अगर इस तरह ताज महल को कहीं शिफ्ट कर दिया जाए तो!

  • 15 मई 2018
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अगर दिल्ली से आगरा जाएँ, तो ताज महल यमुना के दाईं तरफ़ पड़ता है. दिल्ली से जाने वालों को शहर के बीच से होकर गुज़रना पड़ता है. अक्सर मुश्किल हो जाती है कि जाम लगा है.

क्या हो अगर ताज महल को उठाकर यमुना के इस पार रख दिया जाए?

आप यक़ीनन कहेंगे कि क्या बेतुकी बात है? किसी सैकड़ों साल पुरानी इतनी बड़ी इमारत को आख़िर कैसे उठाकर यमुना के इस पार रखा जाएगा?

माना कि तकनीक ने काफ़ी तरक़्क़ी कर ली है. इंसान चांद पर पहुंच चुका है और मंगल पर जाने की तैयारी में है. फिर भी ताज महल या ऐसी किसी इमारत को उठाकर दूसरी जगह रखना अब भी कमोबेश नामुमकिन है.

पर, हम आपसे कहें कि मिस्र में ऐसा कारनामा किया जा चुका है, तो?

नहीं यक़ीन आया न! यक़ीन मानिए, मिस्र में आज से आधी सदी पहले ऐसा कारनामा इंसान कर चुका है. जब क़रीब तीन हज़ार साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत को उठाकर दूसरी जगह ले जाकर उसी रूप में फिर से स्थापित कर दिया गया.

चलिए पूरा क़िस्सा तफ़्सील से बताते हैं.

मिस्र का यह ऐतिहासिक मंदिर

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Image caption मिस्र का प्राचीन अबु सिम्बल मंदिर

दुनिया के हरेक कोने में तारीख़ सिमटी है. वक़्त के थपेड़ों से ऐसी बहुत सी तारीख़ी चीज़ों के नामो-निशां मिट गए, लेकिन अभी भी दुनिया में हज़ारों ऐसी इमारतें और जगहें हैं, जो इंसानी सभ्यता के विकास के सबूत के तौर पर मौजूद हैं.

इन्हें आने वाली नस्लों के लिए संजोने का काम बरसों से चलता आ रहा है. दुनिया में ऐसी बहुत सी ऐतिहासिक धरोहरें हैं जिन्हें अगर समय रहते बचाया नहीं गया होता तो शायद इतिहास का एक क़ीमती ख़ज़ाना मिट्टी में मिलकर ख़त्म हो गया होता.

इतिहास का ऐसा ही एक ख़ज़ाना मिस्र के लोगों ने यूनेस्को के सहयोग से ख़त्म होने से बचाया है और आज ये यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट यानी विश्व की धरोहरों की फ़ेहरिस्त में शामिल है.

मिस्र का अबु सिम्बल मंदिर दक्षिणी मिस्र की प्राचीन घाटी नुबियन में पहाड़ काट कर बनाया गया है. मंदिर के अंदर की ख़ूबसूरती देखते ही बनती है. मंदिर की छत से लेकर फ़र्श तक उस दौर के राजा फ़राओ रैमसेस द्वितीय की जंगों में मिली कामयाबियों के क़िस्से उकेरे गए हैं. दरअसल इस मंदिर का निर्माण इसी राजा ने करवाया था. मंदिर के बाहर भी फ़राओ के चार विशाल बुत बने हैं जिनका रुख़ सामने से बह रही नदी की ओर है.

इस मंदिर से नज़र आने वाला नज़ारा विलक्षण है. अगर विएना हिस्टोरिक सेंटर, कम्बोडिया के अंकोरवाट या यूनेस्को की दीगर वर्ल्ड हेरिटेज साइट की तरह अबु सिम्बल को संजोया नहीं गया होता तो शायद ये अद्भुत मंदिर पास से गुज़रने वाली नील नदी से जुड़ी झील में डूब कर ख़त्म हो चुका होता.

काटकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया गया मंदिर

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ब्रिटिश जियोग़्राफ़िक एक्स्पेडीशन कंपनी की डायरेक्टर किम कीटिंग का कहना है कि मिस्र ने अपनी ऐतिहासिक धरोहरें बचाने के लिए बहुत काम किया है. अबु सिम्बल का ये मंदिर इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जिसे नील नदी पर बनने वाले अस्वान बांध की वजह से एक जगह से हटाकर दूसरी जगह तामीर किया गया, वो भी जस का तस.

