पांच हज़ार सालों से ज़मीन में दफ़्न ये नाव

अरब देश मिस्र दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक का केंद्र रहा है. यहां तमाम ऐतिहासिक सबूत हैं, जो इंसानी सभ्यता के गुज़रे हुए ज़माने का क़िस्सा बयां करते हैं.

मिस्र दुनिया भर में अपने पिरामिडों के लिए मशहूर है. इन्हें दुनिया के सात अजूबों में से एक माना जाता है. पिरामिड में मिस्र के प्राचीन राजा दफ़्न किए गए थे. इनके शवों को जिस तरह लेप लगाकर पिरामिड में दफ़नाया गया, उससे पता चलता है कि मिस्र की सभ्यता कितनी तरक़्क़ी कर चुकी थी.

दुनिया भर से लोग इन्हें देखने के लिए आते हैं.

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चुनौती है दफ़्न नाव को निकालने की

इन दिनों भयंकर रूप से तपते रेगिस्तान में बेहद दिलचस्प तजुर्बा चल रहा है. ये प्रयोग, गीज़ा के इस रेगिस्तानी इलाक़े में फ़राओ बादशाह ख़ुफ़ू के पिरामिड के ठीक बगल में चल रहा है. इसके लिए पिरामिड के बगल में ही एक लैब बनाई गई है.

इस लैब के भीतर पुरातत्व के जानकार और वैज्ञानिक एक हिमालय जैसी चुनौती से जूझ रहे हैं. इनके सामने चैलेंज है, ज़मीन में दफ़्न एक नाव को सुरक्षित बाहर निकालने की. ये नाव आज से क़रीब पांच हज़ार साल पहले यहां दफ़्न की गई थी.

Image caption पिरामिड के बगल में बनाई गई लैब

वैज्ञानिकों की इस टीम की अगुवाई जापान की वसेडा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक कर रहे हैं, जिन्हें इस तरह की खुदाई करके हज़ारों साल से दबी चीज़ों को बाहर निकालने में महारत हासिल है.

मिट्टी में दबी किसी चीज़ को निकालने का काम बहुत सावधानी से करना पड़ता है. ये बहुत नाज़ुक, बारीक़ और पेचीदा काम है. किसी एक टुकड़े को निकालने में ही हफ़्ते भर से ज़्यादा का वक़्त लग सकता है.

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नाव को तोड़ कर ज़मीन में गाड़ा गया था

इस टीम की अगुवाई कर रहे वसेडा यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर हिरोमासा कुरोकोची कहते हैं कि नाव की हालत बहुत अच्छी नहीं है. इसकी लड़की कमोबेश गल चुकी है. इसलिए इसे बहुत ही नाज़ुकी के साथ निकालना पड़ रहा है. इस काम में काफ़ी वक़्त लगेगा.

ये मिस्र के बादशाह के पिरामिड के बगल में दफ़नाई गई दूसरी नाव है. इससे पहले पिरामिड के पास से ही एक और नाव को ज़मीन खोद कर के निकाला गया था.

Image caption गीज़ा के म्यूज़ियम में रखी वो नाव जिसे 1954 में खुदाई के दौरान निकाला गया था

अब ये नाव गीज़ा के म्यूज़ियम में रखी हुई है. इस नाव को 1954 में हुई खुदाई के दौरान निकाला गया था.

जानकार बताते हैं कि पिरामिड के पास दफ़नाई गई इन नावों को तमाम टुकड़ों में तोड़कर ज़मीन में गाड़ा गया था. इनके पास ही इस बात की जानकारी भी पत्थर पर लिखकर दफ़नाई गई थी, कि, जब इन नावों को निकाला जाए, तो उसके टुकड़ों को जोड़कर कैसे नाव को दोबारा तैयार किया जाए.

क्यों दफ़्न किया गया था इन नावों को?

जैसा कि हिंदुस्तान में मान्यता है, उसी तरह मिस्र के प्राचीन निवासी भी पुनर्जन्म, और स्वर्ग-नर्क के विचारों पर यक़ीन करते थे.

माना जाता था कि जब इन फ़राओ बादशाहों की रूहें जागेंगी, तो उन्हें जन्नत तक ले जाने के लिए नाव की ज़रूरत होगी. इसीलिए बादशाहों की लाशों के साथ ये नावें भी पिरामिड में दफ़नाई गई थीं.

इस प्रोजेक्ट के अगुवा ईसा ज़ीदान बताते हैं कि नाव के टुकड़ों को एक-एक करके ज़मीन से निकाल कर लैब में लाया जाता है. टुकड़े हज़ारों साल से ज़मीन में दबे होने की वजह से बेहद नाज़ुक हो गए हैं.

टुकड़ों को फिर से तैयार करने के लिए लैब में एक ख़ास ठिकाना बनाया गया है. जहां इस लकड़ी को सुरक्षित रखने के लिए एक ख़ास तापमान पर माहौल को रखा जाता है. यहां नमी 55 फ़ीसदी रखी जाती है. यहां काम करने वाले, टुकड़ों की नाप-जोख और वज़न करते हैं. इसके बाद उन्हें संरक्षित करने का काम होता है.

टुकड़ा-टुकड़ा जोड़कर ये टीम सिर्फ़ नाव नहीं तैयार कर रही है. बल्कि ये टीम असल में इतिहास के टूटे-बिखरे पन्नों को जोड़कर कहानी को मुकम्मल कर रही है, ताकि आने वाली नस्लें उसे पढ़ सकें. जान-समझ सकें.

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