मर्दों के मुक़ाबले वीगन औरतों की संख्या ज़्यादा क्यों है?

  • 24 फरवरी 2020
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खाने की आदतों की बुनियाद पर लोग दो तरह के होते हैं, शाकाहारी और मांसाहारी. लेकिन आजकल एक नया शब्द काफ़ी चलन में है. 'वीगन'. वेगन आहार में पूर्ण रूप से केवल फल और सब्जियां ही शामिल हैं. वीगन डाइट फॉलो करने वाले लोग दूध और दूध से बने उत्पादों का भी सेवन नहीं करते.

आज दुनिया भर में वेगन लोगों की अच्छी ख़ासी संख्या है. सेलिब्रिटी के बीच तो वीगन डाइट का चलन कुछ ज़्यादा ही है. कहा जाए कि फिल्मी सितारों और दीगर मशहूर हस्तियों ने ही इस आहार को ज़्यादा लोकप्रिय बनाया है, तो ग़लत नहीं होगा.

अमरीका के बड़े सेलेब्रिटी जैसे, माइली साइरस, वीनस विलियम्स, अरियाना ग्रांड, बियोन्से आदि वीगन आहार की ब्रांड एम्बेसडर कहलाती हैं. इन्हीं की देखा देखी बॉलीवुड में भी बहुत सी अभिनेत्रियों ने वीगन होने का एलान कर दिया है. इसमें सोनम कपूर, करीना कपूर, मल्लिका शेरावत जैसे नाम शामिल हैं. इसके अलावा शाहिद कपूर, आमिर खान, अक्षय कुमार जैसे बड़े अभिनेताओं ने भी ख़ुद के वेगन होने का एलान कर दिया है.

लेकिन हैरत की बात है कि वीगन लोगों में मर्दों के मुक़ाबले, औरतों की संख्या कहीं ज़्यादा है. अमरीका में वीगन लोगों की संख्या जानने के लिए एक सर्वे किया गया. सर्वे में सैम्पल साइज़ 11 हज़ार का था. नतीजे में पाया गया कि वेगन आहार लेने वालों में सिर्फ़ 24 फ़ीसद ही पुरुष हैं. वीगन आहार सेहत के लिए काफ़ी फ़ायदेमंद है फिर भी मर्द इसकी तरफ़ आसानी से आकर्षित क्यों नहीं होते?

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मर्दों को शायद लगता है कि मांस खाना मर्दानगी की निशानी है. जबकि सिर्फ़ फल-सब्ज़ियां खाने से उनकी मर्दानगी को चोट लगती है. समाज में उन्हें नीची नज़र से देखा जाने लगता है. ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसे अगर कोई लड़का बचपन में गुड़िया की चोटी गूंथने लगे तो कहा जाता है, उसमें लड़कियों वाली अदाएं हैं. यानी उसे मर्द की श्रेणी में रख दिया जाता है.

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ये सोच आख़िर पनपी कैसे?

अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ कोलम्बिया के मनोवैज्ञानिक प्रोफ़ेसर स्टीवन हाइन का कहना है कि शुरुआत में इंसान पेट भरने के लिए शिकार करता था और मांस खाता था. शिकार करना, मर्दों के हिस्से का काम था. जब समाज जैसी किसी चीज़ की कल्पना भी इंसान के दिमाग़ नहीं थी, तब भी वो अप्रत्यक्ष रूप से पितृसत्तातमक समाज में ही जी रहा था. चूंकि मर्द शिकार करते थे, इसीलिए मांस खाना अपनी शान समझते थे.

आगे चलकर बाज़ार ने भी मर्दों की इस सोच और आदत को और पुख़्ता किया. उन्नीसवीं सदी में जब महिलाओं ने अलग पार्टियों में खाना शुरु कर दिया, तो रेस्टोरेंट और विज्ञापन पेश करने वाली कंपनियों ने खानों को दो वर्गों में बांट दिया. दाल, सब्ज़ी, सलाद और दही को महिलाओं का खाना कहा जाने लगा. जबकि, मांस, मछली, अंडे आदि मर्दों का खाना कहलाए जाने लगे. यही सोच हम आज भी अपनी अगली पीढ़ियों तक पहुंचा रहे हैं.

