क्या इंटरनेट चलाना भी मानवाधिकार में आता है?

  • 17 नवंबर 2019
इंटरनेट का अधिकार

कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा ख़त्म करने के बाद केंद्र सरकार ने क़रीब दो महीने तक वहां इंटरनेट बंद किया था. सरकार का कहना था कि ऐसा उसने हालात को बिगड़ने से बचाने के लिए किया.

वहीं, कई मानवाधिकार संगठनों ने इसे मूल अधिकारों का उल्लंघन बताया और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर ताला कह कर इंटरनेट और फ़ोन पर लगे प्रतिबंधों का विरोध किया.

दुनिया में बहुत से लोग इंटरनेट के इस्तेमाल की आज़ादी को बुनियादी मानवाधिकार मानते हैं.

2013 में फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग ने 10 पन्नों का एक श्वेत पत्र जारी किया था. इसमें उन्होंने संचार को बुनियादी अधिकार मानने के संबंध में अपने विचार रखे थे.

इस व्हाइट पेपर में ज़करबर्ग ने इंटरनेट से महरूम दुनिया के पांच अरब लोगों को वर्ल्ड वाइड वेब से जोड़ने का प्रस्ताव रखा था और इसके तरीक़े भी सुझाए थे.

मार्क ज़करबर्ग का कहना था कि तमाम टेक कंपनियां मिलकर इंटरनेट.ओआरजी (internet.org) के नाम से एक साझा संगठन बनाएं.

इसके तहत दुनिया भर के संचार नेटवर्क का विस्तार कर के दुनिया के तमाम लोगों को उसके दायरे में लाने का सुझाव था.

इसके अलावा ज़करबर्ग ने ऐसी नई तकनीकें विकसित करने का भी सुझाव दिया था, जिससे दूर दराज़ के इलाक़ों तक इंटरनेट पहुंचाया जा सके. जैसे कि सौर ऊर्जा से चलने वाले ड्रोन, जो सुदूर इलाक़ों में बिना तार के इंटरनेट सेवाएं दे सकें.

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Image caption फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़करबर्ग

भरोसेमंद इंटरनेट सेवा की कमी

दुनिया की साढ़े सात अरब से ज़्यादा आबादी में से आधे लोग एक भरोसेमंद इंटरनेट सेवा से महरूम हैं. इससे वो, शिक्षा, वित्तीय सेवाओं, राजनीतिक संवाद, बोलने की आज़ादी और दूसरे कई अधिकारों से महरूम रह जाते हैं.

ऐसे ही लोगों में से एक हैं, अफ़्रीका के चाड देश के रहने वाले सलीम अज़ीम असानी. वो वेनाकलैब्स नाम के डिजिटल हब के संस्थापकों में से एक हैं.

ये डिजिटल हब चाड की राजधानी एनजामेना में स्थित है. 2008 में चाड की सरकार ने फ़ेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पर पाबंदी लगा दी थी.

चाड के सरकारी अधिकारियों का कहना था कि लोगों की ऐसे माध्यमों तक पहुंच से धार्मिक कट्टरवाद फैल रहा है. चाड में ये सेवाएं अगले 16 महीने तक बंद रही थीं.

सलीम असानी कहते हैं, ''इंटरनेट पर इस सरकारी पाबंदी की वजह से हमारा काफ़ी पैसा डूब गया. कई ग्राहक दूर हो गए. उन्होंने ये कह कर हमारे ठेके रद्द कर दिए कि ये सोशल मीडिया के इस्तेमाल का सही वक़्त नहीं है. हम कलाकारों और संगीतकारों के साथ काम करते हैं. इन्हें वीपीएन का इस्तेमाल आता ही नहीं. तो हमारा धंधा ही चौपट हो गया.''

Image caption सलीम अज़ीम असानी

आज़ाद ऑनलाइन दुनिया का ख़्वाब

तमाम कंप्यूटरों को एक दूसरे से जोड़ कर इंटरनेट बनाने के 50 साल बीत चुके हैं. वहीं वर्ल्ड वाइड वेब की स्थापना को भी तीस साल का वक़्त गुज़र चुका है.

लेकिन इनकी स्थापना करने वालों का एक स्वतंत्र ऑनलाइन दुनिया का ख़्वाब अधूरा ही है. इसपर लगातार हमले हो रहे हैं.

