आर्कटिक पर पिघलती बर्फ़ से ज़हरीली गैसों का ख़तरा

  • 28 जून 2019
आर्कटिक इमेज कॉपीरइट Alamy

जलवायु परिवर्तन की वजह से धरती गर्म हो रही है. इसके चलते ध्रुवों पर जमी बर्फ़ पिघल रही है. समंदर का स्तर बढ़ रहा है. मगर, ख़तरा सिर्फ़ इतना ही नहीं है. वैज्ञानिक कह रहे हैं कि बर्फ़ पिघलने की वजह से मानवता के लिए और भी कई ख़तरे सामने आ रहे हैं.

सू नताली ऐसी ही एक वैज्ञानिक हैं. वो एक क़िस्सा सुनाते हुए, इस ख़तरे के बारे में आगाह करती हैं.

वर्ष 2012 में जब वो रिसर्चर थीं और धरती में हमेशा बर्फ़ से ढके रहने वाले इलाक़ों यानी पर्माफ्रॉस्ट पर रिसर्च कर रही थीं, तब सू नताली रूस के डुवानी नाम के इलाक़े में गई थीं. ये साइबेरिया का बेहद बर्फ़ीला इलाक़ा है, जो हज़ारों बरस से बर्फ़ से ढंका हुआ है.

लेकिन, अब जलवायु परिवर्तन की वजह से बर्फ़ तेज़ी से पिघल रही थी. सू ने देखा कि इसके चलते ज़मीन धंस रही है और बर्फ़ में दबी नई-नई चीज़ें सामने आ रही हैं.

अब सू नताली अमरीका के द वुड्स होल रिसर्च सेंटर में वैज्ञानिक हैं. हाल ही में जब उन्होंने दोबारा साइबेरिया का दौरा किया, तो बर्फ़ इतनी तेज़ी से पिघलती देखी कि उन्हें अपनी आंखों पर यक़ीन नहीं हुआ. सू ने देखा कि वहां पर ज़मीन इतनी तेज़ी से धंस रही है कि बहुमंज़िला इमारतों के बराबर गड्ढे हो रहे हैं.

बर्फ़ पिघलने की वजह से हज़ारों साल पहले वहां दफ़न हो गए मैमथ जैसे जीवों के कंकाल सामने आ रहे हैं. ये जीव धरती पर प्लीस्टोसीन युग के दौरान रहा करते थे और अब विलुप्त हो चुके हैं.

इमेज कॉपीरइट Sue Natali

1500 अरब टन कार्बन

ये जलवायु परिवर्तन से आ रहा वो बदलाव है जो आप नंगी आंखों से देख सकते हैं. ये बेहद डरावना है.

हमेशा बर्फ़ीली रही ज़मीन अब उसके पिघलने की वजह से सामने आ रही है. उसमें हज़ारों साल से दफ़्न राज़ बाहर आ रहे हैं. और, यही है जलवायु परिवर्तन का सबसे नया ख़तरा, जिस पर वैज्ञानिकों की निगाह पड़ी है.

बर्फ़ के भीतर जंगलों के ढेर हैं. कई बीमारियों के कीटाणु हैं, जो अब उसके पिघलने की वजह से बाहर आ रहे हैं. बर्फ़ की मोटी परत के भीतर क़ैद ज़हरीली मीथेन गैस और ज़हरीला पारा भी बाहर आकर इंसान को नुक़सान पहुंचा सकता है.

वैज्ञानिकों का अंदाज़ा है कि पर्माफ्रॉस्ट यानी बर्फ़ की मोटी परत के अंदर क़रीब 1500 अरब टन कार्बन क़ैद है.

ये वातावरण में मौजूद कुल कार्बन का दोगुना है, जो हमारे जंगलों में बंद है.

कार्बन ही धरती का तापमान बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है. सू नताली कहती हैं कि साल 2100 तक धरती के हमेशा बर्फ़ीले इलाक़ों में 30 से 70 प्रतिशत बर्फ़ पिघलने का अंदेशा है. हमें इसे रोकना होगा.

