क्या कंप्यूटर से चलेगा इंसानी दिमाग़?

  • 12 सितंबर 2019
मस्तिष्क इमेज कॉपीरइट Getty Images

साइंस-फ़िक्शन फ़िल्में कई बार हमें भविष्य की झांकी दिखा देती हैं. 2018 में आई हॉलीवुड फ़िल्म 'अपग्रेड' ऐसी ही एक फ़िल्म थी.

इसका मुख्य किरदार ग्रे ट्रेस गर्दन में गोली लगने से लकवे का शिकार हो जाता है. ग्रे पर स्टेम नाम से एक कंप्यूटर चिप लगाई जाती है. इसकी मदद से ग्रे अपनी बात कह सकता है, ख़ुद से बातें कर सकता है. अब आगे की कहानी का अंदाज़ा आप ख़ुद लगा लीजिए.

2019 में कंप्यूटर चिप से चलने वाले इंसान की कल्पना केवल कल्पना नहीं है. इस दिशा में कोशिशें की जा रही हैं. 2012 में अमरीकी सरकार के डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स यानी डारपा (DARPA) ने जेनिफ़र कॉलिंगर नाम की बायोमेडिकल इंजीनियर को ऐसी ही रिसर्च करने का ठेका दिया है.

इसके तहत कुछ लोगों के दिमाग़ में चिप लगाए गए थे. इनमें से एक थीं 53 बरस की महिला जेन श्यूमैन. वो एक बीमारी की वजह से क्वाड्रिप्लेजिक हैं, यानी उनकी गर्दन से नीचे के अंग काम नहीं करते. जेन के दिमाग़ में चिप डालकर दो तारों से उसे एक वीडियो गेम के कंसोल जैसी स्क्रीन से जोड़ा गया है.

जेन इस दिमाग़ और कंप्यूटर के आपसी संवाद जिसे ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफ़ेस यानी बीसीआई (BCI) कहते हैं, की मदद से एक रोबोटिक बांह चला सकती हैं. अपने विचारो को व्यक्त कर सकती हैं. चॉकलेट खाने का मन हो, जेन इसकी मदद से वो खा सकती हैं. तीन साल तक चिप का इस्तेमाल करने के बाद जेन ने इसी कंप्यूटर सिमुलेटर की मदद से एक लड़ाकू जहाज़ को बेहद क़ामयाबी से उड़ाया.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

बिना सर्जरी के दिमाग़ और कंप्यूटर जुड़ जाएं

डारपा 1970 के दशक से ही ऐसे प्रयोगों में पैसा लगाता रहा है. अब वो फ़िल्म अपग्रेड को हक़ीक़त बनाना चाहता है. इसके लिए एन3 कार्यक्रम शुरू किया गया है, जिसका पूरा नाम है नेक्स्ट जेनरेशन नॉनसर्जिकल न्यूरोटेक्नोलॉजी प्रोग्राम.

इसका मक़सद ये है कि बिना दिमाग़ की सर्जरी किए हुए या उसमें कोई केबल या चिप लगाए बिना ही, दिमाग़ और कंप्यूटर का संबंध हो जाए और दोनों आपस में बात कह-सुन और समझ सकें.

एन3 कार्यक्रम के प्रबंधक हैं अल एमोंडी. उन्होंने अमरीका के 6 बड़े रिसर्च संस्थानों के वैज्ञानिकों को ऐसा हार्डवेयर विकसित करने को कहा है, जो दिमाग़ के भीतर जाए बिना ही इंसान के ख़यालात पढ़ ले.

इसके लिए किसी को चिप लगाने के बजाय उसे सिर्फ़ एक टोपी पहना दी जाए या फिर कोई हेडफ़ोन लगा दिया जाए. यही असली ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफ़ेस होगा.

एमोंडी ने वैज्ञानिकों को ऐसा हार्डवेयर विकसित करने के लिए 4 साल का समय दिया है. जिसके बाद तैयार हार्डवेयर का इंसानों पर तजुर्बा किया जाएगा.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमरीकी उद्यमी एलन मस्क भी ऐसा प्रयोग कर रहे हैं, जिसका नाम है न्यूरालिंक. हालांकि इसके तहत चिप लगाने के लिए ब्रेन सर्जरी की ज़रूरत होती है. हालांकि इसके बाद केबल से स्क्रीन को जोड़ने की ज़रूरत नहीं रह जाती है.

अल एमोंडी कहते हैं कि दुनिया बदलने के लिए एक जीवन काफ़ी नहीं है. अगर वैज्ञानिक ऐसा इंटरफ़ेस बना सके, जो बिना सर्जरी के दिमाग़ से संपर्क कर सकेगा, तो बहुत बड़ी क्रांति आएगी.

इसका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल वो लोग कर सकेंगे, जो किसी वजह से हाथ-पैर नहीं चला सकते और अपनी बात बयां नहीं कर सकते. फिर वो मशीन के ज़रिए अपने दिमाग़ में चल रही बात व्यक्त कर पाएंगे.

