सीरिया में बनी थी दुनिया के पहले गीत की धुन

  • 26 मई 2018
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अरब मुल्क़ सीरिया में इस वक़्त जंग के शोले धधक रहे हैं. हज़ारों लोग मौत के घाट उतारे जा चुके है.

सीरिया में चारों तरफ़ तबाही, भगदड़, ग़रीबी और बेरोज़गारी का मंज़र है. असुरक्षा का माहौल इस क़दर है कि लोग घरों में क़ैद हैं. ख़ौफ़ हर वक़्त उनका पीछा करता है.

बहुत से सीरियाई लोगों ने तो अपना वतन छोड़कर दूसरे इलाक़ों में पनाह ली है.

मगर इस ख़ून ख़राबे के बीच हम ये कहें कि दुनिया का पहला संगीतमय गीत सीरिया में तैयार किया गया था, तो शायद आप क़तई यक़ीन न करें.

इस सच से रूबरू होने के लिए हमें तारीख़ के पन्नों की धूल साफ़ करनी होगी.

रूह में बसा संगीत

सीरिया वो देश है जिसकी रूह में संगीत बसा है. इसी ने दुनिया को संगीत की चाशनी चखाई.

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मिलजुल कर एक साथ रहने और प्यार-मोहब्बत का पैग़ाम देने का सबक़ पढ़ाया.

दुनिया के नक़्शे पर मौजूदा सीरिया साल 1946 में उभरा. इससे पहले इसका दायरा काफ़ी बड़ा था.

यहां सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं, बल्कि यहूदी, ईसाई, कुर्द भी आबाद थे. सभी ने अपने-अपने स्तर पर यहां की संगीत की विरासत जोड़ने में अपना योगदान दिया.

दुनिया के पहले गीत की धुन

1950 में खुदाई के दौरान पुरातत्वविदों को यहां से क़रीब 3400 साल पुरानी 29 मिट्टी की पट्टियां मिली हैं.

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हालांकि इनमें से ज़्यादातर टूटी हुई हैं. लेकिन, एक पट्टी बिल्कुल साबुत है, जिस पर संगीत की कुछ धुनें उकेरी हैं. इस पट्टी को H6 का नाम दिया गया है.

जानकार कहते हैं कि ये दुनिया के पहले गीत की धुन है, जो सीरिया में तैयार की गई थी.

सीरिया के भूमध्यसागर तट पर स्थित इलाक़े उगारिट में जिस जगह ये पट्टियां पाई गई हैं, माना जाता है कि वो हिस्सा कभी लाइब्रेरी रहा होगा.

बहुत से वैज्ञानिक वर्षों से इन टूटी पट्टियों को जोड़ने और उन पर लिखी भाषा पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.

खुदाई में मिली मिट्टी की इन तख़्तियों पर बेबीलोन कीलाक्षर हुर्रियन लिपि लिखी है. सदियों पहले बेबीलोन सभ्यता में इस लिपि का इस्तेमाल होता था.

संगीत की ज़बान

इराक़ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर रिचर्ड डम्ब्रिल का कहना है कि ये लिपि आरमीनिया से आए लोगों की है, जिसे हुर्रियन कहा जाता है. लेकिन उन्होंने जो चिह्न इस्तेमाल किए हैं वो बेबीलोन सभ्यता में इस्तेमाल होने वाले चिह्न हैं. इसीलिए इन पट्टियों पर लिखी भाषा का सही-सही तर्जुमा करना मुश्किल हो रहा है.

पर इस बात में कोई शक नहीं है कि ये चिह्न संगीत की ज़बान बयान करते हैं.

इन तख़्तियों पर लिखी भाषा को जितना प्रोफ़ेसर डम्ब्रिल समझ पाए हैं, उसके आधार पर उनका कहना है कि, प्राचीन काल में सीरिया में बसने वाले जिन लोगों ने ये धुनें उकेरी थीं, उनके पास हर मौक़े के लिए कोई न कोई धुन और गाना था.

