यूरोपीय देशों में क्यों है केन्या के शहद की मांग?

  • 22 मई 2019
मधुमक्खी, शहद पालन, दक्षिण अफ़्रीक़ा इमेज कॉपीरइट Getty Images

अफ़्रीक़ी देशों में मधुमक्खी पालन का काम बड़े पैमाने पर होता है. इससे ना सिर्फ़ वहां के लोगों को अतिरिक्त कमाई होती है, बल्कि वन्य जीवन की हिफ़ाज़त में भी ये मददगार है. फिर भी एक बड़ा तबक़ा इसमें दिलचस्पी नहीं रखता.

इसकी वजह क्या हो सकती है, इसे जानने से पहले ये जानना ज़्यादा ज़रूरी है कि आख़िर मधुमक्खी पालन के फ़ायदे क्या हैं.

केन्या के शहद की मांग यूरोपीय देशों में बहुत ज़्यादा है. यहां बड़े पैमाने पर यूरोपीय देशों को शहद निर्यात होता है. केन्या का शहद कई दूसरे देशों के शहद से महंगा भी होता है. इसीलिए यहां के स्थानीय लोग बड़ी तादाद में मधुमक्खी पालन कर शहद बेचते हैं.

ट्रिनी कार्टलैंड ऐसी ही एक महिला हैं. वो मधुमक्खी पालन करती हैं. ट्रिनी इसके बहुत से फ़ायदे गिनाती हैं. उनका कहना है कि कमाई के अतिरिक्त साधन के लिए बहुत से स्थानीय लोग उनके साथ जुड़ना चाहते हैं.

लेकिन कार्टलैंड का कहना है कि उनका मक़सद सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाना नहीं है. बल्कि इसके ज़रिए वो वन्य जीवन को संरक्षित रखना चाहती हैं.

उनका कहना है कि ज़्यादा मधुमक्खियां पालने के लिए ज़्यादा पेड़ों की ज़रूरत होगी, जिससे ज़्यादा खाना भी पैदा होगा. इसी चारे, खाने और शहद को बेचकर जो कमाई होगी उसे इकोसिस्टम की देखभाल के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

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अफ़ीक़ी देशों का वातावरण मधुमक्खी पालन के माक़ूल

दक्षिण अफ़्रीक़ा के एग्रिकल्चरल काउंसिल के रिसर्चर माइक एलसॉप का कहना है कि मक्खियों पर यहां के लोगों की निर्भरता व्यवहारिक है. मक्खियां यहां के लोगों की फूड चेन का हिस्सा हैं. अफ़्रीक़ा में जितने फूल उगाए जाते हैं उसका 80 फ़ीसदी हिस्सा मधुमक्खियों के लिए पर्याप्त है.

बी पार्क ट्रस्ट की संस्थापक कीथ स्मिथ का कहना है कि बहुत से अफ़ीक़ी देशों का वातावरण मधुमक्खी पालन के लिए एकदम माक़ूल है. अगर लोगों को सही ट्रेनिंग दी जाए तो इन देशों में ये मोटे मुनाफ़े वाला कारोबार हो सकता है. साथ ही इससे इंसान और वन्यजीवन के बीच की दूरी भी मिटेगी.

केन्या में की गई रिसर्च रिपोर्ट बताती है कि बीहाइव्ज़ फ़ेंसिंग के ज़रिए 80 फ़ीसदी खेतों को बचाने में मदद मिली है. साथ ही इनकी वजह से जंगलों में जंगली जानवरों का शिकार रोकने में भी मदद मिली है.

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अफ़गानिस्तान में मधुमक्खी पालन करने वाली किशोरी

मधुमक्खी पालन के समर्थक इसे बढ़ावा देने के लिए हर संभव तर्क देते हैं. लेकिन बहुत से रिसर्चरों को इनके तर्क नहीं भाते. मसलन यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यू इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया की रिसर्चर मनु सोन्डर्स का कहना है कि मधुमक्खी पालन के तर्क में इतना दम नहीं है कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीवन का संरक्षण किया जा सकता है.

