फ़ेक न्यूज़ फैक्ट्री में काम करने वाली एक लड़की की कहानी

  • 5 जून 2019
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फ़ेक न्यूज़ पूरी दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन गई है. फ़र्ज़ी ख़बरों से भारत भी परेशान है और अमरीका भी. इनके ज़रिए समाज में भेदभाव को बढ़ावा दिया जा रहा है.

अपनी विचारधारा का प्रचार करने के लिए 'फ़ेक न्यूज़' को हथियार बनाया जा रहा है. राजनीतिक फ़ायदे की फ़सल काटने के लिए भी फ़र्ज़ी ख़बरों को ख़ूब फैलाया जा रहा है.

दक्षिणी यूरोप के बहुत छोटे से देश उत्तरी मैसेडोनिया को 'फ़ेक न्यूज़' की फैक्ट्री कहा जाता है. इसका एक शहर वेल्स फ़ेक न्यूज़ के कारखानों के लिए बदनाम है. यहां पर बड़ी संख्या में फ़र्ज़ी और झूठी ख़बरें बनाने वाली वेबसाइट काम करती हैं.

इस शहर के बहुत से लोग इन 'फ़ेक न्यूज़' कारखानों में काम करते हैं. ताकि, अपनी ज़िंदगी बसर कर सकें. उनकी नौकरी किसी आम नौकरीपेशा इंसान जैसी ही होती है. आज हम आपको ऐसे ही 'फ़ेक न्यूज़' कारखाने में काम करने वाली एक लेखिका से मिलवाते हैं.

उनका नाम है, तमारा. तमारा की ज़िंदगी रोज़ ठीक उसी तरह शुरू होती थी जैसे किसी दूसरे नौकरीपेशा इंसान की. हर सुबह तमारा अपना लैपटॉप खोलतीं. उनके पास नई ई-मेल आई होती थी. इसमें एक लिंक होता था. इस दस्तावेज़ में 8 ख़बरें होती थीं, जो तमारा की दुनिया से बहुत दूर स्थित अमरीका से जुड़ी होती थीं. इन्हें कितनी देर में लिखना है, ये भी उस ई-मेल में ही लिखा होता था. तमारा को अगले कुछ घंटों के भीतर इन ख़बरों को नए सिरे से लिखकर डेडलाइन से पहले भेजना होता था.

आख़िर किसी और वेबसाइट और तमारा के काम में क्या फ़र्क़ था?

असल में तमारा का काम होता था इन ख़बरों को तोड़-मरोड़कर, एक ख़ास रंग देकर नए सिरे से लिखना. इसमें सच और झूठ का फ़र्क़ नहीं किया जाता सकता था. बल्कि दोनों की ऐसी मिलावट कर दी जाती थी कि पहचानना मुश्किल हो. तमारा हर दिन ऐसी 8 कहानियां अमरीकी दक्षिणपंथी वेबसाइट से उठाती थीं. फिर उनमें हेर-फेर कर के अपनी वेबसाइट पर पोस्ट कर देती थीं. ये वेबसाइट अमरीकी नागरिकों के लिए ही होती थी. जो असली कहानी का झूठा रूप लोगों को पढ़ाती थीं.

तमारा से मेरी मुलाक़ात पिछले साल यानी 2018 के आख़िरी दिनों में हुई थी. हम उत्तरी मैसेडोनिया की राजधानी स्कोप्जे के एक कैफ़े में मिले थे. तब तमारा ने विस्तार से अपनी नौ महीने की उस नौकरी के बारे में बताया था, जिसमें वो फ़ेक न्यूज़ वेबसाइट के लिए काम करती थीं. हालांकि तमारा की राय ऐसे सैकड़ों लोगों में से सिर्फ़ एक के विचार हैं. लेकिन तमारा से बात कर के हमें वेल्स में चल रहे फ़ेक न्यूज़ के कारखानों के काम-काज के बारे में पता चलता है.

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तमारा अपना असली नाम नहीं बताना चाहती थीं, ताकि उनकी पहचान न उजागर हो. इसीलिए तमारा और उनके कामकाजी साथियों के नाम हम ने बदल दिए हैं.

