एक अच्छे पिता होने का राज़ क्या है

  • 26 जून 2019
एक अच्छे पिता होने के क्या रहस्य हैं इमेज कॉपीरइट Gabriele Galimberti/INSTITUTE

बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए मां और बाप, दोनों का अहम रोल है, लेकिन अक्सर समाज में ये ज़िम्मेदारी सिर्फ़ मां निभाती है.

भारत में तो बच्चे अक्सर पिता से ख़ौफ़ खाते हैं. पुराने ज़माने में तो पिता के घर में दाख़िल होते ही बच्चे मां के आंचल में छुप जाते थे. लड़के तो फिर भी बढ़ती उम्र के साथ अपने पिता के साथ समय बिताने लगते थे.

लेकिन लड़कियो की अपने पिता से दूरी हमेशा बनी रहती थी. वो कभी भी अपने पिता के सामने सिर नहीं उठा पाती थीं. अगर कभी बाप बच्चों के साथ समय बिताने लगता था या प्यार से बच्चे को गोद में उठा लेता था तो समाज के लोग उसके लिए जोरू का ग़ुलाम जैसे शब्द इस्तेमाल करने लगते थे.

घर के बुज़ुर्ग भी यही कहते थे कि बाप को औलाद से ज़्यादा लगाव नहीं रखना चाहिए.

हालांकि विकसित देशों में हालात ज़रा अलग थे. लेकिन वहां भी बच्चे की देख-रेख की ज़िम्मेदारी ज़्यादातर मां के ऊपर ही होती थी. कामकाजी मां-बाप भी अपनी ग़ैर मौजूदगी में बच्चे की देखभाल के लिए किसी महिला की ही मदद लेते हैं. क्योंकि ख्याल यही है कि एक औरत ही बच्चे की अच्छी देखभाल कर सकती है.

लेकिन हालिया रिसर्च बताती हैं कि बच्चे के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास में एक मर्द का रोल भी बहुत अहम होता है.

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जहां बच्चों की परवरिश का जिम्मा मर्द उठाते हैं

अभी तक बच्चे के विकास पर जितनी भी रिसर्च की गई हैं, उन सभी में सिर्फ़ मां के रोल पर ध्यान केंद्रित किया गया है. परवरिश में पिता की अहमियत के बारे में कोई तजुर्बा नहीं किया गया.

जबकि दुनिया में ऐसे बहुत से समाज हैं, जहां बच्चों की परवरिश का ज़िम्मा मर्द उठाते हैं और बच्चे हर लिहाज़ से बेहतर इंसान बनते हैं. मिसाल के लिए मध्य अफ़्रीक़ा गणराज्य के आका समाज में महिलाएं बाहर कमाने जाती हैं और मर्द घर में बच्चों की देखभाल करते हैं.

इस समाज के मर्दों को सबसे अच्छे पिता होने का ख़िताब हासिल है. जबकि यहां का समाज बराबरी के अधिकार के उसूल पर आधारित है.

1970 तक बच्चों के विकास में पिता के रोल पर बहुत कम रिसर्च हुई थी. उनके सिर्फ़ आर्थिक पहलू की अहमियत पर ही रिसर्च की जाती थी. जबकि नई रिसर्च में पिता के रोल को भी बराबर जगह दी जा रही है. जिससे पता चलता है कि बच्चे के विकास में पिता का रोल बहुत अहम है.

रिसर्चर मैरियन बेकरमैन कहती हैं कि मां और बाप, दोनों ही बच्चे के लिए ज़रूरी हैं. मनोवैज्ञानिक माइकल लैम्ब का कहना है कि बच्चे के विकास में सिर्फ पिता ही नहीं, सौतेले पिता, दादा, चाचा और ताऊ के रोल पर भी रिसर्च की गई है. जिससे पता चलता है कि नानी, दादी, चाची, मौसी या बुआ की तरह बच्चों के पालन-पोषण में उनका रोल भी अहम है.

इसराइल की रिसर्चर रुथ फ़ील्डमेन का कहना है कि बच्चे की देखभाल के समय जिस तरह के हार्मोनल बदलाव मां में होते हैं, वही पिता में भी होते हैं. जब उनका दिमाग़ स्वीकार कर लेता है कि बच्चा संभालने की ज़िम्मेदारी उन पर है, तो बच्चे के साथ उनका भी लगाव मां जैसा ही हो जाता है.