उत्तरी अफ़्रीक़ा की नुबियन घाटी एक तरफ़ दक्षिणी मिस्र तो दूसरी तरफ़ उत्तरी सूडान तक फ़ैली है. दूर-दराज़ में खजूर के दरख़्तों से घिरे नख़लिस्तान हैं जहां से मौसमी नदियां निकलती हैं. यहीं से होकर बहती है मिस्र का वरदान कही जाने वाली नील नदी. तमाम छोटी नदियां इसी में आकर मिल जाती हैं. प्राचीन काल में ये इलाक़ा बहुत दौलतमंद था. उस दौर के राजाओं ने यहां पिरामिड, विशाल इमारतें और मंदिर बनवाए. इसके पीछे उनका मक़सद अपनी ताक़त का नमूना पेश करना था ताकि आने वाली पीढ़ियां उन्हें याद रखें.

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इसी दौर में यानी ईसा से क़रीब 1300 साल पहले अबु सिम्बल मंदिर भी बनवाया गया था. तारीख़ी सबूतों के मुताबिक़ इस मंदिर के निर्माण में क़रीब बीस साल का समय लगा था. इसी मंदिर के साथ एक और छोटा-सा मंदिर है जो फ़राओ रैमसेस की पत्नी नेफ़रतारी की शान में बनवाया गया था.

नील नदी इस मंदिर के बहुत नज़दीक से होकर गुज़रती है. मिस्र के लोगों की पानी की ज़रूरत पूरी करने और बिजली पैदा करने के लिए साठ के दशक में अस्वान बांध की योजना बनी. अस्वान बांध की वजह से उस इलाक़े में एक झील बन जाने वाली थी जिसमें ये मंदिर डूब जाता. आज उस झील को कर्नल नासिर झील के नाम से जानते हैं.

बांध से डूब सकता था मंदिर

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Image caption इस बांध की वजह से मंदिर के डूबने का ख़तरा पैदा हो गया था

उस वक़्त संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने इस धरोहर को इंसानियत के लिए ज़रूरी मानते हुए बचाने का फ़ैसला किया. तमाम देशों से जानकार बुलाकर मिस्र में जमा किए गए. इसके बाद तय हुआ कि मंदिर को टुकड़ों में काटकर दूसरी जगह ले जाकर फिर से जमाया जाएगा.

इस टीम ने क़रीब पांच साल तक मशक़्क़त की. मंदिर के टुकड़े-टुकड़े करके उन्होंने उसे उठाया और उसी पहाड़ी पर क़रीब 60 मीटर ऊंचाई पर लाकर फिर से जोड़कर उसी तरह का मंदिर तैयार कर दिया. बादशाह रैमसेस के मंदिर को 860 टुकड़ों में काटा गया. वहीं रानी के मंदिर को दो सौ से ज़्यादा टुकड़ों में काटकर दूसरी जगह ले जाया गया.

मज़े की बात रही कि दूसरी जगह ले जाकर भी मंदिर को इस तरह से बनाया गया कि पुराने मंदिर के बराबर रोशनी ही उस पर पड़े. यहां तक कि साल में दो बार, यानी 22 फ़रवरी और 22 अक्टूबर को सूरज की किरणें मंदिर के भीतर तक पहुंचती हैं और रैमसेस के बुत को रोशन करती हैं. माना जाता है कि 22 फ़रवरी को ही बादशाह रैमसेस ने गद्दी संभाली थी. वहीं 22 अक्टूबर को रैमसेस द्वितीय का जन्म हुआ था.

उसी नाप के खांचे दूसरे पहाड़ पर उकेरे गए

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Image caption 1960 के दशकों में इंजीनियरों की एक टीम ने इस पूरे मंदिर को एक ऊंची जगह पर शिफ्ट किया

यूनेस्को के वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर के डायरेक्टर डॉ. मेक्टिल्ड रोस्लर का कहना है कि मंदिर को एक जगह से हटाकर दूसरी जगह ले जाने और स्थापित करने का काम आसान नहीं था. आज इस तरह के काम की कल्पना भी नहीं की जा सकती. मंदिर के जिन टुकड़ों को हटाया गया था बिल्कुल उसी नाप के खांचे दूसरे पहाड़ पर उकेरे गए थे. ये बहुत मुश्किल काम था.

डॉ. रोस्लर कहते हैं कि अबू सिम्बल ही ऐसी इमारत थी जिसके निर्माण में यूनेस्को की सांस्कृतिक टीम, विज्ञानिकों और शिक्षा विभाग ने एक साथ मिलकर काम किया था. यूनेस्को के लिए ये एक जोखिम भरा प्रोजेक्ट था. लेकिन इस प्रोजेक्ट के बाद साबित हो गया कि यूनेस्को दुनिया भर में फैले अपने-अपने क्षेत्र के माहिरों को साथ लाकर काम करने का क़ाबिल है. साथ ही सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरें बचाने के लिए वो दुनिया को साथ लेकर चल सकते हैं.

