धरती का फ़्रीजर कहा जाने वाला आर्कटिक इलाक़ा क्यों सुलग रहा है?

  • 7 सितंबर 2019
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धरती का फ़्रीजर कहा जाने वाला आर्कटिक इलाक़ा बड़ी तेज़ी से अपनी पहचान खो रहा है. ये हमारी आंखों के सामने देखते-देखते बदल रहा है. पेड़ों की लंबी क़तारें घटती जा रही हैं. ध्रुवीय इलाक़ों में पाये जाने वाले भालू भूख से मर रहे हैं और जान बचाने के लिए शहरों का रुख़ कर रहे हैं.

आज आर्कटिक इलाक़ा धरती के बाक़ी हिस्सों के मुक़ाबले पहले से दोगुनी रफ़्तार से गर्म हो रहा है. इसकी वजह है यहां पड़ने वाली सूरज की रौशनी. पहले इस इलाक़े में बर्फ़ ही बर्फ़ थी, जिससे सूरज की किरणें रिफ्लेक्ट हो जाती थीं, यानी वापस वायुमंडल की तरफ़ मुड़ जाती थीं. लेकिन, बर्फ़ पिघलने की वजह से यहां समंदर का दायरा बढ़ गया है, जिसका पानी सूरज की गर्मी को सोख लेता है. इससे आर्कटिक में गर्मी तेज़ी से बढ़ रही है.

और, चिंता की बात ये है कि आर्कटिक से सिर्फ़ बर्फ़ ही नहीं ग़ायब हो रही है. जलवायु परिवर्तन की वजह से यहां के जंगलों में भयंकर आग लग रही है. यहां तक कि बर्फ़ में भी आग लग जा रही है.

साइबेरिया के विशाल जंगल लगातार तीन महीने तक जलते रहे थे. इससे धुएं और राख का इतना बड़ा ग़ुबार उठा था जितना बड़ा इलाक़ा पूरा यूरोपीय यूनियन है. 40 लाख हेक्टेयर टैगा के जंगल शोलों में तब्दील हो गए थे.

रूस को आग बुझाने के लिए अपनी सेना को लगाना पड़ा था. इस आग से उठे धुएं की वजह से अमरीका के अलास्का तक में लोगों की सांसें घुटने लगी थीं. ऐसी ही आग ग्रीनलैंड, अलास्का और कनाडा में भी देखी गई.

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इलाक़े का बढ़ता तापमान

हालांकि बहुत से लोगों के लिए जलते हुए आर्कटिक की तस्वीरें सदमा देने वाली हो सकती हैं. लेकिन अमरीका के पर्यावरणविद् फिलिप हिगुएरा को इन्हें देख कर कोई हैरानी नहीं. मोंटाना यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले फिलिप, आर्कटिक का अध्ययन पिछले 20 वर्षों से कर रहे हैं.

वो कहते हैं कि, 'मुझे ज़रा भी हैरानी नहीं हुई. मैं तो ख़ुद ही पिछले दो दशकों से ये कह रहा हूं कि ऐसा होने वाला है.'

फिलिप और उनकी टीम ने 2016 में ही भविष्यवाणी की थी कि ग्रीनलैंड, कनाडा और साइबेरिया के आर्कटिक इलाक़ों में आग लगने की तादाद वर्ष 2100 तक चार गुना बढ़ जाएगी.

फिलिप के मुताबिक़, इसकी बड़ी वजह जुलाई महीने में आर्कटिक इलाक़े का बढ़ता तापमान है. यहां जुलाई महीने का औसत तापमान पिछले 30 वर्षों से 13.4 डिग्री सेल्सियस रह रहा है.

1971 से वर्ष 2000 के बीच इतना तापमान रहने से साफ़ है कि आर्कटिक इलाक़ा जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा शिकार हो रहा है. फिलिप कहते हैं कि धरती के बढ़ते तापमान का सबसे बुरा असर आने वाले दिनों में और भी दिखने वाला है.

फिलिप बताते हैं कि अगर आर्कटिक में औसत तापमान इस सीमा से ज़्यादा बढ़ता है, तो आग भड़क उठती है.

यूं तो हमारी पारिस्थितिकी में आग लगने की घटनाएं आम हैं. लेकिन, अब हम आर्कटिक में जितनी बड़ी तादाद में आग लगने की घटनाएं देख रहे हैं, वो परेशान करने वाली हैं.

