क्या कभी असली हीरे को मात दे पाएगा लैब में बना हीरा?

  • हैरियट कॉन्स्टेबुल
  • बीबीसी फ़्यूचर
हीरा

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ट2019 की जनवरी में जब लोगों ने ब्रिटेन की राजकुमारी मेगन मार्कल को देखा तो बस देखते ही रह गए.

उन्होंने बहुत ही स्मार्ट कोट और हाई हील पहने हुए थे. लेकिन लोगों की नज़र उनके कपड़ों पर नहीं थी, बल्कि उनके हीरे के झुमकों पर थी.

उनके झुमकों का ये हीरा पांच दिन पहले ही किमाए नाम की कंपनी ने लैब में तैयार किया था.

इस कंपनी की सह-संस्थापक सिडनी न्यूहॉस और उनकी साथी जेसिका ख़ुद हीरे के कारोबारियों के ख़ानदान से ताल्लुक़ रखती हैं.

लेकिन इन दोनों ने ही पारंपरिक हीरे के उत्पादन से ख़ुद को दूर रखा. वजह है, इसके पर्यावरण और मानवीय पहलू.

आज ज़्यादातर लोग परंपरागत हीरे की जगह लैब में तैयार हीरा ही ख़रीदना पसंद करते हैं.

आख़िर लैब में हीरा तैयार कैसे किया जाता है? क्या ये पारंपरिक हीरे का स्थाई विकल्प है? लैब में तैयार हीरे में किसी आम हीरे के सभी तत्व मौजूद हैं.

हीरा धरती के अंदर बहुत गहराई में भीषण दबाव और गर्मी से तैयार होता है. धरती के अंदर हीरा तैयार होने में करोड़ों साल लगे हैं.

ये वो समय था जब धरती बहुत ज़्यादा गर्म हुआ करती थी. लैब में भी हीरा तैयार करने के लिए उतना ही तापमान पैदा किया जाता है.

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लैब में कैसे तैयार होता है हीरा?

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लैब में दो तरह से हीरा तैयार होता है. दोनों ही सूरतों में हीरे के एक टुकड़े को दूसरे हीरे के साथ इस्तेमाल किया जाता है.

पहला लैब डायमंड, हाई प्रेशर हाई टेम्प्रेचर सिस्टम(HPH) से तैयार किया गया था. फिर दूसरे हीरे के चपटे टुकड़े को जिसमें विशुद्ध ग्रेफ़ाइट कार्बन होता है, 1500 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर दबाया जाता है.

हाल ही में प्रयोगशाला में हीरा तैयार करने का एक और तरीक़ा खोजा गया है. इस तकनीक को केमिकल वेपर डिपोज़िशन (CVD) कहते हैं.

इस तकनीक में सीड को कार्बन गैस के एक कक्ष में रख दिया जाता है. और उसे 800 डिग्री सेल्सियस की गर्मी पर पकाया जाता है. जिससे हीरे के परमाणु तैयार होते हैं.

लैब में तैयार हीरे की क़ीमत परंपरागत हीरे के मुक़ाबले कम होती है. इसीलिए इसकी मांग भी ज़्यादा है. बढ़ती मांग को देखते हुए कंपनियों ने हाल के वर्षों में कई तरह के प्रयोग किए हैं.

एंटवर्प वर्ल्ड डायमंड सेंटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ हीरा ख़रीदारों का बाज़ार हर साल 15 से 20 फ़ीसद बढ़ रहा है. बाज़ार की इतनी बड़ी मांग परंपरागत हीरे से पूरी नहीं की जा सकती.

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कुछ हीरे की खदानें इतनी बड़ी होती हैं कि उन्हें अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है

पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है पारंपरिक हीरा?

डायमंड प्रोड्यूसर एसोसिएशन (DPA) के मुताबिक़, खान से हीरा निकालने के मुक़ाबले लैब में हीरा तैयार करने में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तीन गुना ज़्यादा होता है.

इसीलिए ख़ुद को इको-फ़्रेंडली कहने वाली हीरा कंपनियों को अमरीका की फ़ेडरल ट्रेड कमिशन ने चेतावनी भी दी है. कंपनियों से कहा गया है कि वो अपने दावे के समर्थन में पुख़्ता सबूत दें.

दूसरी ओर डायमंड फ़ाउंड्री का कहना है, कि खान से हीरा निकालने में ज़्यादा ऊर्जा का इस्तेमाल होता है. ज़मीन से हीरा निकालने में ऐसे ईंधन का इस्तेमाल होता है, जो पर्यावरण के लिए मुफ़ीद नहीं है.