अगर ऐसा नहीं हुआ तो बर्फ़ पिघलने से बड़ी तादाद में कार्बन वातावरण में मिलेगा, मीथेन गैस हवा में घुल जाएगी, जो मानवता के लिए बहुत बड़ा ख़तरा बन सकती है.

बर्फ़ पिघलने से दुनिया भर में 130 से 150 अरब टन कार्बन डाई ऑक्साइड वातावरण मे मिल जाएगी. ये उतनी ही कार्बन डाई ऑक्साइड है, जितनी अमरीका हर साल वातावरण में छोड़ता है.

इमेज कॉपीरइट Alamy
Image caption बर्फ पिघलने से मीथेन गैस का रिसाव

गर्म होने की गति दोगुनी

सू नताली इसे ऐसे समझाती हैं, 'बर्फ़ पिघलने से जितनी कार्बन डाई ऑक्साइड निकलेगी, वो अमरीका के बराबर प्रदूषण फैलाने वाले एक नए देश के अचानक सामने जैसी होगी. और दुनिया ने इसका हिसाब भी नहीं लगाया है, अब तक'.

2018-2019 में उत्तरी गोलार्ध में ध्रुवीय बर्फ़ीली आंधी का ख़ौफ़ तारी था. इस साल जनवरी में उत्तरी अमरीका के इंडियाना में तापमान माइनस 29 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया था.

लेकिन, हक़ीक़त ये है कि इस दौरान आर्कटिक की बर्फ़ ज़्यादा तेज़ी से पिघल रही थी.

पिछले साल नवंबर में जब आर्कटिक का तापमान माइनस 25 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए था, तब ये 1.2 डिग्री सेल्सियस था. यानी आर्कटिक अब दोगुनी तेज़ी से गर्म हो रहा है.

आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड नाम के एक पेपर की संपादक एमिली ऑसबॉर्न कहती हैं कि, दुनिया में बर्फ़ तेज़ी से पिघल रही है.

इससे दुनिया का रूप-रंग बिल्कुल ही बदलने की दिशा में बढ़ रहा है. हमने तो अभी इसका ठीक से आकलन भी नहीं किया है.

इमेज कॉपीरइट Alamy
Image caption परमाफ़्रोस्ट के पिघलने से साइबेरिया में एंथ्रेक्स का रिसाव शुरू होने लगा.

30 हज़ार साल पुराना वायरस

नॉर्वे के स्वालबार्ड में 1898 के बाद से पहली बार 2016 में तापमान ज़ीरो डिग्री सेल्सियस से ऊपर दर्ज किया गया था.

उत्तरी अमरीका के पर्माफ्रॉस्ट यानी हमेशा बर्फ़ से ढंके रहने वाले इलाक़े जैसे अलास्का में भी बर्फ़ तेज़ी से पिघल रही है.

अब बर्फ़ की जगह पानी नज़र आने लगा है. बर्फ़ में क़ैद मीथेन जैसी ख़तरनाक गैस वातावरण में घुल रही है.

बर्फ़ीले इलाक़ों की गर्मी बढ़ने से केवल मीथेन या कार्बन डाई ऑक्साइड ही हवा में नहीं मिल रही है. इसकी वजह से बरसों से दबे हुए बीमारियों के जीवाणु भी बाहर आ रहे हैं.

2016 में साइबेरिया में कुछ गड़रिये बीमार पड़ गए. ये अजीब बीमारी थी. लोगों ने कहा कि 1941 में यहां फैली साइबेरियन प्लेग ने दोबारा हमला बोला है.

जब इस रहस्यमय बीमारी से एक लड़का और 2500 रेंडियर की मौत हो गई, तो उस बीमारी की पहचान हुई. ये सभी एंथ्रैक्स के शिकार हुए थे.

क्योंकि वो 75 साल पहले एंथ्रैक्स से मरे एक रेंडियर के कंकाल के संपर्क में आ गए थे. ये कंकाल 75 साल से बर्फ़ में दबा था और बर्फ़ पिघलने से खुले में आ गया था.

वैज्ञानिकों को डर है कि स्पेनिश फ्लू, चेचक और प्लेग जैसी बीमारियां जिनसे इंसान छुटकारा पा चुका है, वो बर्फ़ पिघलने से दोबारा फैल सकती हैं.

2014 में फ्रांस में 30 हज़ार साल से बर्फ़ में दबे एक वायरस को दोबारा गर्म किया गया, तो वो ज़िंदा हो गया था. ये आने वाले ख़तरे की सबसे भयंकर चेतावनी है.

इस ख़तरे को 2016 में नॉर्वे में हुई एक और घटना से बल मिला. यहां पर एक डूम्सडे वॉल्ट है. यानी क़यामत के रोज़ इंसान के काम की कुछ चीज़ें बचाने वाली तिजोरी.

इमेज कॉपीरइट Alamy
Image caption 2016 में एक डूम्सडे वॉल्ट बनाया गया जहां लाखों पेड़-पौधों और फ़सलों के बीच सुरक्षित रखे गए हैं.

ध्रुवीय बर्फ़ में 16.5 लाख टन पारा

यहां पर लाखों पेड़-पौधों और फ़सलों के बीच सुरक्षित रखे गए हैं कि अगर कभी प्रलय आया, तो यहां से बीज लेकर धरती पर नए जीवन का रोपण किया जा सकेगा.

लेकिन, 2016 में यहां पानी भरने से बहुत से बीज ख़राब हो गए. इसी तरह स्वीडन में एटमी कचरे को बर्फ़ के नीचे दबा कर रखा गया है.

अगर बर्फ़ पिघली तो ये एटमी कचरा भी खुले में आ जाएगा, जिससे रेडियोएक्टिव तत्व वातावरण में मिलकर हमें नुक़सान पहुंचा सकते हैं.

पर्माफ्रॉस्ट के भीतर बहुत से राज़ हज़ारों साल से दफ़्न हैं और सुरक्षित हैं. इनके भी बाहर खुले में आकर तबाह होने का डर है. जैसे कि ग्रीनलैंड में 4 हज़ार साल पुराना एस्किमो का ठिकाना हाल ही में बह गया.

समंदर की लहरें इस तरह घूमती हैं कि आख़िर में सारा पानी आर्कटिक में पहुंचता है. इसका नतीजा ये होता है कि दुनिया भर के समंदर का कचरा आर्कटिक में जाकर जमा हो रहा है.

बड़ी तादाद में प्लास्टिक आर्कटिक में जमा हो रहा है. प्लास्टिक के महीन टुकड़े मछलियां निगल लेती हैं. फिर उन मछलियों को जब इंसान खाते हैं, तो वो हमारे पेट में पहुंच जाता है.

इसी तरह पारा भी हमारे खाने में मिल रहा है. धरती पर ज़्यादातर पारा आर्कटिक में जमा है. अमरीकी जियोलॉजिकल सर्वे के मुताबिक़ ध्रुवीय बर्फ़ में 16 लाख 56 हज़ार टन पारा दबा हुआ है. जो बाक़ी धरती पर मौजूद पारे से दोगुना है.

इमेज कॉपीरइट Alamy
Image caption परमाफ़्रोस्ट के पिछलने से अलास्का का भौगोलिक स्वरूप बदल रहा है.

बर्फ़ीले इलाक़े में रहने वाले जानवर इस पारे को अनजाने में निगल लेते हैं और फिर अगर इंसान उनके मांस को खाता है, तो वो हमारे सिस्टम में पहुंच रहा है. पारा बेहद ज़हरीला तत्व होता है.

वैसे, आर्कटिक की बर्फ़ पिघलने में कुछ लोगों को फ़ायदे भी दिख रहे हैं. वहां नए पेड़-पौधे उगेंगे, तो हरियाली का नया इलाक़ा विकसित होगा. समंदर से कारोबार के नए रास्ते खुलेंगे.

लेकिन सू नताली कहती हैं कि ये फ़ायदा, बर्फ़ पिघलने से होने वाले नुक़सान से कहीं ज़्यादा है.

बेहतर होगा कि इंसान संभल जाए और हम प्रदूषण फैलानी वाली गैसों का उत्सर्जन कम कर के धरती को गर्म होने से रोकें. इसी में हमारी बेहतरी है.

(बीबीसी फ़्यूचर पर मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर को आप फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार