कितनी फ़ायदेमंद है स्टेम सेल थेरेपी

  • 10 सितंबर 2019
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मेडिकल साइंस का दावा है कि डिमेंशिया, ऑटिज़म, मल्टिपल स्क्लेरोसिस और सेरेब्रल पालसी जैसी बीमारियों का इलाज अब स्टेम सेल थेरेपी से संभव है. लेकिन, ये एक महंगा इलाज है, जिसका ख़र्च एक आम इंसान के बस की बात नहीं.

लिहाज़ा बहुत से लोग चंदा इकट्ठा करके अपना इलाज कराते हैं. इसके लिए क्राउड फंड रेज़िंग की मुहिम आजकल काफ़ी चलन में है. इस मुहिम के तहत मरीज़ ना सिर्फ़ पैसा जुटा लेता है, बल्कि उसे अंग दान करने वाला डोनर भी मिल जाता है.

लेकिन, आंकड़े बताते हैं कि स्टेम सेल थेरेपी इतनी कारगर नहीं है, जितना इसके बारे में दावा किया जाता है. कहीं ऐसा तो नहीं इस थेरेपी के नाम पर मरीज़ और डोनर दोनों को गुमराह किया जा रहा है.

चलिए सबसे पहले आपको बताते हैं स्टेम सेल आखिर क्या होते हैं? स्टेम कोशिका या मूल कोशिका ऐसी कोशिकाएं होती हैं, जिनमें शरीर के किसी भी अंग को विकसित करने की क्षमता होती है. इसके साथ ही ये शरीर की दूसरी कोशिका के रूप में भी ख़ुद को ढाल सकती हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार इन कोशिकाओं को शरीर की किसी भी कोशिका की मरम्मत के लिए प्रयोग किया जा सकता है. कोशिकाओं की बीमारियों के इलाज के लिए इन्हें लैब में भी विकसित किया जा सकता है.

अभी तक दो तरह की स्टेम कोशिकाओं पर ही रिसर्च की जा रही है. एम्ब्रयोनिक या भ्रूण कोशिका और अडल्ट. भ्रूण स्टेम कोशिका उसी समय निकाल ली जाती है, जब बच्चा पेट में बन रहा होता है. लेकिन इसे अनैतिक माना जा रहा है. जबकि वयस्क स्टेम कोशिकाओं से ख़ास तरह की कोशिकाएं ही विकसित की जा सकती हैं और इनकी संख्या बहुत कम होती है.

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ब्लड कैंसर, लिम्फ़ोमा, मेलोमा जैसे कैंसर के इलाज के लिए स्टेम कोशिका थेरेपी पहले से ही अमल में लाई जा चुकी है. लिम्फ़ोमा यानी ऐसा कैंसर जो बीमारियों से लड़ने वाली कोशिकाओं को ख़त्म करता है, मेलोमा यानि ऐसा ब्लड कैंसर जिसमें प्लाज़्मा कोशिकाएं बढ़ जाती हैं.

उम्मीद की जा रही है कि स्टेम सेल थेरेपी से और भी कई तरह की बीमारियां ठीक की जा सकेंगी. इसके लिए बड़े पैमाने पर रिसर्च जारी है और बहुत से देशों में ये थेरेपी शुरू भी की जा चुकी है. लेकिन, जहां कहीं भी ये थेरेपी कराई जाती है, वहां पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है. लिहाज़ा इलाज के लिए चंदे का सहारा लिया जाता है और थेरेपी करने वाली क्लिनिक भी इस तरह की मुहिम को बढ़ावा देती हैं.

अमेरिकन मेडिकल असोसिएशन के एक जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ अमरीका में स्टेम सेल इलाज के लिए 408 मुहिम चलाई गईं, जिसके तहत 7 लाख अमरीकी डॉलर का फंड जमा किया गया और क़रीब 13 हज़ार 50 डोनर सामने आए.

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थेरेपी के ख़तरे

इस तरह की थेरेपी में कई तरह के ख़तरे भी शामिल रहते हैं. लेकिन, पैसा जुटाने की मुहिम चलाने के दौरान इन ख़तरों के बारे में नहीं बताया जाता. अमरीका में भी जो 408 मुहिम चलाई गईं, उनमें सिर्फ़ 26 में ही ख़तरे का ज़िक्र किया गया.

मिसाल के लिए 2017 में डोरिस टेलर नाम की 77 साल की म्यूज़िक टीचर ने गो फंड मी मुहिम के तहत इलाज के लिए पैसा इकट्ठा किया और जॉर्जिया में स्टेम सेल थेरेपी कराई. उन्हें उम्र बढ़ने की वजह से मांसपेशियों के क्षरण की बीमारी यानी एआरएमडी (ARMD) की दिक्क़त थी.

