किस तरह का तेल, घी सेहत के लिए अच्छा

  • 20 अगस्त 2019
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मोटापा दुनिया भर के लोगों के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है. मोटापे से छुटकारा पाने या फिर इससे बचने के लिए कोई योग का सहारा ले रहा है. तो, कोई जिम में जाकर पसीना बहा रहा है.

जो ज़्यादा परेशान हैं वो डायटिशियन की सलाह पर तरह-तरह के डाइट प्लान अपना रहे हैं. डॉक्टर हो या जिम ट्रेनर सभी की एक सामान्य सलाह होती है कि खाने में वसा या फ़ैट की मात्रा बहुत कम कर दीजिए. क्योंकि मोटापे की असल जड़ इसी को माना जाता है.

डॉक्टर कहते हैं कि वसा की वजह से ही दिल की बीमारियां बढ़ रही हैं, क्योंकि धमनियों में चर्बी जमा हो जाने से ख़ून का प्रवाह बाधित होता है. लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि कई नई रिसर्च फैट के सेवन पर ज़ोर दे रही है.

सलाह दी जाती है कि हमें अपने खाने में संतृप्त वसा यानि सैचुरेटेड फ़ैट कम लेना चाहिए. ब्रिटेन जैसे देशों में तो इसके लिए बाक़ायदा सरकार की तरफ़ से नीति बनाई गई है. लेकिन आम लोग इस सलाह को नहीं मानते.

उन्हें लगता है अगर सैचुरेडेट फ़ैट ज़्यादा मात्रा में भी खा लिया जाए तो बुरा नहीं है. मक्खन, घी, फुल क्रीम दूध, केक, कुकीज़, नारियल तेल, ताड़ का तेल आदि में सैचुरेटेड फ़ैट की मात्रा ज़्यादा होती है. फिर भी, अगर इन्हें संतुलित मात्रा में खाया जाए तो बुरा नहीं है.

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सैचुरेटेड फ़ैट से ख़तरा

फ़िट रहने के लिए आजकल कीटो और पैलियो डाइट काफ़ी चलन में हैं. इस डाइट में फ़ैट का इस्तेमाल नहीं के बराबर होता है. लेकिन दिलचस्प बात है जो लोग इस डाइट पर अमल करते हैं, वो सरकार की तय पॉलिसी से ज़्यादा ही वसा खा जाते हैं.

अगर आपके खाने में पनीर, केक और पेस्ट्री शामिल है तो, ज़ाहिर है आप दूसरों के मुक़ाबले ज़्यादा फ़ैट खा रहे हैं और आपको इसका एहसास भी नहीं है.

ब्रिटेन के सरकारी डाइट चार्ट के मुताबिक़, मर्दों को प्रति दिन 30 ग्राम और महिलाओं को 20 ग्राम फ़ैट का सेवन करना चाहिए. लेकिन केक, पेस्ट्री कुकीज़ और मांस भोजन का मुख्य हिस्सा हैं, तो ऐसे लोग प्रतिदिन क़रीब 100 ग्राम फ़ैट खा लेते हैं.

मेडिकल साइंस कहती है कि ज़रूरत से ज़्यादा सैचुरेटेड फ़ैट खाने से धमनियों में चर्बी जमा हो जाती है. इससे दिल का दौरान पड़ने की आशंका बढ़ जाती है. लेकिन कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि दिल की बीमारियों की मुख्य वजह सैचुरेटेड फ़ैट नहीं है.

बल्कि, इसके लिए लगातार होने वाली जलन प्रमुख वजह है. इनके मुताबिक़ लो कार्बोहाइड्रेट और हाई फ़ैट वाला फ़ॉर्मूला भी कारगर नहीं है. नई रिसर्च के मुताबिक़ मोटापे और शुगर की बीमारी को फ़ैट के सेवन के बाद ज़्यादा आसानी से ठीक किया जा सकता है.

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तय मात्रा

बहुत से देशों में आम जनता के लिए स्वास्थ्य संस्थाओं ने फ़ैट खाने की मात्रा तय कर रखी है. ब्रिटेन में किसी भी शख़्स को अपने पूरे भोजन में 35 फ़ीसद ऊर्जा फ़ैट से लेने और 50 फ़ीसद ऊर्जा कार्बोहाईड्रेट से पूरी करने की सलाह दी जाती है.

सैचुरेटेड फ़ैट के मामले में ये मात्रा और भी कम है. ब्रिटेन की हेल्थ गाइडलाइंस के मुताबिक़, सैचुरेटेड फ़ैट पेय पदार्थों के ज़रिए लिया जाना चाहिए. वो भी संपूर्ण आहार में लिए जाने वाली फ़ैट का 11 फ़ीसद होना चाहिए.

जबकि अमरीका और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, ये मात्रा 10 फ़ीसद से भी कम होनी चाहिए. इनके मुताबिक़ मोटे तौर पर एक महिला को 20 ग्राम और पुरुषों को 30 ग्राम प्रति दिन लेना चाहिए. अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन तो खाने में फ़ैट का हिस्सा 5-6 फ़ीसद रखने की ही सलाह देता है.

