डेनमार्क: मुस्लिम बच्चे और सूअर के गोश्त पर विवाद

  • 23 मार्च 2019
जब डेनमार्क में मुस्लिम बच्चों को सुअर का गोश्त खाने को कहा गया इमेज कॉपीरइट Getty Images

कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी.

हिंदुस्तान के बारे में ये कहावत बड़ी मशहूर है. जिसका मतलब है कि हर एक कोस की दूरी पर पानी और चार कोस की दूरी पर यहां बोलियां बदल जाती हैं. साथ ही बदल जाता है खान-पान.

कश्मीर का स्वाद अलग है और पंजाब का अलग. असम में आप को अलग तरह के पकवान मिलेंगे और तमिलनाडु में अलहदा स्वाद हासिल होगा.

खान-पान, पकाने का तरीक़ा और खाना शेयर करने का रिवाज़, हर समाज में अलग होता है. ऐसे में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हमारे ही देश में खाने-पीने की चीज़ों से लेकर खाने के तौर-तरीक़े तक बदल जाते हैं.

फिर अलग इलाक़ों से ताल्लुक़ रखने वाले बच्चे जब दिल्ली में एक ही स्कूल में पढ़ते हैं. तो कोई पराठा सब्ज़ी लंच में लाता है, तो कोई उपमा-इडली.

ये संस्कृतियों का मेल है न कि टकराव.

पर, खाने में भी अलग तरह की राजनीति होती है. इस में भी मेरा-तेरा घुस जाए तो टकराव बढ़ जाता है.

डेनमार्क में यही हुआ. वहां के लोगों ने ज़ोर दिया कि बाहर से आकर डेनमार्क में बसने वालों को भी डेनमार्क का ही खान-पान स्वीकार करना होगा.

डेनमार्क के स्कूलों में राई ब्रेड और सूअर के गोश्त को लाने पर ज़ोर दिया जाने लगा. अब सूअर का गोश्त खाना इस्लाम में हराम है तो, मुस्लिम बच्चों के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो गई.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

संस्कृतियों का टकराव

डेनमार्क की कोपेनहेगेन यूनिवर्सिटी में समुदायों की विशेषज्ञ मार्था सिएफ़ कैरेबेक ने इसे संस्कृतियों के टकराव के तौर पर देखा. उन्हें लगा कि खान-पान भी सियासी हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. कैरेबेक ने इस बारे में और रिसर्च की, तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं.

कैरेबेक ने देखा कि टीचर्स, बच्चों के साथ घुलने-मिलने के लिए उनका लंच बॉक्स चेक करती हैं. बच्चों को अच्छे खाने के बारे में बताती हैं.

डेनमार्क के स्कूलों में ज़्यादातर बच्चे घर से खाना लाते हैं. डेनमार्क में राई ब्रेड खाना ही सेहतमंद माना जाता है. जिन बच्चों के खाने में ये ब्रेड नहीं होती उनका खाना अच्छा नहीं माना जाता है. पर, बाहर से आकर डेनमार्क में बसे लोगों को उसमें स्वाद नहीं मिलता. यहीं से संस्कृतियों का टकराव शुरू होता है.

डेनिश लोग राई की ब्रेड को स्पेशल फ़ूड मानते हैं. उन्हें लगता है कि खाने का इससे अच्छा विकल्प हो ही नहीं सकता.

इसी तरह जब बाहर से आने वालों की तादाद बढ़ने लगी, तो डेनमार्क की सरकार ने तय किया कि स्कूल के लंच से सूअर के गोश्त को हटा दिया जाए. ताकि मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं आहत न हों.

लेकिन, बहुत से लोगों ने इसे डेनमार्क की संस्कृति से छेड़छाड़ माना. कहा गया कि मज़हब और मुल्क के फ़र्क़ के बिना बच्चों को ख़ालिस डेनिश फूड दिया जाए. इसमें सूअर का गोश्त भी शामिल हो.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

तो फिर संतुलित या पौष्टिक भोजन आख़िर है क्या?

2016 में डेनमार्क के संस्कृति मंत्रालय ने डेनमार्क के बुनियादी सांस्कृतिक मूल्यों पर सर्वे कराया. इसमें बहुत से लोगों ने खाने में सूअर का गोश्त शामिल करने पर ज़ोर दिया.

अच्छे खाने की परिभाषा हर देश और संस्कृति में ही नहीं, हर इंसान के लिए भी अलग ही होती है.

तो, जो खाना असम के लोगों के लिए संतुलित आहार है, उसे शायद तमिलनाडु और केरल के लोग पसंद ही न करें.

ऐसे में विश्व स्तर पर बहस छिड़ गई है कि संतुलित या पौष्टिक भोजन आख़िर है क्या? कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी की कैरेबेक, जर्मनी की रुटगर्स यूनिवर्सिटी में मानव विज्ञान पढ़ाने वाली कैथलीन राइली और अमरीका के ब्रुकलिन कॉलेज की जिलियन कैवेनॉफ़ ने इस बारे में गहराई से रिसर्च की.

