एक साथ कितने रिश्ते निभा सकते हैं आप

  • 26 अक्तूबर 2019
डनबार

इस दुनिया में आपके कितने संबंध हैं?

रोमांटिक, रिश्तेदार, पेशेवर, निजी, दोस्ती वाले, सोशल मीडिया फ्रैंड वग़ैरह…वग़ैरह…

इनमें से आप कितने लोगों के साथ एक वक़्त में अच्छे संबंध निभा पाते हैं?

10, 20, 50, 100…

ब्रिटिश मानव विज्ञानी रॉबिन डनबार का मानना है कि हम एक वक़्त में ज़्यादा से ज़्यादा 150 संबंध निभा सकते हैं. इनमें दोस्ती-यारी और रूमानी ताल्लुक़ात से लेकर रिश्तेदार और परिवार सब शामिल हैं.

डनबार का मानना है कि हमारे दिमाग़ की बनावट ऐसी है कि हम एक समय में इससे ज़्यादा संबंध नहीं निभा सकते.

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एक बार में कितने रिश्ते नहीं निभा सकता है इंसान

डनबार ने चिंपैंजी, गोरिल्ला और बंदर जैसे जानवरों का अध्ययन करके ये नतीजा निकाला है. इसके लिए उन्होंने इन वानर प्रजाति के जीवों के सामाजिक बर्ताव और मस्तिष्क का अध्ययन किया.

डनबार का कहना है कि इंसानों के शरीर और उनके ज़हन के एक हिस्से नियोकॉर्टेक्स के अनुपात को देखें, तो पता चलता है कि कोई शख़्स कितने क़रीबी सामाजिक समूहों से जुड़ सकता है. नियोकॉर्टेक्स हमारे दिमाग़ का वो हिस्सा है, जो ज्ञान और भाषा से जुड़ा है. ये अनुपात हमारे संबंधों की संख्या तय करने में काफ़ी अहम हो जाता है.

डनबार ने तमाम मानवीय समूहों का कई बार अध्ययन किया और हर बार वो इसी नतीजे पर पहुंचे कि कोई इंसान 150 से ज़्यादा संबंध नहीं निभा सकता है.

डनबार और उनके जैसे प्रयोग करने वाले दूसरे लोगों का मानना है कि 150 की संख्या प्रागैतिहासिक मानव समूहों के साथ भी फ़िट बैठती है और, आधुनिक समुदायों के साथ भी. उन्होंने पाया है कि 11वीं सदी के इंग्लैंड के गांव हों या फिर सैन्य संगठन, या फिर कारख़ाने, हर जगह लोग इतने ही ताल्लुक़ ठीक से निभा पाते हैं.

वे कहते हैं, "लेकिन, हम ये मानकर नहीं बैठ सकते हैं कि 150 ही हमारे सभी संबंधों की सही संख्या है. कई बार आप के चार या पांच लोग ही बेहद क़रीबी होते हैं. फिर उनके अलावा कुछ अच्छे दोस्त होते हैं, जिनकी संख्या दस से पंद्रह हो सकती है. काम आने वाले संपर्कों की तादाद 150 हो सकती है."

उनका कहना है, "हमारे परिचितों की संख्या 500 हो सकती है. और ऐसे लोगों की तादाद 1500 के आस-पास हो सकती है जिन्हें हम देख कर पहचान लेते हैं. लोग अक्सर इन दायरों में रहकर रिश्ते निभाते हैं. लेकिन, इनसे ज़्यादा लोगों को अपने जीवन में लाने के लिए हमें जगह बनानी पड़ती है. कुछ लोगों को हटाना पड़ता है. तभी नए लोगों की ज़िंदगी में एंट्री हो पाती है."

यह संख्या क्या बताती है?

डनबार कहते हैं कि वो ये देखकर हैरान हैं कि ये संख्या हमेशा पांच या इसके गुणक वाली होती है.

वैसे, ये संख्या एक दायरा बताती है, जिसमें रहकर लोगों के संबंध काम करते हैं. जो बहिर्मुखी लोग होते हैं, उनके संपर्कों की संख्या ज़्यादा हो सकती है, तो संकोची स्वभाव वालों के ताल्लुक़ इससे कम हो सकते हैं. वो गिने-चुने लोगों से संबंध बनाने में यक़ीन रखते हैं. उसमें भी महिलाओं के मामले में ये देखा गया है कि उनके क़रीबी लोगों की संख्या पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा होती है.

