तब क्या होगा जब खाना ख़त्म हो जाएगा?

  • 10 अप्रैल 2019
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एक रात में ही सब कुछ घट गया था. कुछ ही वर्ष पहले शीतकालीन ओलम्पिक खेलों का आयोजन करने वाले एक आधुनिक फलते-फूलते शहर में रेसाद त्रबोंजा एक आम किशोर का जीवन जी रहा था.

5 अप्रैल 1992 को उसका घर कहा जाने वाला यह शहर बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट गया था.

बोस्निया की सर्ब सेना ने उसके साथ-साथ सरायेवो शहर के चार लाख अन्य बाशिंदों को भी चारों ओर से घर लिया था. लेकिन इन लोगों को तब यह मालूम नहीं था कि यह दुःस्वप्न लगभग चार वर्ष चलेगा. सरायेवो की इस घेराबंदी के बीच यहां के निवासी रोज़ होने वाली गोलाबारी में अपनी रोज़मर्रा की जिन्दगी जी रहे थे.

घेराबंदी करने वाले सैनिक शहर के आसपास की पहाड़ियों पर जमे हुए थे. इससे शहर के लोगों के लिए सड़क पार करना या खाने के लिए किसी कतार में लगना भी जानलेवा हो सकता था.

गोले और गोलियों का ख़तरा तो लगातार बना हुआ था लेकिन त्रबोंजा और उसके पड़ोसी एक और ख़तरे से घिरते जा रहे थे - वो थी भुखमरी.

उस समय 19 वर्ष के हो चुके त्रबोंजा अब बोस्निया में स्कूली बच्चों को युद्ध के बारे में पढ़ाते हैं.

उन दिनों की याद करके वो बताते हैं, "घेराबंदी के तुरंत बाद ही खाना ख़त्म होने लगा था. दुकानों में रखा खाद्य पदार्थ बहुत जल्दी ख़त्म हो गया था. कई दुकानें तो लूट ली गईं. परिवार बड़ा हो तो फ्रिज और अल्मारियों में रखे गये खाद्य पदार्थ भी बहुत जल्दी ही ख़त्म हो जाते हैं."

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जनवरी 1996 में यह घेराबंदी समाप्त हुई. उस समय तक सरायेवो के साढ़े 11 हजार से अधिक निवासी मारे जा चुके थे. छर्रों, विस्फोटकों और गोलियों में मरने वाले कई लोगों के अलावा कुछ लोग निश्चित रूप से ठंड और भूख की वजह से मरे.

लेकिन त्रबोंजा बताते हैं कि मौत और लगातार होने वाले विनाश के बावजूद सरायेवो के लोगों ने असाधारण जुझारूपन दिखाया.

त्रबोंजा बताते हैं, "उपनगरीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग अपने-अपने बगीचों में उन दिनों सब्जियां उगाते थे और सबके साथ बांटकर खाते थे."

"वे लोग अपने पड़ोसियों को भी सब्जियों के बीज देते थे जिससे लोग अपनी बालकनी में फूलदान में सब्जियां उगा सकें. अपनी बालकनी में उगाए गए टमाटरों का स्वाद बहुत ही अच्छा होता है."

शहर को बचाने वाली मदद

अंतरराष्ट्रीय समुदाय बोस्निया में लगातार बढ़ने वाले युद्ध में हस्तक्षेप को लेकर ऊहापोह में रहा, लेकिन कनाडा के सैनिकों ने संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के दल के रूप में काम करते हुए किसी तरह सरायेवो का हवाईअड्डा फिर से खोल दिया. यह एक बहुत अहम कदम था.

घेराबंदी के बीच ही संयुक्त राष्ट्र ने एक लाख 60 हजार टन भोजन, दवाओं और अन्य सामग्रियों को लाने वाली लगभग 12 हजार सहायता उड़ानें इस शहर में सम्पन्न कीं.

त्रबोंजा का मानना है, "यदि यह सहायता न मिलती तो शायद सरायेवो न बचता. शहर की 90 प्रतिशत आबादी संयुक्त राष्ट्र द्वारा वितरित भोजन पर ही जीवित थी. जो लोग बहुत सम्पन्न थे, वे गहनों, चित्रों या किसी भी बहुमूल्य वस्तु के बदले कालाबाज़ार से अतिरिक्त भोजन पा जाते थे."