ये बात अप्रैल 2017 की है, जब तमारा के पास उसके एक दोस्त का फ़ोन आया. उसने कहा कि, ''मुझे पता है कि तुम इन दिनों ख़ाली बैठी हो, तो तुम्हारे लिए कुछ पैसे कमाने का मौक़ा है. तुम्हें राजनीति की अच्छी समझ है. तुम्हारी अंग्रेज़ी भी अच्छी है. तो, क्या तुम एक न्यूज़ वेबसाइट के लिए काम करना चाहोगी?'

तमारा ने तुरंत हां कर दी.

इसके बाद एक वीडियो कॉल पर तमारा की बाद मार्को नाम के युवक से हुई, जिसने उसे नौकरी का ऑफ़र दिया. वो उससे कम उम्र का था और बातचीत में झिझक रहा था. शायद अपने से बड़ी महिला का बॉस बनने में उसे भी हिचक थी.

मार्को ने तमारा को काम करने के तौर-तरीक़े बताए तो तुरंत ही तमारा को अंदाज़ा हो गया कि उसे फ़ेक न्यूज़ वेबसाइट के लिए काम करना है.

तमारा और मार्को के बीच वीडियो कॉल पर कई बार बात हुई. मार्को उसे अपनी स्क्रीन पर बताता था कि तमारा को कैसे किसी लेख को वेबसाइट पर डालना है. कैसे तस्वीरों को फ़ोटोशॉप कर के बदलना है.

तमारा ने मुझे बताया कि, ''वो बहुत शर्मीला था. उसकी उम्र बमुश्किल बीस बरस रही होगी.''

मार्को से तमारा की सीधी मुलाक़ात काम शुरू करने के क़रीब दो महीने बाद हुई थी. वो वेल्स में मार्को से मिलती थी, जहां वो उसे पैसे से भरा लिफ़ाफ़ा पकड़ा देता था.

तमारा ख़ुद को उदारवादी और तरक़्क़ीपसंद मानती हैं. इसीलिए जब उन्होंने वेबसाइट के लेख देखे, तो वो हैरान रह गईं. तमारा ने बताया कि, ''उनके पास बहुत ख़राब आर्टिकिल थे. वो अक्सर मुसलमानों के ख़िलाफ़ लेख छापते थे.''

ज़्यादातर ख़बरें झूठी

तमारा ने अपना लैपटॉप खोलकर उस वेबसाइट को मुझे दिखाया. इनमें से ज़्यादातर ख़बरें मुसलमानों के दूसरे लोगों पर हमले की थीं. तमारा को लगता था कि इनमें से ज़्यादातर ख़बरें झूठी थीं. लेख पढ़ने पर उसमें तमाम ग़लतियां और तथ्यों की कमी साफ़ दिखती थी. उनमें जो तस्वीरें लगी होती थीं, वो भी घटना से जुड़ी नहीं होती थीं. तमारा ने बताया कि उन्हें अक्सर गूगल से ढूंढ कर कोई भी तस्वीर लगा देने को कहा जाता था.

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तमारा से बातचीत कर के साफ़ हुआ कि फ़ेक न्यूज़ का ये मायाजाल बहुत बड़ा है. वो जो कुछ भी छाप रहे हैं, वो बहुत ही ख़तरनाक है. तमारा ने जितने भी लेख लिखे, वो असल घटनाओं की झूठी ख़बरें थीं. इनके ज़रिए लोगों में ग़ुस्सा और डर पैदा करने की कोशिश की जा रही थी. कुल मिलाकर इन ख़बरों से सच्चाई को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा था. लोगों के पूर्वाग्रहों को भड़काया और बढ़ाया जा रहा था.

तमारा ने कहा कि, ''कोई भी घटना हुई. वहां पर कुछ लोग थे. जगह का नाम भी सही होता था. तो असल मायने में ये फ़ेक न्यूज़ नहीं थी. ये तो हर बात को घुमाने का काम था. ये दुष्प्रचार था, ताकि लोगों के ज़हन में ज़हर भरा जा सके.''

