चेर्नोबिल की ज़हरीली ज़मीन पर कैसे उग आए पेड़-पौधे?

  • 21 जुलाई 2019
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यूक्रेन का शहर चेर्नोबिल तबाही का दूसरा नाम है. 1986 में यहां हुए मानव इतिहास के सबसे बड़े एटमी हादसे की यादें हाल में आए एक टीवी शो की वजह से फिर ताज़ा हो गई हैं.

इस दुर्घटना की वजह से हज़ारों लोग कैंसर के शिकार हो गए. एक वक़्त बड़ी आबादी वाला इलाक़ा वीरान और भुतहे शहर में तब्दील हो गया. हादसे की वजह से चेर्नोबिल के न्यूक्लियर प्लांट के आस-पास की 2600 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर इंसानों के आने-जाने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई थी.

हाल ही में यूक्रेन की सरकार ने चेर्नोबिल के आस-पास के इलाक़े को सैलानियों के लिए खोलने का फ़ैसला किया है. इसके लिए टूरिस्ट रूट और कॉरिडोर विकसित किए जाएंगे.

यूं तो वैज्ञानिक पुराने एटमी प्लांट के आस-पास जाने को आज भी ख़तरनाक बताते हैं. लेकिन, जिस इलाक़े में जाने की मनाही है, क़ुदरत ने उसे फिर से आबाद कर दिया है.

आज उस इलाक़े में बड़ी तादाद में सुअर, भेड़िए और भालू रहते हैं. इसके अलाव घने हरे जंगल भी ख़ूब ज़ोर-शोर से पनप आए हैं.

1986 के अप्रैल में हुए हादसे के तीन साल के भीतर ही चेर्नोबिल एटमी प्लांट के आस-पास हरियाली लौट आई थी.

न्यूक्लियर हादसे की वजह से इंसान और दूसरे स्तनधारी जानवर बड़ी तादाद में मारे जाते. लेकिन, यहां के पौधों ने विकिरण का वो भयंकर हमला झेल लिया.

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Image caption परमाणु रिसाव के बाद यूक्रेन और बेलारूस के बड़े इलाक़े को ख़ाली करा लिया गया था लेकिन आज बड़ी संख्या में यहां पेड़-पौधे हैं

पौधे एटमी हादसे को कैसे झेलते हैं?

इस सवाल का जवाब देने से पहले हमें ये समझना होगा कि रेडिएशन का जीवों के शरीर पर क्या असर पड़ता है.

चेर्नोबिल के एटमी प्लांट से निकल रहा रेडियोएक्टिव तत्व अस्थिर है. क्योंकि इससे लगातार विकिरण निकल रहा है. इससे निकल रही तरंगें कोशिकाओं पर हमला करके उन्हें बर्बाद कर देती हैं.

अगर कोई कोशिका चोटिल हो जाती है, तो उसकी मरम्मत क़ुदरती तौर पर हो जाती है. लेकिन, ज़्यादा विकिरण होता है, तो वो कोशिकाओं के डीएनए पर असर डालता है.

डीएनए विकृत हो जाता है तो कोशिकाएं बहुत जल्द मर जाती हैं. हल्के रेडिएशन की वजह से कोशिकाओं की रचना में बदलाव आ जाता है. इसी वजह से कैंसर होते हैं.

जानवरों पर रेडिएशन का बहुत बुरा असर पड़ता है. क्योंकि उनके शरीर की कोशिकाएं बहुत विकसित होती हैं और अलग-अलग तरह के काम करती हैं. उन पर रेडिएशन का हमला होता है तो उनके पास बचाव के ज़्यादा साधन नहीं होते. किसी भी जानवर का शरीर एक मशीन जैसा होता है. जिसमें हर कोशिका का मशीन के पुर्ज़ों की तरह ख़ास काम होता है. जैसे किसी मशीन के पुर्ज़े आपसी ताल-मेल से चलते हुए काम निपटाते हैं, उसी तरह जानवरों के शरीर की कोशिकाएं भी अलग-अलग काम करते हुए किसी जीव को चलाती हैं. कोई भी इंसान बिना दिमाग़, दिल या फेफड़ों के जीवित नहीं रह सकता है.

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Image caption चेर्नोबिल में परमाणु रिएक्टर में धमाके के कारण 54 लोगों की मौत को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है लेकिन रेडिएशन को हज़ारों लोगों की मौत का कारण बताया जाता है

पेड़-पौधों की कोशिकाएं कैसे अलग होती हैं

जानवरों के मुक़ाबले पेड़-पौधों की कोशिकाओं का विकास अलग तरह से होता है. चूंकि पौधे अपनी जगह से हिल नहीं सकते, तो उन्हें हर मुश्किल का सामना स्थिर रहते हुए करना होता है.

बदले हुए हालात में ख़ुद में परिवर्तन लाने की क्षमता पेड़-पौधों में ज़्यादा होती है. इसीलिए परिस्थिति के मुताबिक़ पेड़-पौधे लंबे, छोटे या गहरी जड़ों वाले होते हैं. पौधों का विकास, वातावरण में मौजूद हवा, पानी, रौशनी और पोषक तत्वों के हिसाब से होता है.