बल्कि लंबे वक़्त में एक ही नस्ल के जीवों की ज़रूरत पूरी करने से दूसरी ज़रूरी नस्लों की ज़रूरतों की अनदेखी होगी.

कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जोनास गेल्डमन का कहना कि सिर्फ़ मधुमक्खियों की नस्लों पर ध्यान देने से दूसरी जंगली नस्लों की अनदेखी होगी.

लेकिन रिसर्चर गेल्डमन का कहना है कि सिर्फ़ अफ़्रीक़ा को छोड़ दिया जाए तो ये बात अन्य सभी जगहों पर लागू हो सकती है. अफ़्रीक़ा की मधुमक्खी और दक्षिण अफ़्रीक़ा की केप हनी बी वहां की स्थानीय नस्लें हैं. जबकि अमरीका और ऑस्ट्रेलिया में स्थानीय नस्ल की मधुमक्खियां नहीं हैं.

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कारोबार के लिहाज़ से बहुत फ़ायदेमंद

केपटाउन की कंज़र्वेशन बायोलॉजिस्ट कैथरीन फ़ोर्सिथ का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया और अमरीका में जंगली और पालतू मधुमक्खियों में मेल मिलाप होता रहता है और उनसे नई नस्लें पैदा होती हैं जो पर्यावरण के लिए अच्छा है. जबकि अफ़्रीका में सिर्फ पालतू मधुमक्खियां हैं. वहां नई नस्ल की मधुमक्खियां नहीं हैं. इससे इकोसिस्टम को कोई लाभ नहीं होता.

जानकारों का कहना है कि सहारा रेगिस्तान के इर्द-गिर्द के अफ़्रीक़ी देशों में पैदा किए जाने वाले शहद में कारोबार के लिहाज़ से बहुत फ़ायदेमंद साबित होने की गुंजाइश है. अगर बायोकंज़र्वेशन के साथ-साथ आर्थिक फ़ायदे के नज़रिए से देखा जाए तो सूरत कुछ और होगी.

पिछले साल रवांडा में होने वाली बिज़नेस ऑफ़ कंज़र्वेशन कॉन्फ़्रेंस में इस मुद्दे को उठाया भी गया था. जिसमें कंज़र्वेशन के साथ-साथ मधुमक्खी पालन को एक बड़ी बिज़नेस इंडस्ट्री बनाने पर विचार करने को कहा गया था. ऐसी बिज़नेस इंडस्ट्री जिसमें मोटा मुनाफ़ा कमा कर पेड़ों और जंगलों के संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाए. और इसका भरपूर मौक़ा है.

इस वक़्त दुनिया भर में शहद की कमी है. ख़ास तौर से ऑर्गेनिक शहद की. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग होने की वजह से दाम भी ऊंचे हैं. यूरोप के लोग एक साल में औसतन 0.7 किलो शहद का इस्तेमाल करते हैं.

यूरोपियन यूनियन के देश दुनिया के सबसे ज़्यादा शहद आयात करने वाले देश हैं. ये हर साल तक़रीबन दो लाख टन शहद ख़रीदते हैं. ऐसे में अफ़्रीक़ा के सबसे ज़्यादा और अच्छी क़िस्म का शहद पैदा करने वाले देश एक करोड़ अमरीकी डॉलर की कमाई हर साल कर सकते हैं.

इथियोपिया अफ़्रीक़ा में सबसे ज़्यादा शहद पैदा करने वाला देश है. मौजूदा वक़्त में यहां 45 से 50 हज़ार टन शहद सालाना पैदा किया जा रहा है. लेकिन इसका बड़ा हिस्सा यहां की लोकल शराब बनाने में इस्तेमाल होता है. महज़ एक हज़ार टन शहद ही निर्यात किया जाता है. जबकि इस शहद को मोटी क़ीमत पर निर्यात किया जा सकता है. केन्या में शहद उत्पादन की काफ़ी संभावनाएं हैं.