'सॉय बॉय' एक ख़ास तरह का शब्द है, जो उन लड़कों या मर्दों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो सोयाबीन का सेवन ज़्यादा करते हैं. माना जाता है कि सोयाबीन का ज़्यादा सेवन करने से मर्दों की शारीरिक संरचना बिगड़ जाती है. सेक्स की ख़्वाहिश में कमी आ जाती है. हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. लेकिन ये सोच बड़े पैमाने पर पाई जाती है. 'सॉय बॉय' शब्द शब्दकोश तक में मौजूद है. प्रोफ़ेसर हाइन का कहना है कि बहुत से मर्द रेस्टोरेंट आदि में खाना खाते समय सलाद या सब्ज़ियां ऑर्डर करने से शरमाते हैं. कहीं भीतर डर रहता है कि उनकी मर्दानगी पर शक तो नहीं किया जाएगा.

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औरतें ज़्यादा रहमदिल?

रिसर्च में ये भी पाया गया है कि औरतें, मर्दों के मुक़ाबले ज़्यादा दयालु और रहमदिल होती हैं. जानवरों से उन्हें ख़ास लगाव होता है. शायद इसलिए भी महिलाएं पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा संख्या में वीगन हैं. जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वालों में भी महिलाओं की ही संख्या ज़्यादा है. लगभग 75 फ़ीसदी. 1940 में अमरीका में जानवरों के अधिकार की मांग उठाने वाली दो महिलाएं ही थीं. ऐसा भी ज़रूरी नहीं कि जानवरों से प्यार करने वाली महिलाएं मांस बिल्कुल ही ना खाएं. बहुत सी स्टडी से पता चलता है कि ऐसे बहुत से लोग हैं जो जानवरों से हमदर्दी तो करते हैं, लेकिन मांस खाना भी पसंद करते हैं.

दरअसल बाज़ार में मांस इतने सलीक़े से बेचा जाता है कि ख़रीदने वाला ये भूल ही जाता है कि ये मांस किसी की जान लेकर उसके शरीर से नोंच कर निकाला गया है. मसलन दुकानों में जानवरों की आंखें, उनकी खाल, पैर, ज़बान इत्यादि दुकान में नहीं रखे जाते. अगर ये सब दुकान में रख दिया जाए, तो, हो सकता है ख़रीदने वाले का मन बदल जाए. वो मांस खाना ही छोड़ दे. वहीं रेस्टोरेंट में भी मांस के पकवानों के तरह-तरह के नाम होते हैं. जैसे अगर किसी को सुअर का गोश्त खाना है, तो, वो ये शब्द इस्तेमाल नहीं करेगा. वो कहेगा उसे पोर्क चाहिए. बकरे का गोश्त खाना है तो कहेगा मटन चाहिए. ऐसे नाम शायद एहसास-ए-गुनाह से बचने के लिए रखे जाते हैं.

मांस खाने वालों के पास अपनी आदत को सही साबित करने के लिए दलील भी मौजूद होती हैं. वो इसे क़ुदरती खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बताते हैं. कहते हैं कि अगर जानवरों को खाया नहीं गया, तो क़ुदरत का निज़ाम बिगड़ जाएगा. गोश्त को ख़ुदा की नेमत समझ कर खा लेना चाहिए. कुछ विद्वान कहते हैं कि मांस, इंसान की प्रोटीन की ज़रूरत पूरा करने के लिए ज़रूरी है. लिहाज़ा इसे खाना कोई बुरी बात नहीं.

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1980 की एक रिसर्च बताती है कि आदिम समाज में मर्द ही शिकार करने का काम करता था. ज़ाहिर है उसके पास ताक़त ज़्यादा थी. लिहाज़ा ऐसे समाज जहां मांस खाने का चलन ज़्यादा होता है वह पुरुष प्रधान समाज होते हैं. जबकि खेती पर निर्भर समाज समानता के सिद्धांत पर विश्वास रखते हैं. क्योंकि ऐसे समाज में महिलाओं की भागीदारी भरपूर होती है.

बहरहाल, मर्दों के मुक़ाबले वीगन औरतों की संख्या ज़्यादा क्यों है इस पर रिसर्च अभी जारी है. लेकिन एक बड़ा सच यही है कि, महिलाएं ही वीगन डायट ज़्यादा अपनाती हैं. इसकी एक बड़ी वजह शायद सहानुभूति है, जो पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं में ज़्यादा होती है.

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