क्या ग़ायब हो जाने वाला है लाल सेब?

  • 29 नवंबर 2019
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सेब का रंग लाल होता है, हमें यही पढ़ाया सिखाया जाता रहा है. भले ही बाज़ार में हरे, पीले गुलाबी, नारंगी और इंद्रधनुषी रंग के सेब भी मिलते हों, मगर एक आदर्श सेब लाल रंग का ही होता है. लोग मिसालें भी लाल रंग की ही देते हैं. मसलन, फलां के गाल तो सेब जैसे लाल हैं.

मगर, आज के दौर में सेब का ये लाल रंग ख़तरे में है. और ये ख़तरा जलवायु परिवर्तन से पैदा हुआ है.

आज जो सेब हम दुनिया भर के बाज़ारों में देखते हैं, उनके पुरखे कभी मध्य एशियाई देश कज़ाख़िस्तान के पहाड़ी इलाक़ों में उगते थे. कज़ाख़िस्तान की चीन से लगी पहाड़ी सीमा की ढलानों पर ही ये जंगली सेब उगा करते थे. और कभी ये वहां के जंगलों में आबाद भालुओं का पेट भरने के काम आते थे.

लेकिन, दुनिया भर में जंगली सेबों की आबादी 90 फ़ीसद तक घट गई है. अब सेब बागानों में ही ज़्यादा उगाए जाते हैं. इनके जीन से छेड़छाड़ कर के नई नई क़िस्में उगाई जाती हैं. इसीलिए जंगली सेबों का भविष्य ख़तरे में है.

कज़ाख़िस्तान के जंगल में सेब के जो पेड़ ख़ुद से उगते हैं, वो हल्के पीले भी होते हैं और चेरी के रंग के भी. कई बार उनका रंग चटख़ हरा भी होता है. लेकिन, आम तौर पर जंगली सेब का रंग लाल ही होता है. आज हालत ये है कि कज़ाख़िस्तान में भी अमरीकी रेड डेलीशस और गोल्डेन डेलीशस नस्लों के सेब उगाए जा रहे हैं.

सेब का रंग उसके जीन पर निर्भर करता है. ये जीन, सेब के छिलके में पाया जाता है. न्यूज़ीलैंड के वैज्ञानिक डेविड चेग्न कहते हैं कि कई एंजाइम मिल कर किसी सेब का रंग निर्धारित करते हैं. ये वही एंजाइम होते हैं, जो शकरकंद, अंगूर और बेरों का रंग निर्धारित करते हैं.

किसी सेब के एंजाइम का नियंत्रण एक ख़ास क़िस्म की प्रोटीन तय करती है. वैज्ञानिकों ने इसे MYB10 नाम दिया है. इसकी जितनी मात्रा सेब में होगी, उतना ही उसका रंग लाल होगा.

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सेब का रंग तापमान पर भी निर्भर करता है. अगर गर्मी ज़्यादा होती है, तो सेब का लाल रंग गुम होने लगता है. यानी लाल सेब पैदा करने के लिए मौसम का सर्द होना एक शर्त है. डेविड और उन के साथियों ने देखा था कि एक बार स्पेन में जुलाई का तापमान बहुत गर्म हो गया था, तो सेबों के रंग धूमिल हो गए थे.

भले ही आज तरह तरह के सेब बाज़ार में मिलते हों. मगर, मांग लाल सेब की ही ज़्यादा है.

इंसानों ने जब से सेबों को बागों में उगाना शुरू किया है, तब से ही सेबों की कई नस्लों को विकसित किया गया है. लेकिन, बाज़ार में हावी लाल सेब ही हैं.

अमरीका के मेन राज्य के पालेर्मो मे रहने वाले जॉन बंकर ने कई गुम हो गई क़िस्मों को बचाया है. इन में से कई सेब आज से एक सदी पहले ख़ूब उगाए जाते थे. इन में ब्लैक ऑक्सफ़ोर्ड नाम का एक सेब तो इतना गहरा लाल होता है कि आप इसे काटे नहीं, तो दूर से ये बेर जैसा दिखता है.

