तो क्या आप दूसरे देशों की वेबसाइटें नहीं देख सकेंगे?

  • 26 मई 2019
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ये दुनिया तमाम देशों में बंटी है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सभी देश इस बात पर एकमत हैं कि उन्हें एक-दूसरे की सीमाओं का सम्मान करना चाहिए.

इसके उलट इंटरनेट की दुनिया सरहदों से परे है. किसी अमरीकी वेबसाइट को भारत में आराम से देखा और इस्तेमाल किया जा सकता है. यही वजह है कि आज फ़ेसबुक और गूगल जैसी कंपनियों का दुनिया भर में राज है.

पर, बहुत से देश ऐसे हैं जो इंटरनेट को भी सरहदों के दायरे में बांधना चाहते हैं. 2010 में सीरिया और रूस जैसे कई देशों ने संयुक्त राष्ट्र संघ से अपील की थी कि जिस तरह देशों की सीमाओं और उनकी संप्रभुता को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली है, ठीक उसी तरह डिजिटल दुनिया में भी सरहदों की लक़ीरें खींची जानी चाहिए. हदबंदी होनी चाहिए.

इंटरेनट सलाहकार हैस्केल शार्प उस वक़्त बहुराष्ट्रीय तकनीकी कंपनी सिस्को में काम करते थे. शार्प कहते हैं कि, 'संयुक्त राष्ट्र के पास जाने वाले ये देश चाहते थे कि सबके लिए खुली और सरहदों से परे इंटरनेट की दुनिया में भी हदबंदी हो. हर देश की पहुंच में इंटरनेट का ख़ास हिस्सा ही हो.'

उस वक़्त संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस अपील को ख़ारिज कर दिया था. क्योंकि तमाम देश नहीं चाहते थे कि इंटरनेट की आज़ादी पर किसी तरह का पहरा हो. किसी सरकार का इस पर शिकंजा हो.

इस बात को क़रीब एक दशक बीत चले हैं. जो देश इंटरनेट में सीमाओं की लकीरें खींचना चाहते थे, वो इस झटके के बाद उबरे हैं और अपने-अपने तरीक़े से इंटरनेट को क़ाबू में करने में जुटे हैं.

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मसलन, रूस ने अपने यहां के इंटरनेट ग्राहकों की हिफ़ाज़त के नाम पर कई क़ानून बनाए हैं. वो इंटरनेट के ज़रिए देश में आने और रूस से बाहर जाने वाली जानकारियों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है.

इंटरनेट के अमरीकी एक्सपर्ट रॉबर्ट मोर्गस कहते हैं कि, 'रूस इंटरनेट पर अपनी सरकार का शिकंजा कसना चाहता है. वो चाहता है कि उसके नागरिक जो इंटरनेट देखें-सुनें या इस्तेमाल करें, वो उसकी जानकारी में हो.'

रूस ही क्यों, बहुत से देश हैं, जो इंटरनेट पर किसी न किसी तरह का नियंत्रण चाहते हैं. कभी राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर, तो कभी अपने अवाम को बाहरी दुनिया के ख़तरों से दूर रखने के नाम पर. रोज़-ब-रोज़ इंटरनेट पर नई पाबंदियां आयद की जा रही हैं. आज कई देश मिलकर भी इंटरनेट के बेलगाम घोड़े को क़ाबू में करने मे जुटे हैं.

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खुले इंटरनेट के साथ दिक़्क़त क्या है?

असल में रूस, ईरान और सीरिया जैसे बहुत से देशों को इंटरनेट के पश्चिमी देशों के नियंत्रण में होने से ऐतराज़ है. इन देशों को पश्चिमी देशों के जीवनमू्ल्यों से परेशानी है. उन्हें लगता है कि इंटरनेट के ज़रिए उनके देशवासियों को पश्चिमी देश बरगला सकते हैं. प्रभावित कर सकते हैं. क्योंकि इंटरनेट की दुनिया इतनी खुली है कि कोई किसी को कुछ भी भेज सकता है. या किसी से कुछ भी ले सकता है.