सेचुरेटेड फ़ैट को लेकर कई तरह की रिसर्च हैं. सभी में विरोधाभास है. ऐसे में आम आदमी पसोपेश में है कि उसे क्या करना चाहिए.

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सेचुरेटेड फ़ैट का सेवन ज़्यादा

ब्रिटेन की खान-पान विशेषज्ञ लिन गार्टन कहती हैं कि आजकल लोग फ़ैट के अन्य माध्यमों को छोड़कर सेचुरेटेड फ़ैट का सेवन ज़्यादा कर रहे हैं. ये चिंता का विषय है.

अमरीका में ज़्यादातर लोग तय मात्रा में ही फ़ैट का सेवन करते हैं. लेकिन वो भी फ़ैट का ज़्यादा हिस्सा सैचुरेटेड फ़ैट से ही लेते हैं. गार्टन के मुताबिक़, ख़ून में फ़ैट की मात्रा बढ़ने के बहुत से कारण हैं.

लेकिन खाने में सेचुरेटेड फ़ैट का ज़्यादा होना भी एक बड़ी वजह है. और ये बात 1950 में हुई रिसर्च में ही साबित हो चुकी है. नई रिसर्च में भले ही विरोधाभास हैं.

लेकिन ज़्यादातर रिसर्च एक ही बात पर मुहर लगाती हैं कि लो डेंसिटी लिपोप्रोटीन यानी बैड कॉलेस्ट्रॉल दिल की बीमारियों का मुख्य कारण है.

देखा गया है कि बहुत से लोग जो तय मात्रा से भी कम सैचुरेटेड फ़ैट खाते हैं उन्हें भी दिल की बीमारियां हो जाती हैं.

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सेचुरेटेड फ़ैट का विकल्प

बहरहाल सेचुरेटेड फ़ैट इतनी बुरी चीज़ भी नहीं जितना कि उसे समझा जाता है. अगर कुछ अन्य चीज़ों में कटौती करके इसे उचित मात्रा में लिया जाए तो बुरा नहीं है.

लेकिन, कोशिश की जानी चाहिए कि इसकी जगह कुछ अन्य तरह के फ़ैट खाने में शामिल किए जाए.

पॉलीअनसैचुरेटेड फ़ैट या मोनोअनसैचुरेटेड फ़ैट इसका विकल्प हो सकते हैं.

यानी सूरजमुखी का तेल, मेवे और कई तरह के बीज, ज़ैतून का तेल, सफ़ेद सरसों का तेल इस्तेमाल करके वसा की ज़रूरत पूरी की जा सकती है.

इनके इस्तेमाल से दिल की बीमारियों से मौत की संभावना 19 और 11 फ़ीसद कम हो जाती है.

इसके अलावा मोटे अनाज के कार्बोहाईड्रेट से भी इस कमी को पूरा किया जा सकता है.

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शुगर

बहुत से लोग चीनी और स्टार्च को सैचुरेटेड फ़ैट के विकल्प के तौर पर देखते हैं जोकि सरासर ग़लत है.

बहुत सी फ़ूड कंपनियां भी कम फ़ैट के नाम पर जो सामान बेचती हैं, उनमें भी शुगर की मात्रा ज़्यादा होती है और वो दिल की सेहत के लिए अच्छी नहीं है.

इसके अलावा साइट्रिक एसिड से मिलने वाला सैचुरेटेड फ़ैट भी बुरा नहीं है.

कुछ रिसर्चर्स का तो ये भी कहना है कि डेयरी प्रोडक्ट को कॉलेस्ट्रॉल का कारक मानना ग़लत है.

बल्कि रिसर्च से पता चलता है कि जो लोग दूध, दही का इस्तेमाल ज़्यादा करते हैं उनकी सेहत ज़्यादा ठीक रहती है.

क्योंकि पनीर, दूध दही में कैल्शियम और खनिज की मात्रा ज़्यादा होती है, जो कि ब्लड प्रेशर संतुलित रखने में सहायक हैं.

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संतुलित भोजन

सवाल ये है कि आज हमें खाने के लिए इतना सोचना पड़ रहा है, जबकि हमारी दादी और नानी ख़ूब, घी, तेल खाकर भी सौ साल से ज़्यादा की ज़िंदगी जी लेती थीं. आख़िर कैसे?

जवाब एकदम साफ़ है. वो लोग आज जितने ख़राब वातावरण में सांस नहीं लेती थीं. वो लोग समय से खाते और सोते थे. आज हमारी ज़िंदगी जीने का ढंग ही बदल गया है.

जिसका असर हमारे खाने से लेकर सोने-जागने और उठने-बैठने पर भी पड़ रहा है.

तंदुरुस्त रहने के लिए बहुत ज़्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं है. जो भी खाइए संतुलित खाइए. जहां तक हो फास्ट फूड जैसे पिज़्ज़ा, बर्गर, पेस्ट्री, कोल्ड ड्रिंक आदि से दूर रहिए.

अलग-अलग पोषक तत्वों पर ध्यान देने से बेहतर है संतुलित आहार पर ध्यान देना और नियमित रूप से व्यायाम करना.

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