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डनबार कहते हैं कि, "आप के क़रीबी लोगों की संख्या इस आधार पर तय होती है कि आप रोज़ कितने लोगों से मुलाक़ात करते हैं. क्योंकि आप को रोज़ ये फ़ैसला करना होता है कि आप को किसी रिश्ते में कितना निवेश करना होता है."

बहुत से लोगों ने डनबार के इस सिद्धांत को बड़ी गंभीरता से ले लिया है. मसलन, स्वीडन की टैक्स अथॉरिटी ने अपने दफ़्तरों में लोगों के काम करने की संख्या 150 तक सीमित कर दी है.

वैसे हर कोई सोशल ब्रेन के इस सिद्धांत पर यक़ीन नहीं करता है. कुछ लोगों को आशंका है कि हमारा सामाजिक बर्ताव किसी संख्या के दायरे में नहीं बांधा जा सकता है. फिर भी, इन आंकड़ों के ज़रिए हम मानव समुदाय के विकास को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं.

स्पेन की लेयोन यूनिवर्सिटी की क्रिस्टिना एसेडो कारमोना कहती हैं कि, "हमारे सामाजिक ताल्लुक़ात की संख्या सीमित करने में कई बातें अहम होती हैं. लेकिन, ऐसे रिसर्च से हमारी समझ बेहतर होती है."

अमरीका में हुई एक रिसर्च में क्या कहा गया है?

अमरीका में हुई एक रिसर्च का कहना है कि आज सोशल नेटवर्किंग के ज़माने में ज़्यादातर लोग एक वक़्त में 290 संबंध निभा रहे होते हैं. हालांकि इन में से ज़्यादातर वो लोग होते हैं, जो क़रीबी नहीं कहे जा सकते.

इन में से कुछ लोग होते हैं, जिनका दायरा बड़ा होता है, तो कुछ लोगों के लिए संबंध सीमित दायरे में होने चाहिए.

मसलन, कोई व्यक्ति अगर अमीर है, तो वो अपने बहुत से ताल्लुक़ात निभाने के लिए अस्टिटेंट रख सकता है. इसके लिए उसे जज़्बाती मेहनत करने की ज़रूरत नहीं होगी. और आज के ज़माने में तो आप जितने ज़्यादा लोगों से संबंध बना सकें, उतना ही अच्छा माना जाता है.

वैसे, कुछ वैज्ञानिक डनबार के रिसर्च पर सवाल भी उठाते हैं. ब्रिटिश और डच वैज्ञानिकों की एक टीम का कहना है कि हमारे ज़हन का नियोकॉर्टेक्स भले ही सीमित हो. लेकिन, अलग-अलग हालात में हम अपने सामाजिक संबंधों की सीमा बढ़ा सकते हैं. जैसे कि, जमैका के ग़रीब लोग फ़ोन के ज़रिए बहुत से संपर्क और संबंध बना लेते हैं. इनकी संख्या 150 से ज़्यादा ही होती है.

जिन लोगों के पास पूंजी नहीं होती, वो संबंधों की पूंजी की मदद से आगे बढ़ सकते हैं. क्रिस्टिना कारमोना ने मेक्सिको के ओक्साका और घाना के उत्तरी इलाक़ों का ऐसे ही तुलनात्मक अध्ययन किया. उन्होंने देखा कि स्पेन के साम्राज्यवाद, पहाड़ी रिहाइश और जैव विविधता की वजह से ओक्साका के लोग छोटे समुदायों में रहना और गिने-चुने लोगों से संबंध बनाना बेहतर समझते हैं. उनके मुक़ाबले, घाना के लोगों ने संसाधनों की कमी से निपटने के लिए क़बीलाई संबंध का दायरा बहुत व्यापक कर लिया है. क्योंकि आपसी सहयोग उनके मुश्किल माहौल में आगे बढ़ने में अहम रोल निभाता है.

इसीलिए क्रिस्टिना कारमोना कहती हैं कि बेहतर होगा हम केवल नियोकॉर्टेक्स की सीमाओं को आधार न बनाएं. डनबार की 150 संबंधों की संख्या शायद पश्चिमी देशों के उन्नत समाज पर ज़्यादा फ़िट बैठती है.