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हर्टर्स हनी

दक्षिण अफ़्रीक़ा में सबसे अच्छी क़िस्म का शहद एक ही कंपनी तैयार करती है जिसका नाम है हर्टर्स हनी. ये एक परिवार की कंपनी है जो 1978 में स्थापित की गई थी. इस कंपनी ने बाज़ार की मांग को ख़ूब भुनाया. इस कंपनी ने पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ इसे मुनाफ़े का कारोबार बना दिया. लेकिन अन्य कंपनियों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया.

अफ़्रीक़ा में मधुमक्खी पालन का काम ज़्यादातर देहात के एनजीओ करते हैं. इनके पास ना तो अच्छी क़िस्म के औज़ार होते हैं और ना ही उचित प्रशिक्षण. बाज़ार तक भी इनकी पहुंच नहीं होती. दरअसल ये लोग मक्खी पालन को मुनाफ़े के कारोबार के तौर पर नहीं देखते. देखा गया है कि ये लोग बमुश्किल दो साल में अपने तमाम औज़ार बेच देते हैं.

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मधुमक्खियों से मैनचेस्टर बनेगा बेहतर

केरी ग्लेन ने 1995 में इवासो रिवर हनी की स्थापना की थी. बुनियादी तौर पर ये बिज़नेस से ज़्यादा एक सामुदायिक योजना थी. ये कंपनी केन्या के बहुत से शहद उत्पादनकर्ताओं से शहद ख़रीद कर बाज़ार में बेचती थी.

केरी का कहना है कि ज़्यादातर मक्खी पालन करने वाले अपना काम आगे बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं रखते. सही ट्रेनिंग की कमी के चलते उन्हें अपने ही पैदा किए शहद को बाज़ार तक लाने में लागत ज़्यादा आ जाती है. दूसरे उन्हें पैदावार का भी अंदाज़ा नहीं होता.

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इसके अलावा कारोबारी मक़सद से की जाने वाली खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है, जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर मक्खियां मर जाती हैं. हर्टर का कहना है कि अगर समाज के लिए कल्याणकारी बनना है तो कारोबार में भी साझेदार बनना पड़ेगा. एनजीओ इस फ़्रंट पर पूरी तरह फेल हैं. ज़ाम्बिया में किसानों को अच्छी फ़सल की पैदावार और फिर उसे बाज़ार तक लाने के लिए ज़ोर देकर कहा जाता है. उन्हें यक़ीन दिलाया जाता है कि उनकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी.

युगांडा में ज़िम्बावे के रिसर्चर टेरेंस चम्बाती का कहना है कि मधुमक्खी पालन का सही डेटा ही मौजूद नहीं है. किसी को ये पता ही नहीं है कि युगांडा में कितना शहद उत्पादन है. टेरेंस ने हुचीहाइव नाम की संस्था स्थापित की है जिसका मक़सद है जानकारी इकट्ठा करना और मधुमक्खी पालन करने वालों को तकनीकी मदद पहुंचाना.

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इस शख़्स का पीछा क्यों नहीं छोड़ रही मधुमक्खियां?

इस संस्था से बड़े स्तर पर मधुमक्खी पालनकर्ताओं को मदद मिली है. अब यही संस्था 200 अन्य जगहों पर अपना प्रॉजेक्ट शुरू करने जा रही है.

फ़ायदेमंद कारोबार से जंगलों का संरक्षण एक चुनौतीपूर्ण काम है. फिर भी अफ़्रीक़ी देशों में जहां इस कारोबार के लिए माक़ूल आब-ओ-हवा है, वहां सुनियोजित ढंग से इसे किया जाए, तो न सिर्फ़ पर्यावरण और वन्यजीवन बचाने में मदद मिलेगी बल्कि लोगों के लिए ये एक स्थानीय कमाई का बेहतरीन ज़रिया भी होगा.

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इतनी मधुमक्खियां कहां से आईं?

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