इंटरनेट दो क़ायदों से संचालित होता है. एक टीसीपी यानी ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल और दूसरा आईपी यानी इंटरनेट प्रोटोकॉल. इसके तहत कोई भी जानकारी इंटरनेट पर बेरोक-टोक भेजी या हासिल की जा सकती है. ये सरहदों के दायरों से परे है. इंटरनेट पर बस आईपी या टीसीपी एड्रेस होना चाहिए.

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रूस जैसे देश चाहते हैं कि सूचनाओं के इस बेरोक-टोक आदान-प्रदान पर रोक लगे. सरकारों के पास ये अख़्तियार हो कि वो एक जगह से दूसरी जगह भेजे जाने वाले डेटा को नियंत्रित कर सकें.

कुछ लोग इसे रूस, सीरिया या ईरान की तानाशाही कहकर ख़ारिज कर सकते हैं. पर, कई बार सरकारों की चिंताएं वाजिब भी होती हैं. इंटरनेट के ज़रिए उनकी सामरिक ताक़त को निशाना बनाया जा सकता है. या फिर बिजली और संचार सेवाओं को ठप किया जा सकता है. फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाकर उत्पात मचाया जा सकता है.

रॉबर्ट मोर्गस कहते हैं कि, 'रूस और चीन इस बात को औरों से पहले समझ गए कि इंटरनेट पर बेरोक-टोक संचार नुक़सानदेह हो सकता है. ख़ास तौर पर सियासी इस्तेमाल के लिए उनके नागरिकों को निशाना बनाया जा सकता है. या बैंकिंग सिस्टम को निशाने पर लिया जा सकता है.'

पर, रूसी मूल के ब्रिटिश विद्वान लिंकन पिगमैन कहते हैं कि रूस और चीन की सरकारें अपने नागरिकों की हिफ़ाज़त करने के बजाय उन्हें नियंत्रित करने को लेकर ज़्यादा फ़िक्रमंद हैं.

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इंटरनेट की संप्रभुता का मतलब अलग इंटरनेट नहीं

रूस और चीन ने 2011-2012 में ही इंटरनेट की हदबंदी की बातें शुरू कर दी थीं. उस वक़्त रूस में दो साल चलने वाले विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे. कई देशों में इंटरनेट की वजह से बग़ावत की चिंगारियां शोलों में तब्दील हो गई थीं. रूस चाहता था कि उसके नागरिकों को बग़ावत के लिए भड़काने वाले संदेश इंटरनेट के ज़रिए न पहुंचें.

दिक़्क़त ये थी कि रूस सूचनाओं के बेरोक-टोक आदान-प्रदान को रोक नहीं सकता था. इंटरनेट की सुविधा कुछ केबल और कुछ सैटेलाइट की मदद से तमाम देशों तक पहुंचती है. मसलन, उत्तर कोरिया तक इंटरनेट पहुंचाने के लिए एक केबल बिछी है. यहां स्विच बंद किया और पूरे उत्तर कोरिया में इंटरनेट सेवा बंद. पर, रूस जैसे देश के लिए ये मुमकिन नहीं.

आज रूस की अर्थव्यवस्था इंटरनेट की वजह से बाक़ी दुनिया से जुड़ी है. पहले तो ये मुमकिन ही नहीं, पर फिर भी अगर रूस ने उत्तर कोरिया की तरह इंटरनेट के सभी तार काट दिए, तो उसकी अर्थव्यवस्था भरभरा कर गिर जाएगी.

इसीलिए रूस जैसे देश चाहते हैं कि आईपी एड्रेस या ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकॉल पर उनका नियंत्रण हो.

चीन इस मामले में सबसे आगे है. इंटरनेट पर शिकंजे के लिए चीन ने गोल्डन शील्ड नाम की व्यवस्था बना रखी है. इसे ग्रेट फायरवॉल ऑफ़ चाइना कहते हैं. इसके ज़रिए चीन कई वेबसाइट या आईपी एड्रेस को अपने यहां रोक सकता है.

