क्या आप कभी-कभी लगातार छींकने लगते हैं?

  • 19 मई 2019
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हम सभी कभी न कभी लगातार बेवजह छींक आने, नाक और शरीर में खुजली होने से परेशान होते हैं.

इसे 'हे फ़ीवर' यानी परागण बुखार कहा जाता है. जब धूल में फूलों और घास-फूस के कण मिलकर हमारे ऊपर हमला करते हैं, तो ये बुखार होता है. जिसे घुल, परागण से एलर्जी होती है, वो हे फ़ीवर से ज़्यादा परेशान होता है. लोगों की नाक बहने लगती है, आंख से पानी आने लगता है, गले में ख़राश होती है, लगातार छींकें आने लगती हैं. बसंत के बाद के दिनों में ख़ासतौर से ये बीमारी हमें तंग करती है.

10 से 30 फ़ीसदी तक आबादी इससे प्रभावित होती है. पर हे फ़ीवर को लेकर कुछ मनगढ़ंत बातें भी फैली हुई हैं.

हमने परागण से होने वाले बुखार को लेकर प्रचलित कुछ बातों की हक़ीक़त जानने की कोशिश की.

घास के बुख़ार का घास से कोई ताल्लुक़ नहीं है?

उन्नीसवीं सदी में लोगों का यक़ीन था कि ताज़ा कटी घास की वजह से ये बुख़ार लोगों को जकड़ता है. इसीलिए इसे हे फ़ीवर कहा गया. उस दौर में एक ब्रितानी डॉक्टर जेम्स बोस्टॉक हे फ़ीवर का शिकार हुआ, तो उसने पड़ताल की. वो हर साल गर्मी में इस बुख़ार से पीड़ित होता था. जेम्स बोस्टॉक इस नतीजे पर पहुंचा कि इस बुख़ार का ताल्लुक़ घास से नहीं है. वो जब समंदर किनारे रहने के लिए गया तो उसे इससे निजात मिल गई. लेकिन, डॉक्टर जेम्स का ये मानना था कि ये गर्मी में आने वाली सालाना बीमारी है. जो कि ग़लत था.

इस बुख़ार का फलों के कणों से संबंध 1859 में पता लगाया गया. ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स ब्लैकले को जब एक गुलदस्ता दिया गया, तो सूंघते ही उन्हें छींकें आने लगीं. जांच-पड़ताल के बाद ब्लैकले इस नतीजे पर पहुंचे कि फूलों के पराग और घास से निकलने वाले कण ही हवा में मिलकर हे फ़ीवर को जन्म देते हैं. इसका हमारी रोगों से लड़ने की क्षमता से सीधा मुक़ाबला होता है.

कुल मिलाकर, हे फ़ीवर घास-फ़ूस और फूलों के पराग की वजह से होता है. ये बात हमारी पड़ताल में सही पायी गई.

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उम्र बढ़ने के साथ ख़त्म हो जाता है हे फ़ीवर?

हम आम तौर पर ये मानते हैं कि जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उन्हें हे फ़ीवर जकड़ना छोड़ देता है. 20 फ़ीसद लोगों को तो हमेशा के लिए इससे मुक्ति मिल जाती है. उम्र के पांचवें दशक में आम तौर पर लोग हे फ़ीवर के शिकंजे से मुक्त हो जाते हैं.

हालांकि जिन लोगों को बचपन में ये बीमारी परेशान नहीं करती, उन्हें बढ़ती उम्र के साथ ये बुख़ार तंग करने लग सकता है.

तो, बढ़ती उम्र के साथ हे फ़ीवर से छुटकारा भी मिल सकता है और लोग इसके शिकार भी हो सकते हैं.

बारिश से हे फ़ीवर से निजात मिल जाती है?

कई लोगों को लगता है कि बारिश होने से हवा में मौजूद कण बैठ जाते हैं और उन्हें इससे छुटकारा मिल जाता है. उनकी आंखों और नाक में होने वाली खुजली और छींकें आनी बंद हो जाती हैं.

पर, सच्चाई ये है कि बारिश से एलर्जी की परेशानी बढ़ सकती है. हां, 10 सेंटीमीटर तक बारिश होने के बाद परागण हवा में कम हो जाते हैं. लेकिन, तेज़ बारिश होने पर फूलों से पराग कण निकल कर और भी हवा में मिल जाते हैं और हमें हे फीवर जकड़ सकता है.

तो, बारिश कितनी हुई है, इस बात से तय होता है कि हे फ़ीवर से छुटकारा मिलेगा या नहीं.

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दिन में ये बुख़ार ज़्यादा तंग करता है

अगर आप हे फ़ीवर के शिकार हैं, तो बेहतर होगा कि घर में रहें. खुली हवा में निकलेंगे तो ये और परेशान करेगा.

दिन में हवा गर्म होने से परागण ऊपर उठ आते हैं. वहीं रात में तापमान कम होने से ये ज़मीन पर बैठ जाते हैं.

कुल मिलाकर, हे फ़ीवर आप को कितना तंग करेगा, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप के आस-पास कैसे पौधे हैं. जिनमें परागण ज़्यादा होता है, वो आप को ज़्यादा परेशान करेंगे.

एंटीहिस्टामाइन दवाएं आप को सुस्त कर देंगी

एंटीहिस्टामाइन दवाएं आप पर हे फ़ीवर के असर को कम कर देती हैं. असल में जब परागण हमारे शरीर पर हमला करते हैं, तो हमारे रोग प्रतिरोधक सिस्टम को लगता है कि इसके प्रोटीन हमारे ऊपर हमला कर रहे हैं. तब हमारे शरीर से हिस्टामाइन नाम का केमिकल निकलता है. इसे रोकने के लिए ही एंटीहिस्टामाइन दवाएं दी जाती हैं. पहले इन दवाओं को लेने के बाद लोग ऊंघते रहते थे. सुस्ती आ जाती थी. अक्सर ये दवाएं रात में खायी जाती थीं, ताकि छींकें आना बंद हों और अच्छी नींद आए.

पर 1980 और 90 के दशक में नई दवाएं ईजाद हुईं. इनसे सुस्ती नहीं आती है. हालांकि कुछ लोगों पर अभी भी ये दवाएं लेने से सुस्ती तारी हो सकती है.

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शहद हे फ़ीवर से निजात दिलाता है?

शहद को अमृत के समान माना जाता है. कहते हैं कि इस में रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है. इसलिए हे फ़ीवर होने पर एक चम्मच शहद लेने की सलाह दी जाती है.

लेकिन, रिसर्च से ये बात सही नहीं साबित हुई है. अमरीका और फिनलैंड में हुई रिसर्च में पाया गया है कि शहद लेने से हे फ़ीवर में कोई राहत नहीं मिलती.

यानी, शहद स्वाद में भले अच्छा लगे, पर इससे इस बीमारी से राहत नहीं मिलती.

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