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प्राचीन काल के सबूत बताते हैं कि एक गाने में एक बार गर्ल की कहानी बयान की गई है जबकि H6 टेबलेट पर जो कुछ लिखा है, वो और भी कई दिलचस्प कहानियां बयान करती है.

ऊद नाम का संगीत यंत्र

संगीत चूंकि प्राचीन काल के सीरियाई लोगों का जुनून था, लिहाज़ा उन्हों ने ना सिर्फ़ मुख़्तालिफ़ धुनें तैयार कीं बल्कि कई तरह के संगीत वाद्ययंत्र भी बनाए.

जैसे वीणा और तम्बूरा इन्हीं लोगों की खोज हैं. बाद में इन्हीं से प्रेरित होकर अरब लोगों ने ऊद नाम का संगीत का यंत्र ईजाद किया.

इस यंत्र की ख़ासियत है कि इससे निकलने वाली आवाज़ पुरानी यादें ताज़ा करा देती है.

बीसवीं सदी में सीरिया के पुराने ठिकानों की खुदाई के दौरान प्रारंभिक कांस्य युग के शहर मरी से रिसर्चरों को ऐसे बहुत से सबूत मिले हैं.

ये यहाँ बड़े पैमाने पर संगीत वाद्य यंत्रों का कारोबार होने का इशारा देते हैं.

कैसे निखरा संगीत?

इस शहर से मिट्टी की ऐसी बहुत सी तख़्तियां मिली हैं, जिन पर संगीत के साज़ो-सामान की ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त का ब्यौरा लिखा है.

कुछ तख़्तियों पर कच्चा माल जैसे, लकड़ी, कच्चा चमड़ा और सोने-चांदी के ऑर्डर भी लिखे मिले हैं.

प्रोफ़ेसर डम्ब्रिल का कहना है कि जिन पुराने बाशिंदों ने दूर दराज़ से आकर सीरिया में पनाह ली थी, वो अपने साथ संगीत की विरासत भी लाए थे. और चार हज़ार साल पहले ही उन्होंने संगीत वाद्ययंत्र बना लिए थे. जब सीरिया की अपनी संस्कृति से इन बाहरी तत्वों का मेल हुआ, तो दोनों ने मिलकर संगीत को और निखारा.

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मिसाल के लिए ईरान का संगीत वाद्ययंत्र 'प्राशितुम' एक ख़ास तरह की वीणा थी, जो प्रारंभिक कांस्य युग के शहर 'मरी' में लड़कियों की बीच काफ़ी लोकप्रिय था.

सरहदें बनने से पहले की संस्कृति

सीरिया में संगीत का साज़ो-सामान बनाने का काम सदियों पुराना है.

वक़्त बीतने के साथ इसमें सुधार भी होता आया है. बहुत से पुराने वाद्ययंत्र आज भी यहां के लोगों ने संजो कर रखे हैं.

संगीत प्रेमी दूर-दूर से इन्हें देखने यहां आते हैं. मिसाल के लिए लेबनान के साइदा में शहर में ओटोमान साम्राज्य के ज़माने के 'दिब्बान पेलेस' में उस दौर के बहुत से वाद्ययंत्र संजो कर रखे गए हैं.

इन्हें देखने से पता चलता है कि लेबनान और सीरिया के बीच सरहदें बनने से पहले किस तरह की संस्कृति थी.

संगीत का चलन

दिब्बान पेलेस में तैनात गाइड ग़ासन डिम्से का कहना है कि ओटोमान साम्राज्य में संगीत का काफ़ी चलन था.

यहाँ औरतें भी हर तरह के वाद्ययंत्र बजाना जानती थी. वो भी संगीत की महफ़िलें सजाती थीं.

पिछले साल सीरिया ने अपने दूसरे सबसे बड़े शहर अलेप्पो को यूनेस्को की क्रिएटिव सिटीज़न नेटवर्क में 'सिटी ऑफ़ म्यूज़िक' के तौर पर शामिल कराया.

