चांद पर 12 अंतरिक्षयात्रियों को भेजने के पीछे थे चार लाख लोग

  • 30 जुलाई 2019
अपोलो मिशन, चांद मिशन, चंद्रमा पर इंसान इमेज कॉपीरइट NASA

अंतरिक्ष में पहुंचने वाले पहले अमरीकी थे एलन शेपर्ड. वो अपोलो-4 मिशन के ज़रिए 5 मई 1961 को अंतरिक्ष में गए. शेपर्ड ने धरती की कक्षा में 15 मिनट 28 सेकेंड बिताए थे.

अंतरिक्ष के सफ़र के इतिहासकार और अपोलो-7 के अंतरिक्षयात्री वॉल्ट कनिंघम का कहना है कि 15 मिनट का वो सफ़र किसी भी अमरीकी के जीवन के लिए सबसे यादगार पल थे.

वॉल्ट कनिंघम अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि शेपर्ड चांद पर जाने वाले पहले शख़्स हो सकते थे. लेकिन, अंतरिक्ष जाने वाले पहले अमरीकी नागरिक बनने के बाद शेपर्ड के कान में तकलीफ़ हो गई. इस वजह से वो उन अंतरिक्षयात्रियों की सूची में शामिल नहीं किए गए, जिन्हें चांद पर भेजे जाने के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था.

हालांकि शेपर्ड चांद पर जाने को इस क़दर बेताब थे कि उन्होंने 1969 में अपने कान का ऑपरेशन कराया. इसके बाद वो मून मिशन पर जाने के योग्य हो गए. आज की तारीख़ में शेपर्ड अमरीका में सबसे बुज़ुर्ग अंतरिक्ष यात्री हैं.

शेपर्ड को अपोलो-13 की कमान सौंपी गई थी. इसमें उनके साथ जाने वाले थे एड मिशेल और स्टुअर्ट रूसा. ये दोनों ही पहले कभी अंतरिक्ष में नहीं गए थे. वो जल्द ही नौसिखिए अंतरिक्ष यात्रियों के तौर पर मशहूर हो गए.

लेकिन नासा ने उनकी और पक्की ट्रेनिंग के लिए शेपर्ड को अपोलो 13 के बजाय अपोलो 14 के लिए निर्धारित कर दिया. शेपर्ड अकेले ऐसे एस्ट्रोनॉट हैं जिनके नाम चांद की सतह पर गोल्फ़ खेलने का रिकॉर्ड दर्ज है.

चंद्रमा पर घंटों का वक़्त बिताने के लिए एस्ट्रोनॉट्स ने धरती पर सैकड़ों तरह की ट्रेनिंग की थी. नासा ने चांद का ही एक बड़ा सा मॉड्यूल तैयार किया था जिस पर अंतरिक्ष यात्रियों को उसकी सतह की तमाम बारीकियां अच्छी तरह समझाई गई थीं. इसी मॉड्यूल पर उन्हें चंद्रमा से मिट्टी और चट्टानों के नमूने लाने की ट्रेनिंग भी दी गई थी.

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उड़न चारपाई

इसी तरह, नासा ने मून मिशन के कंट्रोलर्स के लिए भी ख़ास ट्रेनिंग आयोजित की थी. इसमें शामिल वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को किसी भी अंतरिक्ष यान की ख़ूबियों और ख़ामियों के बारे में समझाया गया था.

मिशन कंट्रोलर को इस बात के लिए विशेष तौर पर तैयार किया गया था कि किसी तकनीकी ख़राबी से वो कैसे निपटें और अंतरिक्षयात्रियों की मदद कैसे करें. अपोलो मिशन के फ़्लाइट डायरेक्टर गैरी ग्रिफ़िन का कहना है कि ये ट्रेनिंग उनके लिए बहुत दिलचस्प थी.