पर, चीन की व्यवस्था रूस में लागू नहीं हो सकती. इसमें तकनीकी अड़चनें हैं. चीन ने अपने यहां इंटरनेट का पूरा जाल अपनी कंपनियों के ज़रिए फैलाया है. उसका इस पर पूरा नियंत्रण है. चीन में इंटरनेट का प्रवाह आने-जाने के लिए कुछ ख़ास ठिकाने ही हैं, जिन पर चीन की निगाह भी है औऱ नियंत्रण भी.

इसके उलट रूस में इंटरनेट की सेवाएं उस दौर में फैली थीं, जब रूस ने खुले दिल से इंटरनेट का स्वागत किया था. आज पूरे रूस में इंटरनेट का बुनियादी ढांचा विकसित हो चुका है. पर, इस पर रूस का कोई ज़ोर नहीं.

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इसीलिए रूस कुछ तो इंटरनेट के बुनियादी ढांचे और कुछ आईपी एड्रेस को क़ाबू कर के इंटरनेट की हदबंदी करना चाहता है. हर कंप्यूटर तक इंटरनेट से क्या और कितनी जानकारी पहुंचे, इस पर कुछ हद तक रूस की सरकार ने नियंत्रण पा लिया है.

रूस की सरकार ने अपने नागरिकों के इंटरनेट इस्तेमाल पर नज़र रखने के लिए हर वेबसाइट और इंटरनेट सेवा का लोकल आईपी एड्रेस बनाने का फ़रमान जारी किया है. मतलब ये कि इंटरनेट के ज़रिए रूस तक पहुंचने वाली हर कंपनी या वेबसाइट को रूस का डेटा रूस में ही रखना होगा. हर वेबसाइट का एक लोकल आईपी एड्रेस होगा जो सिर्फ़ रूस में देखा जा सकेगा. इसके अलावा रूस की कोशिश ये है कि लोग इंटरनेट पर गूगल टाइप करें, तो रूसी गूगल यानी यांडेक्स की वेबसाइट खुले. फ़ेसबुक तलाशें तो रूसी सोशल नेटवर्क वीके की वेबसाइट खुले.

इसके लिए रूस ने कई क़ानून बनाएं हैं. जो कंपनियां रूस के क़ानून नहीं मानतीं, उस पर रूस में पाबंदी लग जाती है.

अगर रूस अपने इरादों में कामयाब होता है तो रूस का इंटरनेट बाक़ी दुनिया से अलग होगा. रूस में जब इंटरनेट खोला जाएगा, तो वही चीज़ें दिखेंगी, जिन वेबसाइट के सर्वर रूस में होंगे. अगर, फ़ेसबुक का लोकल सर्वर रूस में नहीं होगा, तो रूस में फ़ेसबुक की वेबसाइट नहीं खुलेगी.

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रूस के इस क़दम का कई बड़ी कंपनियों पर असर पड़ना तय है.

बहुत से छोटे देश भी इंटरनेट पर लगाम लगाना चाहते हैं. मगर, उनके पास रूस और चीन जितने पैसे भी नहीं हैं और तकनीक भी नहीं. ये लोग रूस और चीन की मदद से अपने यहां इंटरनेट के इस्तेमाल पर शिकंजा कस सकते हैं. ऐसा हुआ तो दुनिया दो गुटों में बंटनी तय है. एक तो वो देश जहां इंटरनेट पाबंदियों से परे होगा. दूसरा रूस और चीन जैसे देश जिनका इंटरनेट पर नियंत्रण होगा.

भारत और इज़राइल जैसे कई देश ऐसे भी हैं जो इंटरनेट पर पूरी तरह नहीं तो, कुछ हद तक पाबंदी चाहते हैं. इनमें यूक्रेन, सिंगापुर, ब्राज़ील भी हैं. हर देश अपने यहां इंटरनेट पर किसी न किसी तरह के नियंत्रण की बात करता है.