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लेकिन जिनके पास अदला-बदली के लिए कुछ भी न हो उन्हें रोज़ मिलने वाले जरा से भोजन को बढ़ाने के लिए अन्य तरीके अपनाने की जरूरत थी. अपने परिवार और घर को बचाने के लिए सरायेवो के कई अन्य युवा पुरुषों की तरह ही त्रबोंजा ने भी हताशा में बंदूक भी उठाई.

वे युद्ध से वापसी के समय शहर के अस्पताल में रक्तदान करते हुए घर आते थे. बदले में उन्हें गोमांस का एक कैन मिलता था.

वे बताते हैं, "हमें और भी तरीके ढूंढने पड़े. हम लोगों ने किताबों में ढूंढा कि किन पौधों को खाया जा सकता है जिससे फूलों से भी सलाद बना सकें. कभी-कभी तो केवल चाय और ब्रेड का एक टुकड़ा होता था और कभी पूरे दिन में कुछ नहीं मिलता था. सही मायनों में अस्तित्व की लड़ाई चल रही थी."

भुखमरी का भीषण दौर

त्रबोंजा से बातचीत करते हुए यह विश्वास करना मुश्किल होता है कि 30 वर्ष से भी कम समय पहले यह सब कुछ यूरोप के बीचोंबीच घटा. लेकिन उसकी इस कहानी जैसी अन्य कहानियां अभी इतिहास में दफन नहीं हुई हैं.

युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और सूखे के कारण द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से दुनिया पहली बार भुखमरी के सबसे भीषण दौर से गुजर रही है.

मानवीय आपातकाल की भविष्यवाणी करने वाले अमरीका के एक संगठन फैमाइन अर्ली वॉर्निंग सिस्टम के अनुसार वर्ष 2019 में 46 देशों के साढ़े आठ करोड़ लोगों को आपात खाद्य सहायता की आवश्यकता होगी.

यह संख्या ब्रिटेन, ग्रीस और पुर्तगाल की कुल आबादी के बराबर है. संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम के अनुसार लगभग 12 करोड़ 40 लाख लोग खाद्य संकट का सामना करते हैं.

वर्ष 2015 से भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या में 80 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है. इसमें सबसे अधिक प्रभावित दक्षिणी सूडान, यमन, दक्षिण-पश्चिमी नाइजीरिया तथा अफ़गानिस्तान है.

जहां एक ओर 1980 के दशक में इथोपिया में भूख से बिलबिलाते बच्चों की तस्वीरों ने पश्चिमी जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी थी, वहीं यह आधुनिक भुखमरी बिना पदचाप सुनाए बढ़ती जा रही है.

आंशिक रूप से इसकी वजह यह है कि दुनिया ने लगभग मान लिया है कि अब भुखमरी कहीं नहीं है. यह बात सच है कि भुखमरी के कारण होने वाली मौतों की संख्या कम हुई है.

फ़िर ख़तरा बन रही है भुखमरी

मैसाचुसेट्स के बोस्टन स्थित टफ्ट्स विश्वविद्यालय के वर्ल्ड पीस फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक एलेक्स डी वॉल के अनुसार 1980 के दशक के पहले सौ सालों में भुखमरी के कारण हर वर्ष दस लाख लोग मारे जाते थे.

डी वॉल बताते हैं, "तब से मृत्यु की दर केवल पांच से दस प्रतिशत रह गई है. अब समूचा समाज भुखमरी का शिकार नहीं बनता. वैश्विक बाज़ारों, बेहतर बुनियादी ढांचों और मानवीय सहायता की व्यवस्थाओं ने भुखमरी को लगभग समाप्त कर दिया था, अब से कुछ वर्ष पहले तक."

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लेकिन अगर भुखमरी एक बार फिर से ख़तरा बन कर उभर रही है- तो आखिर इसका कारण क्या है?

इसका कारण युद्ध और खराब राजनीति है.

डी वॉल का मानना है, "दरअसल लोगों को भूखा मारना बड़ा कठिन काम है क्योंकि लोग बहुत जुझारू होते हैं. लोगों को उनकी आवश्यकता से वंचित करना और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए लागू की जाने वाली नीतियां एक बहुत खराब सरकार अपना सकती है."

"यही बात सीरिया, दक्षिणी सूडान और यमन जैसे देशों में फैली भुखमरी की जड़ में है."