उन्हें स्पेसक्राफ़्ट की गड़बड़ियां बताई जाती थीं और वो ठीक करने का झूठ-मूठ प्रयास करते थे. एक के बाद एक कमांड सुनकर वो कई मर्तबा झुंझला भी जाते थे. लेकिन मिशन के दौरान इसी ट्रेनिंग का उन्हें बहुत फ़ायदा मिला.

बहुत सी तब्दीलियों के बाद नील आर्मस्ट्रांग के लिए लूनर लैंडिंग रिसर्च व्हीकल (LLRV) बनाया गया था. इसे फ़्लाइंग बेडस्टेड कहा जाता था. हिंदी में हम इसे उड़न चारपाई कह सकते हैं.

इसके साथ एक बड़ा टर्बोफ़ेन इंजन जुड़ा था. नील आर्मस्ट्रॉन्ग ह्यूस्टन स्थित हवाई पट्टी परअपनी 22वीं LLRV फ़्लाइट पर थे कि अचानक मशीन बेक़ाबू हो गई. वो तुरंत अपने पैराशूट के साथ धरती पर उतर आए और सही सलामत बच गए. लेकिन चंद सेकेंड में ही LLRV टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया.

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12 यात्रियों के लिए चार लाख लोग

चांद पर 12 आदमियों को भेजने के मिशन में क़रीब चार लाख लोग शामिल थे. जिनके ज़िम्मे मिशन कंट्रोल से लेकर मुसाफ़िरों के सूट सिलने और खाने का इंतज़ाम करने की ज़िम्मेदारी थी. नासा ने इंसान को चांद पर भेजने के मिशन पर क़रीब 25 अरब डॉलर ख़र्च किए थे.

लेकिन, चंद्रमा पर पहुंचने के बाद इन अंतरिक्षयात्रियों के पास वहां कुछ घंटे बिताने भर के ऑक्सीजन और पानी थे. लेकिन, इतनी ही देर में इन एस्ट्रोनॉट ने चांद की मिट्टी, चट्टानों के टुकड़े, धूल के ज़र्रों और गुरुत्वाकर्षण का अंदाज़ा ले लिया था. ये अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी.

अपोलो-11 मिशन के दौरान नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज़ एल्ड्रिन ने दो घंटे 31 मिनट का समय चांद पर गुज़ारा था. बाद के मिशन में ये मियाद बढ़ती चली गई. अपोलो-17 के दौरान एस्ट्रोनॉट जीन सर्नन और हैरिसन श्मिट ने चांद की सतह पर क़रीब 22 घंटे का समय बिताया.

इस दौरान दोनों ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल कीं. इनकी रिसर्च के दौरान ही चांद पर नारंगी रंग की चट्टानें मिली थीं. जिनकी जांच के बाद ये साबित हुआ कि कभी चंद्रमा पर भी ज्वालामुखी सक्रिय थे. अपोलो मिशन की वजह से ही हमें पता चल सका कि चांद पर जीवन नहीं है. चंद्रमा भी उन्हीं तत्वों से बना है जिन से धरती का निर्माण हुआ है. शायद चांद और धरती का निर्माण दो खगोलीय पिंडों के आपस में टकराने से हुआ है.

आज हम धरती से चांद की सटीक दूरी जान गए हैं. हमें ये भी पता चल गया है कि चांद पर भी भूकंप आते हैं. साथ ही चांद के वातावरण का भी इंसान को बारीकी से इल्म हो गया है.

और ये सब जानकारियां इंसानों ने महज़ 80 घंटे चांद पर बिता कर हासिल की हैं. ज़रा सोचिए, अगर चांद पर इंसान के रहने का स्थायी ठिकाना यानी लूनर स्टेशन बन जाए, तो, हम और कितनी जानकारियां जुटा सकेंगे. हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते.

