर और तेल-गैस का प्रयोग कम कर के भी पर्यावरण को बचाया जा सकता है. लेकिन जियो इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट के पक्षकार रिसर्चरों का कहना है कि विरोध का कोई वैज्ञानिक सबूत होना चाहिए.

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