कोरोना वायरसः क्या अल्ट्रा वायलेट किरणों से इसका ख़ात्मा हो सकता है?

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स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

दुनिया भर में फैल चुकी कोरोना वायरस की महामारी से निपटने के लिए तरह-तरह के नुस्ख़ों के दावे किए जा रहे हैं.

सोशल मीडिया पर तो इस वायरस को मारने के इतने फॉर्मूले उपलब्ध हैं कि गिनती करना मुश्किल है.

इन्हीं में से एक ये है कि कोरोना वायरस को अल्ट्रा वायलेट किरणों (UV) से मारा जा सकता है.

अल्ट्रा वायलेट (UV) रौशनी का इस्तेमाल कई दशक से कीटनाशक के तौर पर किया जाता रहा है.

ख़ास तौर से मेडिकल के क्षेत्र में माहौल से लेकर सिरिंज तक को कीटाणु मुक्त बनाने के लिए यूवी लाइट इस्तेमाल होती है.

पर, सवाल ये है कि क्या अल्ट्रा वायलेट किरणों से कोरोना वायरस का ख़ात्मा हो सकता है?

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यूवी किरणों से सैनिटाइज़

"अगर आप इंसानों पर अल्ट्रा वायलेट किरणों की बौछार करेंगे, तो असल में आप उन्हें भून डालेंगे." ये कहते हुए, डैन आर्नॉल्ड बेयक़ीनी से हंसते हैं.

डैन, यूवी लाइट टेक्नोलॉजी नाम की एक ब्रिटिश कंपनी में काम करते हैं.

उनकी कंपनी, अस्पतालों, दवा कंपनियों और खाना के निर्माताओं के यहां कीटनाशक सेवाएं उपलब्ध कराती है.

कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के साथ डैन के पास ऐसी गुज़ारिशों की बाढ़ आ गई है कि उनके घर को यूवी किरणों से सैनिटाइज़ कर दिया जाए.

डैन कहते हैं, "हमारे पास एक आदमी ने फ़ोन किया कि हमारी मशीनें कैसे काम करती हैं. फिर वो बोला कि क्यों न आपकी अल्ट्रा वायलेट मशीनों को सुपर मार्केट के बाहर लगा दें. और जिसके नीचे लोग कुछ देर खड़े हों, ताकि उनके शरीर में मौजूद सारे वायरस अल्ट्रा वायलेट किरणों से मर जाएं."

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नया कोरोना वायरस

इंटरनेट पर हर मामलों के जानकार मौजूद हैं. ऐसे ही स्वयंभू विशेषज्ञ लोगों को यूवी लाइट से वायरस इन्फ़ेक्शन ख़त्म करने के मशविरे बांट रहे हैं.

हद तो ये है कि थाईलैंड में एक कॉलेज ने तो अल्ट्रा वायलेट सुरंग बना डाली है, जिससे गुज़रते हुए छात्र ख़ुद को कीटाणु मुक्त कर सकते हैं.

कई लोगों के ज़हन में सवाल है कि चूंकि सूरज की किरणों में अल्ट्रा वायलेट किरणे भी शामिल होती हैं, तो क्या सूरज की रौशनी में खड़े होने से ये नया कोरोना वायरस ख़त्म हो जाएगा?

इस सवाल का छोटा सा जवाब है-नहीं. अब हम आपको इसकी वजह बताते हैं.

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ख़तरनाक किरणें

सूरज की रौशनी में तीन तरह की अल्ट्रा वायलेट किरणें (UV) मौजूद होती हैं. पहली है, यूवीए (UVA).

ये सूरज के ज़रिए धरती पर पहुंचने वाली सबसे अधिक अल्ट्रा वायलेट किरण होती है. ये इतनी शक्तिशाली होती है कि हमारी त्वचा को छेद कर हमारे शरीर में घुस जाती है.

हमारी त्वचा के बूढ़े होने, झुर्रियां पड़ने और बढ़ती उम्र के धब्बे पड़ने के लिए 80 फ़ीसद यही किरण ज़िम्मेदार होती है. इसके बाद नंबर आता है, यूवीबी (UVB) का.