भुखमरी पीड़ित देशों का सामान

हमारे आधुनिक विश्व की यह एक विडम्बना भी है. वैश्विक खाद्य आपूर्ति और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण हम अब कुछ ही दिनों में खाद्य पदार्थ महासागरों के पार ले जा सकते हैं. हमें सुपरमार्केट में दुनियाभर से आया सामान उपलब्ध है, अपने पड़ोसी देश से लेकर उन स्थानों तक से आया सामान जहां भुखमरी हो.

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लेकिन विकसित देशों में भी खाने की कमी उतनी दूर नहीं है जितना हम विश्वास करना चाहेंगे. हमें हमारा पसंदीदा भोजन पहुंचाने वाली अन्तर्राष्ट्रीय खाद्य कंपनियां एक तरह से कगार पर खड़ी हैं.

इन व्यवस्थाओं को झकझोरने के लिए युद्ध या सूखे जैसी भीषण स्थिति की आवश्यकता नहीं है. तेल के भंडारों से सम्पन्न देश वेनेजुएला में उत्पन्न राजनीतिक संकट के कारण आसमान छूती महंगाई ने भोजन और दवाओं की कमी ला दी है.

अब परिवारों को सड़े हुए मांस पर गुज़ारा करना पड़ रहा है और इसकी वजह से लाखों लोगों ने देश ही छोड़ दिया है. यूरोज़ोन में उत्पन्न संकट से ग्रीस की अर्थव्यवस्था भी ढहने के कगार पर आ गई थी और खाद्य पदार्थ का संकट उत्पन्न हो गया था.

भोजन की उपलब्धता बड़ी समस्या

उधर, हाल के वर्षों में बहुत सारी आम फसलों में रोगों, खराब मौसम और बढ़ते हुए दाम के कारण कमी आई है. वर्ष 2008 में फिलीपींस और अन्य एशियाई देशों में खाद्य पदार्थों के बढ़ते हुए दाम की वजह से लोगों ने अफरातफरी में खरीदारी की जिससे मुख्य खाद्य पदार्थ की आपूर्ति में संकट उत्पन्न हो गया. वर्ष 2017 में यूरोप में ख़राब मौसम की वजह से कई सब्जियों के दाम में काफी उछाल आया जबकि कई देशों में ख़राब फसल की वजह से दुनियाभर में एवोकेडो नामक फल की कमी हो गई.

वर्ष 2000 में ब्रिटेन में ईंधन के दामों में बढ़ोतरी के विरुद्ध हुए विरोध-प्रदर्शनों के कारण सुपरमार्केटों ने खाद्य पदार्थों की सीमित बिक्री शुरू कर दी थी.

ब्रेक्ज़िट से ठीक पहले ब्रिटेन में स्कूलों, देखभाल केन्द्रों, अस्पतालों और कुछ ग्राहकों द्वारा खाद्य पदार्थों के भंडारण से ये पता चलता है कि खाद्य पदार्थों की कमी की अफ़वाह भी क्या असर ला सकती है.

यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि खाद्य पदार्थों की कमी से भुखमरी नहीं होती और ज्यादातर भुखमरी खाद्य पदार्थों की कमी से नहीं बल्कि भोजन न मिल पाने के कारण होती है. जब अधिकांश लोगों को भोजन नहीं मिलता तब यह भुखमरी का रूप ले लेता है.

दुनिया के एक सबसे बड़े खाद्य पदार्थ निर्यातक अमरीका में लगभग 12 प्रतिशत परिवारों को भोजन के हिसाब से असुरक्षित की श्रेणी में रखा गया है

लेकिन खाद्य असुरक्षा हमारी सोच से कहीं अधिक आम है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन के अनुमानों के अनुसार विश्वभर में लगभग 82 करोड़ 10 लाख लोग अल्पपोषित हैं.

दुनिया के एक सबसे बड़े खाद्य पदार्थ निर्यातक अमरीका में लगभग 12 प्रतिशत परिवारों को भोजन के हिसाब से असुरक्षित की श्रेणी में रखा गया है और लगभग 65 लाख बच्चों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता.

भूखमरी का अनुभव

आखिर भूख से क्या होता है? इस संबंध में प्रयोग करने की नैतिक दिक्कतों के कारण वैज्ञानिक इस बारे में जानने के लिए उन लोगों के अनुभवों पर निर्भर करते हैं जो भूख और भुखमरी के दौर से गुजरे हों.