उन्होंने पाया कि खाना और खाने से संबंधित बातें हमारी पहचान, संस्कृति और सियासत का अहम हिस्सा हैं. खाना हमारी सेहत, माहौल और संस्कृति पर असर डालता है.

कैथलीन राइली ने फ़्रेंच पोलिनेशिया यानी प्रशांत महासागर में फ्रांस के क़ब्ज़े वाले छोटे-छोटे जज़ीरों की संस्कृति पर अध्ययन किया है. इनके मुताबिक़ यहां स्कूलों में बच्चों को सामाजिक-आर्थिक स्तर पर खाने के अच्छे या बुरे होने का फ़र्क़ बताया जाता है. खाने का संबंध स्वाद और पौष्टिकता से है.

जिलियन कैवेनॉफ़ का कहना है कि एक वक़्त था जब लोग सिर्फ़ अपने काम से जाने जाते थे. लेकिन आज हालात बदल गए हैं. आज आप क्या खाते हैं, इससे समाज में आप का दर्ज़ा तय होता है. आज खाने की इतनी क़िस्में हैं जो ना सिर्फ़ ज़ायक़ेदार हैं, बल्कि सेहत के लिए भी अच्छी हैं.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

शाकाहारी होने का फिर क्या मतलब है?

कैरेबेक का कहना है कि खाना हमेशा से एक समुदाय की पहचान रही है. लेकिन शाकाहारी होने से किसी की पहचान ख़ास नहीं हो जाती. बल्कि इसका मतलब है कि आप किसी अन्य सामाजिक समूह का हिस्सा हैं जो शाकाहारी है.

कैरेबेक रिसर्च के आधार पर इस नतीजे पर पहुंचीं कि अमरीका में ज़्यादातर लोग खाने के पौष्टिक होने की बात करते हैं. वहीं, इटली के लोगों का ज़ोर ज़ायके पर ज़्यादा होता है. मज़े की बात ये है कि सेहतमंद खाने पर ज़ोर देने वाले अमरीकियों में मोटापे की शिकायत ज़्यादा है.

कैथलीन राइली का कहना है कि एक साथ पूरे परिवार के साथ बैठकर खाने का रिवाज सभी संस्कृतियों में नहीं है. कुछ संस्कृतियों में खाते समय बात करने का रिवाज नहीं है. फ़्रांस में लोग भी खाना तैयार करते समय तो बात करते हैं, लेकिन खाते समय नहीं.

वहीं जिलियन कैवेनॉफ़ ने अपनी रिसर्च में पाया कि ज़्यादातर परिवार एक साथ मिलकर खाना पसंद करते हैं लेकिन इसका ताल्लुक़ आर्थिक और सामाजिक स्तर से है.

मज़दूर तबक़े या 9-5 की शिफ्ट में काम करने वाले परिवार ही एक साथ खाना खा लेते हैं. लेकिन, जो लोग शिफ्ट में काम करते हैं, या एक साथ कई जगह पर काम करते हैं उनके लिए ऐसा कर पाना आसान नहीं होता.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

ऑनलाइन बाजार का कितना असर

कैरेबेक का कहना है कि एक ही टेबल पर बैठ कर खाने का रिवाज समाज में पहले से नहीं था. इतिहास से पता चलता है कि बच्चे, बड़ों के साथ खाना नहीं खाते थे. न ही उन्हें खाते वक़्त बात करने की इजाज़त थी.

आज ज़्यादातर लोग रेडी टू ईट वाले पकवान खाने के आदी हो गए हैं. लिहाज़ा अगर परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर भी खाना खाते हैं, तो भी सबका खाना अलग होता है.

कैथलीन राइली के मुताबिक़ तकनीक ने हमारे खाने की आदतों में बदलाव किया है. आज सभी के हाथ में मोबाइल फ़ोन है. ज़्यादातर लोग खाने के दौरान अपने फ़ोन पर व्यस्त रहते हैं. वो पेट तो भर लेते हैं, लेकिन खाने की ख़ुशबू से मिलने वाले सुखद अहसास से दूर हो जाते हैं.

इसी तरह पहले लोग ज़रूरत का सामान लेने बाज़ार जाते थे. जांच-परख के बाद ही ख़रीदारी करते थे. ये अपने आप में एक तजुर्बा लेने वाली प्रक्रिया होती थी. लेकिन आज दौर 'होम डिलिवरी' का है. इसका नुक़सान ये है कि आज लोग खाने का सामान ख़रीदने के दौरान होने वाली गप-शप और सोशल कनेक्शन से दूर हो रहे हैं.

पहले खाने के उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध होता था. उपभोक्ता को पता रहता था कि वो जो चीज़ खा रहा है वो कितनी सही है या नहीं. लेकिन अब लोग सिर्फ़ खाना ख़रीदते हैं और पेट भरते हैं. उन्हें इससे सरोकार नहीं है कि खाना किसने और कैसे बनाया गया होगा.

उम्मीद है कि आने वाले दिनों में लोगों के दरमियान ये फ़र्क़ मिटेगा. लोग रेडी टू ईट वाले फूड की जगह घर के चूल्हे पर बना खाना एक साथ मिल बांट कर खाएंगे. और एक सेहतमंद समाज का निर्माण करेंगे.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे

संबंधित समाचार