बीमार हैं तो ऐसे जल्दी ठीक हो सकते हैं

  • 5 अक्तूबर 2019
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बीमार पड़ने या शरीर में कहीं चोट लगने पर अक्सर बुज़ुर्ग सोने से पहले वाले बहुत से नुस्ख़े बताते हैं. वो कहते हैं कि रात में शरीर आराम की मुद्रा में होता है लिहाज़ा बीमारी या चोट ठीक होने में आसानी रहती है. लेकिन नई रिसर्च कुछ और कहती है.

नई रिसर्च साबित करती है कि हमारे दिमाग़ ने पूरे शरीर की कोशिकाओं के काम का टाइम-टेबल बनाया हुआ है.

दिन के 24 घंटों में ये कोशिकाएं उसी टाइम-टेबल के मुताबिक़ काम करती हैं, जिसे हम 'सर्केडियन रिदम' या 'शरीर की घड़ी' (बॉडी क्लॉक) कहते हैं. इस शारीरिक घड़ी के मुताबिक़ दिन और रात में शरीर के काम करने का तरीका अलग-अलग होता है.

कैंसर से लेकर दिल की बीमारी तक, गठिया से लेकर सभी तरह की एलर्जी तक में मरीज़ को उस समय दवा दी जाती है, जिस वक़्त वो शरीर में बेहतर काम करती हैं. इन दवाओं के साइड इफ़ेक्ट कम से कम होते हैं. इससे मरीज़ को जल्द ठीक होने में मदद मिलती है.

कनाडा में कार्डियो-वैस्कुलर सेंटर के डायरेक्टर टॉमी मार्टिनो का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बीमारियों से लड़ने और उनका बोझ कम करने के लिए आज स्टेम सेल, जीन थेरेपी और आर्टिफ़िशयल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकें मौजूद हैं.

अगर सही सर्केडियन रिदम का अंदाज़ा हो जाए, तो इन के हिसाब से दी जाने वाली दवाओं से सेहत हमेशा के लिए ठीक रखी जा सकती है.

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शरीर के अंगों का 'टाइम-टेबल'

दिन के 24 घंटों में हमारा शरीर अलग-अलग समय पर अलग-अलग तरह से काम करता है. इस बात को ग्रीस के महान चिकित्सक हिप्पोक्रैट ने बहुत पहले ही समझ लिया था.

चीन के पारंपरिक चिकित्सक विज्ञान में भी इसका ज़िक्र किया गया है कि सुबह तीन से पांच बजे के दरमियान फेफड़े, सुबह 11 से दोपहर 1 बजे के दरमियान दिल और शाम 5 से 7 बजे के दरमियान गुर्दे बेहतर काम करते हैं.

शायद इसी को बुनियाद बनाते हुए आज इस दिशा में नई रिसर्च की जा रही हैं.

सर्केडियन बायोलॉजिस्ट जॉन ओ-नील की रिसर्च बताते हैं कि फ़ाइब्रोब्लास्ट नाम की कोशिकाएं चोट की वजह से ख़राब होने वाले ऊतकों को दिन के समय जल्दी ठीक करती हैं. फ़ाइब्रोब्लास्ट कोशिकाएं त्वचा की कोशिकाओं में पहुंच कर चोट की जगह तक पहुंचती हैं, और उसे ठीक करने में मदद करती हैं.

प्रोफ़ेसर ओ-नील ने इंटरनेशनल बर्न इंजरी डेटा बेस का आकलन करने के बाद रिसर्च में बताया कि जो लोग रात के समय में जल जाते हैं, उनके ज़ख़्म दिन में जलने वाले मरीज़ों के मुक़ाबले ठीक होने में 11 दिन ज़्यादा लेते हैं.

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अपने 'शरीर की घड़ी' को समझिए

इसके अलावा बीमारियों से लड़ने की शारीरिक क्षमता भी हमारे शरीर की घड़ी को प्रभावित करती है. शरीर में फैले किसी भी तरह के संक्रमण से लड़ने में इम्यून सिस्टम का मज़बूत होना ज़रूरी है.