पिछले कुछ वर्षों में भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों, जैसे सूडान, इरीट्रिया, इथियोपिया, सीरिया, कॉन्गो और इराक़ में हम इंटरनेट पर पाबंदी लगते हुए देख चुके हैं.

एमनेस्टी टेक नाम की कंपनी, दुनिया भर में इंटरनेट पर लगने वाली रोक पर निगरानी रखती है. हालांकि वो सभी जगह की रिपोर्ट नहीं रख सकते.

कंपनी के डिप्टी डायरेक्टर जोशुआ फ्रैंको कहते हैं, ''दुनिया भर में इंटरनेट पर पाबंदी की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं. हमने पाया है कि 2017 में पश्चिमी और मध्य अफ्रीकी देशों में इंटरनेशनल मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं स्थगित करने की 12 घटनाएं हुईं. जो 2016 में हुई ऐसी घटनाओं से ज़्यादा हैं. 2018 में तो इसी इलाक़े में 20 बार इंटरनेट और मोबाइल पर पाबंदियां लग चुकी हैं. हमे आशंका है कि ऐसी मिसालें और भी बढ़ेंगी.''

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Image caption अफ़्रीकी देश सूडान में अप्रैल 2019 में हुए प्रदर्शनों के दौरान इंटरनेट सेवा रोक दी गई थी.

अफ़वाहों को रोकना मक़सद?

आम तौर पर सरकारें ऐसी पाबंदियां लगाने के पीछे क़ानून-व्यवस्था का हवाला देती हैं. ताकि अराजकता न फैले.

जैसे कि अप्रैल 2019 में ईस्टर धमाकों के बाद श्रीलंका ने सोशल मीडिया के प्रयोग पर पाबंदी लगा दी थी. श्रीलंका की सरकार का कहना था कि उन्होंने अफ़वाहों और ग़लत जानकारियां फैलने से रोकने के लिए ये पाबंदियां लगाई थीं.

जोशुआ फ्रैंको कहते हैं, ''हम ऐसी रोक की संख्या के बजाय इनके असर को ज़्यादा क़रीब से देखते हैं. आम तौर पर हमने देखा है कि अहम सार्वजनिक कार्यक्रमों से पहले या इनके दौरान, जैसे कि चुनाव या विरोध-प्रदर्शनों के समय, ऐसी पाबंदियां ज़्यादा लगती हैं. ऐसे में हमें आशंका है कि ये बोलने की आज़ादी पर लगाम लगाने की कोशिश ज़्यादा होती है.''

इंटरनेट पर रोक बहुत कड़वी दवा है. लेकिन, कई बार इंटरनेट पर अलग तरह से भी पाबंदियां लगाई जाती हैं.

मसलन, रूस की सरकार एक तरह का समांनांतर इंटरनेट बना रही है. ये इंटरनेट केवल रूस की सीमाओं में ही उपलब्ध होगा.

इसके तैयार होने के बाद रूस की सरकार का लोगों के इंटरनेट इस्तेमाल करने पर पूरा नियंत्रण होगा. वो इंटरनेट पर क्या देख सकेंगे और क्या पोस्ट कर सकेंगे, हर चीज़ पर रूस के अधिकारियों की नज़र होगी.

इसी तरह चीन में भी इंटरनेट पर बहुत सी पाबंदियां हैं. सरकार या देश विरोधी कंटेंट रोकने के नाम पर चीन ने इंटरनेट पर कई फ़िल्टर लगा रखे हैं. चीन ने कई वेबसाइट पर भी रोक लगा रखी है. इसीलिए जानकार इसे 'द ग्रेट फ़ायरवॉल ऑफ़ चाइना' भी कहते हैं.

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प्राइवेसी में तांक-झांक

ऐसा नहीं है कि केवल विकासशील देशों में ही ऐसा हो रहा हो. हाल ही में यूरोपीय यूनियन ने ऐसा कॉपीराइट निर्देश जारी किया है. इसे आर्टिकिल 13 कहा जाता है.

इस आदेश के तहत यूरोपीय यूनियन ने तकनीकी कंपनियों से कहा है कि वो अपनी ऑनलाइन सेवा में ऐसा फ़िल्टर लगाएं, जिससे ऐसा कंटेंट ख़ुद ही छंट जाए, जिसे संबंधित देश में अवैध कहा जाता है.