ये अल्ट्रा वायलेट किरण हमारे शरीर के डीएनए तक को नुक़सान पहुंचा सकती है.

जो लोग सूरज की तपिश में झुलसने की शिकायत करते हैं, वो सन बर्न असल में इसी अल्ट्रा वायलेट बी (UVB) किरण की कारस्तानी होती है.

आम तौर पर लोगों को इन्हीं दो अल्ट्रा वायलेट किरणों के बारे में जानकारी होती है.

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अल्ट्रा वायलेट किरण

लेकिन, एक और अल्ट्रा वायलेट किरण होती है. यूवीसी (UVC). सूरज की रोशनी का ये कम जाना माना हिस्सा हैं. ये रोशनी का छोटा हिस्सा होती हैं.

इनमें ज़्यादा ऊर्जा होती है. ये ज़िंदा कोशिकाओं के डीएनए या आरएनए को नष्ट करने में बहुत कारगर होती हैं. फिर चाहे वो इंसानों की कोशिकाएं हों या वायरस की.

पर हम इससे बच जाते हैं. क्योंकि धरती के ऊपर मौजूद ओज़ोन की परत इन करिणों को रोक देती हैं. वरना हम इनके प्रहार से झुलस जाएं.

1878 में वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि इन किरणों को प्रयोगशाला में बनाकर इस्तेमाल किया जा सकता है.

आज, यूवी किरणों के ज़रिए अस्पतालों, हवाई जहाज़ों, दफ़्तरों और कारखानों में लगभग रोज़ाना इन किरणों का प्रयोग कीटनाशक के तौर पर होता है.

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परजीवी मर जाते हैं...

इन किरणों से पीने के पानी को कीटाणुओं से मुक्त किया जाता है. इससे वो परजीवी मर जाते हैं, जो क्लोरीन जैसे पानी साफ़ करने वाले केमिकल से भी बच निकलते हैं.

हालांकि, अब तक नए कोरोना वायरस पर यूवीसी (UVC) यानी अल्ट्रा वायलेट सी किरणों के प्रभाव पर बहुत अध्ययन नहीं किया गया है.

लेकिन, कोरोना वायरस परिवार के एक अन्य सदस्य, सार्स (SARS) वायरस पर इसके प्रभाव को लेकर काफ़ी रिसर्च हुई है.

इन अध्ययनों से पता ये चलता है कि अल्ट्रा वायलेट सी किरणों से सार्स कोरोना वायरस को ख़त्म किया जा सकता है.

सार्स (SARS) वायरस पर अल्ट्रा वायलेट किरणों के असर को देखते हुए, चीन में कोविड-19 से निपटने के लिए भी इन किरणों का प्रयोग किया गया है.

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सैनिटाइज़ेशन की प्रक्रिया

वहां बसों को हर रात अल्ट्रा वायलेट नीली रौशनी में नहलाया जाता है, ताकि वायरस का ख़ात्मा किया जा सके.

इसी तरह अस्पतालों में रोबोट के ज़रिए अल्ट्रा वायलेट किरणों से सैनिटाइज़ेशन की प्रक्रिया पूरी की जाती है.

यहां तक कि कई बैंक भी अपने पैसे को सैनिटाइज़ करने के लिए अल्ट्रा वायलेट किरणें इस्तेमाल करते हैं.

हाल के दिनों में अल्ट्रा वायलेट उपकरण बेचने वाली कंपनियों के उत्पादों की मांग बेतहाशा बढ़ गई है.

मगर, ऐसा नहीं है कि यूवी सी किरणों से हम नए कोरोना वायरस को मार सकते हैं.

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कीटाणु मुक्त करने के लिए...

डैन आर्नॉल्ड कहते हैं, "आप को सीधे तौर पर अल्ट्रा वायलेट सी किरणों के संपर्क में आने से बचना चाहिए. वरना कुछ देर सूरज की रौशनी में खड़े होने पर जैसे आपकी आंखें चुंधियाने लगती हैं. उसी तरह कुछ सेकेंड में ही यूवी सी की मशीन में आपका यही हाल हो जाएगा."