फिलिप कहते हैं कि, 'आग लगने की घटनाओं की बढ़ती तादाद इस बात का संकेत हैं कि हम इंसान धरती के साथ किस कदर खिलवाड़ कर रहे हैं. जलवायु परिवर्तन की वजह से ही आर्कटिक में इतनी आग लग रही है.'

आर्कटिक में आग लगने की घटनाएं बढ़ने की वजह ये है कि बढ़ती गर्मी की वजह से ज़मीन सूख रही है. जिससे सदियों से जिन इलाक़ों में बर्फ़ जमा थी, वो पिघल रहे हैं. इन्हें पर्माफ्रॉस्ट कहते हैं. और धरती का तापमान बढ़ने की वजह से आर्कटिक में बिजली गिरने की घटनाएं भी बहुत हो रही हैं. इनसे भी बार-बार आग लग रही है.

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धीरे-धीरे सुलगता आर्कटिक

अमरीका की पर्यावरणविद् सू नटाली काफ़ी दिनों से साइबेरिया और आर्कटिक के दूसरे इलाक़ों का अध्ययन कर रही हैं. वो कहती हैं कि, 'इस साल अलास्का में गर्मियों के दौरान काम करते हुए हम ने देखा कि पूरा माहौल धुआं-धुआं और गर्म है.'

'इसकी वजह ये है कि इलाक़े में आग लगने की घटनाएं बढ़ गई हैं. आग लगने का असर वहां पर आप साफ़ देख सकते हैं. हमारी आंखों के सामने वो हिस्से धंस रहे थे, जो सदियों से पर्माफ्रॉस्ट का हिस्सा थे, यानी बर्फ़ में जमे थे.'

सू नटाली बताती हैं कि उन्होंने तो अलास्का में एक पानी वाले इलाक़े में आग लगी हुई देखी.

आग लगने की घटनाओं की वजह से उत्तरी गोलार्ध का पूरा इकोसिस्टम तबाह हो रहा है. हवा प्रदूषित हो रही है. बार-बार सूखा पड़ रहा है. नए-नए इलाक़ों में पेड़ उगते देखे जा रहे हैं, जो कभी बर्फ़ में दबे थे. इस बदलाव की वजह से इस इलाक़े में पाये जाने वाले जीवों की तादाद भी घट-बढ़ रही है.

आर्कटिक में दुनिया के कुल जंगलों का एक तिहाई हिस्सा है. इसके अलावा पर्माफ्रॉस्ट वाले इलाक़ों में हज़ारों साल से पेड़ और दूसरे जीवों के जीवाश्म दबे हैं. इनमें बहुत बड़ी मात्रा में कार्बन बंद है. अगर बर्फ़ पिघलती है और ये जीवाश्म खुले में आ जाते हैं, तो इसका बहुत बुरा असर हमारे वातावरण पर पड़ने जा रहा है.

भयंकर ठंड की वजह से यहां पर कीटाणु भी आसानी से नहीं पनपते. अगर गर्मी बढ़ी, तो जीवाश्मों में बंद कार्बन वायुमंडल में घुलने लगेगा. इससे धरती पर बहुत तेज़ी से जलवायु परिवर्तन होगा. इससे निपटना पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगा.

कनाडा के वैज्ञानिक मेरिट ट्यूरटस्की कहती हैं कि, 'उत्तरी गोलार्ध, दुनिया का विशाल रेफ़्रिजरेटर है. यहां हज़ारों साल से कार्बन बर्फ़ के भीतर बंद है. बर्फ़ पिघलने से बहुत बड़ी तबाही आ सकती है.'

आज हम उत्तरी गोलार्ध के आर्कटिक वाले हिस्सों में गीली ज़मीन को भी सुलगते देख रहे हैं. ट्यूरटस्की कहती हैं कि, 'ये पेड़ो को अपनी ज़द में लेने वाली भयंकर आग नहीं है. यहां धरती, अंदर ही अंदर धीरे-धीरे सुलग रही है. पर्माफ्रॉस्ट को पिघला रही है. इस आग को बुझाना आसान नहीं है.'

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कितना बड़ा ख़तरा

2015 के अपने रिसर्च पेपर में ट्यूरटस्की ने विस्तार से बताया है कि किस तरह ये सुगती ज़मीन, दुनिया की आब-ओ-हवा के लिए बहुत बड़ा ख़तरा है. क्योंकि ये लंबे समय तक सुलगती रहती है, तो ये ज़्यादा नुक़सान पहुंचाती है. ऊपर की बर्फ़ पिघलाकर ये सुलगती आग ज़्यादा कार्बन को हवा में छोड़ती है.

