पुरुष जो महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा रोकने के रास्ते सीख रहे हैं

  • 30 नवंबर 2019
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Image caption अपने माता-पिता राजू और कांता के साथ ओंकार

18 बरस का ओंकार अक्सर अपना ग़ुस्सा अपनी छोटी बहन ऋतु पर निकालता था. लेकिन, अब उसकी मां कांता का कहना है कि वो अपनी बहन से धैर्य से बात करता है और उसे उचित सम्मान देता है.

ओंकार अब घर के काम में भी हाथ बंटाता है. कांता बताती हैं कि, "जब कोई घर में आता है तो ओंकार चाय बनाता है. वो घर के दूसरे काम जैसे साफ़-सफ़ाई भी करता है. वो अपने मोहल्ले के बाक़ी लड़कों से बिल्कुल अलग बर्ताव करता है. उसका व्यवहार बहुत अच्छा है."

ओंकार, पुणे के उन पांच हज़ार से ज़्यादा लड़कों में से एक है, जो एक्शन फ़ॉर इक्वालिटी (एएफ़ई) कार्यक्रम में शामिल हुए हैं. ये कार्यक्रम एक कल्याणकारी संस्था ईक्वल कम्युनिटी फ़ाउंडेशन (ईसीएफ़) ने 2011 में शुरू किया है.

इस कार्यक्रम का मक़सद किशोर उम्र लड़कों के महिलाओं से करने वाली हिंसा को रोकना है.

ईसीएफ़ की कार्यकारी निदेशक क्रिस्टिना फ़र्टाडो कहती हैं, "लैंगिक समानता के लिए लड़ना, नदी की तेज़ धार से मुक़ाबला करने जैसा है. हम महिलाओं को काफ़ी समय से बता रहे हैं कि उनका अपने हक़ के लिए लड़ना बेहद ज़रूरी है. हम ने कई महिलाओं को हिंसा और अपमान के दुष्चक्र से बाहर निकालने में भी कामयाबी हासिल की है."

लेकिन, क्रिस्टिना ये भी कहती हैं कि, "जब आप इस समस्या का समाधान केवल महिलाओं पर केंद्रित रखकर निकालने की कोशिश करते हैं, तो समाज की व्यापक सोच की तेज़ बहती धार पर तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. क्योंकि आख़िर में पढ़ी-लिखी और सशक्त महिलाएं उन्हीं मर्दों के साथ रहेंगी जो हिंसा और अपमान से पेश आते हैं."

लेकिन, एएफ़ई के तहत 13 से 17 साल की उम्र तक के लड़के 43 हफ़्ते के एक कोर्स में शामिल होते हैं. जिसमें उन्हें महिलाओं से हिंसा न करने, लैंगिक भेदभाव से बचना सिखाया जाता है. ताकि वो अपने आस-पास महिलाओं और लड़कियों को बराबर समझें और उनसे अच्छा सुलूक करें.

महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा, क्या कहते हैं आंकड़े

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संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, महिलाओं से हिंसा पूरी दुनिया का भयंकर मर्ज़ है. कई तजुर्बों में ये बात सामने आई है कि दुनिया की 70 फ़ीसद महिलाओं ने अपने क़रीबी साथियों के हाथों हिंसक बर्ताव झेला है. फिर चाहे वो शारीरिक हो या यौन हिंसा.

दुनियाभर में हर रोज़ 137 महिलाएं अपने क़रीबी साथी या परिवार के सदस्य के हाथों मारी जाती हैं.

भारत में महिलाओं के प्रति हिंसा की सबसे बड़ी मिसाल दिसंबर 2012 में दिल्ली में देखी गई थी. जब 23 बरस की एक युवती के साथ एक चलती बस में गैंगरेप हुआ था. इस के बाद महिलाओं से होने वाली हिंसा के ख़िलाफ़ व्यापक आंदोलन हुआ था.

ऐसी घटनाओं को देखते हुए एक्शन फ़ॉर इक्वालिटी जैसे कार्यक्रमों की अहमियत बढ़ जाती है. पुणे जैसे रुढ़िवादी शहर में लैंगिक समानता का ऐसा ज़मीनी कार्यक्रम शुरू करना धारा के विपरीत तैरने जैसा ही है. उसमें भी ऐसे कार्यक्रम का केंद्र लड़कों को बनाना तो और भी चुनौती भरा काम है.