वेस्टमिनिस्टर विश्वविद्यालय के एक शरीर विज्ञानी हैं ब्रैडले इलिएट, जिन्होंने एक ऐसे व्यक्ति पर भूख के प्रभाव का अध्ययन किया जो 50 दिन तक बिना भोजन के रहा. वे बताते हैं, "अल्पावधि में आपका वज़न कम होता है क्योंकि चयापचय क्रिया से आप शरीर की चर्बी और मांसपेशियों के ऊतकों का प्रयोग करते हैं."

मानव शरीर अद्भुत रूप से कम वज़न से निपटता है: 20 प्रतिशत वज़न कम करने पर शरीर 50 प्रतिशत कम ऊर्जा की खपत करता है. शरीर का तापमान कम हो जाता है और अपनी बची-खुची ऊर्जा संभालने के लिए शरीर में आलस्य छा जाता है. आखिरकार मस्तिष्क को छोड़कर अन्य शारीरिक अवयवों का भी क्षय होने लगता है. यह भुखमरी से निपटने का एक तरीका-सा लगता है.

इलिएट कहते हैं, "ऐसा लगता है कि यकृत और गुर्दे की भी समस्या हो जाती है. रक्तचाप भी गड़बड़ाने लगता है और लोग बेहोश भी हो सकते हैं."

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विटामिन और खनिजों की कमी से स्कर्वी नामक रक्त रोग और पेलाग्रा जैसा त्वचा रोग होने लगता है. विश्व खाद्य कार्यक्रम की रीता भाटिया के अनुसार, भूख से वयस्कों की अपेक्षा बच्चे अधिक जल्दी प्रभावित होते हैं. उन्होंने 1990 के दशक में उत्तरी कोरिया में खाद्य पदार्थों की भीषण कमी के बारे में जानकारी दी थी.

कुपोषण का असर

भोजन के बिना जिन्दा बचना किसी व्यक्ति के वज़न, शरीर पर जमा चर्बी और अन्य शारीरिक स्थितियों पर निर्भर करता है. पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस मामले में अधिक जुझारू होती हैं.

लेकिन आमतौर पर यदि वज़न सामान्य बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई से आधा रह जाए तो अधिकांश लोगों की मृत्यु हो जाएगी. यह स्थिति 45 से 61 दिनों तक बिना भोजन के रहने पर होती है.

जो लोग बच भी जाते हैं उन पर दीर्घावधि असर होते हैं.

लम्बे समय तक भूख का शिकार होने पर लोगों की लम्बाई पर असर पड़ सकता है जिससे भुखमरी और खाद्य पदार्थों की कमी वाले इलाकों की आबादी की लम्बाई कम रह जाती है.

चीन में 1959 से 1961 के बीच हुए द ग्रेट फैमाइन यानी भीषण भुखमरी के दिनों में एक से तीन वर्ष की आयु के लोगों की औसतन लम्बाई वयस्क के रूप में उन लोगों से 2.1 सेंटीमीटर कम रही जो इस परिस्थिति में नहीं पले-बढ़े. इस अवधि में तीन करोड़ लोगों की मौत हुई. इस दौरान बचे लोगों की बाहें पतली, वज़न 4.4 प्रतिशत कम तथा शैक्षणिक उपलब्धियां औसत के मुकाबले कम रहीं. गर्भवती महिलाओं में गर्भपात भी बढ़ जाते हैं.

1980 के दशक के मध्य में इथियोपिया की भुखमरी में बचने वाले नवजातों में वयस्क अवस्था में बीमारी की संभावना अधिक थी. अन्य अध्ययनों में पाया गया है कि इस अवस्था से गुजरने वाले बच्चों में बड़े होने पर उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोग काफी आम पाया गया.

लेकिन भुखमरी का असर शारीरिक स्वास्थ्य से कहीं अधिक है. चीन में पड़े अकाल के दौरान मजदूरों की संख्या 25 प्रतिशत तक गिर गई जिसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा. इसी तरह अकाल के शिकार इथोपियाई बच्चों की वयस्कावस्था में औसत आय अन्य के मुक़ाबले 3 से 8 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से कम रही.

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Image caption कूड़े में खाने की तलाश करते हुए बच्चे

इन आंकड़ों से कुछ संकेत तो मिलते हैं लेकिन ये असली भूख का अहसास कराने में विफल रहते हैं.

