इंसाफ़ के लिए तरसते बेज़ुबान जानवर

  • 13 अक्तूबर 2019
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जब जानवर किसी इंसान को मारे, तो कहते हैं दुनिया में वहशी उसे सारे. लेकिन जब इंसान जानवर की जान लेता है तो सारा संसार तमाशा देखता है. उसकी मौत, उसका नसीब मान लिया जाता है.

उसे कभी शौक़ के लिए, तो कभी स्वाद के लिए, तो कभी उससे पैसा कमाने के लिए मार दिया जाता है. दलील दी जाती है कि जानवर तो है ही इंसान के फ़ायदे लिए. इंसान, जानवरों का हर तरह से इस्तेमाल करता है. लेकिन कभी उसके हक़ के बारे में नहीं सोचता.

आपको जानकर हैरानी होगी कि हथियार, नशीले पदार्थ, मानव तस्करी के बाद वन्य जीव तस्करी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी इंडस्ट्री है. फिर भी वन्य जीवों से जुड़े अपराधों को संजीदगी से नहीं लिया जाता.

यूरोप में ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से जंगली जानवरों को मारने या उनकी तस्करी करने वालों को बमुश्किल ही पकड़ा जाता है. पर्यावरण की खोजी पत्रकारिता में महारत रखने वाली संस्था ऑक्सपेकर के आंकड़े बताते हैं कि कोर्ट तक पहुंचने वाले वन्य जीव अपराध के मामलों की संख्या काफ़ी कम है.

मुश्किल ये है कि ऐसे केस में अपराधी का जुर्म साबित करने के लिए ठोस सबूत की ज़रूरत होती है. जबकि जंगली जानवरों का शिकार तो दूर दराज़ होता है जहां आम लोग बहुत कम जाते हैं. ऐसे में गवाह नहीं मिल पाते.

वाइल्डलाइफ़ फ़ोरेंसिक

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चिड़ियों के शिकार के अपराध पर नज़र रखने वाली संस्था द रैप्टर परसिक्यूशन की प्रमुख निक लियॉल का कहना है कि मज़बूत फ़ोरेंसिक तकनीक इस्तेमाल करके भी शिकार का पुख्ता सबूत जुटा पाना मुश्किल होता है.

सबूतों के अभाव के चलते ही मामला कोर्ट तक नहीं पहुंच पाता. अपराध वाली जगह से बेहतर सबूत इकट्ठा करने और संदिग्धों तक पहुंचने के लिए ही वाइल्डलाइफ़ फ़ोरेंसिक विकसित किया गया है.

क़त्ल के बाद जब किसी इंसान का शव मिलता है, सबसे पहले उसकी पहचान की जाती है. वो कहां का रहने वाला है. क़त्ल की वजह क्या हो सकती है, किस ने क़त्ल किया होगा…जैसे सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की जाती है.

लेकिन वन्य जीवों की हत्या में ऐसी छानबीन नहीं होती क्योंकि मरे हुए जानवर के शरीर के कुछ ही हिस्से मिल पाते हैं और वो भी अपराध की जगह से कहीं दूर.

पशु रोग विशेषज्ञ हॉवी का कहना है कि उनका सबसे पहला काम होता है आपराधिक गतिविधि का पता लगाना. सबूत के तौर पर किसी चोट के निशान हमें मिल जाते हैं.

फिर ये पता लगाने की कोशिश की जाती है कि ये आघात पहुंचा कैसे. क्या जानवर जाल में फंसा था या उसे गोली मारी गई. इसके लिए जानवरों के सामान्य और असामान्य दोनों ही तरह के बर्ताव की गहरी समझ होनी चाहिए.

ग़ैर-क़ानूनी था या नहीं

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स्विटज़रलैंड की ज्यूरिक यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ोरेंसिक मेडिसिन की रिसर्चर नदजा मोर्फ़ का कहना है कि अन्य अपराधों की तुलना में वन्य जीव अपराध के मामले में पीड़ित की सही पहचान करना काफ़ी मुश्किल काम है. इसके लिए सटीक डीएनए की ज़रूरत होती है.