वायरोलॉजिस्ट रशेल एडगर सर्केडियन रिदम और वायरल इंफ़ेक्शन के सम्बन्ध पर रिसर्च कर रही हैं. उन्होंने चूहे पर दाद के वायरस की रिसर्च की है.

उनका कहना है कि रात में ये वायरस 10 गुना ज़्यादा सक्रिय हो जाता है, जबकि सुबह तक इसका असर काफ़ी कम हो जाता है. ये बदलाव शायद प्रतिरोधी तंत्र के कम सक्रिय होने की वजह से होता है. संक्रमित कोशिकाओं की रिदम भी संक्रमण बढ़ाने में प्रभावी होती है.

इसी तरह के नतीजे मौसमी बुख़ार में भी देखे गए. अगर दवा दोपहर के मुक़ाबले सुबह दी जाए, तो आराम जल्दी होता है. लेकिन ये भी सच है कि दिन के समय में ही बीमार होने का अंदेशा ज़्यादा रहता है. अलग-अलग तरह के संक्रमण में एक जैसी थ्योरी भी लागू नहीं होती.

सेप्सिस की ही मिसाल लीजिए. जब हमारा शरीर किसी रोग से लड़ते हुए ओवर रिएक्शन करता है, तो उसे सेप्सिस कहते हैं. ये कोई इंजेक्शन लगाने से भी हो सकता है.

चूहों पर हुए एक प्रयोग में देखा गया है कि उन्हें अगर कीटाणुओं से लड़ने वाला इंजेक्शन रात में दिया जाए, तो उन में से 20 फ़ीसदी ही बचते हैं, बाक़ी चूहे मर जाते हैं. जबकि यही इंजेक्शन दिन के वक़्त दिया जाए, तो क़रीब 90 फ़ीसदी चूहों की जान बच जाती है.

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सही वक़्त पर दवा लें

रिसर्च के ऐसे नतीजे संक्रमण से फैलने वाली बीमारियों से लड़ने की रिसर्च को और आगे बढ़ाने में मददगार हैं.

प्रोफ़ेसर एडगर कहती हैं कि अगर ये पता हो कि किस ख़ास वक़्त में वायरस आस-पास की कोशिकाओं को प्रभावित कर रहा है, तो एंटी-वायरल थेरेपी के ज़रिए उसे फैलने से रोका जा सकता है. ऐसा करने से एंटी वायरल दवा की मात्रा भी कम की जा सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की क़रीब 250 बुनियादी और ज़रूरी दवाएं दुनिया के लगभग सभी अस्पतालों में मौजूद हैं लेकिन इन सभी को खाने का समय अलग-अलग है.

इनका असर शरीर के अंदरूनी सेल्यूलर क्लॉक से संचालित होता है. इसकी वजह से दवाओं का असर कम या ज़्यादा हो सकता है. इसमें बुनियादी पेनकिलर, ब्लड प्रेशर, अस्थमा और कैंसर की दवाएं शामिल हैं.

कुछ दवाएं ऐसी भी होती हैं, जिनकी ख़ुद बहुत कम उम्र होती है. इसका मतलब ये हुआ कि अगर उन दवाओं को बिल्कुल सही समय पर नहीं लिया गया, तो उनका असर कम हो जाता है.

मिसाल के लिए ब्लड प्रेशर की गोली, वल्सार्टन सुबह के बजाय शाम को ली जाए तो 60 फ़ीसदी तक असर करती है. इसी तरह एस्पिरिन भी शाम के समय ली जाए तो ज़्यादा असर करती है. एक अन्य रिसर्च में पाया गया है कि रेडिएशन थेरेपी का असर भी सुबह के मुक़ाबले दोपहर में ज़्यादा होता है.

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सबका शरीर एक तरह से काम नहीं करता

कौन सी दवाओं का असर कितना और किस समय ज़्यादा होगा ये पता लगाना इतना आसान नहीं है. इसकी रिसर्च पर मोटी रक़म ख़र्च करनी पड़ेगी. इसके अलावा मरीज़ सही समय पर दवाएं लेता रहे ये भी मुमकिन नहीं है. क्योंकि मरीज़ को दवाओं के पीछे का गणित नहीं समझाया जा सकता.