यौन शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश

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ओंकार जैसे कम आमदनी वाले पारंपरिक समुदायों में लड़कियां और लड़के, दोनों ही पुराने रिवाज़ों से बंधे हुए होते हैं, जहां ये सिखाया जाता है कि घर के काम महिलाओं का कर्तव्य है.

उन्हें सिखाया जाता है कि पुरुष, महिलाओं को ज़ुबानी, शारीरिक या यौन शोषण करने के लिए स्वतंत्र हैं. और इसका उन्हें कोई अंजाम भी नहीं भुगतना होगा.

लेकिन, एएफ़ई कार्यक्रम चलाने वाले लोग वो हैं, जो किशोरों के लिए आदर्श होते हैं. जिनके नक़्शे-क़दम पर ये किशोर चलते हैं. ये वो युवा हैं, जो उम्र का दूसरा दशक पार कर चुके हैं.

ईसीएफ़ के इस कार्यक्रम में शामिल होने की शर्त यही है कि हर युवक को 60 प्रतिशत कक्षाओं में शामिल होना होगा और एक सामुदायिक कार्यक्रम 'एक्शन प्रोजेक्ट' को लागू करने के काम में शामिल होना होगा. ऐसे कार्यक्रम का हिस्सा बनने वाले 80 फ़ीसद युवा पास हो जाते हैं.

18 बरस के अक्षय 2014 में एएफ़ई कार्यक्रम में एक स्वयंसेवी के तौर पर शामिल हुए थे. लेकिन, बाद में वो ख़ुद इसमें पढ़ाई करने लगे. बाद में उन्होंने अपने दो भाइयों को भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनाया. जब से उन्होंने इस कार्यक्रम में पढ़ाई पूरी की है, तब से वो अपने मोहल्ले के लड़कों के लिए रोल मॉडल बन गए हैं.

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Image caption अक्षय ने 2014 में एएफ़ई के कार्यक्रम में शिरकत की थी

ओंकार की मां की ही तरह, अक्षय की मां सुजाता बताती हैं कि उन्होंने अपने बेटे में आए बदलाव को साफ़तौर से महसूस किया है.

वो कहती हैं, "वो घर की ज़िम्मेदारियों में हाथ बंटाने लगा है. उसके भाई भी समझदार हो गए हैं. पिछले महीने तो उन लोगों ने ही घर के सारे काम किए. मुझे कुछ करने का मौक़ा ही नहीं मिला."

अक्षय और ओंकार के मोहल्लों में बहुत से किशोर उम्र के लड़के 14-15 साल की उम्र में शराब पीने लगते हैं. वयस्क होते-होते उन्हें शराब की लत लग चुकी होती है. भारत के ग़रीब समुदायों में शराबनोशी की लत बहुत भयंकर समस्या है. जो लोग नियमित रूप से शराब पीते हैं, वो ही अक्सर अपनी बीवियों या दूसरी लड़कियों से बुरा बर्ताव करते हैं.

ये ऐसी समस्या है जिसका महिलाओं और लड़कियों पर बहुत गहरा असर पड़ता है. शराबी युवकों और लड़कों के भद्दे कमेंट की वजह से लड़कियां घर से बाहर निकलकर खेल नहीं पाती हैं. वहीं, घरेलू महिलाएं अक्सर अपने साथ होने वाले दुर्व्यवहार की शिकायत न तो पुलिस से कर पाती हैं और न ही ख़ुद इसका विरोध कर पाती हैं. क्योंकि उन्हें डर होता है कि या तो अधिकारी उनकी बात पर यक़ीन ही नहीं करेंगे. या फिर उन्हें ही दोषी ठहराएंगे.

लेकिन, ओंकार और अक्षय इस कार्यक्रम की वजह से यौन हिंसा या महिलाओं से होने वाले दुर्व्यवहार के प्रति काफ़ी सचेत हैं. वो अपने आस-पास जब भी किसी महिला या लड़की से बुरा बर्ताव होते देखते हैं, तो इसकी शिकायत मोहल्ले के बड़े बुज़ुर्गों या पुलिस से करते हैं.

ओंकार ने महसूस किया है कि अब किशोर उम्र की लड़कियां उस पर भरोसा करती हैं. क्योंकि ईसीएफ़ के तजुर्बे की वजह से उन्हें पता है कि ओंकार उनसे हमदर्दी रखता है और उन्हें असुरक्षित नहीं महसूस कराएगा.