इस आग को विमान से पानी डाल कर नहीं बुझाया जा सकता. बारिश से भी ये सुलगती ज़मीन नहीं ठंडी पड़ती. इसके लिए भारी बारिश लंबे समय तक होने की शर्त है. और ऐसा होता है तो बिजली भी गिरती है, जिससे ये आग और धधकने लगती है.

ग्रीनलैंड के विशाल इलाक़े के जंगल सदियों से धरती के कार्बन को सोखते आए हैं. लेकिन अब इन में आग लगने की घटनाओं से ये कार्बन वातावरण में मिल रहा है. मतलब ये कि आर्कटिक के जो जंगल कभी धरती को गर्म होने से बचाते थे, वो अब इसे तेज़ी से बढ़ा रहे हैं.

अलास्का के जंगलों को बचाने की मुहिम से जुड़ी कार्ली फ़िलिप्स कहती हैं कि 'जिस तरह आर्कटिक में कीचड़ और दलदल में भी आग सुलग रही है, उससे लोगों को ये समझने का बेहतर मौक़ा है कि आख़िर आर्कटिक में इतनी आग क्यों लग रही है.'

ज़मीन के भीतर सुलग रही ये आग ठंड में भी ठंडी नहीं पड़ती. बसंत आते ही ये कई जगह फूट पड़ती हैं. यानी ये ऐसी आग है, जो न ज़िंदा है, मुर्दा. ये बस भूत की तरह कहीं भी दिखाई दे जाती है.

सू नटाली और उनकी टीम ने 2012 से 2016 के बीच साइबेरिया में आग के शिकार इलाक़ों में नए पौधे लगाए थे. उन्होंने देखा कि जंगल की आग से तबाह साइबेरिया के बेहद सर्द इलाक़ों में नए पौधे उग रहे थे. साफ़ है कि आग की वजह से तबाह आर्कटिक के कई हिस्सों में पौधों की नई नस्लें पनप सकती हैं.

मतलब ये हुआ कि आर्कटिक की रंगत जल्द ही बदल सकती है. वहां पर नुकीले पेड़ों की जगह पत्तेदार घने पेड़ उग सकते हैं, जो अभी आर्कटिक के बर्फ़ीले इलाक़े में नहीं पाये जाते हैं. ग्रीनलैंड और अलास्का के बोरियल जंगलों का रंग-रूप भी बदलता साफ़ दिख रहा है.

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क्या हो उपाय

आर्कटिक और ग्रीनलैंड-अलास्का में आ रहे इस बदलाव का असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा. यूरोपीय संघ के फॉरेस्ट फायर इन्फॉरमेशन सिस्टम के मार्क पैरिंगटन कहते हैं कि, 'आर्कटिक की आग पूरी दुनिया का सिरदर्द है. क्योंकि, एक इलाक़े की आग दुनिया के दूसरे हिस्सों की हवा को प्रदूषित करती है.'

मार्क पैरिंगटन की टीम ने देखा है कि अलास्का में लगी आग का धुआं, अमरीका और कनाडा के बीच स्थित ग्रेट लेक एरिया तक असर डाल रहा था. कनाडा के अल्बर्टा में लगी आग का असर यूरोप में भी दिखा था.

मार्क पैरिंगटन कहते हैं कि हमें इस बात का पता लगाना होगा कि आर्कटिक में लगने वाली आग से पैदा राख और धुएं के कण कहां गिरते हैं. इससे ही हम आर्कटिक की आग के दुनिया की आब-ओ-हवा पर असर का ठीक-ठीक पता लगा सकेंगे. अगर ये राख और धूल के कण बर्फ़ में गिरते हैं, तो इससे बर्फ़ सूरज की गर्मी ज़्यादा सोखेगी. इससे जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार तेज़ होगी.

जानकार कहते हैं कि अभी इंसान में इतनी कुव्वत नहीं है कि वो आर्कटिक के बड़े-बड़े इलाक़ों में लगने वाली भयंकर आग पर क़ाबू पा सके. हिगुएरा सवाल उठाते हैं कि, 'क्या हम किसी समुद्री तूफ़ान को रोक सकते हैं?'

वहीं, टयूर्टस्की का कहना है कि पैसे जुटाकर आग बुझाने का फ़ॉर्मूला यहां काम नहीं आने वाला. अच्छा होगा कि हम जलवायु परिवर्तन की रफ़्तार कम करने की सोचें. और इसके लिए तमाम देशों के पास 10 या 15 साल का समय नहीं है.

इसके लिए ज़रूरी क़दम अभी ही उठाना होगा.

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