जॉन हॉपकिंस एप्लाइड फिजिक्स लैब के माइकल वोलमेत्ज़ कहते हैं कि, ''इंसान ने अब तक दुनिया से अपने शरीर के ज़रिए ही संवाद किया है. लेकिन, अगर वो दिमाग़ को किसी और तरीक़े से बाहरी दुनिया से बात करने लायक़ बना लेता है, तो ये बिल्कुल ही नया तजुर्बा होगा.'

अमरीकी सरकार की संस्था डारपा यूं तो रक्षा मामलों पर रिसर्च के लिए जानी जाती है. लेकिन, इसने मानवता की मदद करने के लिए बहुत सारे आविष्कार किए हैं.

इंटरनेट, ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम और सिरी जैसे वर्चुअल असिस्टेंट, डारपा की रिसर्च का ही नतीजा हैं. इसीलिए अब अगर डारपा ब्रेन-कंप्यूर इंटरफ़ेस विकसित करने में मोटी रक़म ख़र्च कर रहा है, तो इससे भी मानवता को फ़ायदा होने की उम्मीद है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

न्यूरोलॉजिकल तकनीक का बाज़ार

एलन मस्क के न्यूरालिंक के अलावा भी निजी क्षेत्र की कई कंपनियां इस तरह के रिसर्च में पैसे लगा रही हैं. इंटेल कंपनी भी इस दिशा में काम कर रही है.

इसकी वजह भी है. न्यूरोलॉजिकल तकनीक का बाज़ार वर्ष 2022 तक 13 अरब डॉलर से भी ज़्यादा होने की संभावना है.

आज हम ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफ़ेस की संभावना तलाश रहे हैं, उसके पीछे अठारहवीं सदी के वैज्ञानिकों की कोशिशें हैं. जब वैज्ञानिकों ने जानवरों के दिमाग़ की गतिविधियों को तलाशा था.

1920 के दशक में हैंस बर्जर नाम के वैज्ञानिक ने इलेक्ट्रोएनसेफैलोग्राफ यानी ईईईजी (EEEG) को ईजाद किया था. इसकी मदद से इंसान की खोपड़ी की सतह के ऊपर से उसके भीतर होने वाली इलेक्ट्रिकल गतिविधि को पकड़ा जा सकता था.

50 साल बाद कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के याक विडाल की रिसर्च के बाद वैज्ञानिकों ने दिमाग़ और कंप्यूटर के संपर्क को ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफ़ेस नाम दिया. हालांकि इसके बाद वैज्ञानिकों को कंप्यूटर की तकनीक में तरक़्क़ी का इंतज़ार करना पड़ा.

वर्ष 2004 में एक मरीज़ के दिमाग़ को पहली बार चिप के ज़रिए कंप्यूटर से जोड़ा गया था. उस व्यक्ति को गर्दन पर चाकू मारा गया था, जिसकी वजह से उसके शरीर का गर्दन से नीचे का हिस्सा निष्प्राण हो गया था. लेकिन, इस कंप्यूटर इंटरफ़ेस की मदद से वो कंप्यूटर पर खेल सकता था.

ऐसी क़ामयाबियों के बाद भी, अभी इंसान के दिमाग़ और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से लैस कंप्यूटर को बिना किसी तार या चिप के जोड़ने में कई समस्याएं हैं.

बिना खोपड़ी में छेद किए सूचनाओं का आदान-प्रदान नहीं हो सकता. अगर कोई कंप्यूटर ऐसा विकसित कर भी लिया जाए जो बिना खोपड़ी में छेद किए दिमाग़ से संपर्क कर सके, तो भी उससे इंसान का दिमाग़ सीमित रूप से ही संवाद कर सकेगा. और हो सकता है कि उसे हमारा शरीर स्वीकार ही न करे.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

बेहद कठिन चुनौत

बिना सर्जरी के कंप्यूटर और दिमाग़ तालमेल से काम करें, इसके लिए अल एमोंडी की टीम अल्ट्रासाउंड, मैग्नेटिक फील्ड, इलेक्ट्रिक फील्ड और बिजली जैसे कई माध्यमों का अध्ययन कर रहे हैं.

जिसकी मदद से दिमाग़ और कंप्यूटर एक-दूसरे से संवाद कर सकें. मसला ये भी है कि हमारे ज़हन में एक साथ सैकड़ों गतिविधियां चलती रहती हैं, उनमें से असल बात को छांटना भी मुश्किल काम है.

जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के एप्लाइड फ़िजिक्स लैब टीम के डेविड ब्लडगेट कहते हैं कि, 'आप अपने ज़हन में एक मिलीमीटर जगह को समंदर में कुछ मीटर समझिए, तो आप को अंदाज़ा होगा कि कितने विशाल ढेर में से आप को सुई तलाशनी है. फिर भी हमें यक़ीन है कि हम काम के लायक़ जानकारी निकाल सकेंगे.'