ख़ुद समाज बदलने की कोशिश

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अक्षय भी अपने आस-पास महिलाओं से बुरा बर्ताव होते देखता है, तो उसे रोकने की कोशिश करता है. अक्षय ने एक घटना हमें बताई, जब एक शराबी व्यक्ति अपनी पत्नी से पहले झगड़ा किया, फिर उसे पीटने लगा.

अक्षय अपने साथियों के साथ उस आदमी के घर गया और उसे वहां से खींचकर बाहर किया. फिर उन्होंने उस महिला से कहा कि वो पुलिस को ख़बर करे. अक्षय के दख़ल देने का नतीजा ये हुआ कि वो आदमी शराब की लत छुड़ाने के लिए एक केंद्र में गया.

उसने शराब पीना काफ़ी कम कर दिया और उसके हिंसक बर्ताव में भी काफ़ी कमी आई है.

अक्षय कहते हैं, "मुझे लगता था कि लड़कियां कमज़ोर होती हैं, इसीलिए वो घर से बाहर निकलने में घबराती हैं. लेकिन अब मुझे समझ में आ गया है कि वो मर्दों के बुरे बर्ताव से बचने के लिए घर से नहीं निकलती हैं. इसके बाद मैं उनका सम्मान करने लगा हूं."

ओंकार अपना तजुर्बा मोहल्ले के अन्य लड़कों से बांट रहे हैं. वो अपने एक और साथी की मदद से 10 लड़कों को लैंगिक समानता और महिलाओं का सम्मान करने की ट्रेनिंग दे रहे हैं. ओंकार बताते हैं कि वो लड़कियों पर फ़ब्तियां न कसें, घर के काम में हाथ बटाएं और किसी महिला से बुरा बर्ताव होते देखें, तो इसकी शिकायत करें.

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ईसीएफ़ की प्रोग्राम एसोसिएट सुहासिनी मुखर्जी कहती हैं कि, "हम लड़कों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करना चाहते हैं कि वो आगे बढ़ें. हम उनकी हर तरह से मदद करेंगे."

हालांकि कई बार लड़के ऐसे सबक़ को इतनी गंभीरता से ले लेते हैं कि वो अपनी बहनों को ये भी बताने लगते हैं कि वो कैसे कपड़े पहनें और कैसे न पहनें. जबकि इसी समस्या को दूर करने के लिए उन्हें ट्रेनिंग दी जाती है.

इसीलिए ईसीएफ़ के कार्यक्रम की शुरुआत में लड़कों को यही बताया जाता है कि वो तभी मदद करें, जब लड़कियां उनसे मदद मांगें या फिर वो वाक़ई बेहद मुश्किल हालात में हों. लड़कों को ये भी बताया जाता है कि वो हर काम ख़ुद करने के बजाय अधिकारियों को ख़बर करने का विकल्प ज़्यादा आज़माएं.

अक्षय ने ऐसी ही एक घटना बताई. जब उसके एक पड़ोसी अपनी कम उम्र लड़की की शादी करने पर आमादा थे. उसने ख़ुद दख़ल देने के बजाय क़ानूनी अधिकारियों को इसकी ख़बर दी, जिन्होंने आकर उनके पड़ोसी को बेटी की कम उम्र में शादी करने से रोका.

ईसीएफ़ स्थानीय स्तर पर लैंगिक समानता के लिए काम कर रहा है. तो ब्राज़ील का प्रोमुंडो नाम का संगठन पूरी दुनिया में ऐसे कार्यक्रम चला रहा है.

होमेन्स या होम्ब्रेस

प्रोमुंडो की स्थापना 1997 ब्राज़ील में हुई थी. अब इसका मुख्यालय अमरीका की राजधानी वॉशिंगटन में है. ये संगठन भारत और ब्राज़ील समेत 25 देशों में सक्रिय है. इनमें अमरीका से लेकर यूरोप के बाल्कन देश भी हैं.

प्रोमुंडो के कार्यक्रम का नाम है प्रोग्राम-एच, एच का मतलब पुर्तगाली होमेन्स या स्पेनिश ज़बान में होम्ब्रेस यानी पुरुष होता है. इसका मक़सद शहरी बस्तियों में महिलाओं के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार को रोकना है. इस कार्यक्रम में 10 से 24 साल तक की उम्र के लड़कों को लैंगिक समानता और महिलाओं से अच्छे बर्ताव का सबक़ सिखाया जाता है.