जानवरों की कोशिकाओं के विपरीत, पेड़-पौधों की कोशिकाओं में अपनी मरम्मत की ज़्यादा क्षमता होती है. वो ज़रूरत के हिसाब से नई कोशिकाएं भी बना लेते हैं. इसीलिए आपने देखा होगा कि माली आराम से टहनियां काटकर नए पौधे उगा लेता है. नई टहनी से ही जड़ें निकल आती हैं.

इसका मतलब है कि पौधे अपनी मृत कोशिकाओं को जानवरों के मुक़ाबले आसानी से बदल सकते हैं. भले ही कोशिकाओं को विकिरण से नुक़सान हुआ हो या किसी जानवर के चबाने से.

रेडिएशन या किसी और तरह से जब पौधों की कोशिकाओं को क्षति पहुंचती है, तो उनमें भी ट्यूमर हो जाते हैं. कोशिकाएं मुड़-तुड़ जाती हैं. लेकिन ये ट्यूमर पौधों के शरीर के दूसरे हिस्सों में नहीं फैलते. जैसा कि जानवरों को होने वाले कैंसर के साथ होता है. क्योंकि पौधों की कोशिकाओं के बीच मोटी-मज़बूत दीवार होती है.

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Image caption चेर्नोबिल के आस-पास का इलाक़ा कई जंगली जानवरों का घर बन चुका है

रेडिएशन से बचने के तरीक़े ईजाद किए

पौधों की कोशिकाओं में पनपने वाले ट्यूमर इतने घातक नहीं होते कि वो पौधों के लिए जानलेवा बन जाएं. क्योंकि पौधे ऐसे ख़राब ऊतकों से बचने के तरीक़े जानवरों से बेहतर जानते हैं.

अपनी हिफ़ाज़त के इन बुनियादी उपायों से लैस तो पौधे होते ही हैं. लेकिन चेर्नोबिल में एटमी प्लांट के इर्द-गिर्द उग रहे पेड़-पौधों ने रेडिएशन से अपनी कोशिकाओं के डीएनए बचाने के और तरीक़े भी ईजाद कर लिए हैं.

उन्होंने अपनी बनावट में बदलाव लाकर रेडिएशन से ज़ख़्मी कोशिकाओं की मरम्मत के नए तरीक़े अपना लिए हैं.

जब धरती पर जीवन का विकास हो रहा था, तब जितना रेडिएशन था, आज चेर्नोबिल के प्लांट से उससे बहुत कम विकिरण निकल रहा है. तब भी पहले पौधों का विकास हुआ था. पौधों की कोशिकाएं उस वक़्त जिस तरह से ख़ुद को रेडिएशन से बचाती थीं, शायद आज चेर्नोबिल प्लांट के आस-पास उग रहे पौधे उसी नुस्खे पर अमल करते हुए ख़ुद को बचा रहे हैं.

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आज ज़्यादा आबाद है चेर्नोबिल

आज चेर्नोबिल के एटमी प्लांट के इर्द-गिर्द ज़िंदगी के हज़ारों रंग देखने को मिलते हैं. बहुत से पौधों और जानवरों की नस्लें यहां आबाद हैं. बल्कि इनकी तादाद 1986 में हुई न्यूक्लियर दुर्घटना के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा है.

परमाणु संयंत्र में हुई दुर्घटना के बाद जिस तरह इंसानों की जानें गईं. कई पीढ़ियों को नुक़सान हुआ, उसे देखते हुए प्लांट के आस-पास ज़िंदगियों का पुनर्जन्म चौंकाने वाला है. इसमें कोई दो राय नहीं एटमी प्लांट की वजह से जो विकिरण पैदा हुआ, उससे इंसानों के अलावा दूसरे जानवरों और पौधों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा था.

लेकिन धरती पर आज भी मौत का सामना करने से ज़्यादा ज़िंदगियां पनपने के मौक़े उपलब्ध हैं. चेर्नोबिल में ऐसा ही देखने को मिल रहा है.

अहम बात ये है कि चेर्नोबिल में परमाणु हादसे की वजह से जो नुक़सान हुआ था, उससे ज़्यादा यहां से इंसानों की विदाई से फ़ायदा हुआ है.

आज हम चेर्नोबिल के आस-पास के इलाक़े को यूरोप का सबसे विशाल क़ुदरती संरक्षित क्षेत्र कह सकते हैं. बंद पड़े एटमी प्लांट के आस-पास आज 1986 से पहले के मुक़ाबले ज़्यादा ज़िंदगियां आबाद हैं. भले ही उनकी उम्र कम हो गई हो.

चेर्नोबिल में क़ुदरत के पुनरुत्थान को देखकर ये बात साफ़ हो जाती है कि इंसानों ने पर्यावरण पर किस क़दर बोझ बढ़ा दिया है. एटमी हादसे ने यहां नुक़सान तो पहुंचाया. फिर भी इंसानों की मौजूदगी के मुक़ाबले चेर्नोबिल में विकिरण से कम ही क्षति हुई.

रेडिएशन की वजह से इंसान ने चेर्नोबिल से अपने पांव पीछे खींचे, तो मौक़ा मुफ़ीद देखकर क़ुदरत ने पूरे इलाक़े को अपने आगोश में समेट लिया है.

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