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शुरुआत में जब इंसानों ने सेब उगाना शुरू किया, तो इसके रंग को उतनी अहमियत नहीं दी जाती थी. तब सेबों का वर्गीकरण उनकी उपयोगिता के आधार पर किया जाता था. जैसे कि कुछ सिरका बनाने के लिए मुफ़ीद थे, तो कुछ सॉस बनाने के लिए और कुछ ऐसे ही खाने में ज़्यादा अच्छे लगते थे.

उस दौर में लोग ये ध्यान नहीं देते थे कि सेब का रंग कैसा है. क्योंकि उस वक़्त किसान अपने लिए सेब उगाया करते थे. या तो ये स्थानीय बाज़ार में बिकते थे. उस समय रंग से ज़्यादा सेब की उपयोगिता पर ज़ोर था.

जॉन बंकर कहते हैं कि ये सिलसिला आज से एक सदी पहले बदला. जब सेबों को उगा कर पूरी दुनिया में निर्यात करने का सिलसिला शुरू हुआ. तब सेब का रंग ब्रैंडिंग की बुनियाद बन गया. जॉन बंकर कहते हैं कि एकसाथ सेबों की ब्रैंडिंग करना आसान था. और सेबों को हज़ारों मील दूर भेजने के लिए उन्हें कच्चा ही तोड़ा जाने लगा, ताकि वो सड़ें नहीं.

लेकिन, इस में समस्या ये थी कि सेब का असल रंग तो पकने के बाद ही आता था. कच्चे सेबों का रंग लाल होता नहीं था. फिर म्यूटेशन की मदद से कच्चे सेबों के रंग को भी हरा करने में कामयाबी मिली. और इसका नाम रखा गया रेड डेलीशस. सेब की ये नस्ल 1921 में बाज़ार में उतारी गई थी.

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दूसरे क़िस्म के सेबों की भी मांग बढ़ने लगी. एक जैसे दिखने वाले सेबों का बाज़ार बढ़ता गया और अलग-अलग रंगों के सेब अच्छे नहीं माने जाने लगे.

सेब की रंगत पर ज़ोर बढ़ा, तो पुरानी क़िस्मों के वो सेब भी चलन से बाहर हो गए, जो कभी केवल अच्छे स्वाद के लिए उगाए जाते थे.

अमरीका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी में सेब उगाने वाले वैज्ञानिक डेविड बेडफोर्ड कहते हैं कि उन्होंने बचपन से रेड डेलीशस सेब ही खाए थे. उन्हें दूसरे सेबों का स्वाद ही नहीं पता था. हालांकि बाद में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर सेब की एक नई क़िस्म हनीक्रिस्प को विकसित किया. आज से कुछ साल पहले इसे उगाने के लिए बाज़ार में उतारा गया. ये पीले रंग का होता है और इस में लाल धारियां बनी होती हैं.

रेड डेलीशस से अलग क़िस्म के सेब भले उगाए जा रहे हों, मगर आज भी ज़ोर लाल रंग के सेबों पर ही है. हाल ये है कि हनीक्रिस्प सेब की भी लाल रंग वाली प्रजाति विकसित कर ली गई है. डेविड बेडफोर्ड कहते हैं कि बाज़ार में आने वाले हर सेब के साथ यही होता है. हम लाल रंग के ही सेब चाहते हैं.

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लाल रंग के सेब पीले रंग के सेब से बेहतर ही हों, ये ज़रूरी नहीं है. बल्कि कई बार तो लाल रंग के सेबों का स्वाद पीले रंग के सेबों से ख़राब ही होता है. लेकिन, दिक़्क़त ये है कि लाल रंग के सेब ही ज़्यादा बिकते हैं.

इस चुनौती से बचने के लिए मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक साथ कई सेबों की नस्लें बाज़ार में उतारी हैं. इस में किसानों के पास रंग चुनने का विकल्प नहीं है.

जब आप देखते हैं कि जंगली सेबों के कितने सारे रंग होते हैं, तब आप को अंदाज़ा होता है कि लाल रंग के सेबों के चक्कर में हम अच्छे स्वाद वाले सेबों से कितने दूर होते जा रहे हैं.

अब सवाल ये उठता है कि क्या कभी सेब का ये असली रंग, लाल रंग के प्रति हमारे विशेष लगाव पर जीत सकेगा?

इतिहास हमें बताता है कि ये बहुत बड़ी चुनौती है. लेकिन, हमें ऐसा वक़्त आने का ख़्वाब देखने से भला कौन रोक सकता है?

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