जबकि लैब में हीरा तैयार करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोत का इस्तेमाल होता है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ज़मीन से एक कैरेट हीरा निकालने के लिए 250 टन मिट्टी खोदी जाती है. हीरे की कुछ खदाने तो इतनी विशाल हैं कि इन्हें नासा के टेरा सेटेलाइट से देखा जा सकता है.

2014 की फ़्रॉस्ट ऐंड सलिवन की रिपोर्ट में भी ज़िक्र किया गया है कि खदान से निकाले जाने वाले हीरे में लैब में तैयार किए जाने वाले हीरे के मुक़ाबले दो गुना ज़्यादा ऊर्जा की ज़रूरत होती है.

खदान से एक कैरेट हीरा निकालने में 75 किलो कार्बन डाई ऑक्साइड पर्यावरण में मिलती है.

जबकि लैब में तैयार होने वाले हीरे में कुछ ही ग्राम कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है. लेकिन इस दावे पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता.

खदान से हीरा से पानी के दूषित होने की बात भी सामने आती है. खुदाई की वजह से कई तरह के रसायन निकलते हैं, जो पानी में मिलकर उसे प्रदूषित कर देते हैं.

लेकिन ये मसला अन्य खनिज खदानों के साथ भी है. यही नहीं, खुदाई की वजह से उस जगह रहने वाले जानवरों को विस्थापित होना पड़ता है.

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शेरों की आबादी पर हीरे का असर

मिसाल के लिए 2016 में द वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में कहा गया है कि डायमंड कंपनी डे बियर्स के खुदाई के काम के चलते कनाडा की झील में 18 हज़ार मछलियां मर गई थीं.

भारत में भी हीरा खदानों के चलते शेरों की संख्या पर असर पड़ा है.

हीरे की खुदाई के साथ मानवीय शोषण का पहलू भी जुड़ा है. खानों में खुदाई के काम के लिए अक्सर छोटे बच्चों को लगाया जाता है.

क्योंकि वो मामूली पगार पर उपलब्ध होते हैं. यही नहीं, जिन परिस्थितियों में ये बच्चे काम करते हैं, वो पशुओं से भी बदतर होते हैं.

हीरा खदानों में काम करने वाले मज़दूरों के मानव अधिकारों के लिए कई बार आवाज़ उठी है. लेकिन अभी तक कामयाबी नहीं मिली है. खदानों में काम करने वाले मज़दूरों की मौत हो जाती है. लेकिन हर्जाने के नाम पर उनके परिजनों को कुछ नहीं मिलता.

मिसाल के लिए साल 2000 में ज़िम्बाब्वे में एक बड़ी हीरा खदान की खोज हुई.

और, इस खदान में काम करने वाले सैकड़ों मज़दूरों की मौत हो गई. यहां से मिलने वाला हीरा तो बाज़ार में ख़ूब बेचा गया. लेकिन जो मज़दूर मरे थे, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं था.

मजदूरों के हितों के ख़िलाफ़

एक चिंता ये भी है कि अगर लैब में हीरे का उत्पादन ज़्यादा किया जाने लगा, तो उन इलाक़ों में मज़दूरों की संख्या कम हो जाएगी, जो क़ुदरती संसाधनों से लबरेज़ हैं. और ऐसे ज़्यादातर देश विकासशील हैं.

जवाहरात में हीरा हर एक की पहली पसंद होता है. अमीरों के लिए तो ये वैसे भी आन-बान और शान की चीज़ होता है.

कुछ कंपनियों ने विज्ञापनों के ज़रिए इसे लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बना दिया है. जैसे डे बियर्स नाम की हीरा कंपनी ने 1947 में स्लोगन दिया था 'हीरा है सदा के लिए.'

लेकिन जब लैब में तैयार हीरा बाज़ार में मिलने लगा तो खदान से निकाले गए हीरे की मांग में कमी आने लगी.

चीन जैसा देश जहां दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हीरा बाज़ार है, वहां भी 2019 में हीरे की मांग में पांच फीसदी की कमी आई.

खदान से निकले हीरे का इस्तेमाल आज ज़्यादातर औज़ारों में किया जाता है जबकि, गहनों में, लैब में तैयार हीरा ही ज़्यादा इस्तेमाल होता है. हालांकि हीरे की ज़्यादा खपत ज़ेवरात में ही होती है.

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