ग्लास्गो की कैलेडोनियन यूनिवर्सिटी में जेंडर स्टडीज़ यानी लैंगिक अध्ययन की प्रोफेसर ऊनाग वॉल्श ने पाया कि 1845 से 1851 के बीच आयरलैंड में पड़े अकाल के कारण मनोरोग केन्द्रों में भर्ती लोगों की संख्या इस दौरान और इसके ठीक बाद बहुत तेजी से बढ़ी.

उनका कहना है, "इस दौरान आबादी तो आधी हो गई थी लेकिन मनोरोग केन्द्रों में लोगों की संख्या बहुत बढ़ गई थी. इनमें से कुछ लोग शायद अच्छे भोजन की तलाश में यहां आये हों लेकिन लोगों की सोच में भी एक बदलाव आया था. लोग बहुत आसानी से भाग्यवादी हो गए थे. पश्चिमी तट पर यह सबसे भीषण अकाल था. भूख से बिलबिला रही आबादी ने अपना सब कुछ बेच डाला था और पक्षी पकड़ने से लेकर घास और खर-पतवार तक खाने के किस्से मिलते हैं."

शायद इससे कुछ संकेत मिलें कि खाद्य पदार्थों की आपूर्ति में अचानक रुकावट आ जाए तो लोग इससे कैसे निपटते हैं.

भुखमरी से निपटने के तरीके

वर्ष 1944-45 की सर्दियों और वसंत ऋतु के आरम्भ में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हॉलैंड में पड़े अकाल से त्रस्त लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए जंगली पौधों और मशरूमों में ही भोजन तलाशना शुरू कर दिया था.

नीदरलैंड्स की लीडेन यूनिवर्सिटी में पादप विज्ञान इतिहास के प्रोफेसर टिन्डे वान एंडेल कहते हैं, "द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरूआत में एक अपेक्षाकृत सम्पन्न और घनी आबादी वाले देश नीदरलैंड्स ने जंगली पौधों का भोजन करना आम बात नहीं थी."

युद्ध की विभीषिका ने उन्हें उन पुरानी पुस्तकों की भी खाक छानने पर मजबूर किया था जिनमें जंगली पौधों से बने खाद्य पदार्थों का जिक्र था.

वान एंडेल बताते हैं, "शहर के काफी लोग समूहों में गांव की ओर पत्तियों और पौधों की तलाश में निकल जाते थे. जिसको भी ज़मीन मिल जाती थी वह उसे सब्जियों के खेत में बदल देता था. लोगों ने शहर में ही खरगोश पालने शुरू कर दिये. कुछ लोगों ने फार्मों से पशुओं का चारा या कृषि में उत्पन्न होने वाले कूड़े को निशाना बनाया."

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प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भोजन की तलाश में लोगों ने लंदन के बहुत सारे मशहूर राजसी उद्यानों को जमीनों और बागीचों में तब्दील कर दिया.

हाल ही में खाद्य पदार्थों की कमी के खतरे से मजबूर लोग परम्परागत पेशों की ओर जाने लगे हैं. ग्रीस में आर्थिक उठापटक और उसके कारण उत्पन्न खाद्य पदार्थों की कमी के बाद उन स्कूलों में आवेदन काफी बढ़ गए जहां कृषि के बारे में पढ़ाया जाता है.

एलेक्स डी वॉल के अनुसार, अकाल से शहरों की अपेक्षा ग्रामीण आबादी ज्यादा बेहतर ढंग से निपटती है. वे कहते हैं कि इसका कारण लोगों में मौजूद ज्ञान है.

रेसाद त्रबोंजा के लिए 47 महीनों तक गुज़ारे गए दिनों की याद एक दुःस्वप्न की तरह हमेशा ज़ेहन में बनी रहेगी. लेकिन उनका मानना है कि डर और निराशा का यह अनुभव उनके शहर को एक अन्य तरह का पोषण दे गया.

वे कहते हैं, "समूचा सरायेवो शहर एक बड़ा परिवार बन गया. हम सब एक दूसरे के प्रति बहुत दया और सम्मान का भाव रखते थे और एक दूसरे से सभी चीजें बांटते थे. मैंने यह पहले कभी नहीं देखा था."

"मैं इस मामले में भाग्यशाली हूं कि निराशा और कष्ट के समय में सरायेवो को मैंने पहले से कहीं अधिक खूबसूरत देखा है."

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