अल्ट्रा वायलेट सी किरणों के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए आप को विशेष प्रशिक्षण की ज़रूरत होती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सख़्त चेतावनी जारी की है कि आप अपने हाथों को कीटाणु मुक्त करने के लिए इन किरणों का इस्तेमाल न करें.

हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक नई तरह की अल्ट्रा वायलेट सी किरणों को खोजा है. जिन्हें इस्तेमाल करने में इंसानों को ख़तरा कम है.

पर, वो वायरस और बैक्टीरिया का ख़ात्मा कर देंगी.

इस नई यूवी सी के इंसानों पर असर का परीक्षण अभी लैब में ही हुआ है, तो मौजूदा महामारी से निपटने में ये भी कारगर नहीं साबित होगी.

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सूरज की रोशनी का सहारा?

अब सवाल ये है कि क्या हम नए कोरोना वायरस को यूवीए (UVA) या यूवीबी (UVB) किरणों से ख़त्म कर सकते हैं.

अगर संक्रमित चीज़ों को सूरज में छोड़ दिया जाए, तो क्या इस समस्या का समाधान हो सकता है?

शायद, इस तरीक़े से कोरोना वायरस तो ख़त्म हो सकता है. पर, आप इस प्रयोग पर भरोसा नहीं कर सकते.

विकासशील देशों में पानी को कीटाणु मुक्त करने के लिए सूरज की रोशनी में छोड़ दिया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसकी सलाह देता है.

जिसमें पानी को छह घंटे तक सूरज की रौशनी में छोड़ दिया जाता है, ताकि उसमें मौजूद सारे कीटाणु मर जाएं.

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ब्राज़ील में रिसर्च के दौरान देखा गया है कि जब जंगलों में पेड़ जलाए जाते हैं, तो ब्राज़ील में फ्लू की बीमारी ज़्यादा होती है

ब्राज़ील में फ्लू की बीमारी

पानी के बिना किसी सामान को भी सूरज की रोशनी में कीटाणु मुक्त किया जा सकता है. हालांकि, इसमें आपकी उम्मीद से भी ज़्यादा समय लगेगा.

पर, कितना लगेगा, ये हमें भी नहीं मालूम. क्योंकि कोविड-19 वायरस पर अभी रिसर्च बहुत कम हुई है.

हालांकि इसके रिश्तेदार यानी सार्स वायरस पर किए गए तजुर्बे में पाया गया कि अगर वायरस पंद्रह मिनट तक सूरज की रोशनी में रहता है, तो उस पर कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता.

ब्राज़ील में रिसर्च के दौरान देखा गया है कि जब जंगलों में पेड़ जलाए जाते हैं, तो ब्राज़ील में फ्लू की बीमारी ज़्यादा होती है.

यानी उस वक़्त यूवी किरणें धरती तक नहीं पहुंच पातीं और वायरस को अपना काम करने में आसान होती है.

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कैंसर का ख़तरा

वैसे, अभी तक ये पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि सूरज की रोशनी में नया कोरोना वायरस ख़त्म ही हो जाएगा.

पहली बात तो यही है कि इसमें कितना समय लगेगा, यही नहीं पता. कितनी तेज़ धूप की ज़रूरत होगी, ये भी नहीं मालूम.

दिन के अलग अलग समय पर सूरज की रौशनी में अल्ट्रा वायलेट किरणों की तादाद भी कम ज़्यादा होती है.

अलग अलग क्षेत्रों में भी सूरज की रोशनी की तुर्शी कम या ज़्यादा होती है. ऐसे में सूरज की रोशनी से इस नए कोरोना वायरस को मारने का ख़याल तो सिर्फ़ ख़याल ही है.

अगर आप अपनी त्वचा पर सीधे अल्ट्रा वायलेट किरणों की बारिश करते हैं, तो इससे आपकी स्किन को ही नुक़सान पहुंचेगा. इसमें स्किन कैंसर का भी ख़तरा है.

और, अगर वायरस आपके शरीर के भीतर पहुंच गया है, तो फिर आप कितनी भी अल्ट्रा वायलेट किरणें इस्तेमाल कर लें, उससे फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला.

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