2017 में रूस ने एलान किया था कि वो ब्रिक्स देशों यानी भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ मिलकर इंटरनेट को बाहरी देशों के असर से बचाने का काम करेगा. हालांकि ब्राज़ील और भारत ने इस कार्यक्रम पर बहुत उत्साह नहीं दिखाया. पर, चीन और रूस लगातार इंटरनेट को नियंत्रित करने की मुहिम में जुटे हैं.

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बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव

चीन का बीआरआई प्रोजेक्ट यूं तो एशिया को यूरोप और अफ्रीका से जोड़ने का प्रोजेक्ट है. पर इसके लिए अफ्रीकी देशों से लेकर एशियाई देशों तक संचार सेवाओं का जाल विकसित किया जा रहा है. तंज़ानिया, डिजीबूती, ज़िम्बाब्वे और ताजिकिस्तान जैसे देशों में चीन 80 से ज़्यादा संचार प्रोजेक्ट विकसित कर रहा है. यानी चीन इंटरनेट के बरक्स संचार का अपना नेटवर्क पूरी दुनिया में खड़ा कर रहा है.

तकनीकी जानकार सिम टैक कहते हैं कि चीन का बीआरआई प्रोजेक्ट, पश्चिमी देशों के नियंत्रण वाले इंटरनेट के लिए चुनौती बनने जा रहा है. बहुत से छोटे देश इस पर निर्भर होने जा रहे हैं. उनकी दिलचस्पी इंटरनेट को क़ाबू करने में है.

इंटरनेट की आज़ादी की वक़ालत करने वाली एक्सपर्ट मारिया फैरेल कहती हैं कि चीन ने बीआरआई के ज़रिए इंटरनेट का सिर्फ़ बुनियादी ढांचा नहीं दिया है. बल्कि वो इंटरनेट को नियंत्रित करने की ट्रेनिंग से लेकर इससे जुड़े क़ानून तक का मॉडल तमाम देशों तक पहुंचा रहे हैं. तंज़ानिया, ज़िम्बाब्वे, डिजीबूती और युगांडा जैसे देश ऐसा इंटरनेट नहीं चाहते, जो गूगल और फ़ेसबुक को बेरोक-टोक उनके देश में घुसने दे. इसीलिए वो चीन के क़रीब जा रहे हैं. उसकी तकनीक अपना रहे हैं.

जानकार आशंका जता रहे हैं कि आगे चलकर इंटरनेट दो हिस्सों में बंट सकता है. एक तो पश्चिमी देशों की खुली इंटरनेट दुनिया. और दूसरी तरफ़ रूस और चीन जैसी पाबंदियों वाला इंटरनेट.

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पाबंदी के पक्षधर पश्चिमी देश!

पिछले दिनों बहुत से पश्चिमी देशों ने भी इंटरनेट के खुलेपन का नुक़सान उठाया है. रूस ने अमरीकी चुनावों को इंटरनेट के ज़रिए प्रभावित करने की कोशिश की. कई और देशों ने भी चीन के हैकर्स और रूस के हैकर्स का हमला झेला है.

ब्रिटेन ने तो मजबूरन इंटरनेट पर निगाह रखने के लिए ब्रिटिश ऑनलाइन हार्म्स बिल संसद में पेश किया है. ये क़ानून भी इंटरनेट पर निगाह रखने के रूसी इरादे से मिलता-जुलता है.

ब्रिटेन का मानना है कि पोर्न साइट, नस्लवादी हिंसा को बढ़ावा देने वाली वेबसाइट और ट्रोलिंग रोकने के लिए ये क़ानून ज़रूरी है.

फ़ेसबुक और गूगल जैसी कंपनियां तो पहले से ही इंटरनेट पर नियंत्रण रखने की कई सरकारों की मांग के आगे झुकती आई हैं. चीन में गूगल का दूसरा रूप है और भारत में दूसरा. यही हाल फ़ेसबुक के अमरीकी और भारतीय वर्ज़न का है.

कुल मिलाकर वो आज़ाद इंटरनेट, जिसका ख़्वाब इसकी शुरुआत करने वालों ने देखा था, वो अपनी आख़िरी सांसें गिन रहा है.

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