बहुत बार मरीज़ को ठीक होने में इसलिए भी समय लगता है, क्योंकि वो समय पर अपनी दवाएं नहीं लेते. बहुत-सी दवाएं कोर्स में चलती हैं. इनकी एक भी ख़ुराक छोड़ दी जाए तो पूरा कोर्स बेकार हो जाता है. लेकिन ये बात सभी मरीज़ समझ नहीं पाते.

हर इंसान की सर्केडियन रिदम भी अलग होती है. कुछ लोग सोने, जागने और खाने के मामले में समय की पाबंदी रखते हैं. तो, कई लोग देर रात तक जागने और सुबह देर तक सोने के आदी होते हैं.

इसके अलावा आज एक बड़ी आबादी रात की शिफ़्ट में काम करती है. जिसकी वजह से उनकी सर्केडियन रिदम बिल्कुल अलग हो जाती है इसका असर उनकी सेहत पर भी पड़ता है. फ़िलहाल किसी की अंदरूनी घड़ी की चाल जानने का कोई आसान तरीक़ा नहीं है.

इसके अलावा आज अस्पतालों की इमारतें जिस तरह बन रही हैं, वो भी मरीज़ को जल्द ठीक करने या नहीं करने के लिए ज़िम्मेदार हैं. ज़्यादातर अस्पतालों में छोटी खिड़कियां होती हैं, जिन पर दिन के समय भी पर्दे डले रहते हैं. मरीज़ ज़्यादा समय तक आर्टिफ़िशयल लाइट में रहता है. जिससे उसकी बायोलॉजिकल रिदम प्रभावित होती है.

इसके सबसे गहरे और साफ़ सबूत हमें दिल के मरीज़ों में मिलते हैं. कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम की सर्केडियन रिदम सबसे ज़्यादा मज़बूत होती है. जब हम सो रहे होते हैं, तो हमारा ब्लड प्रेशर सबसे कम होता है. लेकिन हम जैसे ही जागते हैं, हमारा ब्लड प्रेशर तेज़ी से बढ़ता है.

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रोशनी, नींद और वक़्त

दिन के समय हमारे प्लेटलेट्स और ख़ून को गाढ़ा करने वाली सेल ज़्यादा बढ़ जाती हैं. साथ ही दिल की धड़कन को बढ़ाने वाला और नसों को जकड़ने वाला हार्मोन एड्रिनेलिन दिन के समय ज़्यादा रिसता है.

अलग-अलग तरह का सर्केडियन होने की वजह से दिल का दौरा पड़ने का अंदेशा भी बढ़ जाता है. अक्सर दिल का दौरा सुबह के समय पड़ता है. इसी तरह दिल की चोट से उबरने में भी दिन और रात का समय असर डालता है.

कुछ इंटेंसिव केयर यूनिट या कार्डियक केयर यूनिट में रात के समय रोशनी धीमी कर दी जाती है, जो मरीज़ के लिए अच्छा है. वहीं इमरजेंसी यूनिट में अगर बेड नहीं होता है तो मरीज़ को सारी रात कॉरिडोर में खुली रौशनी में रहना पड़ता है. इससे मरीज़ को दिल का दौरा पड़ सकता है.

कई तरह की सर्जरी करने और उनके ठीक होने में भी दिन-रात का समय औऱ मरीज़ की शारीरिक घड़ी अहम रोल निभाते हैं. रिसर्चरों को उम्मीद है कि जल्द ही वो ऐसा माहौल तैयार कर लेंगे जहां दिल के मरीज़ों को ठीक करने में सर्केडियन गोली, रोशनी के होने या नहीं होने को ज़रूरत के मुताबिक़ इस्तेमाल कर पाएंगे.

रोशनी, नींद और समय, सेहत दुरूस्त रखने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी हैं लेकिन हम सभी इन तीनों को इस्तेमाल में नहीं लाते.

यह लेख मूल रूप से बीबीसी फ़्यूचर पर प्रकाशित हुआ था. मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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