अबख़ाज़िया: वो गुमनाम मुल्क जिसे भारत ने भी नहीं दी मान्यता

  • 13 जून 2019
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जब वक़्त का पहिया घूमता है तो अपने साथ सारे ज़माने को बदलता चलता है. फिर भी, कुछ लोग और कुछ जगहें ऐसी होती हैं, जो गुज़रे हुए समय की क़ैद से आज़ाद नहीं हो पाती हैं.

आज हम आप को ऐसे ही इलाक़े की सैर पर ले चलते हैं. इस जगह का नाम है अबख़ाज़िया.

आपने शायद ही इसका नाम सुना हो. और, जिन्होंने सुना होगा, वो यहां गए नहीं होंगे. ये इलाक़ा पूर्वी यूरोप में काला सागर और काकेशस पर्वतों के बीच स्थित है.

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अबख़ाज़िया ने 1990 के दशक में ख़ुद को आज़ाद मुल्क घोषित कर दिया था. लेकिन, इसे गिने-चुने देशों ने ही मान्यता दी है. तो, ये ऐसा देश है, जिसे दुनिया जानती-मानती नहीं.

1980 के दशक के आख़िर में जब सोवियत संघ बिखरना शुरू हुआ, तो अबख़ाज़िया भी जॉर्जिया से आज़ाद होने के लिए अंगड़ाई लेने लगा. जॉर्जिया, सोवियत संघ से स्वतंत्र होना चाहता था और अबख़ाज़िया उसकी पाबंदी से.

1930 के दशक से अबख़ाज़िया, सोवियत संघ के गणराज्य जॉर्जिया का हिस्सा था. लेकिन, इसे काफ़ी ख़ुदमुख़्तारी (ऑटोनोमी) हासिल थी.

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लेकिन, 1931 से पहले अबख़ाज़िया एक स्वतंत्र इलाक़ा हुआ करता था.

जब 1991 में जॉर्जिया ने सोवियत संघ से आज़ादी का ऐलान किया, तो, अबख़ाज़िया के बाशिंदों को लगा कि उनकी स्वायत्तता तो ख़त्म हो जाएगी.

तनाव बढ़ा और 1992 में गृहयुद्ध छिड़ गया. शुरुआत में तो जॉर्जिया की सेना को बढ़त हासिल हुई और उसने अबख़ाज़िया के बाग़ियों को राजधानी सुखुमी से बाहर ख़देड़ दिया.

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लेकिन, विद्रोहियों ने फिर से ताक़त जुटाकर जॉर्जिया की सेना पर तगड़ा पलटवार किया. इस लड़ाई में दसियों हज़ार लोग मारे गए.

जिसके बाद जॉर्जियाई मूल के 2 लाख से ज़्यादा लोगों को अबख़ाज़िया छोड़कर भागना पड़ा. इस काम में रूस की सेना ने भी अबख़ाज़िया के बाग़ियों की मदद की थी.

कितना स्वतंत्र है ये देश

सोवियत संघ के ज़माने में अबख़ाज़िया सैलानियों के बीच बहुत मशहूर था. हल्का गर्म और हल्का सर्द मौसम, सैर-सपाटे के बहुत मुफ़ीद माना जाता था. लेकिन, 1990 के दशक में जब से गृह युद्ध छिड़ा, ये देश सैलानियों से वीरान हो गया. जॉर्जिया की सेनाएं यहां से पीछे हट गईं. आज यहां के होटल और रेस्टोरेंट वीरान पड़े हैं.

मशहूर फ़ोटोग्राफ़र स्टेफ़ानो माज्नो ने वक़्त के दायरे में क़ैद इस देश का कई बार दौरा किया और वहां की तस्वीरें खींचीं.

स्टेफ़ानो कहते हैं, 'ये मुश्किल काम नहीं था. हालांकि अभी भी अबख़ाज़िया की सीमाओं पर रूस की सेना का क़ब्ज़ा है. तो ये नाम का स्वतंत्र देश है. हक़ीक़त में तो अबख़ाज़िया, रूस की कठपुतली है.'

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2008 में जॉर्जिया से छोटी सी जंग के बाद से रूस की सेनाओं ने अबख़ाज़िया को जॉर्जिया पर हमले के लिए इस्तेमाल करती हैं. अबख़ाज़िया और रूस के रिश्ते बेहद क़रीबी हैं. वो रूस से मिलने वाली मदद पर ही निर्भर है.

स्टेफ़ानो कहते हैं कि, 'रूस का क़ब्ज़ा केवल अबख़ाज़िया की सीमाओं पर नहीं है. रूस ने तो अबख़ाज़िया की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था पर भी क़ब्ज़ा कर रखा है. यहां के रियल स्टेट सेक्टर पर भी रूस का कंट्रोल होता जा रहा है. इससे अबख़ाज़िया को ये फ़ायदा है कि इसे रूस की मदद मिलती रहेगी.'

अबख़ाज़िया का बुनियादी ढांचा रख-रखाव की कमी के चलते बिखर रहा है. इसे केवल पांच देशों, रूस, निकारागुआ, सीरिया, नाउरू और वेनेज़ुएला से मान्यता मिली है.

टैक्सी लेना मुश्किल काम

स्टेफ़ानो बताते हैं कि यहां टैक्सी किराए पर लेना बहुत बड़ी चुनौती है. सफ़र के लिए आप को सरकारी बसों के भरोसे ही रहना होगा. इन्हीं से एहसास होगा कि आप टाइम मशीन पर सवार होकर समय में पीछे चले गए हैं.

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मज़े की बात ये है कि यहां के बस अड्डे भी सोवियत संघ के ज़माने के हैं. 1990 के दशक से चली आ रही लड़ाई की वजह से यहां मलबों के ढेर लगे हैं. अबख़ाज़िया की करेंसी रूस की रूबल है. देश की ज़्यादातर संपत्तियों पर रूस का ही क़ब्ज़ा है.

अबख़ाज़िया के पास अपनी संसद भी नहीं है. राजधानी सुखुमी में यहां की संसद की पुरानी इमारत वीरान पड़ी है. पास स्थित शहर का प्रमुख रेलवे स्टेशन भी वीरान है.

स्टेफ़ानो कहते हैं कि सरकारी इमारतों की तस्वीरें लेना यहां मुश्किल काम है. लेकिन, लोगों की तस्वीरें लेने में कोई दिक़्क़त नहीं. हाल ये है कि यहां उन तस्वीरों को डेवेलप करने की तकनीक भी उपलब्ध नहीं है.

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एक वक़्त ऐसा भी था कि हर साल क़रीब दो लाख लोग अबख़ाज़िया की सैर के लिए आते थे. ये सैलानी दुनिया भर से आते थे. लेकिन अब यहां सिर्फ़ रूस के लोग घूमने-फिरने आते हैं.

पड़ोसी देश जॉर्जिया में तो बाक़ायदा क़ानून है जिसके तहत अबख़ाज़िया जाने की मनाही है. इस देश की आबादी का एक चौथाई हिस्सा जॉर्जियाई मूल के लोग हुआ करते थे. उनके भागने के बाद से अबख़ाज़िया वीरान सा लगता है.

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