इसकी स्थापना 1945 में हुई थी. 60 के दशक में इसके केवल 100 सदस्य देश हुआ करते थे. आज ये संख्या 195 है. जबकि इसके दस सहायक मेम्बर हैं. साथ ही इस प्रोजेक्ट ने एहसास दिलाया कि ऐतिहासिक धरोहरें बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोग एक साथ आ सकते हैं और फंड इकट्ठा कर सकते हैं.

कई प्रोजेक्ट पर काम कर रहा यूनेस्को

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Image caption यूनेस्को ने अब ऐसे कई प्रोजेक्ट पूरे करने का बीड़ा उठाया है

यूनेस्को ने अब ऐसे ही और कई प्रोजेक्ट पूरा करने का बीड़ा उठा लिया है. मिसाल के लिए अभी इटली के वेनिस शहर बचाने के प्रोजेक्ट पर काम जारी है जो कि 1960 में आई बाढ़ में कमोबेश तबाह हो गया था.

साल 1965 में वॉशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस कांफ़्रेस में वर्ल्ड हेरिटेज ट्रस्ट बनाने का प्रस्ताव रखा जिसके तहत दुनिया भर के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व वाली जगहों को संजोना था. इसके कुछ साल बाद ही इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर कन्ज़र्वेशन ऑफ़ नेचर ने ठीक इसी तरह का प्रस्ताव रखा. 1972 में दोनों प्रस्तावों को साथ मिलाकर काम किया जाने लगा.

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नूबिया कैंपेन प्रोजेक्ट की कामयाबी के बाद ही बहुत सी ऐतिहासिक धरोहरों जैसे मैक्सिको की मोनार्क बटरफ्लाई बायोस्फ़ेयर रिज़र्व, जर्मनी के केव एंड आइस एज आर्ट इन द स्वाबियन जूरा को बाचाया जा सका. इसके अलावा दक्षिण अफ़्रीक़ा का रॉबेन द्वीप भी यूनेस्को की कोशिशों की बदौलत ही दुनिया के सामने अपने असली रूप में आज भी मौजूद है. ये वही द्वीप है जहां की जेल में नेल्सन मंडेला को रखा गया था.

इसी तरह इराक़, यमन और इथियोपिया जैसे देशों में भी बहुत सी ऐतिहासिक धरोहरें बचाने का काम बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. ये वो देश हैं जो फ़िलहाल जंग की आग में जल रहे हैं. अगर यहां तारीख़ी निशान नहीं बचाए गया तो हो सकता है कि इंसानियत का बहुत बड़ा ख़ज़ाना दुनिया से ख़त्म हो जाए.

1700 साल पुराना एक्सम ओबेलिस्क

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Image caption 1700 साल पुराने एक्सम ओबेलिस्क को दोबारा इथियोपिया में लाकर स्थापित किया गया

अब से दस साल पहले यूनेस्को ने इथियोपिया के ओबेलिस्क ऑफ़ एक्सम को इटली से लाकर दोबारा स्थापित किया. ये अशोक की लाट जैसे ही ऊंचे खंबे हैं जो सैकड़ों साल पहले इथियोपिया के शासकों ने लगवाए थे. जब इटली ने 1937 में इथियोपिया पर क़ब्ज़ा किया तो उसमें से ये स्तंभ अपने देश उठा ले गए थे.

ये विशाल स्तंभ 160 टन ग्रेनाइट से बना है और 24 मीटर लंबा है. इसे इटली से वापस इथियोपिया लाने में यूनेस्को ने बहुत अहम रोल निभाया है.

अबु सिम्बल मंदिर 1968 में पूरी तरह से नई जगह पर तैयार हो गया था. आज उस वाक़ये को आधी सदी से ज़्यादा वक़्त बीत चुका है. ये मंदिर दुनिया भर में मशहूर है. दुनिया भर से लोग इसे देखने मिस्र आते हैं.

ज़रा सोचिए अगर तारीख़ के इस बेशक़ीमती ख़ज़ाने को इंसानियत ने एकजुट होकर ना संजोया होता तो दुनिया तीन हज़ार साल पुराने एक दौर के गवाह को दरिया-ए-नील के पानी में डुबो चुकी होती.

विश्व धरोहर को संजोने की ज़िम्मेदारी किसी एक देश की नहीं. न ही एक देश अकेले ये काम कर सकता है. इसके लिए मानवता को एकजुट होना होगा.

ऐसा होने पर तीन हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराने अबु सिम्बल मंदिर को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का चमत्कार हो जाता है.

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