दरअसल सत्रहवीं सदी में अलेप्पो अपनी 'मुवाशशाह' नाम की संगीतमय शायरी के लिए जाना जाता था. इस शायरी में कई देशों की शायरी शामिल होती थी जैसे क्लासिकल अरबी शायरी, अंडालूसी शायरी और मिस्री शायरी. अंडालूसिया शायरी स्पेन की शायरी थी.

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मुवाशशाह मॉडर्न दौर के बैंड की शक्ल में पेश किया जाता था, जिसमें गायक के साथ संगीत के बहुत से साज़ा सामान जैसे ऊद, क़ानुन, कमानजा, दाराबुक्का और डफ़ली शामिल होते थे.

दोनों समाज के लोग शामिल

कानुन क्षैतिज आकार का बोर्ड होता था, जिस पर सितार या गिटार की तरह बहुत से तार बंधे होते थे.

इसे बजाने पर पानी के गिरने जैसी आवाज़ निकलती थी. इसे मौजूदा दौर का संतूर माना जा सकता है. कमानजा मॉडर्न दौर के वायलिन जैसा होता था. जबकि दाराबुक्का ढोल को कहते थे.

दिलचस्प बात ये है कि मुवाशशाह में मुसलमान और ईसाई दोनों समाज के लोग शामिल होते थे. यानी कहा जा सकता है कि सीरिया में संगीत, धर्म की दीवार तोड़कर इंसानों को एक दूसरे क क़रीब लाने का काम कर रहा था.

हालांकि सीरिया के मौजूदा हालात में लोग सिर्फ़ अपनी जान की हिफ़ाज़त के बारे में सोच रहे हैं. लेकिन, बहुत से संगीत प्रेमी सीरिया की इस विरासत को आज भी संजोने का काम कर रहे हैं. इसे दुनिया के सामने ला रहे हैं.

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लेबनान का शहर बेरूत इसमें सबसे अहम रोल निभा रहा है.

साल 2015 में लेबनान की राजधानी में 'मीज़फ़' नाम की एक संस्था क़ायम की गई. इसका मक़सद सीरिया और पूरे मध्य-पूर्व एशिया के संगीत की विरासत को संजोना है.

इसी तरह बेरूत में 'अस्सालीक' नाम का एक बैंड है. इसमें सीरिया और नॉर्वे के संगीतकार शामिल हैं. ये बैंड अपनी तुलना उस रॉबिनहुड से करता है जिसने अपने तरीक़े से शासक वर्ग के काम का तरीक़े बदलने की कोशिश की थी. इस बैंड के एक गायक मोना का कहना है कि संगीत हमारी पहचान और विरासत है. इसे संजोना हमारी जिम्मेदारी है.

...म्यूज़िक का सहारा

संगीत के ये शैदाई अपने साथ हुई नाइंसाफ़ियों के लिए संगीत को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं. समाज में फैल रही बुराइयों जैसे महिलाओं और बच्चों पर बढ़ते अत्याचार और बुरी आदतों से लड़ने के लिए भी म्यूज़िक का सहारा ले रहे हैं.

इसी तरह लेबनान में एक और ग्रुप है जो साल 2013 से सीरिया के लोक गीतों का अपने देश में प्रचार कर रहे हैं.

साथ ही लोक गीतों के साथ तजुर्बे करके नए गीत भी तैयार कर रहे हैं. अस्सालीक ग्रुप सीरिया के प्राचीन संगीत को एक नई शक़्ल देने का काम कर रहा है. पुराने और नए संगीत का कॉकटेल नए पीढ़ी को ख़ूब लुभा रहा है.

मोना कहते हैं कि आज अगर उनसे कोई सीरिया की पहचान के बारे में पूछता है तो उनका एक ही जवाब होता है. सीरिया मतलब संगीत और कला.

(बीबीसी ट्रेवल की ये मूल स्टोरी अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.)

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