जब अंतरिक्ष में बीफ़ सैंडविच छुपाकर ले गए थे एक वैज्ञानिक

  • 1 जुलाई 2019
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भारत अगले महीने चांद के लिए अपना नया यान चंद्रयान-2 भेजने वाला है. जिसका लक्ष्य चंद्रमा पर उतरने का है. आज से क़रीब पचास साल पहले यानी 1969 में इंसान ने पहली बार चांद पर क़दम रखा था. ये अमरीका का अपोलो मिशन था, जो चांद पर पहुंचा था.

इस मिशन का बीजारोपण जुलाई 1960 में किया गया था. जब तक कोई भी इंसान अंतरिक्ष में नहीं गया था और नासा का मर्करी मिशन शुरू होने में भी तीन साल बाक़ी थे.

जब नासा के स्पेशल टास्क ग्रुप ने एक ऐसा अंतरिक्ष यान विकसित करने का फ़ैसला किया, जो इंसान को धरती की परिक्रमा करने वाली कक्षा में ले जाए और उन्हें वापस भी ले आए. इसका अंतिम लक्ष्य चांद पर इंसान को पहुंचाना था.

अपोलो मिशन की शुरुआत 1961 में हुई थी. अरबों डॉलर का ये प्रोजेक्ट उस समय नासा का सबसे महत्वाकांक्षी मिशन था. इसमें हज़ारों वैज्ञानिक शामिल थे. आख़िर में 33 अंतरिक्ष यात्रियों को चुना गया कि उन्हें ट्रेनिंग देकर चांद पर भेजा जाएगा.

अगले महीने अपोलो मिशन के 50 साल पूरे हो रहे हैं. जब नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज़ एल्ड्रिन ने चांद पर क़दम रखा था. चांद पर पहुंचना आज के मुक़ाबले बहुत मुश्किल था.

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ये एक पेचीदा मिशन था, जिसके वैज्ञानिक पहलू भी थे और सामान्य मानवीय पहलू भी. जैसे, अंतरिक्ष यात्री खाना क्या खाएंगे? हाजत महसूस होने पर वो क्या करेंगे? पेशाब लगने की सूरत में उन्हें क्या करना होगा?

नासा के पहले अंतरिक्ष यात्री एलन शेपर्ड ने 1961 में उड़ान भरी थी. तब से लेकर सभी अपोलो मिशन के एस्ट्रोनॉट को उड़ान से पहले भरपूर नाश्ता दिया जाता था.

एलन शेपर्ड को पोषण और कैलोरी से भरपूर ऐसा नाश्ता दिया गया था, जिसमें फ़ाइबर कम थे. ऐसा इसलिए किया गया था, ताकि उन्हें उड़ान के दौरान मल त्याग करने की ज़रूरत न हो.

मिशन से पहले अंतरिक्ष यात्रियों को कॉफ़ी लेने से भी रोका जाता था. लेकिन, पहले ही मिशन में एक बड़ा मसला तब खड़ा हो गया, जब अंतरिक्ष यात्रियों को पेशाब लगने के सारे अनुमान ध्वस्त हो गए.

पहला मिशन केवल पंद्रह मिनट का था. डॉक्टरों ने सोचा कि इतनी देर तक तो एलन शेपर्ड का काम चल जाएगा. लेकिन, इस हिसाब-किताब में काउंटडाउन में लगने वाला समय जोड़ा ही नहीं गया. नतीजा ये हुआ कि अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद एलन को पेशाब लग गई.

उस दिन जे बारब्री, अमरीकी टीवी चैनल एनबीसी पर इस मिशन की कमेंट्री कर रहे थे. वो उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, "उन्होंने एलन शेपर्ड को रॉकेट की नोक पर कैप्सूल में बंद कर के भेज दिया था. लेकिन, एलन के पेशाब करने की कोई व्यवस्था इस मिशन में नहीं की गई थी. दो घंटे बाद वो बार-बार मिशन कंट्रोल से इसकी इजाज़त मांगने लगे. आख़िरकार नासा के यात्रियों ने उन्हें इजाज़त दे दी कि वो अपने कपड़ों को ही गीला कर लें. लेकिन, ऐसा करने के बाद उनके स्पेससूट के मेडिकल सेंसर ख़राब हो गए."

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पेशाब और मलत्याग

वहीं अपोलो मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों को पेशाब के लिए कंडोम जैसे पाउच दिए गए थे. इन्हें एक डिस्पोज़ल में डाल दिया जाता था, जो इन्हें अंतरिक्ष यान के बाहर कर देता था.

वहीं, मलत्याग के लिए प्लास्टिक के बैग दिए गए थे. हालांकि अंतरिक्ष यात्री इसे तब तक टालते रहते थे, जब तक मुमकिन हो. अंतरिक्ष में हाजत के लिए मजबूर हुए पहले अंतरिक्षयात्री अपोलो मिशन के वाल्ट कनिंघम थे.