एमोंडी के निर्देशन में कुछ टीमें हल्की-फुल्की सर्जरी से दिमाग़ और कंप्यूटर को जोड़ने पर भी काम कर रही हैं. हो सकता है कि इसे गले के ज़रिए या फिर नाक के ज़रिए शरीर के भीतर डाला जाए. ऐसी कोई भी चीज़ इंसान के बाल बराबर होगी.

एक और टीम वायरस के डीएनए की मदद से कोशिकाओं के अंदर नैनोट्रांसड्यूसर यानी ट्रांसमीटर जैसी चीज़ डालने पर भी काम कर रही है.

अगर इन में से कोई तकनीक कारगर साबित होती है, तो एक मामूली सी सर्जरी की मदद से कोई चिप इंसान के शरीर में लगाने की कोशिश होगी, जो कंप्यूटर से संपर्क में रहे.

फिर अगली चुनौती होगी दिमाग़ और कंप्यूटर के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान को पलक झपकाने से कम वक़्त में पूरा करना होगा. एमोंडी कहते हैं कि ऐसी तकनीक को कंप्यूटर के माउस के क्लिक से भी कई गुना कम समय में काम पूरा करने वाला होना चाहिए.

ऐसे इंटरफ़ेस की रफ़्तार इतनी तेज़ होनी चाहिए, जो रोबोटिक आर्म के बजाय एक ड्रोन को पलक झपकते उड़ा सके.

अब अगर ऐसा हो भी जाता है, तो दिमाग़ और कंप्यूटर के संवाद की भाषा क्या होगी? शब्दों के ज़रिए या फिर तस्वीरों के माध्यम से? क्या चिप लगाने वाले इंसान दोस्त से बात कर पाएंगे या अपना फ़ोन का बिल भर पाएंगे?

वैज्ञानिक कहते हैं कि किसी भी नए इंटरफ़ेस का आदी होने में इंसान को समय लगेगा. अगर इसे सीखने का तरीक़ा पेचीदा होगा तो इसे सीखना मुश्किल होगा. इसके लिए सेमी-ऑटोमैटिक मशीन बनानी होगी, जो कंप्यूटर को सक्रिय कर सके.

एमोंडी कहते हैं कि, ''जैसे-जैसे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस बेहतर होता जाएगा, वैसे-वैसे कंप्यूटर और इंसान के ज़हन के बीच संवाद कराना आसान होगा, कोई इंसान अगर ये सोचेगा कि उसे गेंद चाहिए, तो उससे जुड़ा हुआ रोबोट जा कर गेंद ले आएगा.''

पर, अगला बड़ा सवाल ये होगा कि कौन किसके क़ाबू में रहेगा. दिमाग़ का कंट्रोल कंप्यूटर पर होगा या फिर कंप्यूटर ही दिमाग़ को चलाएगा?

इमेज कॉपीरइट Getty Images

अब तक की रिसर्च कहती है कि कंप्यूटर, दिमाग़ की गतिविधियों को मोटे तौर पर समझ लेता है. दिमाग़ के इशारों के हिसाब से रोबोट उसकी बताई दिशा में आगे बढ़ता है, या काम करता है.

तो, कंप्यूटर से संवाद करने वाले को ये नहीं सोचना होगा कि ऊपर, दाएं-बाएं या फिर नीचे. इतने इशारे कंप्यूटर दिमाग़ की गतिविधियों से समझ जाएगा.

हालांकि अभी जो ब्रेन कंप्यूटर इंटरफ़ेस हैं, उन्हें चलाने के लिए दिमाग़ को मशक़्क़त करनी पड़ती है. मगर, ये उम्मीद है कि नई तकनीक का इस्तेमाल ज़हन पर इतना भारी नहीं होगा.

दिमाग़ पर ज़ोर डालने वाली तरंगे हमारे लिए सही नहीं होतीं. ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि अगर कोई अच्छा-भला इंसान ब्रेन कंप्यूटर इंटरफ़ेस को केवल टोपी पहनकर इस्तेमाल कर सकेगा, तो क्या होगा?

ऐसा भी हो सकता है कि आगे चल कर इंसान, मशीन की मदद से ख़ुद को अपग्रेड कर सके. एलन मस्क तो अपने न्यूरालिंक को ऐसा कह कर ही बेच रहे हैं.

वोलमेत्ज़ कहते हैं कि हमारा आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस दिनों-दिन बेहतर होता जा रहा है. हो सकता है कि एक वक़्त में कंप्यूटर और इंसान में इंसान ही कमज़ोर कड़ी बन जाए. फिर ख़ुद को कंप्यूटर से मुक़ाबले के लिए इंसान को कहीं कंप्यूटर की ही ज़रूरत न पड़े.

फ़िल्म अपग्रेड में तो होता यही है कि कंप्यूटर चिप स्टेम, ग्रे पर पूरी तरह से क़ाबू पा लेती है. फिर ग्रे का दिमाग़ ऐसी सपनों की दुनिया में रहता है, जिसमें उसकी पत्नी की मौत नहीं हुई होती और न ही उसे लकवा मारने का एहसास होता है.

ये भी पढ़ेंः

(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार