कितनी तेज़ी से मिट रहा है इंटरनेट की दुनिया का इतिहास

  • 13 अप्रैल 2019
डिजिटल इतिहास को सहेजना कितना मुश्किल? इमेज कॉपीरइट Getty Images

2005 में एलेक्स ट्यू के दिमाग़ में करोड़ों रुपये का एक आइडिया आया.

20 बरस के एलेक्स के सामने चुनौती थी कि 3 साल की बिज़नेस की डिग्री की फ़ीस कैसे भरें. उन्हें लग रहा था कि क़र्ज़ का बोझ बढ़ता जा रहा है. तो, उन्होंने एक नोटपैड पर लिखा-'कैसे बनें करोड़पति.'

क़रीब 20 मिनट बाद एलेक्स के ज़हन में जो बात आई, वो उनकी नज़र में इस सवाल का जवाब थी.

एलेक्स ट्यू ने मिलियन डॉलर होमपेज नाम की वेबसाइट बनाई. इसका मॉडल बहुत ही साधारण था. इस वेबसाइट पर दस लाख पिक्सेल थे. हर पिक्सेल एक विज्ञापन का ठिकाना था. कोई भी एक डॉलर प्रति पिक्सेल के हिसाब से 100 पिक्सेल ख़रीद कर उस पर अपना विज्ञापन दे सकता था. आप ने एक बार जो पिक्सेल ख़रीद लिए, वो हमेशा के लिए आप के हो गए.

जब दस लाख पिक्सेल बिक जाते, तो एलेक्स करोड़पति बन जाते. कम से कम एलेक्स की योजना तो यही थी.

एलेक्स ट्यू ने मिलियन डॉलर होमपेज को 26 अगस्त 2005 को लॉन्च किया. इसे तैयार करने में ट्यू को 50 डॉलर की भारी-भरकम रक़म ख़र्च करनी पड़ी थी.

विज्ञापन देने वालों ने पिक्सेल ख़रीदे और इन पर अपने प्रॉडक्ट के लिंक दिए, जिन तक पहुंचा जा सकता था. हर पिक्सेल में विज्ञापन के बारे में एक छोटी सी लाइन भी लिखी होती थी एक तस्वीर के साथ.

एक महीने के भीतर ही इस पेज के चर्चे थे. मीडिया में भी एलेक्स की वेबसाइट चर्चित हुई. जनवरी 2006 में दस लाख पिक्सेल के आख़िरी एक हज़ार पिक्सेल भी बिक गए. एलेक्स ट्यू अब करोड़पति बन गए थे.

आज भी उनकी वेबसाइट चल रही है. जबकि इसे लॉन्च किए हुए 13 साल हो चुके हैं. इसके बहुत से ग्राहक जैसे ब्रिटेन का द टाइम्स अख़बार, ट्रैवेल कंपनी चीपफ्लाइट्स.कॉम और याहू जैसी कंपनियों ने लंबे वक़्त तक पैसे देकर इस पर अपना प्रचार किया है. आज भी हज़ारों लोग इसे रोज़ाना देखते हैं.

एलेक्स ट्यू ने इस वेबसाइट को काफ़ी पहले बेच दिया था. अब वो एक ऐप चलाते हैं, जो लोगों को ध्यान योग सिखाता है.

उनकी वेबसाइट इंटरनेट के शुरुआती दिनों का म्यूज़िम बन चुकी है.

15 साल में कोई भी चीज़ इतनी पुरानी नहीं पड़ती कि उसका इतिहास लिखा जाए. उसका म्यूज़ियम बनाया जाए.

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Image caption milliondollarhomepage.com वेबसाइट

पर, इंटरनेट की रफ़्तार बड़ी तेज़ है. जो आज सितारा है, वो कल गर्दिश में हो जाता है. मिलियन डॉलर होमपेज को ही लीजिए. आज इसकी साइट के पिक्सेल पर मिलने वाले 40 फ़ीसदी लिंक मुर्दा हो चुके हैं. मतलब उनकी कंपनियों की वेबसाइटें बंद हो चुकी हैं. कइयों ने नई वेबसाइटें बना ली हैं.

मिलियन डॉलर होमपेज इस बात की मिसाल है कि इंटरनेट में कितनी तेज़ी से वेबसाइट खंडहर बन जाती हैं.

एक दशक पहले अमरीका की मशहूर कंपनी अमरीकन ऑनलाइन वेबसाइट चलाती थी. इसमें लोग गीत-संगीत और साहित्य के बारे में लेख लिखते थे. इंटरव्यू छपते थे. फ़ेसबुक और ट्विटर के ज़रिए भी इस वेबपेज को ख़ूब लाइक्स और लोकप्रियता मिल रही थी. स्मार्टफ़ोन के बढ़ते दायरे ने इस वेबपेज की लोकप्रियता में काफ़ी इज़ाफ़ा किया.