कनिंघम बताते हैं, "अंतरिक्ष में सब कुछ ठीक-ठाक काम करे ये सुनिश्चित करना बहुत बड़ी चुनौती है. आप सब कुछ रोक सकते हैं. लेकिन एक बार आप जब अपने मल को प्लास्टिक बैग में बंद कर देते हैं, तो फिर उसमें कुछ गोलियां डालनी पड़ती हैं, ताकि बदबू न आए और वो केमिकल रिएक्शन से नष्ट हो जाए. ये बेहद ख़राब काम था."

अंतरिक्ष यात्रियों को रोज़ाना 2800 कैलोरी दी जाती थी-

अंतरिक्ष में खाना खाने वाले पहले अमरीकी थे, जॉन ग्लेन. ग्लेन, पांच घंटे के लिए अंतरिक्ष के मिशन पर गए थे. उन्होंने टूथपेस्ट जैसी ट्यूब से खाना निगला था.

ये एपल प्यूरी थी. इससे साबित हुआ था कि अंतरिक्ष में लोग खाना निगल कर पचा भी सकते हैं. ये बड़ी चुनौती थी.

क्योंकि अंतरिक्ष में भारहीनता होती है. इसलिए खाना पचेगा या नहीं? खा पाएंगे या नहीं? इन सवालों के जवाब जॉन ग्लेन के इस मिशन से मिले थे.

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खाना

1960 के दशक के मध्य में भेजे गए जेमिनी मिशन में दो अंतरिक्ष यात्री गए थे. उन्हें रोज़ 2500 कैलोरी वाला खाना दिया जाता था. ये खाना प्लास्टिक में पैक था. और इसे व्हर्लपूल नाम की घरेलू सामान बनाने वाली कंपनी ने तैयार किया था.

खाने को बनाकर, उसे फ्रीज कर के अंतरिक्ष यात्रियों को दिया जाता था. वो अंतरिक्ष में इसमें सादा पानी डालकर इसे सामान्य तापमान पर लाकर खाते थे. हालांकि खाने का ठंडापन फिर भी नहीं जाता था.

1965 में भेजे गए जेमिनी-3 मिशन के दौरान जॉन यंग नाम के वैज्ञानिक ने एक गड़बड़ी कर दी थी. वो अपने साथ एक बीफ़ सैंडविच छुपाकर अंतरिक्ष ले गए थे.

ये एक मज़ाक़ के तौर पर किया गया था, जो अंतरिक्ष में बड़ी चुनौती बन गया. वैज्ञानिकों को डर था कि कहीं ब्रेड के टुकड़े, अंतरिक्ष यान के सर्किट को न ख़राब कर दें.

अपोलो मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों के पास इतनी जगह होती थी कि वो वर्ज़िश कर सकें. इसलिए वैज्ञानिकों ने उन्हें 2800 कैलोरी वाला खाना खाने की इजाज़त दे दी थी.

अब खाना भी पहले से स्वादिष्ट था. सर्द खाने को गर्म करने के लिए पानी वाली जो बंदूकें दी जाती थीं, उनमें से गर्म पानी भी निकलता था.

यानी अब अंतरिक्ष यात्री गर्म खाना भी खा सकते थे. वो अब केवल ट्यूब से खाना निगलने को मजबूर नहीं थे. कुछ चीज़ें ऐसी भी होती थीं, जिन्हें वो चम्मच से खा सकते थे.

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पाइनएपल फ्रूट केक-

अपोलो मिशन के खान-पान वाले डिब्बे में ढेर सारा खाना रखा गया था. इसमें पाइनएपल फ्रूट केक था. ब्राउनी थीं. चॉकलेट केक और जेली वाली फ्रूट कैंडी भी थी.

अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बार्बेक्यू बीफ़ और चीज़ क्रैकर भी रखे गए थे. इसके अलावा उन्हें च्यूइंग गम के पैकेट भी दिए गए थे.

अपोलो 17 मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्री चिकेन चावल, बटरस्कॉच पुडिंग और ग्राहम क्रैकर क्यूब खा सकते थे. उसके बाद वो कॉफ़ी, चाय, कोकोआ या नींबू का जूस पी सकते थे.

अपोलो 15 मिशन से अंतरिक्ष यात्री अपने साथ पोषण वाले 'फूड स्टिक' ले जाने लगे थे. ये उनके हेल्मेट के ऊपर ही रखे होते थे, जिन्हें निकालकर वो फ़ौरन भूख मिटा सकते थे.

इसके अलावा उनके हेल्मेट में पानी पीने के लिए भी नली लगी हुई थी. यानी वो चंद्रमा पर चहलक़दमी करते हुए खाना भी खा सकते थे, और पानी भी पी सकते थे.

खान-पान की इतनी व्यवस्था के बावजूद अपोलो मिशन के हर यात्री का वज़न मिशन के बाद घटा हुआ दर्ज किया गया था.

चांद पर क़दम रखने वाले पहले इंसान नील आर्मस्ट्रॉन्ग का वज़न 4 किलो घट गया था. वहीं, अपोलो 13 के यात्री जिम लोवेल का वज़न 6 किलो कम हो गया था.

अपोलो मिशन के बाद से अंतरिक्ष यात्रियों का खाना बेहतर होता गया है. आज वो दूसरे इंसानों की तरह सामान्य तौर पर खाना खा सकते हैं.

हालांकि उन्हें ताज़े फल और सब्ज़ियां तभी मिलते हैं, जब खाने की सप्लाई लेकर कोई रॉकेट स्पेस स्टेशन जाता है.

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जब अंतरिक्ष में पी गई थी शराब-

जब अपोलो 8 मिशन अंतरिक्ष में भेजा गया था, तो चांद से लौटते वक़्त क्रिसमस का त्यौहार पड़ा. इस मौक़े पर उनके लिए साथी अंतरिक्ष यात्री डीक स्लेटन भरपूर खाना ले गए थे. टर्की का का मांस था, क्रैनबेरी सॉस था और इसे दोबारा पानी डाल कर गर्म करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ी.

मिशन के कमांडर फ्रैंक बोरमैन कहते हैं कि, "ये एक नए तरह की पैकेजिंग थी, जिसका तजुर्बा हमें पहले नहीं हुआ था. क्रिसमस पर हमने अंतरिक्ष में सबसे बढ़िया खाना खाया था."

लेकिन स्लेटन अपने साथ ब्रैंडी भी लेकर गए थे. हालांकि किसी ने ब्रैंडी इस डर से नहीं पी कि कहीं अंतरिक्ष में कोई गड़बड़ न हो जाए.

वैसे, रूसी अंतरिक्ष यात्रियों ने अंतरिक्ष में थोड़ी बहुत शराब पीने का कारनामा किया है. लेकिन, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर शराब पीने पर पाबंदी है. इसकी थोड़ी सी भी मात्रा स्पेस स्टेशन को ख़तरे में डाल सकती है.

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माइक्रोवेव का आविष्कार-

अंतरिक्ष के मिशन से मानवता को तमाम फ़ायदे हुए हैं. इनमें से एक बड़ा फ़ायदा माइक्रोवेव का आविष्कार भी है. जिसने आज दुनिया में मोटापे की महामारी को जन्म दे डाला है. लेकिन, शायद अगर अपोलो मिशन नहीं होता, तो माइक्रोवेव भी नहीं होता.

जब नील आर्मस्ट्रॉन्ग, बज़ एल्ड्रिन, और माइकल कॉलिन्स चांद से धरती पर लौटे, तो किसी बीमारी की आशंका से उन्हें पहले अमरीकी नौसेना के जहाज़ यूएसएस हॉर्नेट पर बंद कर के रखा गया था. इस दौरान उनके आराम के तो तमाम इंतज़ाम थे. लेकिन, खाना पकाने की व्यवस्था नहीं थी.

इसलिए नासा के वैज्ञानिकों ने लिटन इंडस्ट्रीज़ नाम की कंपनी से मदद मांगी. इस कंपनी ने विशाल अवन बनाए थे. लेकिन, नासा ने कहा कि उन्हें छोटे अवन की ज़रूरत है, जिसमें अंतरिक्ष यात्री अपना खाना गर्म कर सकें.

कंपनी ने जब ये अवन तैयार कर के दिया, तो सबसे पहले इसमें अंडे गर्म करने के लिए डाले गए और वो फट गए. असल में कंपनी ने अवन का आकार तो घटा दिया था, मगर उसकी पावर कम नहीं की थी. नतीजा ये हुआ कि अंडे फट गए.

हालांकि, जल्द ही इन शुरुआती चुनौतियों से पार पा लिया गया और फिर माइक्रोवेव अपने आज के रूप में ईजाद किया गया.

आज अंतरिक्ष यात्री इसमें अपना नाश्ता तैयार कर सकते हैं. खाना गर्म कर सकते हैं. आज अंतरिक्ष यात्रियों के खाने में आइसक्रीम और दूसरी बहुत सी चीज़ें होती हैं. आज अंतरिक्ष यात्री ताज़ा खाना भी खाने को पाते हैं.

अंतरिक्ष से लौटने वाले एस्ट्रोनॉट भी जांच पूरी होने तक जब कुछ दिन बंद कमरों में गुज़ारते हैं, तो उनके लिए शानदार दस्तरख़्वान सजता है.

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