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तारों की चादर

अपोलो-11 मिशन के दौरान जब एडविन एल्ड्रिन और नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद की सतह पर इतिहास रच रहे थे, माइकल कोलिंस अकेले ही चंद्रमा की कक्षा का चक्कर लगा रहे थे. इसी तरह अपोलो-15 में एल वोर्डन ऑर्बिट में अकेले थे और उन्होंने चांद के चारों तरफ़ घूमते हुए 73 घंटे बिताए थे.

उनके साथ अंतरिक्षयात्री डेव स्कॉट और जिम इर्विन गए थे. वोर्डन कहते हैं जितनी देर स्कॉट और इर्विन चांद पर रहे, वो अकेले चक्कर लगाते हुए चांद के चारों तरफ़ अंतरिक्ष में देख रहे थे. उनका काम ऑर्बिट से सेंसर और कैमरों की मदद से चांद को देखना था.

लेकिन आज वो अपनी याद ताज़ा करते हुए कहते हैं कि उन्होंने अंतरिक्ष में इतने सितारे देखे कि लगा रहा था मानों तारों की चादर बिछी हुई है. हर आकाशगंगा में अनगिनत तारे हैं. और हर आकाशगंगा के बाहर न जाने कितनी और गैलेक्सी हैं. इससे पता चलता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड में धरती का वजूद कितना छोटा है.

चांद पर जाने वाले आख़िरी शख़्स थे, जीन सर्नन. जब वो अपने यान की तरफ़ लौटने लगे, तो उन्होंने जो बातें कहीं, वो नील आर्मस्ट्रॉन्ग के यादगार शब्दों, मानवता की लंबी छलांग जैसे ही गहरे थे. चांद से विदा लेते हुए जीन ने कहा था- "हम जैसे आए थे, वैसे ही वापस जा रहे हैं. ईश्वर ने चाहा तो हम फिर से संपूर्ण मानवता के लिए शांति और उम्मीद का संदेश लेकर आएंगे."

चंद दिनों बाद अपोलो-17 कमांड मॉड्यूल प्रशांत महासागर में आकर गिरा और उसी के साथ अपोलो मून मिशन की कहानी का अंत हो गया.

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फिर से चांद की यात्रा

2014 में जब सर्नन का इंटरव्यू किया गया तो वो बहुत नाराज़ थे कि इंसानियत के लिए अमरीका ने जो काम शुरू किया था वो पूरा नहीं हो पाया. इस इंटरव्यू के दो साल बाद वो खुद भी नहीं रहे.

फ़्लोरिडा के केनेडी स्पेस सेंटर से लॉन्च होने वाले सबसे बड़े रॉकेट एसएलएस को वो नहीं देख पाए. सेटर्न फ़िफ़्थ के बाद एसएलएस ऐसा पहला लॉन्चर है जो चांद पर इंसान को ले जाने की क़ुव्वत रखता है. हालांकि नासा ने 2024 तक एक बार फिर चांद पर इंसान को भेजने का प्लान बनाया है.

इसके लिए तैयार किए जाने वाले मून बेस के लिए विश्व की अन्य स्पेस एजेंसियों की मदद भी ली जाएगी. हालांकि नासा का ये भी कहना है कि ये डेडलाइन पूरी कर पाना एक मुश्किल काम है, लेकिन नामुमकिन नहीं है. और इस मर्तबा एक महिला एस्ट्रोनॉट भी मिशन में शामिल की जाएगा.

अगर नासा अपनी डेडलाइन पूरी कर लेता है तो हो सकता है अब तक चांद पर जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स में कुछ ही ऐसे ख़ुशनसीब रहें जो अपनी ज़िंदगी में किसी महिला एस्ट्रोनॉट को चांद पर जाते हुए देखेंगे.

लेकिन एक संभावना ये भी है कि चांद पर जाने वाला अगला इंसान अमरीका से ना होकर चीन से जाए. क्योंकि चीन इस दिशा में बहुत तेज़ी से काम कर रहा है. वैसे भारत के चंद्रयान-2 से भी बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां मिलने की उम्मीद है.

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