लेकिन अप्रैल 2013 मे अमरीकन ऑनलाइन ने अचानक ये वेबसाइट बंद करने का फ़ैसला किया. इसके साथ ही सैकड़ों लेखकों, संपादकों का काम-काज हवा में उड़ गया. वेबसाइट बंद यानी इस पर मौजूद हर दस्तावेज़ का ख़ात्मा.

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डिजिटल इतिहास को सहेजने की चुनौती

आज की तारीख़ में अमरीकन ऑनलाइन के इस वेबपेज की कुछ ही चीज़ें बची हैं, जिनका ज़िक्र दूसरी वेबसाइट्स पर किया गया था.

यानी इंटरनेट की दुनिया का इतिहास बड़ी तेज़ी से मिट रहा है. अच्छी बात है कि कुछ लोगों को इस डिजिटल इतिहास को सहेजने की फ़िक्र हो रही है.

अमरीका के सैन फ्रांसिस्को शहर की कंपनी इंटरनेट आर्काइव ऐसी बंद होती वेबसाइट और इंटरनेट पर ख़त्म होते पन्नों को सहेजने का काम करती है. इसकी शुरुआत 1990 के दशक के आख़िरी दिनों में कंप्यूटर इंजीनियर ब्रयूस्टर काहले ने की थी.

ये उन गिने-चुने संगठनों में से एक है जो इंटरनेट के इतिहास को सहेजने का काम कर रही हैं. पुरानी वेबसाइट, बंद होने वाले वेब पेज और इंटरनेट पर मौजूद पुराने कंटेंट को संजोने का काम मुश्किल और ख़र्चीला दोनों ही है.

इसीलिए इसका सहेजा जाना अहम हो जाता है. क्योंकि जब भी कोई वेबसाइट बंद होती है, तो, उसके साथ बरसों के दस्तावेज़ एक झटके में ख़त्म हो जाते हैं.

ब्रिटेन की साउथैम्पटन यूनिवर्सिटी की डेम वेंडी हाल कहती हैं कि, "अगर इंटरनेट आर्काइव ने इंटरनेट की दुनिया के दस्तावेज़ सहेजने का काम न किया होता. तो आज हमारे पास उस दौर के इंटरनेट का कोई सबूत नहीं होता. सब कुछ ख़त्म हो गया होता."

डेम वेंडी कहती हैं कि म्यूज़ियम और पुस्तकालयों को अहम ग्रंथ, दस्तावेज़, किताबें, अख़बार और पत्रिकाएं सहेजने का तजुर्बा तो है. लेकिन, इंटरनेट के आने के बाद से उनके लिए भी इन डिजिटल पन्नों को सहेजना एक चुनौती बन गया है.

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वेब पन्नों को सहेजने का ख़र्च

ब्रिटिश लाइब्रेरी अब पुराने इंटरनेट के पन्नों को संरक्षित करने का काम कर रही है. बहुत से अख़बारों के प्रिंट एडिशन वेबसाइट में तब्दील हो गए हैं. ऐसे में उन्हें आर्काइव कर के रखना नई तरह की चुनौती है.

अख़बारों की वेबसाइट को सहेजना इसलिए चुनौतीपूर्ण है कि कई बार अख़बारों के मालिक बदल जाते हैं. या कंपनी बंद हो जाती है, तो अचानक से कोई वेबसाइट बंद कर दी जाती है. अगर इन्हें सहेजा न गया तो ऐसे अख़बारों के डिजिटल पन्ने हम हमेशा के लिए खो बैठते हैं.

इंटरनेट को सहेजना मामूली काम नहीं. हर लम्हे यहां कुछ न कुछ नया होता है. फ़ोटो, ब्लॉग, वेबसाइट और न जाने क्या-क्या. दस्तावेज़ों का ऊंचा पहाड़ है, जो हर पल बड़ा होता जा रहा है. कई ख़बरें हैं, लेख हैं और दूसरे दस्तावेज़ हैं जिन पर लगातार कमेंट्स और लाइक होते जा रहे हैं.

वैसे तो आज डिजिटल आर्काइव सस्ता हो गया है. लेकिन, इन्हें सहेजने में फिर भी भारी ख़र्च है. डेम वेंडी पूछती हैं कि, "इन वेब पन्नों को सहेजने का ख़र्च उठाएगा कौन?"

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डिजिटल लाइब्रेरी बनाना बड़ा काम

ब्रिटेन में वेबपेज के संरक्षण की ज़िम्मेदारी मुख्य तौर पर ब्रिटिश लाइब्रेरी निभा रही है. यूके वेब आर्काइव के नाम से ये एक संस्था चलाती है, जो ब्रिटेन में बंद हो रही वेबसाइट को उनकी इजाज़त से सहेजती है. ये काम 2004 से ही चल रहा है.

इसके प्रबंधक जैसन वेब्बर कहते हैं कि डिजिटल लाइब्रेरी बनाना बहुत बड़ा काम है. इतना बड़ा कि लोगों को इसका अंदाज़ा नहीं है.

सैन फ्रांसिस्को के इंटरनेट आर्काइव ने पहला वेबपेज 1996 में सहेजा था, यानी इंटरनेट के आने के पांच साल बाद. दुनिया का पहला वेबपेज अब नहीं रहा. इसकी एक छोटी सी झलक आप वर्ल्ड वाइड वेब कंसर्शियम पर ही देख सकते हैं.

इसी तरह ब्रिटेन में 1996 के बाद ही वेबसाइट व्यापक रूप से प्रचलित हुईं.

ब्रिटिश लाइब्रेरी हर साल ब्रिटेन में चलने वाली तमाम वेबसाइट का हाल जानती है. जो बंद हो गई हैं या उसके कगार पर हैं, उन्हें सहेजने का काम, मालिक की मंज़ूरी लेकर शुरू कर दिया जाता है. एक वेबसाइट सहेजने के लिए कम से कम 500 एमबी का स्पेस चाहिए. वैसे तो बीबीसी न्यूज़ जैसी वेबसाइट के पुराने पन्नों को ज़्यादा तरज़ीह दी जाती है.

इसी तरह ब्रेक्सिट और 2012 के लंदन ओलंपिक या पहले विश्व युद्ध की 100वीं सालगिरह से जुड़े डिजिटल दस्तावेज़ों के संरक्षण पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है.

जैसन वेब्बर कहते हैं कि लोगों को ये ख़बर ही नहीं होती कि इंटरनेट से कोई चीज़ हमेशा के लिए ग़ायब हो जाती है. क्योंकि डिजिटल दुनिया बहुत विशाल है. इसके ओर-छोर का लोगों को ठीक-ठीक अंदाज़ा ही नहीं. हालांकि धीरे-धीरे इसे लेकर जागरूकता बढ़ रही है.

लेकिन, उन्हीं वेबसाइट का संरक्षण किया जा सकता है, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं. बहुत से लोग निजी तौर पर ढेर सारा डेटा लेकर बैठे हैं, जो अचानक ही हमेशा के लिए हाथ से निकल सकता है. इन्हें सुरक्षित रखने का कोई इंतज़ाम नहीं है.

जैसन कहते हैं कि, 'ब्रिटिश लाइब्रेरी में चिट्ठियों की भरमार हैं. नेताओं के बीच ख़तो-किताबत है, प्रेम पत्र हैं. ये लोगों के लिए बहुत अहम हैं.'

हम सोशल मीडिया पर कुछ भी डालते हैं, तो सोचते हैं कि ये हमेशा वहां रहेगा. लेकिन आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि बहुत सी पुरानी वेबसाइट अचानक बंद हो गईं. उनके दस्तावेज़ भी हमेशा के लिए ख़त्म हो गए. जैसे कि अमरीकी सोशल साइट माइस्पेस या फिर ओर्कुट.

डिजिटल इतिहास को समेटना कितना मुश्किल?

गूगल जैसी कंपनी के साथ भी ऐसा हो सकता है. फ़ेसबुक से मुक़ाबले के लिए गूगल ने गूगल प्लस नाम की वेबसाइट शुरू की थी. जिसे हाल ही में, 2 अप्रैल को अचानक बंद कर दिया गया.

वेब्बर कहते हैं कि, 'फ़ेसबुक पर फ़ोटो डालने का मतलब ये नहीं कि वो वहां हमेशा रहेगी. एक दिन ऐसा आएगा जब फ़ेसबुक बंद हो जाएगा. ठीक उसी तरह जैसे दूसरी कई बड़ी वेबसाइट की उम्र पूरी हो गई. वो भी अचानक.'

एक और मसला भी है. ख़बरों की दुनिया के वेबपेज अगर सुरक्षित नहीं किए जाते, तो उनका न होना सरकारों के लिए फ़ायदेमंद होगा. एक ही पक्ष की स्टोरी आप को पता चलेगी. कोई ख़बर अगर सरकार के कारनामों का पर्दाफ़ाश करने वाली है और उसे संरक्षित नहीं किया गया, तो जनता का नुक़सान होगा.

बहुत सी चुनावी वेबसाइट सीज़नल होती हैं. चुनाव के बाद उनका काम तमाम हो जाता है. उनसे जुड़े तमाम डिजिटल दस्तावेज़ हमेशा के लिए इंटरनेट के क़ब्रिस्तान में दफ़्न हो जाते हैं.

कई बार देशों का पतन भी इंटरनेट के एक बड़े हिस्से को दफ़्न कर देता है. युगोस्लाविया को ही लीजिए. इसके नाम पर दर्ज हुए वेबपेज अब बचे ही नहीं.

अच्छी बात ये है कि हम इतिहास की टूटी कड़ियों को जोड़ना जानते हैं. बहुत सी ऐतिहासिक घटनाएं हैं, जिनके बारे में हम ने अटकलों से जानकारियां जोड़ीं और उन हिस्सों को पिरोया जो एक-दूसरे से मिलते हुए इतिहास का सफ़र तय कर के हम तक पहुंचे.

तो, उम्मीद यही है कि हम इंटरनेट के इतिहास के इन गुम हो रहे पन्नों के बिना भी डिजिटल इतिहास को सहेज और समझ पाएंगे.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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