गोले से क्यों मोहब्बत करते हैं हिंदू और बौद्ध?

बौद्धनाथ, नेपाल, काठमांडू, बीबीसी ट्रैवल, बौद्धनाथ स्तूप इमेज कॉपीरइट Getty Images

गोलों को कोई पसंद नहीं करता. रेखागणित पढ़ने वाले इन्हें नफ़रत से देखते हैं. दुनिया के ज़्यादातर लोगों को चौकोर आकार पसंद आता है. पश्चिमी सभ्यता में तो गोलों के ख़िलाफ़ कितना कुछ कहा गया है.

अगर हम किसी काम में फंस जाते हैं, तो डांटकर समझाया जाता है कि गोल-गोल मत घूमो. इससे हमारा सिर गोल-गोल घूमने लगता है.

इनके मुक़ाबले सीधी लक़ीरें और कोनों की तारीफ़ की जाती है. हमें सीधे चलने को कहा जाता है. बुज़ुर्ग हमेशा सीधे खड़े होने को कहते हैं. और फिर हमें सीधा निशाना लगाने को कहा जाता है. और मनोवैज्ञानिक सलाह देते हैं कि सीधा सोचो.

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Image caption बौद्धनाथ काठमाण्डू के पूर्वी भाग में स्थित प्रसिद्ध बौद्ध स्तूप है

बौद्धनाथ की अपनी अलग पहचान

गोलों के ख़िलाफ़ इस नफ़रत का नतीजा ये होता है कि हमारे ज़हन में इनके ख़िलाफ़ सोच गहरे बैठ जाती है. लोग सीधा सोचना, बैठना और चलना चाहते हैं. वो गोल-गोल घूमने या गोल घुमाकर बात करने को नापसंद करते हैं.

लेकिन, गोला इतना बुरा भी नहीं. कई बार ये ज़िंदगी में बहुत काम भी आ सकता है. इसके लिए आप को जाना होगा नेपाल की राजधानी काठमांडू.

काठमांडू से लगा हुआ एक गांव है बौद्धनाथ. यहां पर हज़ारों तिब्बती रहते हैं. गांव में आध्यात्म की तलाश में आकर बसे सैकड़ों विदेशी सैलानी भी आपको मिल जाएंगे. काठमांडू शहर का हिस्सा होने के बावजूद बौद्धनाथ ने अपनी अलग पहचान बचाकर रखी है.

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Image caption विश्‍व धरोहर में शामिल है यह स्तूप

बौद्ध धर्म के स्तूप का महत्व

बौद्धनाथ में पहुंचने पर आपको हर तरफ़ गोले ही दिखेंगे. यहां ज़िंदगी सीधी नहीं चलती, गोल चक्कर लगाती हुई मालूम होती है. असल में यहां पर एक बौद्ध स्तूप है. जिसकी मंडप सोने का है. स्तूप को चटख रंगों से रंगा गया है.

असल में बौद्ध धर्म के स्तूप गौतम बुद्ध के दिमाग़ की नुमाइंदगी करते हैं. इसके चक्कर लगाने का मतलब ये माना जाता है कि आपको भी बुद्धि प्राप्त होगी. इसीलिए आप कभी भी बौद्धनाथ गांव पहुंचेंगे, तो लोग मंत्र जपते हुए, माला फेरते हुए, पूजा का पहिया घुमाते हुए दिखाई दे जाएंगे. कलाई के एक इशारे से सिलेंडर गोल-गोल घूमने लगते हैं.

बौद्ध धर्म के अनुयायी गोल चीज़ें बेहद पसंद करते हैं. उनके मंडल ब्रह्मांड के गोल होने की नुमाइंदगी करते हैं. पूजा का पहिया और स्तूप सब गोलाकार होते हैं.

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Image caption इस स्तूप को 2015 के भीषण भूकंप में नुकसान पहुंचा था

धर्मों में गोलाकार की अहमियत

हाल ही में बौद्ध धर्म अपनाने वाले एक अमरीकी का कहना है कि गोल आकार के प्रति बौद्धों की मोहब्बत का नतीजा है कि बौद्ध लामा आलसी हो जाते हैं. अब आप गोल-गोल घूमेंगे, तो वक़्त की पाबंदी का दायरा कैसे तय होगा? या तो आप वक़्त से बहुत आगे होंगे, या फिर पीछे. ये बात गोले को देखने के नज़रिए से तय होगी.

वैसे गोल आकार सिर्फ़ बौद्ध धर्म में अहमियत रखता हो ऐसा नहीं है. हिंदू धर्म में भी इसकी बहुत अहमियत है. इस धर्म के मानने वाले भी संसार की चाल को चक्र के रूप में देखते हैं. जिसमें जीवन, मरण और पुनर्जन्म बार-बार होते हैं.