रिसर्च में देखा गया है कि जिन बच्चों की परवरिश पिता की देख-रेख में होती है आगे चलकर उन्हें समाज में अपने बर्ताव को लेकर बहुत दिक़्क़त नहीं होती. जबकि सिर्फ़ मां की देखरेख में पलने वाले बच्चे के व्यक्तित्व के बहुत से पहलू कमज़ोर रह जाते हैं. यही नहीं जिन बच्चों को अपने पिता, दादा या नाना से ज़्यादा लगाव होता है, उनका अपने अध्यापकों और दोस्तों के साथ भी संतुलित बर्ताव रहता है.

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कैसे रिश्ते स्थापित होते हैं

बच्चे की देखभाल का मां और बाप का तरीक़ा भी एक दूसरे से अलग होता है. मां, बच्चे की देखभाल, उसकी ज़रूरतों का ख्याल करके उसके साथ रिश्ता मज़बूत करती है.

जबकि पिता बच्चों के साथ खेल कर, उनके दिल की बात जानकर रिश्ता बनाता है. ज़्यादातर बच्चे एडवेंचर पसंद करते हैं. अक्सर माएं बच्चों के साथ ऐसा नहीं करतीं. बल्कि चोट लग जाने के डर से उन्हें उछल-कूद से रोकती हैं.

जबकि मर्दों की मौजूदगी में बच्चों को मनचाहा करने का मौक़ा मिल जाता है और वो बिना ख़ौफ़ अपनी मर्ज़ी चला पाते हैं. ऐसे बच्चे निडर भी ज़्यादा होते हैं.

Organisation for Economic Co-operation and Development यानि OECD देशो में बच्चा पैदा होने पर पिता के मुक़ाबले मां को ज़्यादा पेड मेटरनिटी लीव दी जाती है. ब्रिटेन जैसे देश जहां मां और पिता दोनों को बराबर छुट्टियां मिलती हैं, वहां भी बहुत ही कम, क़रीब 2 फ़ीसद जोड़े ही ये छुट्टी लेते हैं.

बच्चे हरेक काम खेल-खेल में सीखते हैं. रिसर्च में पाया गया है कि जो पिता बच्चे में समझ का विकास होने के दौर के साथ ही खेलने लगते हैं, उनका अपने बच्चों से मज़बूत रिश्ता बनता है और दूसरों बच्चों का सामना करने का साहस भी पैदा होता है.

रिसर्चर पॉल रामचंदानी कहते हैं कि बच्चे अपनी दुनिया खेल-खेल में ही तैयार करते हैं. जो पिता बच्चों को ज़्यादा समय देते हैं, उनके बच्चों में आगे चलकर समस्याओं का सामना करने का साहस पैदा हो जाता है. दो साल की उम्र में वो सभी तरह के आकार पहचानने और समझने लगते हैं. उनका मानसिक विकास तेज़ी से होता है.

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रामचंदानी का कहना है कि पिता को बच्चे के थोड़ा बड़े होने तक का इंतज़ार नहीं करना चाहिए. मां की तरह एक पिता को भी बच्चे की पैदाइश के साथ ही उसके साथ समय बिताना शुरू कर देना चाहिए.

उसे गोद में लेकर, उसकी आंखों में आंखे डालकर उससे बातें करनी चाहिए. हालांकि बच्चा ये सब नहीं समझता. लेकिन, वो पिता के साथ रिश्ता बनाने लगता है. हालांकि ज़्यादातर पिता इसी हिचक में रहते हैं कि वो जो कुछ कर रहे हैं, वो सही है भी कि नहीं.

लेकिन यही हिचक नई-नवेली मां को भी होती है. हां इतना ज़रूर है कि कुछ मर्दों को ये हुनर क़ुदरती तौर पर आता है लेकिन ज़्यादातर को ये कला सीखनी पड़ती है. आज तकनीक का ज़माना है. पिता और बच्चों के रिश्तों पर बहुत तरह के वीडियो ऑनलाइन उपलब्ध हैं.

विदेशों में तो बाक़ायदा इसके लिए क्लास चलाई जाती हैं. हालात हालांकि बदल रहे हैं. फिर भी, दुनिया भर में आज भी परवरिश की ज़िम्मेदारी बड़े पैमाने पर मां ही निभाती हैं.

अब समय आ गया है कि इस काम में मर्द भी महिलाओं के कंधे से कंधा मिलाकर चलें. ये उनके बच्चों के लिए भी बेहतर होगा.

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