ब्रिटेन में सरकार बार-बार ये कहती रही है कि उसे तमाम सोशल मीडिया के एनक्रिप्शन को तोड़ने की आज़ादी मिलनी चाहिए. फिर चाहे वो टेलीग्राम या व्हाट्सऐप जैसे प्राइवेट चैटिंग ऐप हों या ऑनलाइन पेमेंट की सुविधा.

वहीं अमरीका में सांसदों ने नेट न्यूट्रैलिटी के उन नियमों को हमेशा ताक पर रखने की कोशिश की है, जिनसे इंटरनेट इस्तेमाल करने में सबको बराबरी का हक़ मिले.

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इंटरनेट का अधिकार भी मानवाधिकार

मार्क ज़करबर्ग ने इंटरनेट.ओआरजी (internet.org) लॉन्च करने के दो साल बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपनी पुरानी बात दोहराई की इंटरनेट सबके लिए है.

ऐसा विचार रखने वाले ज़करबर्ग अकेले शख़्स नहीं. 2011 और 2016 की संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद् की रिपोर्ट में इंटरनेट पर लगाई जाने वाली पाबंदियों की आलोचना की गई थी.

दोनों ही बार ये माना गया था कि अभिव्यक्ति की आज़ादी की तरह ही इंटरनेट का अधिकार भी मानवाधिकार है.

सलीम असानी कहते हैं कि इंटरनेट मानव अधिकार है. युवाओं को सोशल मीडिया के इस्तेमाल की आज़ादी होनी चाहिए. वो इंटरनेट का इस्तेमाल कर के अपना कारोबार भी खड़ा कर सकते हैं. इसलिए सबको इंटरनेट का इस्तेमाल करने की आज़ादी मिलनी चाहिए.

लेकिन, 'फादर्स ऑफ़ द इंटरनेट' के सदस्यों में से एक विंट सर्फ़ इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते. विंट ने ही इंटरनेट का टीसीपी/आईपी प्रोटोकॉल विकसित किया था.

इंटरनेट के बारे में 2011 की संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट आने के बाद विंट सर्फ़ ने न्यूयॉर्क टाइम्स में एक संपादकीय लिखा था. इसमें उन्होंने ये तर्क ख़ारिज कर दिया था कि इंटरनेट एक मानवाधिकार है.

विंट सर्फ़ का कहना है कि तकनीक किसी अधिकार के इस्तेमाल में मददगार होती है और उसे अलग से अधिकार मानना ग़लत होगा.

विंट ने अपने संपादकीय में लिखा, ''एक दौर था जब आपके पास घोड़ा न हो तो आपके लिए रोज़ी कमाना मुश्किल था. इसका ये मतलब हुआ कि आप को रोज़ी कमाने का अधिकार है, न कि घोड़ा रखने का. इंटरनेट किसी लक्ष्य को प्राप्त करने का माध्यम है, ख़ुद कोई मंज़िल नहीं है.''

सुर्ख़ियों से परे, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की सोच भी यही है. 2011 और 2016 में जारी इसकी रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि इंटरनेट के माध्यम से लोग अपनी आवाज़ उठा सकते हैं, जानकारी जुटा सकते हैं और किसी मसले पर राय रख सकते हैं. लेकिन, मानवाधिकार परिषद ने इंटरनेट को एक मानवाधिकार नहीं माना था.

इसमें कोई दो राय नहीं कि सबके फ़ायदे के लिए काम करने वाला इंटरनेट कुछ पाबंदियों के साथ मिलता है. फ्रैंको भी मानते हैं कि मुश्किल हालात में इंटरनेट का उपयोग सीमित करना ग़लत नहीं है.

वो कहते हैं, ''आप को आज़ादी हासिल है, इसका ये मतलब नहीं कि आप भीड़ भरे ठिकाने पर आग चिल्लाकर वहां भगदड़ मचा दें.''

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इंटरनेट में अवैध की परिभाषा कैसे तय हो?

कई दशकों से नियामक संस्थाएं वेब के बढ़ते जाल पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास कर रही हैं. इस बारे में कई क़ानून बनाए गए हैं ताकि, पाइरेटेड संगीत और फ़िल्में, ड्रग बेचने, बच्चों की पोर्नोग्राफी, आतंकवादी दुष्प्रचार, नफ़रत भरे भाषण और अराजकता फैलाने वाले दूसरे अपराधों पर लगाम लगा सकें.