कार्यक्रम से जुड़े लोग चार महीने तक हर हफ़्ते मिलते हैं. इसमें 12 लोगों के छोटे-छोटे समूह ही रखे जाते हैं. इन्हें ईसीएफ़ की ही तरह युवा लोग लैंगिक समानता के सबक़ सिखाते हैं. कार्यक्रम में शामिल लोगों को महिलाओं के प्रति हिंसा, उनकी यौन स्वतंत्रता और लैंगिक बराबरी जैसी बातें बताई जाती हैं. उन्हें इस बात के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है कि वो घर के काम में हाथ बटाएं.

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Image caption एक आकलन के अनुसार पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं अपने वक्त से 40 फीसदी अधिक वक्त ऐसे कामों में लगाती हैं जिनसे उन्हें कोई आय नहीं होती. इन कमों में अपने छेटे भाई-बहन का ध्यान रखना, घर के कम करना शामिल हैं.

प्रोमुंडो की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, लड़कियों को खेलने के लिए कम मौक़े मिलते हैं. क्योंकि उनका 40 फ़ीसद समय ऐसे कामों में जाता है, जिसके पैसे भी नहीं मिलते. इसका ये नतीजा होता है कि उन्हें खेलने, आराम करने या पढ़ने का समय लड़कों के मुक़ाबले कम ही मिल पाता है.

महिलाओं और पुरुषों में भेद को मापने के लिए प्रोमुंडो ने जेम नाम का एक पैमाना ईजाद किया है. जेम यानी जेंडर इक्विटेबल मेन (Gem) के तहत सुरक्षित यौन संबंध, घरेलू हिंसा, परिवार नियोजन और महिलाओं के प्रति बदली हुई सोच को मापा जाता है.

इथियोपिया में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि प्रोमुंडो के कार्यक्रम में शामिल होने के बाद मर्दों के महिलाओं से हिंसा के मामलों में 20 फ़ीसद तक की कमी आई है.

हालांकि ज़मीनी स्तर पर चल रहे ये कार्यक्रम बहुत चुनौती झेल रहे हैं. क्योंकि महिलाओं को बराबरी से न देखने की सोच हमारे समाज में बहुत गहरी जड़ें जमाए हुए है.

अफ्रीका के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो में प्रोमुंडो के कार्यक्रम में शामिल होने वाले पुरुषों ने घर के काम में हाथ बंटाना शुरू किया. लेकिन, वो ये बात अपने साथियों से छुपाते हैं. क्योंकि, उन्हें लगता है कि उनका मज़ाक़ बनाया जाएगा.

प्रोमुंडो और ईसीएफ़ के कार्यक्रम के दौरान ये देखा गया कि लड़कों का बर्ताव सुधारना तो आसान है. लेकिन, समाज में इसे लागू करना बहुत मुश्किल है. क्योंकि, वहां पर महिलाओं के प्रति सोच बदलने का विरोध तगड़ा है.

इस चुनौती से निपटने के लिए प्रोमुंडो और ईसीएफ़ दोनों ही अपने कार्यक्रमों में बदलाव ला रहे हैं. जहां कक्षा में लड़कों को सिखाने के बाद सामुदायिक स्तर पर भी कार्यक्रम लागू करने की कोशिश की जएगी. प्रोमुंडो, तो स्कूलों और अस्पतालों के माध्यम से भी लैंगिक समानता का प्रचार प्रसार करने के लिए काम कर रही है.

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प्रोमुंडो के उपाध्यक्ष जियोवान्ना लॉरो कहते हैं कि, "हम युवाओं की सोच और बर्ताव बदल भी दें, तो रहना तो उन्हें उसी समाज में है, जहां कोई बदलाव नहीं आया है."

लेकिन, ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने के बाद लड़के ख़ुद भी अपने आस-पास बदलाव ला रहे हैं. वो सामुदायिक स्तर पर भी महिलाओं से होने वाले बुरे बर्ताव से निपटने का प्रयास करते हैं. ऐसे कार्यक्रमों में समाज की ज़रूरत के हिसाब से बदलाव लाकर इसे और व्यापक बनाया जा सकता है.

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