इलाज से पहले वो मोटे अक्षरों वाली किताबें पढ़ने में सक्षम थीं, चलना फिरना भी हो जाता था लेकिन थेरेपी के बाद उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह ख़त्म हो गई. 2015 में फ्लोरिडा में भी थेरेपी के बाद ऐसे ही तीन केस सामने आए. इसी तरह स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के बाद 9 साल के एक बच्चे को रीढ़ की हड्डी और ब्रेन में ट्यूमर हो गए. पता चला कि जिन दानदाताओं से कोशिकाएं ली गई थीं उनमें से दो को रीढ़ की हड्डी में ट्यूमर थे.

ज़्यादा पैसा जमा करने के लिए कई बार चंदा मुहिम के दौरान स्टेम सेल थेरेपी के फ़ायदे बढ़ा-चढ़ा कर बताए जाते हैं. कई बार इसका असर होता भी है. मिसाल के लिए एक बच्चे को ऑटिज़म के इलाज के लिए पनामा भेजना था. इसके लिए चंदा मुहिम के ज़रिए 18 हज़ार अमरीकी डॉलर का चंदा जमा किया गया जबकि ज़रूरत सिर्फ़ 15 हज़ार डॉलर की थी.

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गुमराह हो रहे लोग

कुछ जानकारों का कहना है कि स्टेम सेल थेरेपी के फ़ायदों और उसके लिए चलाई जाने वाली मुहिम के नाम पर लोगों को गुमराह किया जा रहा है. इनके मुताबिक़ स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से किया जाने वाला इलाज पूरी तरह प्रभावशाली नहीं है. बल्कि वो इस क्षेत्र में की जाने वाली रिसर्च को ही अधूरी मानते हैं.

इसी तरह एम्योट्रोफ़िक लैटेरल स्कलेरोसिस (ALS) नाम की मोटर न्यूरॉन बीमारी में स्टेम सेल ट्रांसप्लांट एक चुनौतीपूर्ण काम है. क्योंकि ट्रांसप्लांट के बाद नई कोशिकाएं उन कोशिकाओं को और ज़्यादा नुक़सान पहुंचा सकती हैं जो अपनी मौत खुद ही मर रही होती हैं. इसीलिए अभी मोटर न्यूरॉन का लैब मॉडल तैयार किया जा रहा है, जिस पर दवाओं का परीक्षण करके सही नतीजे पर पहुंचने की कोशिश की जा रही है.

कई बार बेबुनियाद प्रचार करने में मीडिया भी बड़ी भूमिका अदा करती है. मिसाल के लिए 2014 में पूर्व सैनिक जेम्स दी लिटिल के हाथ में कंपकंपी होने लगी. जांच में पता चला कि उन्हें पार्किनसन्स नाम की बीमारी है.

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ये एक तरह का नर्वस सिस्टम डिस्ऑर्डर है जिसमें हाथ में कंपकंपाहट और झटके आने लगते हैं. उन्होंने यूक्रेन में साढ़े आठ हज़ार डॉलर में इसके लिए स्टेम सेल थेरेपी कराई. फिर प्रेस में अक्सर ही उस क्लीनिक के फेवर वाली खबरें छपने लगी. दावा किया जाने लगा कि उस क्लीनिक में 75 फीसद मरीज़ स्टेम थेरेपी से ठीक हो जाते हैं. जबकि जेम्स का कहना था कि उन्हें कोई फ़ायदा नहीं हुआ. बल्कि वो तो इस महंगे इलाज को एक स्कैम मानते हैं.

स्टेम सेल ट्रांसप्लांट को लेकर जिस बड़े पैमाने पर रिसर्च की जा रही है उससे ना सिर्फ़ रिसर्चरों में बल्कि मरीज़ों में भी उम्मीद जगी है. उम्मीद है कि आज नहीं तो कल ऐसा रास्ता ज़रूर निकलेगा कि अभी तक लाइलाज कही जाने वाली बीमारियां भी स्टेम सेल ट्रांसप्लांट से ठीक हो जाएंगी और इंसान की औसत आयु भी बढ़ जाएगा. लेकिन ख़तरनाक बीमारियों के नाम पर चलाई जाने वाली चंदा मुहिम पर नियंत्रण ज़रूरी है.

बहुत-सी संस्थाएं इस दिशा में काम शुरू भी कर चुकी हैं. मिसाल के लिए ब्रिटेन की क्राउडफंडिंग संस्था ट्री ऑफ़ होप का कहना है कि वो सिर्फ़ उन्हीं लोगों की मदद करते हैं जिनके पास कोई विकल्प नहीं बचता. इसके लिए भी वो अपनी मेडिकल कमेटी की सलाह लेने के बाद ही आगे क़दम बढ़ाते हैं. रिसर्च की प्रगति को देखकर उम्मीद है कि जल्द ही लोगों को मुनासिब क़ीमत पर जानलेवा बीमारियों से छुटकारा मिल जाएगा.

(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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