लेकिन, अरबों लोगों की पहुंच वाले नेटवर्क के साथ दिक़्क़त यही है कि अवैध क्या है, इसकी परिभाषा सबके लिए अलग है. ये केवल दो देशों के बीच का मसला नहीं है.

फ्रैंको कहते हैं कि फ़ेसबुक या किसी और तकनीकी कंपनियों की नीतियों को तो आप संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार घोषणापत्र की जगह नहीं अपना सकते हैं.

इंटरनेट के अपने अधिकार मांगने का मतलब ये है कि आप इसे लेकर आक्रामक रवैया रखें. इस काम में एक गैर लाभकारी संस्था वर्ल्ड वाइड वेब फाउंडेशन जुटी हुई है.

इस साल नवंबर में ही बर्लिन में होने वाली इंटरनेट गवर्नेंस फ़ोरम में कॉन्ट्रैक्ट फॉर वेब के नाम से एक घोषणापत्र जारी किए जाने की तैयारी है.

वर्ल्ड वाइड वेब फ़ाउंडेशन की पॉलिसी डायरेक्टर एमिली शार्प कहती हैं कि इस कॉन्ट्रैक्ट का लक्ष्य सबको इंटरनेट मुहैया कराना और इसके ज़रिए हर नागरिक का सशक्तिकरण करना है.

इस दस्तावेज़ में सबके लिए इंटरनेट मुफ़्त में और खुली व्यवस्था के तहत लाने का प्रस्ताव है. हक़ीक़त की दुनिया का विज़न रखने वालों के लिए ये इंटरनेट घोषणापत्र जैसा है, जिसके माध्यम से सभी को इंटरनेट से जोड़े रखने की कोशिश होगी.

तमाम सरकारें हों या कंपनियां, वो इस पर दस्तख़त कर के मुफ़्त इंटरनेट का वादा कर सकती हैं.

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लोगों को जोड़ना ही एक मक़सद नहीं

एमिली कहती हैं कि इंटरनेट जब नया नया था, तो इसने मानवाधिकारों का दायरा बढ़ाने में मदद की. लेकिन, जैसा कि हर तकनीक के साथ होता है, इंटरनेट का शुरुआती उत्साह भी ठंडा पड़ गया. इसके नए-नए प्रयोग से हमें इसके ख़तरों के बारे में भी पता चला.

जोशुआ फ्रैंको कहते हैं, ''नफ़रत भरे भाषण का लोग अलग तरह से दुरुपयोग करते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि लोग नफ़रत भरी बातें इंटरनेट से फैलाते हैं. महिलाओं के प्रति हिंसक बर्ताव की बहुत सी मिसालें ऑनलाइन दुनिया में मिलती हैं. इसी वजह से कई बार अभिव्यक्ति की आज़ादी पर भी पाबंदी लगती है. लेकिन, इसी बहाने से सरकारों ने लोगों के बोलने के अधिकार छीनने की भी कोशिश की है. ऑनलाइन पाबंदी लगाकर लोगों की आवाज़ दबाना अब सरकारों का शगल बनता जा रहा है.''

मार्क ज़ुकरबर्ग ने 6 साल पहले इंटरनेट.ओआरजी (internet.org) लॉन्च किया था. लेकिन, पूरी दुनिया को ऑनलाइन करने का ये ख़्वाब अब भी अधूरा है.

दुनिया भर की संचार कंपनियां लोगों को डेटा प्लान देने की अनिच्छुक हैं, क्योंकि उन्हें मैसेज और फ़ोन की सुविधाओं से ज़्यादा मुनाफ़ा मिल रहा है. 2018 में फ़ेसबुक ने भी सबको इंटरनेट सेवा देने के लिए ड्रोन तैयार करने के अपने प्लान अक़ीला को बंद कर दिया था.

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यानी, अभी दुनिया में अरबों लोग ऐसे हैं, जिनकी पहुंच इंटरनेट तक नहीं है. लेकिन, जब तमाम लोग उन्हें ऑनलाइन लाने की कोशिश कर रहे हैं, तो हमें याद रखना होगा कि हम किस तरह के इंटरनेट का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं.

सिर्फ़ जोड़ना ही काफ़ी नहीं है. हमें याद रखना होगा कि ये लोगों के लिए फ़ायदे का भी सौदा हो.

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यह लेख मूल रूप से बीबीसी फ़्यूचर पर प्रकाशित हुआ था. मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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