लेकिन, आज इंटरनेट की वजह से पश्चिमी समाज भी पेचीदा होते जा रहे हैं.

ऑनलाइन मौजूदगी-

प्राचीन काल में इंसान गुफ़ाओं में रहते थे. इसी तरह समुदायों का विकास हुआ.

आज स्लैक जैसे ऐप हैं, जो लोगों को जोड़ने का काम करते हैं.

अमरीका की डिजिटल डिज़ाइनर कार्ली आयर्स ने कई साल पहले 100 अंडर 100 नाम से स्लैक पर एक ग्रुप बनाया. आज इस में 84 चैनल हैं जिनके 14 एडमिन हैं. यानी इस ग्रुप का दायरा इतना व्यापक हो गया है कि इसके कई एडमिन बनाने पड़े हैं. ये ग्रुप, कई उप समूहों में बंट गया है.

कार्ली कहती हैं कि, "मुझे नहीं लगता कि आप अपने ज़हन में सीमित जानकारी ही जमा कर सकते हैं. आप दूसरों के बारे में जितना ही जानेंगे, उतना ही वो संबंध मज़बूत होगा. हर संबंध के कई अवतार होते हैं."

कार्ली के बनाए ग्रुप में उप समूह इसलिए बनाए गए हैं, ताकि जिन लोगों के आपसी संवाद बेहतर हुए हैं, वो और ज़्यादा नज़दीकी संबंध विकसित कर सकें. बहुत से लोग, जो ग्रुप में दिलचस्पी नहीं लेते, उन्हें इससे बाहर भी किया जाता रहता है.

सोशल मीडिया पर भी लोग यही कहते हैं कि आप का ग्रुप जितना छोटा हो, उतना ही अच्छा. संवाद उतना ही स्पष्ट होगा.

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वैसे, ऑनलाइन दुनिया की तरह ही असली दुनिया में भी संबंधों को निभाने की एक सीमा होती है. डनबार कहते हैं कि अगर फ़ेसबुक या ट्विटर पर आपके जानने वालों की संख्या 150 से ज़्यादा है, तो वो आपके क़रीबी लोग नहीं होंगे. वो केवल परिचित होंगे. डिजिटल माध्यम और टेलीफ़ोन आपको अपने परिचितों से संपर्क करने का माध्यम भर हैं. इनसे आप का दायरा असीमित नहीं हो सकता है.

ऑनलाइन दुनिया में अगर आपकी पहचान से लोग अनजान हैं, तो भी आप के संबंध सीमित ही होंगे. डनबार इसके लिए कैथोलिक चर्च की कन्फ़ेशन व्यवस्था की मिसाल देते हैं. लोगों को अपना दुखड़ा रोने के लिए भी एक कंधा चाहिए होता है. वो वर्चुअल दुनिया में अकेले बैठ कर अपनी तकलीफ़ नहीं बयां कर सकते हैं.

डनबार की नज़र में आज भी कौन से संबंध बेहतर हैं?

डनबार की नज़र में आज भी वो संबंध बेहतर हैं, जिसमें आप लोगों से मिलकर अपनी बात कह सकते हैं और उनकी सुन सकते हैं.

डनबार ने इसके लिए इंटरनेट के ज़माने में पैदा हुई पीढ़ी पर रिसर्च की. उन्होंने देखा कि ये युवा सोशल मीडिया पर ज़्यादा वक़्त बिताते हैं. फिर वो असल ज़िंदगी के संबंधों के लिए वक़्त नहीं निकाल पाते.

वैसे भी, सोशल मीडिया पर बने ग्रुप हमेशा के लिए नहीं होते. एक वक़्त के बाद उनकी उपयोगिता ख़त्म हो जाती है. ऐसे में अगर उनकी संख्या बढ़ती भी जाए, तो, आप के संबंधों का दायरा नहीं बढ़ता.

ऐसे में हमारे दोस्तों और जानने वालों की संख्या तय हो, तो बेहतर है. अब ये पता नहीं है कि ऑनलाइन संपर्कों के दौर में, आज इंसान की संबंध निभाने की क्षमता बढ़ रही है. या फिर सिमट रही है.

(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहां पढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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