वो कहते हैं कि इतनी तरह की प्रजातियों पर काम करना पड़ता है कि जांचकर्ताओं के लिए ये पहचान करना ही मुश्किल हो जाता है कि कौन सा जानवर क्राइम स्पॉट पर ही रखा गया था और किसे कहीं दूर बचा कर रखा गया था. उसका मारा जाना ग़ैर-क़ानूनी था या नहीं ये पता लगाना भी मुश्किल हो जाता है.

मिसाल के लिए एयरपोर्ट से बुश मीट पकड़ा जाए तो जांच करने से पहले ये कोई भी एजेंसी जानना चाहती है, कि ये किस प्रजाति के हैं. इसके बाद ही तय होता है कि केस किया जाए की नहीं. अपराध स्थल से जमा किए गए ग़ैर इंसानी डीएनए का पता लगाने के लिए जानकार रिवायती तरीक़ों और तकनीक पर ही भरोसा करते हैं.

रिसर्चर जानवर के शरीर का कौन सा हिस्सा डीएनए के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, इस पर भी तकनीक में अंतर होता है. लेकिन जल्द नतीजा पाने के लिए कोशिश यही रहती है कि डीएनए सीक्वेंस उसी तरह लिया जाए, जो रेफ़रेंस डेटाबेस से मेल खा जाए.

लेकिन समस्या ये भी है कि ये डेटाबेस भी अधूरे और अविश्वसनीय हैं. वैसे तो, फोरेंसिक साइंटिस्ट जेनबैंक के डेटाबेस का ही इस्तेमाल करते हैं. लेकिन ये भी पूरी तरह विश्सनीय नहीं है क्योंकि ये फ़्री साइट है और इस पर कोई भी डेटा अपलोड कर सकता है. लिहाज़ा इसका डेटा बहुत सावधानी से इस्तेमाल करने की ज़रूरत है.

जंगली जानवरों का डेटाबेस

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कोई भी जानवर या पौधा कहां का है, ये जानना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि कुछ देशों में कुछ प्रजातियों का पूरा ब्यौरा रखा जाता है. अगर पकड़े गए सैम्पल की सही जानकारी मिल जाए तो ग़ैर क़ानूनी व्यापार के रैकेट का पता लगाना आसान हो जाता है.

लेकिन सैम्पल की सटीक पहचान करना आसान काम नहीं है. हालांकि इस संदर्भ में कई केस में कामयाबी मिली भी है. हाल ही में बाज़ की एक विशेष प्रजाति के तस्कर को पकड़ा गया है.

डब्लू डब्लू एफ़ जर्मनी के वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव तस्करी रोकने में आसानी हो सकती है अगर जंगली जानवरों की तमाम प्रजातियों का डेटाबेस तैयार कर लिया जाए.

स्थिर रेडियोएक्टिव आइसोटोप मूल्यांकन तरीक़े से सैम्पल की सही उम्र का पता लगाया जा सकता है. साथ ही फ़्री रेफ़रेंस डेटा की मदद से उसकी पहचान की जा सकती है.

बहरहाल जंगली जानवरों के शिकारियों और तस्करों को उनके अंजाम तक पहुंचाने के लिए कई तरह की तकनीक तैयार की जा रही है. उम्मीद है कि इससे जानवरों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध में कमी आएगी.

इसके साथ ही क़ानून में बदलाव की भी ज़रूरत है. ऐसे सख़्त क़ानून बनाने की ज़रूरत है जिससे अपराधी को सज़ा मिल सके.

जानवरों के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध के लिए भी ऐसे ही कानून की ज़रूरत है जैसे कि इंसान के ख़िलाफ़ होने वाले अपराध के लिए बनाए गए हैं. क़ानून के डर से ही जानवरों के साथ होने वाले अपराध को रोका जा सकता है.

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