तमारा का काम था कि वो असली अमरीकी लेख को घुमा-फिराकर इस तरह से लिखें कि कोई ये न पकड़ पाए कि ये लेख कहीं से चुराया गया है. उन्हें और छोटा कर दिया जाता था ताकि सोशल मीडिया पर आसानी से शेयर किया जा सके. इनकी मदद से मार्को की वेबसाइट को गूगल से विज्ञापन मिल जाते थे.

वील्स से चलने वाली एक ऐसी ही वेबसाइट के मालिक को लेकर सीएनएन से दावा किया था कि उसकी वेबसाइट को दस लाख से ज़्यादा फ़ेसबुक लाइक मिले थे. इसका मालिक रोज़ाना दो हज़ार डॉलर से ज़्यादा कमाता था.

मार्को दो वेबसाइट चलाता था. दोनों के बीस लाख से ज़्यादा फ़ेसबुक फॉलोअर थे.

क्या ऐसे लेखों का तमारा पर भी कोई असर हुआ? इस सवाल के जवाब में उनके जज़्बात मिले-जुले थे. तमारा ने कहा कि, ''मैं जितनी देर तक टाइप करती थी, यही सोचती रहती थी कि हे भगवान! इस कचरे पर कौन यक़ीन करेगा? ऐसे लेख पढ़ने वाला कितना कमअक़्ल होगा? हज़ार शब्दों के लेख में एक या दो लाइन ख़बर होती थी. बाक़ी तो बस दुष्प्रचार होता था. इसे पढ़ना मुश्किल था. बहुत बुरा लगता था.''

निशाने पर मुसलमान

तमारा ने बताया कि, ''मैं अक्सर ऐसे लेख को छोटा कर देती थी. जिन बातों को नहीं लिखना चाहती थी, उन्हें छोड़ देती थी.''

हर लेख के निशाने पर मुसलमान होते थे. इसलिए कई बार तमारा इन आर्टिकिल को छोटा कर के उनके आख़िर में एक छोटा सा वाक्य ऐसा लिख देती थीं, जो उनके दिल की बात होती थी. जैसे कि, 'हर इंसान बराबर हैं.'

अब मार्को के पास हर लेख पढ़ने का समय तो होता नहीं था. तो उनकी ये 'बदमाशियां' कभी पकड़ी नहीं गईं.

तमारा ने कहा कि सभी कहानियों में एक जैसी बात दोहराई जाती थी. ज़्यादातर कहानियों के निशाने पर मुसलमान थे. पता लग जाता था कि ये तो बस दुष्प्रचार है. पर, तमारा को पता था वो जो भी लिख रही थीं, वो उनके अपने विचार नहीं थे.

तमारा कहती हैं कि, ''मुझे अंदाज़ा हो गया था कि किस तरह ये लेख लिखने वाले अमरीकी नागरिकों को मुसलमानों के नाम पर डराना चाहते थे.''

वो ऐसी नफ़रत भरी कहानियां पढ़ने के बाद कैसे इनका सामना करती थीं?

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तमारा कहती हैं कि, ''मैंने ख़ुद को समझा लिया था कि मैं ये काम पैसे के लिए कर रही हूं. मैं अपने दिमाग़, हाथ-पैर का इस्तेमाल नौकरी करने के लिए कर रही हूं. ये विचार मेरे नहीं हैं. मुझे ये लगता था कि जो लोग ऐसे लेख पढ़ना चाहते हैं, वो शायद इसी के हक़दार हैं. मैं ये काम मशीनी की तरह कर रही थी.'

तमारा के अपने राजनीतिक विचार उन कहानियों के बिल्कुल उलट हैं.

मार्को की वेबसाइट वील्स से चलने वाली ऐसी अकेली वेबसाइट नहीं थी. अमरीका की बज़फ़ीड के मुताबिक़ उत्तरी मैसेडोनिया के उस छोटे से शहर से 140 फ़र्ज़ी ख़बरों वाली वेबसाइट चलाई जा रही थीं, जो अमरीकी राजनीति से जुड़े लेख प्रकाशित करती थीं.

वेल्स एक छोटा सा मरता हुआ शहर है. बंद पड़े कारखाने, स्विमिंग पूल और दूसरी सुविधाएं, यहां की सड़न की गवाही देती हैं. लेकिन, ऐसी वेबसाइट चलाने वाले युवा हर महीने हज़ारों डॉलर कमा रहे थे.

हालांकि तमारा को हर लेख के केवल 3 यूरो मिलते थे. वो प्रतिदिन 24 यूरो ही कमा पाती थीं. लेकिन किसी और नौकरी में वो इसकी एक तिहाई कमाई ही कर पातीं.

फ़ेक न्यूज़ का असर

ऐसी फ़ेक न्यूज़ का अमरीकी राजनीति कितना असर पड़ा, इसके भी सबूत जुटाए गए हैं. अमरीका में 2016 में हुए राष्ट्रपति चुनाव के पहले तीन महीनों में असली मीडिया की ख़बरों से ज़्यादा इन फ़ेक न्यूज़ वेबसाइट को लोग पढ़ रहे थे. फ़ेसबुक पर इन्हें सच्ची ख़बरों से ज़्यादा शेयर किया जा रहा था.

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दिसंबर 2017 में फ़ेसबुक ने ऐसी कई फ़ेक न्यूज़ वेबसाइट को अपने यहां शेयर करने पर रोक लगा दी थी.

तमारा बताती हैं कि, ''मैं उस दिन काम कर ही रही थी कि हमारी वेबसाइट फ़ेसबुक पर बंद हो गई. मैंने फ़ेसबुक मैसेंजर पर मार्को से बात करनी चाही. लेकिन उसका अपना पेज भी ब्लॉक कर दिया गया था. जब मैंने उसे फ़ोन किया तो वो बहुत सदमे में था. उसने मुझे पूछा कि क्या तुम किसी और वेबसाइट के लिए काम करना चाहोगी.''

तमारा ने ऐसा करने से मना कर दिया.

सवाल ये है कि ये फ़ेक न्यूज़ वेबसाइट चलाने वाले कौन हैं? कुछ लोगों का मानना है कि उत्तरी मैसेडोनिया में कुछ युवाओं ने ख़ुद से ही ऐसी वेबसाइट शुरू कर दी थीं. ताकि 2016 के अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के शोर में कुछ पैसे कमा सकें.

लेकिन, नए सबूतों से पता चलता है कि इनके पीछे कुछ अमरीकियों का ही हाथ था.

बज़फीड न्यूज़ के मुताबिक़ 'पेशेंट ज़ीरो' असल में उत्तरी मैसेडोनिया का एक वक़ील था. उसका असली नाम ट्रैज्चे आर्सोव था. कई अमरीकी पूंजीपति उसके साझीदार थे. इनमें रिपब्लिकन पार्टी के एक उम्मीदवार पेरिस वेड भी थे.

आर्सोव ने ही उत्तरी मैसेडोनिया से पहली फ़ेक न्यूज़ वेबसाइट यूएसएपॉलिटिक्सटुडे.कॉम को 23 सितंबर 2015 को रजिस्टर कराया था. इसका पता वील्स का ही था. इसके बाद वील्स से सैकड़ों फ़ेक न्यूज़ वेबसाइट ने अपना काम शुरू किया. ये फ़ेक न्यूज़ का कारखाना बन गया. इन वेबसाइट्स ने डोनल्ड ट्रंप के लिए माहौल बनाने का काम किया.

तमारा की कहानी से फ़ेक न्यूज़ के इस कारखाने पर बहुत रौशनी तो नहीं पड़ती. लेकिन, इससे उन युवाओं की चुनौतियों का एहसास होता है जो बेरोज़गार हैं. जिन्हें पैसों की ज़रूरत है. उनका कैसे शोषण होता है.

उत्तरी मैसेडोनिया, बाल्कन प्रायद्वीप का हिस्सा है. इस देश में अलग-अलग नस्लों के लोग आबाद हैं. कभी मार्शल टीटो ने इन्हें एकजुट किया था. लेकिन, उनके देहांत के बाद युगोस्लाविया बिखर गया. नस्लीय हिंसा ने देश के टुकड़े-टुकड़े कर डाले. अब इसी बाल्कन प्रायद्वीप का देश मैसेडोनिया, हज़ारों मील दूर अमरीका के लोगों को बांटने का काम कर रहा है.

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