ये चक्र तभी टूटता है जब आप निर्वाण यानी मुक्ति पा लेते हैं. दूसरे धर्मों में भी गोले को ऊंचा दर्ज़ा हासिल है. जैसे कि सूफी संत. जो गोलाकार झूमकर अल्लाह से नज़दीकी महसूस करते हैं.

वहीं पश्चिमी सभ्यता में सीधी लक़ीर अहम है. ज़िंदगी लक़ीर के एक सिरे से शुरू होकर दूसरे सिरे पर ख़त्म होती है. लेकिन, बहुत सी सभ्यताओं की सोच अलग है. वो वक़्त और ब्रह्मांड को गोलाकार रूप में देखते हैं. इसीलिए उनके हिसाब से समय का पहिया घूमता है. इतिहास का चक्र घूमता है.

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Image caption यहां गोलाकार संरचना के चारो तरफ से लोग चक्कर लगाते हुए देखे जा सकते हैं

गोल-गोल घूमने का क्या मतलब?

ब्रह्मांड के गोल होने का ख़याल लैटिन अमरीकी क़ेरो इंडियन से लेकर होपी उत्तरी अमरीका के होपी इंडियन सभ्यता तक में पाया जाता है. इसी तरह जर्मन मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे मानते थे कि हमारी ज़िंदगियां ख़ुद को बार-बार दोहराती हैं.

जब आप गोल-गोल घूमते हैं, तो आप को लगता है कि असल में तो आप न तो कोई दूरी तय कर रहे हैं, न ही किसी मंज़िल तक पहुंच रहे हैं. शायद ज़िंदगी का दर्शन यही कहता है कि असल में आपको न तो कहीं जाना है और न ही कुछ करना है.

ये बात आपको अच्छी भी लग सकती है और डराने वाली भी. अगर कुछ करना नहीं है. कहीं जाना नहीं है. तो, ये कैसे पता चलेगा कि कुछ न करना सही है. हमारी ज़िंदगी मसरूफ़ियत भरी होती है. जिसमे भाग-दौड़ करनी पड़ती है. अब अगर आप को न कुछ करना है, न कहीं जाना है. तो, आप इतने मसरूफ़ कैसे हो सकते हैं?

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Image caption 2015 के भूकंप में क्षतिग्रस्त होने के बाद बौद्धनाथ स्तूप को मरम्मत के बाद नवंबर 2016 में फिर से खोला गया

कहीं ये विरोधाभास तो नहीं?

हाल ही में बौद्ध धर्म अपनाने वाले जेम्स हॉपकिंस कहते हैं कि एक फ़र्क़ है. बात असल में ये है कि आप बाहरी तौर पर तो बेहद सक्रिय हैं. मगर आपके भीतर, आपकी रूह ठहरी हुई है. चलते-फिरते रहना अच्छी बात है. इससे ज़िंदगी की तमाम ज़रूरतें पूरी होती हैं.

बौद्ध गांव में भी ज़िंदगी ऐसी ही है. सुबह उठकर आप रोज़मर्रा के काम में लगते हैं. फिर पूजा-पाठ करने में लग जाते हैं. स्तूप के इर्द-गिर्द घूमते हुए मंत्रों का जाप करना.

बौद्ध धर्म का सबसे जाना माना मंत्र है-ओम मणि पद्मे हम. ये कमल की महानता को नमन है, जो कीचड़ में ही पैदा होता है फिर भी साफ़-सुथरा और ख़ूबसूरत होता है.

जब आप स्तूप के चक्कर लगाते हैं, तो आप को लगता है कि आप कोई सफ़र तय कर रहे हैं. मगर असल में तो आप वहीं के वहीं होते हैं. इस चक्कर लगाने से आपको तरक़्क़ी के झूठ का पर्दाफ़ाश होता मालूम होगा. ज़िंदगी कोई सीधी लक़ीर नहीं.

बौद्ध धर्म आपके ज़हन में सवाल उठाता है. आप सोचते हैं कि क्या सब व्यर्थ है?

पिछले कुछ साल से बौद्धनाथ गांव में भी काफ़ी बदलाव आ रहे हैं. अब यहां पिज़्ज़ा की दुकान खुल गई है, जो लकड़ी के ईंधन पर पकाया जाता है. हालांकि गांव में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ है.

ऐसे में अगर कोई बार-बार बौद्धनाथ आता है, तो इसका क्या मतलब है? क्या उसने कोई तरक़्क़ी नहीं की है. इस सवाल का जवाब है नहीं. असल में यहां दोबारा आने वाले ने एक चक्कर लगा लिया है.

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